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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

साखी । ( ६१७ )
जाकोसतगुरुनामल्यो, ब्याकुलचहुँदिशिधाय ॥
आँखिनसूझैबावरा, घरजारैघूरबुताय ॥ २३९ ॥
गुरुमुख ।
जाको सतगुरु नहीं मिले हैं सो ब्याकुल ह्वैकै चारों ओर धावै है कहूंब्रह्ममें
कहूंनाना ईश्वरनमें नानामतनमेंलागै है कि हमारी मुक्ति ह्वैजाय सो अरे बावरे
तेरी आंखिनमें नहीं सूझै है औरै औरै मतनमें निश्चय करै है सो घूरहै ताकों
कहा बुतावैहै मेरोरूप औ आपनोरूप ताको तौ जानु या घरतो जरोजाय है ताको-
बुताउ जातें जनन मरण छूटै घूर बुताये कहा है ॥ २३९ ॥
अनतवस्तुजोअनतैखोजै, केहिविधिआवैहाथ ॥
ज्ञानीसोईसराहिये, पारिखराखैसाथ ॥ २४० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनतकी बस्तु अनतै खोजै है कहेयह जीव साहबको
अंशहै सदाको दास है तौनेको कहै हैं कि ब्रह्म को है देवतनको है ईश्वरनकों
दासहै सो जौने साहबको दासहै ताको तो जानबही न कियो आपनो स्वरूप
कौनी रीतिते जानै सो हम तौ सोई ज्ञानीको सराहते हैं जो पारिख अपने साथ
राखै है कि हम साहबके हैं दूसरे के नहीं हैं न ब्रह्मके न मायाके न ईश्वरन के
हैंसोई सांचे ज्ञानीको हम सराहते हैं ॥ २४० ॥
सुनिये सबकी, निबेरिये अपनी ॥
सिन्धुरको सेंदोरा, झपनीकी झपनी ॥ २४१ ॥
जहाँ जहाँ सुनिये तहाँ तहाँ साहबहीकी बात निबेरि लीजिये और मत खण्डन करि
डारिये काहेते कि वेदशास्त्र सोई है जामे साहबको परत्वहोइ जोकहूं वेदशास्त्रक-
रिकै साहबको न जान्यो ताको उपदेश यहि रीतिते जैसे सिंधुर जो हाथी ताको
सेंदुर शृङ्गारिकियो वे शुण्डते धूरिभरियो झपनीकी झपनी कहे जैसे रज झपिगई
तैसे जबलौं उपदेश सुन्यो तबलो ज्ञानरह्यो। फिरि नहींरहै जौने वेद शास्त्रमें साहबको
परत्वहोइ सोई अर्थ । तामें प्रमाण चौरासी अंगकी साखी ॥ "राम नाम निज
जानिले, येही बड़ा अरत्थ॥ काहेको पढ़ि पढ़ि मरै, कोटिन ज्ञान गरत्थ"॥२४१॥

( ६१८ ) बीजक कबीरदास ।
बाजनदेवायंतरी, कलिं कुकुरी मति छेर ॥
तुझे बिरानी क्या परी, तू आपनी निबेर ॥ २४२ ॥
जे और और बातें सबकहैं हैं सो या शरीर यंत्रकहे बीणा है जैसों बजवैया
बजावै है तैसो बाजै है ऐसे या शरीरमनके आधीन है जहां चलावैहै तहां चलै है
कहूं बक बक करावै है कहूं ब्रह्ममें लगावै है नानामतनको सिद्धांतकरै है सो
वा यंत्रकों बाजनदे मन बैकळकुकुरिया है वाको विष जो तेरे चढ़ैगो तै
तुहूं बैकळह्वैमरि जाइगो अर्थात् चौरासी योनिमें परैगो सो तोको बिरानी कह
परी है तैं आपनी निबेरु जो तेरे यन्त्र बाजै है सुरति कमलमें गुरु राम
नाम ध्वनि उपदेश देइँ हैं ताको ध्यान करु राम नाम शब्द सब शब्दतें
अलगहै सोई साँचहै और सब मिथ्याहै सो तैं राम नाम ते सनेहकरु राम
नामको स्नेही मरत नहीं है तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “शून्य मरै अजपा मरै
अनहदहू मरि जाय ॥ राम सनेही ना मरै, कह कबीर समुझाय” ॥ २४२॥
गावैं कथैं विचारैं नाहीं, अन जानैको दोहा ॥
कहकबीरपारसपरशेबिन, ज्योंपाहनविचलोहा ॥२४३॥
नाना पुराण नाना शास्त्र नाना मत गावै हैं औ उनको कथनी करै हैं और
औरको समुझावै है परन्तु सर्व शास्त्रको अर्थ साहबही हैं यह नहीं बिचारै हैं
जैसे शुक चित्रकूटी राम कहि दियें न चित्रकूटको अर्थ न रामको अर्थ जानै है
आने में आन साजै है रसाभाव करि देयहै ऐसे सब शास्त्रको सिद्धांत जो जो
साहब पारस रूप तिनको तो जानतही नहीं है कौनी रीति जीव लोहा कञ्चन
होइ अर्थात् जब स्पर्श होय उनको जानि उनमें लगै भजन करै तब कञ्च-
न होय ॥ २४३ ॥
प्रथममैं एक जो हौ किया, भयासो बारह बाट ॥
कसत कसौटी ना टिका, पीतर भया निराट ॥२४४॥
प्रथममें यह जीवको एक कियो कहे एक राहमें लगायो कि मेरी भक्ति करै
गो तौ संसारते छूटि जायगो औ यह बारह बन भयो कहे आपने रूपी बाणकों

साखी। ( ६१९ )
बारह लक्षमें लगायो अर्थात् छःशास्त्रके सिद्धांतमें छःदरशनमें लगाय दियो
बारह बाट भयो मोको न जान्यो सो जब ज्ञानरूपी कसौटीमें कस्यो कि साहब
को ज्ञानहै कि नहीं तब पीतरही द्वैगयो जगन्मुखै ठहरयो साहबमुख न ठहरयो
सहाबको ज्ञान सोना न ठहरयो ॥ २४४ ॥
कबिरन भक्ति बिगारिया, कंकर पत्थर धोय ॥
अन्दरमें विषराखिकै, अमृत डारै खोय ॥ २४५ ॥
कबीरा जे जीव हैं ते भक्ति को बिगारि डारचो कंकर जो है जौने को पत्थर
जो हे मन तामें धोयकै॥"पाहन फोरि गंगयक निकरी चहुँदिशि पानी पानी॥"
या पदमें पाहन मनको लिखि आये हैं सो पाषाणमें जो कंकरधोवै तौ और
चूरचूरहै जाय सो मेरे भक्तिरूपी जलमें आपने अणुजीव कन्करको तैं नहीं धोये
पाथरमें धोये ताते चूरचूरहै नानामत नानादेवमें लागे आपने स्वरूपको न जाने
अन्दरमें विषयरूपी विषराखि अमृतरूप साहबको ज्ञानताको खोइ डाल्यो॥२४५॥
रही एककी भई अनेककी, वेश्या बहुत भतारी ॥
कहकबीर काके सँगजरिहै,बहुत पुरुषकी नारी २४६॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हैं जीव! तैं तो मेरो रह्यो है सो तैं अब बहुत मतनमें
लगिकै बहुत मालिक मानन लग्यो सो कौन तेरो उद्धार करैगो बहुत भतारी बेश्या
काके काके साथ जरैगी ॥ २४६ ॥
तनबोहित मन कागहै, लखयोजन उड़ि जाय ॥
कबहीं दरिया अगमवह, कबहीं गगन समाय ॥२४७॥
ये चारिउ शरीर बोहित कहे नावहैं तामें मनरूपी काग बैठा है सो लख यो
जनलौं उड़ि जायहै कबहूं संसार समुद्रमें बहत रहै है औ कबहूं पाँचवां शरीर जो
कैवल्य चैतन्यकाश अगम जायबे लायक नहीं तामें महालयादिकनमें समायहै
सो जे हरिकी शरण जायहैं ते यहि संसार समुद्रको गोखुरकी तुल्य उतरिं

( ६२० ) बीजक कबीरदास ।
जाय है तामैं प्रमाण ॥ “इच्छाकर भवसागर बोहित राम अधार॥ कह कबीर
हरि शरण गहु गोबछ खुर बिस्तार ॥ २४७ ॥
ज्ञान रत्नकी कोठरी, चुपकरि दीन्हो ताल ॥
पारखि आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल ॥ २४८ ॥
ज्ञान रत्नकी जो कोठरी है तामैं चुपको तारा दीन्हे ही रहिये जो कोई
समुझनेवारो पारखीहोइ ताहीके आगे रसालबचन कुंजीते चुपको तारा खोलिकै
ज्ञानको प्रकटकरिये काहेते कि जे नहीं समुझैं हैं तिनके आगे न कहिये साह-
बको ज्ञानरत्न वे कहाजानैं ॥ २४८ ॥
स्वर्गपतालके बीचमें, द्वैतुमरीयकबिद्ध ॥
षटदर्शन संशयपरो, लखचौरासीसिद्ध ॥ २४९ ॥
यह स्वर्ग पातालरूपी वृक्षमें जीव ईश्वररूप दुइतुमरीलगी हैं तामैं जीवरूपी
तुमरीबेधी है कहे जीवहीते नानाशब्द निकसै हैं शरीर सारी हैं सो येई जे
जीवहैं षट्दर्शनआदिदै कै तिनको नाना मतकरिकै संशयपरो है साहबको नहीं
जानै हैं एक सिद्धांत नहीं पावैं हैं तिनको चौरासी लाख योनि सिद्धि बनी हैं
भटकतही रहै हैं ॥ २४९ ॥
सकलौदुरमतिदूरिकरु, अच्छाजन्मबनाउ ॥
कागगवन बुधिछोड़िदे, हंसगवनचलिआउ ॥ २५० ॥
साहब कहैं हैं कि अरे जीव ! तेरो जो सकलहै शरीर सोई दुर्मति है सो
पांचौ शरीरनको छोड़िदे औ आपनो अच्छो जन्म बनाउ कागबुद्धि को त्यागू
मेरो दियो हंस शरीर तामैं टिकिकै मेरे पास आउ ॥ २५० ॥
जैसीकहै करै जो तैसी, रागद्वेष निरुवारै ॥
तामैं घटै बढ़ै रति औ नहिं,यहिविधिआपसँभारै॥२५१॥
गुरुमुख ।
साहबक कहैं हैं कि जैसो उपाय मैं तेरे छूटिबेको कहि आयौं है तैसोकरै
औ संसारमें नाना रागद्वेष करि राखै हैं ताको निरुवारै मोमें प्रीति रत्तिउभर
घटै न पावै एकरसही आवै ॥ २५१ ॥

साखी। (६२१)
द्वारे तेरे राम जी, मिला कबीरा मोहिं ॥
तूतो सबमें मिलि रहा, मैं न मिलौंगा तोहिं ॥ २५२ ॥
साहब कहैं हैं कि हे जीव! तेरे मुखद्वारमें मेरो राम असनाम बनो है ताकों
भजन करि हे कबीर! जीवौ मोको मिलौ जो कहौ कि साहब दयालु हैं वोई
मिलिबेकी सामर्थ्य देइँगे सो सत्यहै तेरी दया मोको लगै है परन्तु तैं सबमें
मिलिरहा है ताते मैं तोको न मिलूंगा तैं सब छोड़िदे तो मैं तोको आपसे
मिलौं आइ ॥ २५२ ॥
भर्मपरातिहुँलोकमें, भर्मबसा सब ठाउँ ॥
कहहि कबीर पुकारिकै, बसै भर्मके गाउँ ॥ २५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे जीव! साहब को तैं कैसे मिलै काहेते कि तीनौँ
लोकमें कर्म भर्म जो है धोखाब्रह्म सो भरो है तिनमें भर्म बसो है भरमहीमें
सब मिलिरहे हैं भरमके पार जे साहबहैं तिन को तो जानबेही न कियो ॥२५३॥
रतन लड़ाइनिरेतमें, कङ्कर चुनिचुनि खाय ॥
कहकवीरयहअवसरवीते, बहुरिचलेपछिताय ॥२५४॥
रतन जो है साहब को ज्ञान ताको रेतमें लड़ाय कहे लगाय दियो अति-
कठोर जो है कङ्कर ब्रह्मज्ञान तामें आत्माको लगायो चुनिचुनि खानलग्यो सो
कबीर जी कहैं हैं कि जब या अवसर बीति जायगो अर्थात् शरीर छूटिजायगो
तब पछितायगो वा धोखाब्रह्म में कुछ न मिलैगो ॥ २५४ ॥
जेते पत्रबनस्पती, औ गङ्गाकी रेणु ॥
पण्डितबिचारा क्याकहै, कविरकहै सुखवेणु ॥२५५॥
सारासारके बिचार करनेवारे पण्डित तोको केतो समुझावेंगे कबीरजी कहैहैं
हैं कि जेतो मैं समुझायो है कि बनस्पती पत्र गिनि जायँ औ गंगाकीरेणु गनी-
गनिजाएँ परन्तु मेरे मुखके बैन गने नहीं गिनिजायहैं तऊन तुम बूझयो॥२५५॥
१ पुरानी प्रतियोंमें इस शब्दके लिये "रमाइन" लिखाहै ।

( ६२२ ) बीजक कबीरदास ।
हमजान्यो कुलहंसहौ, ताते कीन्हो संग ॥
जो जनत्यौं बकवरणहौ, छुवन न देत्यौंअंग ॥२५६॥
कबीरजीकहें हैं कि हमतो तुमको हंसके कुलमें जानते रहे हैं ताते तुमको
उपदेश कियो तुम्हारो सङ्ग कियो है जो तुमको बकैकै बर्ण जानते कि हंस
नहींहो तो एकौ अंग छुवन न देत्यौ अर्थात् उपदेशकी बातहू न चलावतो उप-
देश को कौन कहै ॥ २५६ ॥
गुणिया तो गुणको गहै, निर्गुण गुणहि घिनाय ॥
बैलहि दीजै जायफर, क्या बूझै क्या खाय ॥ २५७ ॥
गुणियाकहै जोसगुणहोय है सो गुणको गहै है सत रज तमको जो धारण
करै है सो अशुद्धई रहै है ते मायाते नहीं छूटै हैं औजो निर्गुण उपासकहोइ
है सो सगुणको घिनाय है सो निर्गुणैवाले सगुणवाले साहबके गुणको कहा-
जानें वेतो सगुण निर्गुणके परे हैं मायाकृत गुणते रहित हैं दिव्यगुण सहित हैं
काहेते कहै हैं कि बैलके आगे जो जायफर धरिदीजिये तौ कहा बूझै क्याखाय
ऐसे वे साहबके गुणको कहाजानैं ॥ २५७ ॥
अहिरहु तजि खसमहु तज्यो, विना दाँतको ठोर ॥
मुक्तिपरी बिललातिहै, वृन्दावनकी खोर ॥ २५८ ॥
बिनादाँतको ठोरजो है बूढा गाय बैल ताको अहिरौ चराइबो छाँड़िदेइ है
और खसम जो है बैलको मालिक सोऊ छोड़ि देइ है अर्थात् बुढाजानिकै कि
मेरे कामको नहीं है तब वह बैल बृन्दाबनकी खोरि बिललानलग्यो ऐसे जब
मनरूपीदाँत उखारिडारचो तब अज्ञानअहिर याको छोड़िदियो औ याको खसम
जो है माया सबलित ब्रह्म सो जब मन न रहिगयो तब याहू छांड़िदियो तब
आपहीआप मुक्त है गयो सर्वत्र साहबहीको देखन लग्यो जैसे वृन्दावनमें डारमें
पातमें कृष्णदेखिपरेँ हैं मुक्ति परी धिललाइहै काको मुक्तकरै ऐसे यहू सर्वत्र साह-
बको देखनेलग्यो मुक्तही हैगयो मुक्तिकाको मुक्तकरै तामेंप्रमाण ॥ “सवन-
दियाँ गङ्गाभई, सब शिल शालिग्राम ॥ सकलौ बन तुलसी भयो, चीन्ह्यौ
आत्माराम” ॥ २५८ ॥

साखी । ( ६२३ )
मुखकी मीठी जे कहैं, हृदयाहै मति आन ॥
कहकबीर तेहिलोगसों, रामौ बड़े सयान ॥ २५९ ॥
जो या भाँतितें मनको त्यागिकै सर्वत्र साहब को देखै हैं तिनको साहब
सर्वत्र देखिपरे हैं औ जिनके मनमें औ मुख में आनआन है तिनको कबीरजी
कहैं हैं कि रामऊ बड़े सयानहैं अर्थात् उनते दूरिरहैं हैं ॥ २५९ ॥
इतते सबतौ जातहैं, भार लदाय लदाय ॥
उतते कोइ न आइया, जासों पूंछौं धाय ॥ २६० ॥
नानाकर्म्मके नाना उपासनाके नानाज्ञानके भार लदाय-लदायइतते सबजात हैं
परंतु उहांते ऐसाकोई न आया जासों धायकै उहांकी खबरिपूंछौ कि कौनफल-
पाया सो आपनेहींजन्मकी खबरि नहींजानै साहबकी खबरि कहाजानै॥२६०॥
भक्तिपियारीरामकी, जैसी प्यारी आगि ॥
सारा पाटन जरिगया, फिरि फिरि ल्यावैमाँगि ॥२६१॥
यहभक्ति साहबकी बहुतपियारी है जैसे आगि पियारीहोइ है कि आगि
लगी औ सारापाटन कहे शहर जरिजाय पुनि आगीकी चाहना बनीहीरहै है पुनि
पुनि मांगिलैआवै है अपनी करै है काम लोग ऐसे साहबकी भक्ति केतौलोग
साहबकी भक्तिकरि संसारते पारहै गये परंतु अबतक जो कोई भक्ति करै है सो
पिआरै होत जाय है संसारते उतरिजाय है ॥ २६१ ॥
नारिकहावै पीउकी, रहे और सँग सोइ ॥
जारमीत हिरदै बसै, खसमखुशीक्या होइ॥२६२॥
नारितौ अपने प्रीतमकी कहावै है औ आनपति लैके सोइ रहै है तौ खसम
कैसे खुशी होय ऐसे यह जीव साहब को अंश है और और मतमें लग्यो कहीं
ब्रह्म में कहीं माया में सो साहब कैसे खुशी होय ॥ २६२ ॥
सज्जनतौ दुर्जनभया, सुनि काहूकोबोल ॥
काँसाताँवाह्वैरहा, नहिं हिरण्य का मोल ॥ २६३ ॥

( ६२४ ) बीजक कबीरदास ।
'सज्जन शुद्ध जीव हैं ते गुरुवालोगन के बोल सुनिकै दुर्जन द्वैगये सो जो
हिरण्यका मोल है सो जातरहा काँसा ताँबाकी तुल्य द्वैरहा है ॥ २६३ ॥
बिरहिन साजी आरती, दर्शनदीजै राम ॥
मुयेते दरशनदेहुगे, आवै कौने काम ॥ २६४ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि जे श्रीरामचन्द्रके बिरही जीवहैं ते आरतीसाजे खड़े हैं
कि जो रामजी मिलैं तौ आरतीकरैं संसार छाँड़ि एक तुम्हारे मिलिबेकी आशा
किये हैं सो हेसाहब ! दर्शनदीजै मुयेते दर्शनतो देवही करोगे परन्तु औरे जीवन
के काम न आवोगे काहेते वेतौ उपदेश करही न आवेंगे साहब बिरहीको मिलै
हैं तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ "बिरहिन जरती देखिकै, साई आये-
धाय ॥ प्रेमबुन्दते सींचिकै, हियमें लई लगाय"॥ २६४ ॥
पलमें प्रलयबीतिया, लोगन लगी तमारि ॥
आगिल सोच निवारिकै, पाछे करो गोहारि ॥ २६५ ॥
पलभरमें प्रलयतेरी होती जायहै आयुक्षीण होती जायहै यही तमारि लोगनके
लगी है फिरि वा घरी नहीं मिलै ताते आगिल सोच छाँड़िदेव जौन धन जोरि
जोरि स्त्री लरिकनहेत धरचोहै पाछिल गोहारिकरौ साहब को जानो जाते जनन
मरण छूटै ॥ २६५ ॥
एकसमाना सकलमें, सकलसमाना ताहि ॥
कविरसमाना बूझमें, तहाँ दूसरा नाहि ॥ २६६ ॥
एक जो ब्रह्महै सो सब जीवनमें समाय रह्यो है औ कबीरजी कहैं हैं कि
मैं बूझमें समान्यो है ब्रह्मके प्रकाशी औ सब जगत् के अन्तर्यामी ऐसे जे
श्रीरामचन्द्र तिनको जब बूझ्यो तब वही बूझमें समायरह्यो है सर्वत्र साहबही
को देखनलग्यो दूसरा नं देखत भयो मुक्तद्वै सांचा दासभयो तामें प्रमाण
कबीरजी को ॥ "जीवन मुक्त द्वैरहै, तजै खलककी आश॥ आगे पीछे हरिफिरैं,
क्यों दुखपावै दास "॥ २६६ ॥

साखी । ( ६२५ )
यकसाधे सबसाधिया, सबसाधे यकजाय ॥
उलटिजो सींचै मूलको, फूलै फलै अघाय ॥ २६७ ॥
एक जो साहबकी भक्तिहै ताके साधे सब सधिजायहै अर्थात् लोकौ परलोक
बनिजायहै और सब साधेते अर्थात् नानामतनमें लागते एक जो साहबकी भक्ति
सो जातरहै है औ ऊपरते वृक्षके जलमें डारिराखै तौ पत्ता फूलफल सरिजायहैं
औ जो वृक्ष को मूलते सींचै तौ फूलैफलै अघायकै ऐसे सबके मूल साहबहैं
तिनकी भक्ति कीन्हे सब फूलैफलै है दूसरेकी चाह नहीं रहिजायहै दूसरे की
उपासना में संसार नहीं छूटै है ॥ २६७ ॥
जेहि वन सिंह न संचरै, पक्षी नहिं उड़िजाय ॥
सोबन कबीरन हीठिया, शून्यसमाधि लगाय ॥२६८॥
जेहि बाणी रूप बनमें कहे जेहि बाणीतें ब्रह्म ज्ञानौ कथै है तौनी बाणीमें
सिंहजे हैं शुद्धजीव साहबके जाननवारे ते नहीं संचरै हैं कहे नहीं जायहैं औ
पक्षी जे हैं नानामतवारे नानाशास्त्रवारे ते अपने अपने पक्षकारि ब्रह्मको बिचा-
रकरै हैं उड़ै हैं पार कोई नहीं पावै हैं सो तौने बनको कबीर जे हैं जीव सोहीं
ठिया कहे हीठत भयो वही शून्य समाधि लगायकै साहबकी प्राप्ति न भई
तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ “ शून्य महलमें सुन्दरी, रही अकेले
सोइ । पीउ मिल्यो ना सुखभयो, चली निराशा रोइ ” ॥ २६८ ॥
बोली एकअमोलहै, जो कोइ बोलै जानि ॥
हिये तराजू तौलिकै, तब मुख बाहर आनि ॥ २६९ ॥
सो वे शून्य समाधि लगायकै शून्य ब्रह्ममें जायहैं तिनकों कहि आये अब
ज्ञान करिकै जे ब्रह्ममें लीनहैं तिनको कहै हैं कि वह बोली सोहं अमोल
ताको जो कोई जानिकै हियेके तराजूमें तौलिकै मुखके बाहर लैआइकै बोलै
कहे श्वास श्वासमें यही जपै जातमैं सो आवत में हृदय तराजूमें यँही तौलै
कि सो पारषदरूप हंस साहब को है ॥ २६९ ॥
४०

( ६२६ ) बीजक कबीरदास ।
वोहूतौवैसहिभया, तू मतिहोइ अयान ॥
तूगुणवंता वे निरगुणी, मतिएकैमें सान ॥ २७० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि योगी तौ समाधि करिकै शून्यमें गये औ वहू जे हैं
वह ज्ञानी सहजसमाधिद्वारे तौनौ ज्ञानकारिकै वैसेभये कहे वही शून्यमें समाय
रह्यो तू मति अयान होय कहे अज्ञानी होइ तूतो गुणवंता कहे दिव्यगुण सहित
जे साहब हैं तिनको है दिव्यगुण तेरेहू है निर्गुण जो धोखा ब्रह्म तामें तू काहे
सानै है तू मतिसान साँचाद्वैकै तू असाँच काहे होइहै ॥ २७० ॥
साधू होना चहहुजो, पक्काके सँगखेल ॥
कच्चासरसों पेरिकै, खरी भया नहिं तेल ॥ २७१ ॥
जो तुम साधु होना चाहो तौ पक्के जे साहबकें जाननवारे तिनके संग खेल
कहे सत्संगकरौ जो तुम और नाना देवता नाना मतनमें लगौगे तौ तुम्हारो
न लोकै बनैगो न परलोकै बनैगो जैसे कच्चे सरसों को पेरनो न तेलै भयो न
खरी भई ॥ २७१ ॥
सिंहैकेरीखालरी, मेढ़ा ओढ़े जाय ॥
वाणीते पहिंचानिया, शब्दहि देत बताय ॥ २७२ ॥
सिंहकी खालरीकहे शुद्ध जीवनको वेष गुरुवालोग संसार में बनाये कण्ठी
छापा टोपी दीन्हें हैं सबलोग जानैं किं बड़े साधुहैं जैसे सिंहकी
खालरी मेढ़ाकों वढ़ायदेइ अर्थात् मढ़िदेइ तौ सब सिंहैकी नाईं जानै हैं परंतु
जब भ्याँ भ्याँ बोलन लग्यो तब बाणी ते जानि परेउ कि सिंह नहीं है मेढ़ाहे
ऐसे जब गुरुवनको सत् सङ्गकीन्यो तब बाणीते जानिपरे कि ये साहबको
नहीं जानै हैं वेषैभरि बनाये हैं इनते संसार न छूटैगो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥ “स्वामी भया तो का भया, जान्यो नहीं बिबेक ॥ छापा
तिलक बनायकै, दग्धे जन्म अनेक ॥ १ ॥ जप माला छापा तिलक, सरै न
एकौ काम ॥ मन कांचे नाचे वृथा, साँचे राचे राम ” ॥ २७२ ॥

साखी । ( ६२७ )
ज्यहि खोजत कलपनभया, घटहीमें सो पूर ॥
बाढ़ॆगर्वगुमानते, ताते परिगो दूर ॥ २७३ ॥
जौने मुक्तिको खोजत खोजत कल्पैभयो अर्थात् कल्पनाकरत करत कल्पना
रूप द्वैगया ब्रह्ममें लीनभया मुक्तिको मूल जों रामनाम सो तेरे घटही में है
ताको अहंब्रह्मास्मिके गर्बते तोको दूरि परिगयो अबहूं समझ तौ तेरे
समीपही हैं ॥ २७३ ॥
दश द्वारेका पीपरा, तामें पक्षी पौन ॥
रहिबेको आश्चर्य्य है, जायतो अचरज कौन ॥२७४॥
रामहि सुमिरहिं रणभिरैं, फिरैं औरकी गैल ॥
मानुषकेरीखालरी, ओढ़िफिरतहैं बैल ॥ २७५ ॥
२७५। रामनामकों तौसुमिरै है परन्तु रामनामजपिबे की बिधिगुरुतें
नहीं पाये बादबिवाद करत साधुनते भिरतफिरै हैं साहबको नहीं जानै हैं ते
मानुषकी खाल ओढ़ेतौ हैं परंतु बैलहैं अर्थात् पशु हैं जानै नहीं हैं ॥ २७५ ॥
खेत भला बीजौ भला, बोइये मुठीफेर ॥
काहे बिरवारूखरा, या गुणखेतै केर ॥ २७६ ॥
खेती तो नौ कई है परंतु तृणादिकनके जरको कारण वामें बनो है त्यहितें
बिरवा उठै नहीं पावै तृणछाय जायहै सो या गुण खेतै को है ऐसे खेत अंतः
करणमें नाना बासनारूप तृण जानिरहे हैं तामें रामनामरूपी बीज फेरि फेरि
बोवै हैं परंतु तृण बासननके मारे लगे नहीं पावै साहबमें प्रीति नहीं होय
देइ जब सत्संग करि कै निराय डारै तौ तृणऔ रामनामरूप अंकुर दृढ़ ह्वैजाय
साहब को जाननलगे संसार छूटिजाय पापजारेमें नामकी बड़ी शक्ति है
तामें प्रमाण ॥ “यावती नाम्निवै शक्तिःपापनिर्दहनेहरेः ॥ तावत्कर्त्तुंनशक्नोति
पातकम्पातकीजनः” ॥ २७६ ॥
गुरु सीढ़ीते ऊतरै, शब्द बिमूखा होइ ॥
ताको काल घसीटिहै, राखिसकै नहिं कोइ ॥ २७७ ॥

( ६२८ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुके बताये साधनसीढ़ीमें चढ़ो फिर उतरि और और साधनमें लगो राम
नामते बिमुख द्वैगयो ताको कालनरकमें घसीटिकै डारिही देइगो कोई नहीं
राखिसकैगो ॥ २७७ ॥
आगि जो लगी समुद्रमें; जरै सो कांदौ झारि ॥
पूरब पश्चिम पण्डिता, मुये बिचारि बिचारि ॥२७८॥
या संसार समुद्रमें अज्ञानरूपी अग्नि लगीहै सोपूरंबपश्चिमके पंडित कहे
उदय अस्तके पण्डित बिचारि बिचारिमरे परंतु अज्ञान रूपी अग्नि न बुतानि
उपासना करिकै ज्ञानहू करिकै संसार समुद्र सूखि हू गयो परंतुबामूल अज्ञानरूप
कांदौमें फँसेजरे जायहैं ॥ २७८ ॥
जो मोहिं जानै त्यहिमैं जानौं।लोक वेदका कहा न मानौं ॥
भूमुरघाम सबै घटमाहीं।सबकोउबसै शोककी छाहीं २७९॥
गुरुमुख ।
अज्ञानरूपी घामते अंतःकरणरूपी भूमि सबकै तपिंरही है शोकरूपीजें
नाना उपासना तिनकी छाया चाहै है परंतु वहीते और तप्त होयहै शीतल नहीं
होइहै सो मोको तो जानतही नहीं हैं मैं वाको काहेको जानौं जो कोई मोको
जानै तौ मैं वाको जानौं जानबही करौं लोकवेदतो कहतही है कि जो जाको
है सो ताहूको जनै है सो या लोक वेदको कहा मानबहीकरों अथवा कैसो पापी
होइ जो मेरी शरण आवै तौ मैं लोक वेदका कहा न मानूं वाको शरणमें राख
बई करौं वाके सम्पूर्ण पापमैंहौं छुड़ाय देउँ तामें प्रमाण ॥ “ सकृदेव प्रपन्नाय
तवास्मीति च याचते ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतमम ” ॥ २७९ ॥
जौन मिलासो गुरुमिला, चेलामिला न कोइ ॥
छहउलाखछानबे रमैनी, एकजीव परहोइ ॥ २८० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि एकजीवके उपदेशपर मैं छः लाखछानबे रमैनी
युगयुग कह्यो पै मेरो कह्यो कोई न समझ्यो जो मिलो सो गुरुही मिलो चेला
कोई न मिलो जो मेरो कह्यो बूझै साहबको जानै संसारतें छूटै छानबे रमैनी में
प्रमाण ॥ “ सहसछानबे और छःलाखा ॥ युगपरमाण रमैनी भाखा॥२८०॥

साखी । ( ६२९ )
जहँ गाहक तहँहौं नाहिं, हौं जहँ गाहक नाहिं ॥
बिनबिबेकभटकताफिरै, पकरिशब्दकीछाहिं ॥ २८१ ॥
गुरुमुख ।
जहां नाना ईश्वर नाना उपासना नाना ज्ञान इन एकहूकों जहां गाहकहै
तहां मैं नहीं हौ अथवा जहां कौनिहूं बस्तुकी चाहहै तहां मैं नहीं हौं जहां
कौनिहूं बस्तुकी चाह नहीं है तहांमैं हौं सो बिना बिबेक कहे बिना सांच
असांचके जाने अर्थात् सांच जो रामनाम ताके बिना जाने गुरुवालोगनके
शब्दकी छांह पकरिकै संसार भटकत फिरै है जनन मरण नहीं छूटै है जब
रामनाम जानै तब संसारते छूटै तामें प्रमाण “सप्तकोटि महामन्त्राश्चित्तवि भ्रम
कारकाः ॥ एक एव परो मन्त्रो राम इत्यक्षरद्वयम् ॥ २८१ ॥
शब्दहमाराआदिका, इनते वली न कोइ ॥
आगे पाछे जोकरै, सो बलहीना होइ ॥ २८२ ॥
गुरुमुख ।

( ६३० ) बीजक कबीरदास ।
ताहि नकाहिये पारखी, पाहनलखै जो कोई ॥
नग नल या दिलसों लखै, रतनपारखी सोइ ॥२८४॥
जो कोई पाहनरूपी मनको देखै है अर्थात् जब भरम जाके मन बनो रहै
ताको पारखी न कहिये औ जो कोई नर आपनो आत्मारूप जो है नग स्वस्व-
रूप सो आपने दिलमें रामनाममें देखै है अर्थात् मकार स्वरूप जो है आप
नों स्वस्वरूप ताको रकार रूप जै हैं साहब तिनके समीप देखै सोई पारखी
है जब नग मुन्दरी मे जड़ि जायहै तबहीं शोभा होयहै नहीं तो पाहनै है ॥ २८४ ॥
सारीदुनियाँ बिनशती, अपनी अपनी आगि ॥
ऐसा जियरा नामिला, जासों रहिये लागि ॥२८५॥
सारी दुनियाँ अपनी अपनी आगिमें कहे कोई ब्रह्ममें लागिकै कोई नाना
देवतनमें लागिकै कोई नाना मतनमें लागिकै बिशेषते बिनशि रहे है साहब
को नहीं जानै हैं सो कबीरजी कहै हैं ऐसा जियरा कहे रामोपासक सन्त कोई
न मिला जासों लागि रहे अर्थात् सत् सङ्ग करौं कहे जे साहब को नहीं जानैं
ते बिनशि जायहैं तामें प्रमाण ॥ “यश्चरामनपश्येतयं चरामो न पश्यति ॥ निंदितः
सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनंविगर्हते ॥ २८५ ॥
सपने सोया मानवा, खोलि देखै जो नैन ॥
जीव परा बहु लूटमें, ना कछु लेन न देन ॥ २८६ ॥
जो मानुष अपनी आँखि खोलिकै देखै तो सब स्वप्नै है यह जीव बहुत
लूटमें पर्यो है नाना मतनमें नाना उपासननमें लग्यो है साहब को नहीं जानै
ताते न कछु लेन है न देन है यांते या आयो कि इनमें बृथै लागे हैं मुक्ति
काहूकी दई नहीं दैजायहै या सब स्वप्न है तामें प्रमाण गोरख गोष्ठीकों
कबीरजी को गोरख पूंछै हैं ॥
कर्ताकौ स्वरूप कौन! अण्डका स्वरूप कौन! अण्ड पार बसै कौन? नादबिन्दुयोग
कौन ? जीव ईश्वर भोग कौन ? भूमी अवतार कौन ? निराकार पार कौन ?
पाप पुण्य करै कौन ? वेद औ वेदान्त कौन ? बाचा औ अबाचा कौन ?
चंद्र सूर्य भास कौन ? पश्चमें प्रपंच कौन ? ओहं औ सोहं कौन ? स्वर्ग नरक

साखी । ( ६३१ )
बसै कौन ? पिण्ड औ ब्रह्मांड कौन ? आत्म परमात्म कौन ? जरा मरण काल
कौन ? गुरु शिष्य बोध कौन ? क्षर अक्षर निरक्षर कौन ? तबकबीरजीबोले ।
नाद् बिंदु योग स्वप्न, जीव ईश्वर भोग स्वप्न, भौमी अवतार स्वप्न,
निराकार स्वप्न है ।
पाप पुण्य करै स्वप्न वेद औ बेदान्त स्वप्न बाचा औ अबाचा स्वप्न चंद्र
सूर स्वप्न है ॥ इत्यादिक बहुत बाक्यहैं ॥ २८६ ॥
नष्टैका यह राज्यहै, नफरक वरतै द्वैक ॥
सारशब्द टकसारहै, हिरदयमाहिं विवेक ॥ २८७ ॥
नष्टजो है धोखा ताहीको यहराज्यहै अर्थात् अहंब्रह्मास्मि कहिकै सब नष्टभये
औ नफरजो है काल ताही को छेक संसार बरत रह्यो है अर्थात् सब संसारको
काल छेकिछेकि खाये जायहै सारशब्दजो रामनाम टकसार ताको हृदय में
कोई कोई विवेक करतभये अर्थात् कोई साहेबको न जानतभये संसारते न
छूटतभये ॥ २८७ ॥
दृष्टमान सब बीनशै, अदृष्टलखै ना कोइ ॥
हीनकोइ गाहकमिलै, बहुतैसुख सो होइ ॥ २८८ ॥
जहांभरदृष्टमानहै सो सबबिनशै है नाशहोयहै औ मनबचन के अगोचर जो
ब्रह्महै ताकोतौ कोई देखतै नहीं है धोखही है सो दृष्ट अदृष्ट के परे हीन
कोई कहे कोई हीनहोइ अर्थात् दीन होई ताको गाहक ऐसें जे साहब श्रीराम-
चन्द्रते मिलैं जो जीवको तौ बहुतसुख सो होय अर्थात् जननमरण छूटिजाय
साहबके समीप सेवामें बनोरहै तामें प्रमाण ॥ गोसाईंजीकोदोहा ॥ “ पदगहि
कहति सुलोचना, सुनहु बचनरघुवीर ॥ तुमहिं मिले नहिं होइ भव, यथा सिन्धु-
करनीर ” ॥ २८८ ॥
दृष्टिहि माहिं विचारहै, बूझै बिरला कोइ ॥
चरमदृष्टि छूटै नहीं, ताते शब्द्दी होइ ॥ २८९ ॥
जोकहो साहबको देखै कैसे हैं तौ दृष्टिही में विचारहै साहब को देखै है
या चर्मदृष्टिकरिकै साहबको नहीं देखै या बात कोई बिरला बूझै है या जीवकी

( ६३४ ) बीजक कबीरदास ।
हंसजीव बसै है सो या जीवठौरमें न लग्यो कहे साहबकें पास न गयो वहीमन-
के ओटमें रहिगयो अर्थात् मनरूपी सरोवरमें रहिगयो ॥ २९७ ॥
मधुरबचनहैं औषधी, कटुकबचनहैं तीर ॥
श्रवणद्वार ह्वै संचरैं, शालैं सकल शरीर ॥ २९८ ॥
कटुकबचन तीरहैं औ अधुरबचन औषधहैं ते ये दोऊ श्रवण द्वारह्वैकै सञ्चरै
हैं कहे जाइहैं औसिगरे शरीरमें शालै हैं कहे व्याप्त ह्वैजायहैं जो कोई मीठ बचन
कह्यो तौ वासों रागभयो औ जो कोई कटुकबचन कह्यो तौ वामें द्वेषभयो औ
मधुरबचन ते जहां राग कियो जहांमन लग्यो तहँ जन्मतभयो औ कटुकबचन
सुनि कोप करि बधादिक कियो तेहिते आयु हानिभई मरतभयो याते मधुर
बचन कटुकबचन दोऊ बरोबर शालै हैं ॥ २९८ ॥
ई जगतो जहडेगया, भया योग ना भोग ॥
तिलतिलझारिकबीर लिय, तिलठीझारैलोग ॥ २९९ ॥
या जगतो जहडेगयो कहे द्वैगयो काहेते कि न याको योगही सिद्ध भयो
न भोगही सिद्धभयो कैसेउ हजारन वर्षलों योगकै जिये महाप्रलय भररहें
आखिर नाशही ह्वैजाइहै जो धर्मकरि दिविको भोगकियो तौ जब पुण्यक्षीण
ह्वैजाइहै तबतौ मृत्युही लोकको आवै है याते न भोग सिद्धभयो न योग सिद्ध-
भयो सो तिलजो है रसरूपाभक्ति साहबकी ताकोतों श्रीकबीरजी कहैं कि मैं
झारिलियो तिलठी जो है नानाउपासना तिनकी और लोग झारै हैं नभकरै हैं
जामें रस नहीं है ॥ २९९ ॥
ढाढसदेखुमरजीवको, धसिके पैठिपताल ॥
जीवअटकमानैनहीं, गहिलैनिकरयो लाल ॥ ३०० ॥
मरजीवते कहावैं हैं जेसमुद्रमें पैठिरत्न निकारै हैं ताको ढाढस देखो ढाढस
करिकै पातालमें पैठै हैं जीवको अटक नहीं मानै हैं समुद्रते लालगहि लैआवै हैं
तैसे जीव तैहूं मनादिकनको त्यागिदे मरिबेको नडेराय विश्वासकारिकै साहब
रसरूपसागरमें पैठु ॥ ३०० ॥

साखी । ( ६३५ )
येमरजीवाअमृतपीवा, काधसिमरैपताल ॥
गुरुकीदयासाधुकीसंगति,निकसिआउ यहिकाल३०१
ये मरजीवा कहे तैं तो अमृतको पीवनवारो पातालमें धसिकै कहे संसार
में परिकै कहामरै है औ जियै है नरकको चलाजाइ है सो गुरुकी दयातें
साधुनकी संगतिते तू यहिकालमें संसारते निकसिआउ जो तैं साहबके जाननवारें
साधुनकी शरणहोइ वाही चालचलै ॥ ३०१ ॥
केते बुंद हलफे गये, केते गयो बिलोइ ॥
एक बुंदके कारणे, मानुष काहेको रोइ ॥ ३०२ ॥
हा इति कष्टमें है सो कबीरजी कहै हैं कि हाय केतन्यो जीव लफेकहैं
नैगये अर्थात् ढरकि गये अर्थात् साहबके मार्गचले साहबकी उपासनाकियो पै
गुरुवालोग जो नानामत लखायो तिनहींमें लफेकहै नैगये सो केतौ तौ याभका-
रसों गये औ केतौ पहिलेहीते बिगोयगये कहे बिगरिगये सो हे मानुष! श्रीराम-
चन्द्रको जो आनन्दसमुद्र ताके एकबुन्दके कारण हे संसारीजीव ! तैं काहेरोवै
है धोखाब्रह्मको छांडि साहबको जानु जाते जननमरणछूटै ॥ ३०२ ॥
आगिजो लगीसमुद्रमें, टुटिटुटि खसै जो झोल ॥
रोवै कबिरा डिम्भिया, मोरहीरा जरै अमोल॥३०३॥
या संसारसमुद्रमें अज्ञानरूपी आगिलगी कर्मरूप झोल जे शरीरके कारणहैं
ते या देहते टुटिटुटि वा देहमें गये या देह जारिगई याही रीतिते नानादेह धरै
हैं संसार नहीं छूटैहै सो कबीर जी रोवै हैं कि दम्भीह्वैकै मोर अमोल हीरा-
जीव ते अज्ञानरूपी अग्निमें जरेजायहैं ॥ ३०३ ॥
साँचे शाप न लागिया, साँचे काल न खाय ॥
साँचेसाँचे जो चलै, ताको कहा नशाय ॥ ३०४ ॥
कबीरजी कहै हैं कि दम्भकरिकै काहे अज्ञानरूपी आगिमें जरे जाउहौ
जोसांचे साहबमें लगिकै सांचे साधुहोउ तौ वे सबते जबर होइहैं न वाकोशापलगै
न वाकोकाल खायहै सो जाम्बवंतहनुमानादिक अबतकबने हैं ॥ ३०४ ॥

( ६३६ ) बीजक कबीरदास ।
पूरासाहब सेइये, सबविधि पूरा होइ ॥
ओछे नेह लगाइये, मूलौआवै खोइ ॥ ३०५ ॥
पूरा साहब जे सर्वत्र पूर्ण हैं तिनको जो सेइये तौ सबविधि पूरोहोइ
औ ओछे जेहैं नानामत धोखा तौने में जो लगाइये तो नफाकी कौनचालै मू-
लौकी हानिहैजाय है ॥ ३०५ ॥
जाहुबैद्य घरआपने, बात न पूछै कोइ ॥
जिन यहभार लदाइया, निरबाहै वा सोइ ॥ ३०६ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे बैद्य ! गुरुवालोगौ तुम अपने घरको जाहु तुमकों
बात कोई नहीं पूछै है जिन यह संसाररूपी भारलदाया है कहे संसार उत्पत्ति
कियाहै तौने निर्बाहैगा अर्थात् न निर्बाहैगा येतो सबमायिकहैं अधिक बाँधनेवारें
हैं छुड़ावनेवारे नहीं हैं ॥ ३०६ ॥
औरनके समुझावते मुखमें परिगो रेत ॥
राशि बिरानी राखते, खाये घरको खेत ॥ ३०७ ॥
औरेनको उपदेश करत करत तुम्हारे मुखमें रेत कहे धूरिपरिगई अर्थात्
कुछ न तुमसों बनिपर्चो बिरानी राशि तो तुम राखतेहौ कहे औरे औरेकों
उपदेश करिकै समुझावतेहौ आपने घरको खेत जो स्वरूप ताको नहीं ताकतेहौ
काल खाये लेइहै सो तुम्हारो स्वरूपखेततौ ताको नहीं रहे औरकी राशिकहें
आत्मा तुमकैसे ताकौगे ॥ ३०७ ॥
मैं चितवतहौं तोहिंको, तुम कह चितवै और ॥
नालत ऐसे चित्तको, चित्त एक दुइ ठौर ॥ ३०८ ॥
गुरुमुख ।
साहब जीवसों कहै हैं कि मैं तो तेरी ओर चितवै हौं सदा सन्मुख बनेरहौं
हौं औ तू कहा और और में चित्त लगावै है सो ऐसे तेरे चित्तकों नालति है
कि एक आपने चित्तकों माया में औ ब्रह्ममें दुइठौर लगाये है ॥ ३०८ ॥

साखी । ( ६३७ )
तकत तकावत तकिरहे, सके न बेझामारि ॥
सबै तीर खालीपरे, चले कमानी डारि ॥ ३०९ ॥
साहब कहै हैं कि जेजीव!मोकों तकै हैं अर्थात् मेरे सन्मुख भये हैं तिनको
माया कालादिक जे हैं ते काम क्रोधादिकनते तकावै हैं कि जबहीं संधिपावैं
तबहीं मारिलेइँ औ आपहू ताके रहे हैं परन्तु जे जेमोको तके रहे चारयो युग
तिनको ये कबहूं न बेझा मारिसकै हैं सो जबसबैतीर खाली परे माया कालादि-
कनते तब कमानी डारिकै चलेगये अर्थात् मोको जे हंसजीव जानै हैं तिन में
माया कालादिकनको जोर नहीं चलै है ॥ ३०९ ॥
जस कथनी तस करनियो, जस चुम्बक तस नाम ॥
कह कबीर चुम्बक विना, क्यों छूटै संग्राम ॥ ३१० ॥
जस साधुनकी कथनी कहे कहै हैं तस करनिउहै कैसे जैसे चुम्बक श्रीरा-
मचन्द्रहैं तैसे उनको नामहूं है सो कबीरजी कहै हैं कि रामनाम चुंबकबिना
कामादिकनको संग्राम याको कैसे छूटै जैसे लोहेकोकना धूरिमें मिलोरहै है जब
चुम्बक देखावो तौ वाही में लपटि आवै है धूरिमें नहीं रहै ऐसे या जीव
साहबको है साहबको नाम लेइहै तबहीं संसारते छूटै है नहीं भटकते रहै है॥३१०॥
अपनी कहै मेरी सुनै, सुनि मिलि एकै होइ ॥
मेरे देखत जगगया, ऐसा मिला न कोइ ॥ ३११ ॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि आपनी शंका मोसों कहै पुनि जौन मैं वेदशास्त्रादिकनमें
कह्यो है ताको सुनै औ वह मेरे वाक्यमें मिलावै देखैतो कोई शंका रहिजाती
है अर्थात् न रहिजायगी तब एकै मत ह्वैजाय एकैजो मैं हौं ताहीको जानिलेइ
और सब छोड़ि देइ सो ऐसा मोको कोई न मिला जो मेरे देखत जगगया
होइ कहे जगतते दूरि भया होइ ॥ ३११ ॥

( ६३८ ) बीजक कबीरदास ।
देशदेशहमबागिया, ग्रामग्रामकी खोरि ॥
ऐसाजियराना मिला, जोलेइफटकिपछोरि ॥ ३१२ ॥
कबीरजी कहै हैं कि मैं देशदेश गाउँ गाउँ खोरि खोरि बाग्यो परन्तु ऐसा
जियरा मोको कोई न मिला कि जो मैं कहौ हौं ताको फटक पछोरि लेइ॥३१२॥
लोहे चुम्बक प्रीति जस, लोहा लेत उठाय ॥
ऐसा शब्द कबीरको, कालते लेइ छुड़ाय ॥ ३१३ ॥
लोहेकी औ चुम्बककी प्रीतिहै जो लोहको चुम्बक देखै है सो उठाय लेइहै
ऐसे कबीर जो है कायाको बीर जीव ताको या शब्द रामनामहै जौन जीवनकों
कालते छड़ाय लेयहै जैसे चुम्बक लोहे के किणकाको आपने में लगाय लेइहै
ऐसे रामनाम जीवको में लगाय लेइहै ॥ ३१३ ॥
गुरू विचारा क्या करै, शिष्यहिमेंहैचूक ॥
शब्द बाण बेधै नहीं, बाँसबजावैं फूंक ॥ ३१४ ॥
कबीरजी कहै हैं कि गुरू जो है साहव सो विचारा कहा करै शिष्य जो है
जीव तांहींमें चूकहै कौन चूकहै यासों कि रामनामरूपी जो शब्दबाण ताकें
साथ छइउजेचक्रहैं तिनको बेधिकै सातों चक्र जे हैं सुरतिचक्र ताको बेधिकै
उहां जो गुरुबतावैं हैं मकरतारडोरि ताही चढ़िकै रामनाम रूपीबाणके साथ
साहबके पास जायबो न जान्यो वहै निर्गुण ब्रह्म जो है झूरबाँस ताहीमें लगिकै
फूकि-फूंकि बजावै हैं अर्थात् वोहीको ज्ञानकथै हैं ॥ ३१४ ॥
दादाबाबाभाई कै लेखै,चरनहोइगे बंधा ॥
अबकी बेरिया जोना समझ्यो,सोईसदाहै अंधा ३१५॥
मानुष शरीर पायकै दादा बाबा भाई सब साहिबैको मानै है सोई साहबके
चरणको बंधा होइहै कहे साहबके चरणमें सदा लगे रहै हैं सो अबकी बेरिया
कहे या मानुष शरीर पायके साहबको न जान्यो सोई सदाको अंधाहै॥३१५॥