सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ५९२ ) बीजक कबीरदास ।
सबको मालिक साहबएकही है औ साहब के जाननवारे बिरलेसाधुहैं जें
रामनाम को जपै हैं वेसब साधुनके शिरमौरहैं तामें प्रमाण ॥ “साधु हमारे
सब खड़े,अपनी अपनी ठौर । शब्द बिबेकी पारखी,सो माथेको मौर”॥तामें या
दृष्टान्त है जैसे मलैगिरी चन्दन एकहै, सिंहएकहै तैसे हीरा जो राम नामहै
तेहिते साहब को ज्ञान होयहै सो एकही है औ ताके जाननवारे साधु एकही हैं,
वे जमाति में नहीं चले हैं ऐसेतो सब साधुही कहावै हैं औ राम नाम वस्तु-
खोयकै औरेमें लागे हैं ते गँवारहैं तामें प्रमाण ॥ “वह हीरा मतिजांनैये,
जेहिलादै वनजार ॥ यह हीरा है मुक्तिको, खोये जात गँवार ॥ १६९ ॥
अपने अपने शीश की, सबन लीन है मानि ॥
हरिकी बात दुरंतरी, परी न काहू जानि ॥ १७० ॥
जौनजाकोमतनीकलाग्यो सोतौनैनमतको शीशचढ़ाय मानि लीन्ह्यो हरिकी
जो दुरंतरी बातहै सबतें दूरकहेपरे सो काहूको न जानिपरी कि सबके रक्षक
साहबै हैं ॥ १७० ॥
हाड़ जरै जस लाकड़ी, तनवा जरै जस घास ॥
कबिरा जरै सो राम रस, जस कोठी जरै कपास॥१७१॥
कबीर जे जीवहैं तिनके रामरसजो है रामभक्ति सो कैसे उनके अंतःकरणमें
जरै है जैसे कोठीमेंकपास भितरैजरै है याहीते उनके हाड़बार लकड़ी घासकी
नाईं जरै हैं ॥ १७१ ॥
घाट भुलाना बाट बिन, भेष भुलाना कानि ॥
जाकी माड़ी जगत में, सो न परौ पहिचानी॥ १७२॥
घाटकहे सत्संग बाट जो है बिचार ताके बिना भूलिगयो अर्थात् साहबको
तौ जान्यो न अपनेहीको ब्रह्म माननलग्यो बिचारभूलि गयो सत्संग काहेको करै
आपने गुरुवनकी कानिमानि भ्रमवारे मत न छाड़तभये भेषवारे साधु सबभुला-
यगये सो जाकी माड़ी कहे माया जगत्में पूरिरही ऐसेजो साहब सो न पहिचानिपरयों
माड़ी मायामें भूलिगये ॥ १७२ ॥

साखी। (५९३)
मूरुख सा क्या बोलिये, शठसों कहा बसाय ॥
पाहनमें क्या मारिये, चोखा तीर नशाय ॥ १७३ ॥
मूरुख कौन कहावै है कि साधुनके समुझायेतें सूझै परन्तु बूझै नहीं है
तासों क्याबोलिये । शठकौनकहावैहै कि चाहे नीकौ कोऊ बतावै परन्तुछाड़ै न
हठकीन्हे वाहीमें लागरहै । जौन गुरुवा लोग पहिले बतायनिहै चाहे कूपौमा
गिरिपरे पै छाडै न सोऐसेलोगन ते कहा बसाय उनको ज्ञानदीन्हे ज्ञानौ खराब
होयगो पाहनके मारे तीरही टूटैगो शठ मूरुख नहीं समुझै तामें प्रमाण ॥
“पानी कोपाषाण, भीजै तौ बेधै नहीं ॥ त्यों मूरुखको ज्ञान, सूझै तौ
बूझै नहीं” ॥ १७३ ॥
जैसे गोली गुमजकी, नीच परे दुरि जाय ॥
ऐसे हृदया मूर्खके, शब्द नहीं ठहराय ॥ १७४ ॥
जैसे गुम्मजमें जो गोलीमारिये तौ ऊँचेपरै ढरकिजायहै ऐसे मूरुखके हृद्-
यमेंशब्द रामनाम केतौ उपदेशकारिये परन्तु ठहराय नहीं है एकघरीभर तौ
ज्ञानरहो फिरि ज्योंकोत्यों ह्वै गयो ॥ १७४ ॥
ऊपरकी दोऊ गई, हियकी गई हेराय ॥
कह कबीर चारिउगई, तासों कहा बसाय ॥ १७५ ॥
ऊपरकी आँखिनते यादेख हैं कि साहबको भजिकै हनुमानादिक अजर
अमर ह्वैगये जिनकी पूजा देवता करै हैं सब सिद्धिको प्राप्तहैं कालशक्र बिष्णु
सबते अधिकहैं औ हियेकी आँखिनते देखै हैं कि हाथिनको पति ऐरावतहै पक्षि-
नको पति गरुड़है भक्तनमें महादेवपति हैं मनुष्यनमें भूपति है ऐसे सब ईश्व-
रनके मालिक श्रीरामचन्द्र हैं तिनको नहीं भजन करै है सो श्रीकबीरजी कहै
हैं कि जाकीभीतरौबाहरकी आँखिफूटीगई तासोंकहाबसाय ॥ १७५ ॥
केते दिन ऐसे गये, अन रुचे को नेह ॥
बोये उसर न ऊपजै, जो घन वरसैं मेह ॥ १७६ ॥
३८

( ५३४ ) बीजक कबीरदास ।
जैसे ऊसरमें बोवै घन बहुतौ बरसें परन्तु जामै नहीं है तैसे निराकार
धोखामैलख्यो फलकछू न हाथलग्यो वातो कुछ वस्तु ही नहीं है अनरुचेको नेहं
है अर्थात् बावड़ी प्रीतिकियो वातोप्रीति ही नहीं करै ॥ १७६ ॥
मैं रोऊं सब जगतको, मोको रोवै न कोइ ॥
मोको रोवै सो जना, जो शब्द विवेकी होय ॥ १७७॥
साहब कहैं हैं कि मैं सब जगतपर दया करिकै रोऊँहौं कि मेरो अंश
जीवमोको भूलिगयो ताते जगतमें जनन मरणरूपी दुःखसहै है औ जीवमोको
नहीं रोवै है कि हम अपने मालिकको भूलिगये नाना मालिक मानि नाना
दुःख पावै हैं सो मोको सो जन रोवै है जो शब्द जो रामनाम ताको विवेकीहो
य कि रकारके समीप मकार शोभित होईहै मैं साहबको हौं ॥ १७७ ॥
साहब साहब सब कहैं, मोहिं अंदेशा और ॥
साहबसों परिचय नहीं, बैठैगा केहि ठौर ॥ १७८॥
कबीरजी कहैं हैं कि साहब साहब तो सब जीव कहै हैं अर्थात् आपने
आपने इष्टदेवताको सबते परे कहै हैं कि येई सबके मालिकहैं सो येतो सब
एक एक मालिक बनाये हैं पै मोको या और अंदेशाहै कि जौन रामनाम
साहबको बतावै है तौने रामनामको जानि साहबते परिचयतो करिबै न किये
ये कौने ठोर बैठेंगे काके पास जायँगे अर्थात् जनन मरण न छूटैगो ॥ १७८॥
जिव बिन जिव बाचै नहीं, जिवका जीव अधार ॥
जीव दया करि पालिये, पंडित करहु विचार ॥ १७९॥
या जीव बिना जीव कहे सतगुरु बिना नहीं बाचै है जीवको जीव जो
सतगुरुहै सोई आधारहै सो जीवपर दया करि अर्थात् सतगुरुके शरणह्वै जीव
उद्धारकरो हे पंडित ! तुम बिचारकर देखो तो बिना सतगुरु संसार पार
न होउगे ॥ १७९ ॥
हमतो सबहीकी कही, मोको कोइ न जान ॥
तबभी अच्छा अच्छा अबभी, युग युग होंहुँनआन १८०

साखी । ( ५९५ )
· साहब कहै हैं कि हमतो सबके अच्छेकी कही जांते कालते बचिजायँ परंतु
मोको कोई न जानत भयो सो तब भी अच्छा है अबभी अच्छाहै काहेते कि
युगयुगमें मैं आन नहीं होउँहौं वहीवही बनोहौं जो अबहूं मोको जानै तौ मैं
कालते बचायलेउँ तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥
दोहा ॥ "बिगरी जन्म अनेककी, सुधरै अबहीं आज ॥
होय रामको राम जपि, तुलसी तजि कुसमाज" ॥
औ कबीरजीने कह्यो है ॥
"कह कबीर हम युग युग कही । जबही चेतों तबहीं सही" १८०
प्रकट कहौं तौ मारिया, परदा लखै न कोइ ॥
सहनाछपाप्यारतर,को कहिवैरी होइ ॥ १८१ ॥
श्रीकबीरजीकहैं हैं कि जो मैं प्रकट कहौंहौं कि तुम साहबके हौ और के
नहीं हौ तौ मारन धावै है अर्थात् बादविवाद करै है औ जो परदे सों कहौ
हौं तौ कोई समझतै नहीं है काहेते नहीं समझै है

( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
जो कोउ कहै हम मनको मारा जाकें रूप न रेखा ।
छिन छिनमें केतनौ रंग ल्यावै जें सपनेहुं नाँहिं देखा ॥
रासातल यकईश ब्रह्मण्ड। सब पर अदल चलावै ।
षट रसमें भोगी मन राजा सो कैसे कै पावै ॥
सबके ऊपर नाम निरक्षर तहँ लै मनको राखै ।
तब मनकी गति जानि परै यह सत्य कविर मुख भाखै ॥ १८१ ॥
देश विदेशन हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल ॥
जाको ढूंढत हौं फिरौं, ताको परा दुकाल ॥ १८२ ॥
देशकहे संसार बिदेशकहे ब्रह्म तौने में फिराहै सो ये दूनों मायाको सुका-
लभराहै अर्थात् वह ब्रह्म मनहीं को अनुभवहै और संसार मनहीं को कल्पनाहै
जौन बस्तु को मैं ढूंढत फिरौं हौं जो मन बचनके परे है ताको दुकालपर्यो
वा न ब्रह्ममें है न संसार में है ॥ १८२ ॥
कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न मानै कोइ ॥
जाहि कहौं हित आपना, सो उठि वैरी होइ ॥ १८३ ॥
जगत् तो आँधराहै ज्ञानदृष्टि याके नहीं है कुछ समझै नहीं है तौने में या
कलि खोटा प्राप्त भयो सो जाको शब्द जो राम नाम मैं बताउँहौं सोई वैरी
होइहै कहे शास्त्रार्थ करै है मानै नहीं है ॥ १८३ ॥
मसि कागद तो छुवों नहिं, कलम गहो नहिं हाथ ॥
चारिहु युग माहात्म्य जेहि, करिकै जनायो नाथ १८४
गुरुमुख ॥ चारिउ युग में है माहात्म्य जिनको ऐसे जे नाथ रघुनाथहैं
तिनको कबीरजी सबको जनायो न कलमगही न कागद लियो न मसि लियो
मुखहीतें कह्यो ये तो सरल करिकै कह्यो कि जामें एकौ साधन न करनपरै
सो साहब कहै हैं कि जो मोको जानिलेइ तौ संसारते तरिजाय जो कहौ
कबीर जी मुखही तें कह्यो है ग्रन्थकैसे भये हैं तौ कबीर जी कहते गये हैं
शिष्यलोग लिखतें गये हैं ॥ १८४ ॥

साखी । ( ५१७ )
फहमै आगे फहमै पाछे, फहमै दहिने डेरी ॥
फहमै परजो फहम करत है, सोई फहम है मेरी॥१८५॥
गुरुमुख ।
फहमजो है ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सोई आगे है सोई पाछे है सोई दहिने है सोई
डेरी कहे बायें है अर्थात् सर्वत्रपूर्णहै सो यहजोफहमहै ज्ञानस्वरूप ब्रह्म तौनेके
ऊपर ब्रह्मयाहूके परे साहब है फहम करै है कि वह ज्ञानरूप उनहींको प्रकाश
है याहूके परे साहब हैं तौन फहम मेरी है कहे वहज्ञान मेरोहै ॥ १८५ ॥
हद चलै सो मानवा, बेहद चलै सो साध ॥
हद बेहद दोनों तजै, ताको मता अगाध ॥ १८६ ॥
हद जो चलै है सो मानवाहै कहे उनको मान कहे प्रमाण है अर्थात् जो
जौने देवता की उपासना कियो सो तौने देवता के लोकगये वाको वहैभर
प्रमाणहै वतनैज्ञान होइहै औ जे बेहद चलै हैं ब्रह्ममें लगे हैं ते साधुहैं जो
ब्रह्मको साधन करिकै सिद्धि करिलेइ सो साधु सो हद जो है सगुणसंसार औ
बेहद जोहै निर्गुण ब्रह्म ये दोनोंको जे तजिकै निर्गुण सगुणके परे परम पुरुष
श्री रामचन्द्र के सेवक ह्वैरहे हैं ऐसे जे रामोपासक हैं तिनहीं के मत
अगाधहैं ॥ १८६ ॥
समुझैकी गति एकहै, जिन समुझा सब ठौर ॥
कह कबीर जे बीचके, बल कहि औरै और ॥१८७॥
जे रामोपासक निर्गुण सगुणको समुझिकै ताहूते परे साहब को जान्यों
तिनकी गति एकहै कहे एक साहबहीको सबठौर निर्गुण सगुणमें समुझै हैं
कबीरजी कहै हैं कि जे बीचकेहैं ते और और उपासना करै हैं और और
ज्ञानकरै हैं औ आपने आपनेदेवतनमें बलकै हैं कि येई सबके मालिकहैं॥ १८७॥
राह बिचारी का करै, पथिक न चलै विचारि ॥
आपन मारग छोड़िकै, फिरहि उजारि उजारि॥१८८॥

( ५९८ ) बीजक कबीरदास ।
पथिक जो विचारिकै न चलै तौ राह बिचारी कहाकरै वेद पुराण शास्त्र
येई सब राहैं हैं तिनको तात्पर्य यही है यहजीव साहबको अंशहै उनहींके
जानें संसारते छूटै है सो रामनाम को जपिकै साहबको हैरहै यह जो है आपनों
मारग तौनेको छोड़िकै उनारि उजारि कहे कोई ब्रह्ममें कोई ईश्वरमें कोई नाना
देवतन की उपासनामें फिरे हैं सोउनके जननमरण रूप कण्टक लागिबोई चाहैं
नरकरूप खोह गिरैचाहै औ जीवसाहबको अंशहै तामें प्रमाण ॥ "ममैवांशो-
जीवलोके जीवभूतः सनातनः" ॥ औ ब्रह्ममाया ईश्वर जगत् इनको विचारकरै
तौ भ्रममात्रहै कछू इनसे जीवको उद्धारनहीं होयहै तामें प्रमाण ॥ "ब्रह्मजीव
ईश्वरजगत ईसब अनमिलसैन ॥ निरवारे ठहरै नहीं भाखत झांईं बैन"॥ १८८॥
मूआहै मरि जाहुगे, बिन शर थोथे भाल ॥
परे करहारै बृक्षतर, आजु मरै की काल ॥ १८९ ॥
अरेजीवौ ! तुम केतनौ बार मरतआये हौ औ मरिजाउगे बिना शरकाहेते कि
तुम्हारे भालमें थोथे लिखे हैं बिना फलकें बाणसों तुम यहि संसार वृक्षतरे जो
बोलते बताते हौ सो परे कल्हारते हौ आजु मरिजाउ कि काल्हिमरिजाउ बाड़ा
कछू नहीं है ॥ १८९ ॥
बोली हमारी पूर्वकी, हमैं लखा नहिं कोइ ॥
हमकोतो सोई लखै, घर पूरुबका होइ ॥ १९० ॥
हमारी जो पूर्बकहे पहिलेकी बोली जो साहबकोरूप उपदेश करिआये
जीवको स्वरूप बतायआये सो कोई नहीं लखै है न हम को लखै है सो हमारी-
बाणीको तो सोई लखै है जो कोई पूरुबको कहे शुद्धजीव हैजाय जस पूर्बही
रह्यो है ॥ १९० ॥
जेहि चलतै रवदे परा, धरती होइ विहार ॥
सोइ सावज घामैं जरै, पण्डित करो विचार ॥१९१॥
जेहि जीवके चलतकहे निकसतमें यहशरीर रवदे कहे धूरिमें मिलिजाय है
पुनि वैहैजीव जो कहूं अवतरै है तब यहै शरीर को पाइकै धरती में विहा-

रकैरहै औ बहै साउज जो है जीव सो शरीरनको पायके आधिदैविक आधिभौतिक
आध्यात्मिक जे तीनों तापहैं तेई घाम हैं तिनहींमें जरै है सो हे पण्डित तुम
बिचारकरिकै असारको त्यागकरायकै सार जे साहब श्रीरामचन्द्रहैं तिनकोबता
ओ तौ तीनों तापते जीव छूटै ॥ १९१ ॥
पायँन पुहुमी नापते, दरिया करते फाल ॥
हाथन परबत तौलते, तेहि धरि खायो काल॥ १९२॥
जे हाथनते पर्वत तौलते रहे औ पायँनते पुहुमी नापते रहे औ समुद्रको
एकफाल करते रहे हिरण्याक्षादिक तिनहूँको काल धरि खायो ॥ १९२ ॥
नव मन दूध बटोरिकै, टिपका किया विनाश ॥
दूध फाटि कांजी हुआ, भया घीव का नाश ॥१९३॥
नवमन कहे नवीन नवीन जामें होते आये मन ऐसो कै तौ देह धरे अब
यहदूध मनुष्यशरीर पायो सो कांजीका टिपका जो धोखाब्रह्ममें लागिवो तोव
दूध जो मनुष्य शरीर सो कांजी भया कहे पशुतुल्य भया घीवजो साहबकोज्ञान
रहै ताको नाशहै गयो ।
अथवा—ऊपरकी साखीमें बड़ेबड़े पराक्रमीको कालखाइ जाइ है ते कहि
आये हैं। अब या साखीमें कहैं हैं हे दूध जीव ! तैं या शरीरको अभिमान
करिके कहा नाना विषयन कहे मतनमें लागि गये । सो हे दूधजीव ! तैं
कहा नौ मनको बटोरचो, अर्थात् नौ कहिय नवीन मन कहिये जनकी मानी हुई
मनते तैं नाना प्रकारके नवीन मतनको गुरुवनते सुनिके वाहीमें लगिके मन
जो है कांजीकाटिपका (बिन्दु) ताको आश्रय कर्योपर वही मुझको मारि
डारचो अपने में मिलायलियो तूहू मनमें मिलिके मन ह्वै गयो । ताते जौने
मनमें साहबको मिलनकी शक्ति होती घीवसो नाश ह्वै गई। सो आगे तैं शुद्धरहै
स्वच्छ रहे तेरो संग कियो सब जीव सुधरि जाते रहे हैं अर्थात् शुद्धरूप
आपनो जानिके जीव साहबको होते रहे हैं सो तोको गुरुवालोग नाना मतनमें
लगायके कांजी (पानी) बनाई डारयो । अथवा जो छाछको घास खेतनमें
डारिदेई तौ घास जरि जाइ है तैसे तेरो संगकरिके जीव जरि जाइहै कहे

( ६०० ) बीजक कबीरदास ।
साहबको ज्ञान त रहित है जाइहै। सोतैं ऐसों बिगरि गयो है कि जो अब
दूध भयों चाहै तो आपने किये ते कौने हू भांति न होइ सकै है फिर जो होन
चाहै तो होइ कैसे ताको या युक्ति है कि, जाको वा छाछ है ताहीको पियाई
देइ तौ फिर वा दूध बनि जाइ है। तैसे जौने साहबको तू है तिनको जो रूप
गुरु बताइ देइ और तैं ओई साहब श्रीरामचन्द्रमें लगि जाई तौ पुनि तैं शुद्ध
जीव है जाइ ॥ १९३ ॥
केत्यो मनावैं पायँ परि, केत्यो मनावैं रोइं ॥
हिन्दू पूजैं देवता, तुरुक न काहुक होइ ॥ ३९४ ॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि केतन्यो हिन्दू ते देवतनके पायँ परि मनावै हैं कि
हमारी मुक्ति ह्वैजाय औ नाना देवतनको पूजते हैं औ केतन्यो जे मुस्लमान
तिनको हाल आवती है औ साहब के इश्कमें रोवते हैं औ मानते हैं कि साहब
बेचून बेचिगून बेसुवा बेनिमून निराकारहैं सो जे देवतनको मनावतेहौ पायँ
परिकै तिनहीं की मुक्ति नहीं भई तिहारी मुक्ति कैसे होयगी देवता तो सब
सगुणहैं विष्णु सतोगुण के ब्रह्मा रजोगुणके रुद्र तमोगुणके अभिमानी हैं
मुक्त नहीं भये तौ तुमको कैसे मुक्त करेंगे सो जौन तीनों देवतनको अधिकार
दिये हैं सबको मालिक श्रीरामचंद्र तिनको भजनकरु तब मुक्ति पावैगो तहां
प्रमाण गोसाईंजीको॥"हरिहि हरिता विधिहिं विधिता शिवहि शिवता जिन दयो।
सो जानकी पति मधुर मूरति मोदमय मंगल भयो"॥ और मुस्लमानौ ! तुम
निराकार तौ मानौ हौ इश्क काकेपर करौ हौ सो जो साहबको रूप न मानौगे
तौ इश्क तुम्हारा झूठा ठहरि जायगा ताते बिचारौ तौ साहब रूप न होता तौ
मूसा पैगम्बर को छिगुनी कैसे देखावता ताते उसके रूपहैं परंतु मायाकृत
पाञ्चभौतिक नहीं हैं दिव्य रूपहैं याते निराकारकहैं हैं सगुण निर्गुणके परे जो
साहब श्रीरामचंद्र ताको बन्दाहोउ आपनेको जो मालिक मानौगे तौ बड़ी मार
सहौगे तामें प्रमाण ॥ “स्वामी तो कोई नहीं स्वामी सिरजन हार ॥ स्वामी
द्वै जो बैठिहैं घनी परैगी मार” ॥१॥ औ साहब निर्गुण सगुणके परे हैं तामें
प्रमाण ॥ सगुणकी सेवाकरौ निर्गुणका करुज्ञान ॥ निर्गुण सगुणके परे तहँ
हमारा जान ॥ १९४ ॥

साखी। (६०१)
मानुष तेरा गुण बड़ा, मास न आवै काज ॥
हाड़ न होते आभरण; त्वचा न बाजन बाज ॥१९५॥
: हे मानुष! जो तैं देहको अभिमान करै है सो नाहक करै है यह देह तेरी
कौने कामकी है तेरो मांस काम नहीं आवै कोई नहीं खायहै हाड़नके आभरण
नहीं होते हैं त्वचाके बाजन नहीं बाजते हैं सो तेरे एकगुण है या देहते साहब
मिलते हैं सो मिलिबे की यतन करु ॥ १९५ ॥
जौलंगि ढोला तवलगि बोला, तौलंगि धनव्यवहार ॥
ढोलाफूटाधनगया, कोई न झांकै द्वार ॥ १९६ ॥
सबकी उतपति धरणिमें, सब जीवन प्रतिपाल ॥
धरती न जानै आपगुण, ऐसा गुरुदयाल ॥ १९७॥
एकको अर्थ प्रकटै हैं एकको कहैं हैं दुःखसुख नीकनागा सबकी उत्पत्ति
धरतीहीते है कहे शरीरहीते है जौने ज्ञानते सब जीवनको प्रतिपाल है ऐसें
ज्ञानको तू जान अपने गुणको धरती जो शरीर ताको न मानु ते पांचो शरीर
दै बाहिरे हैं ऐसे गुरु दयालुहैं साहब छुड़ावन वारे ताको जानु तैं अंशहै साहब
अंशी हैं ॥ १९६ ॥ १९७ ॥
धरती जानतआपगुण, तौ कधी न होतअडोल ॥
तिलतिलहोतोगारुवा, ह्वैरहत ठिकौकीमोल ॥१९८॥
धरती जो शरीर ताके धरैया जो जीव धरती सो आपनो गुण नहीं जानत
कि मोमें साहबकी प्राप्ति होयबो यही गुणह उत्पत्ति जो करौहै सो साहबकी
शक्तिते मेरीशक्ति नहीं है तौ कधी डोल न होतो अर्थात मनादिकनको उत्पत्ति
करि संसारी न होतो शुद्धै बनो रहतो धरती जीव आपनो गुण कहा जानै जो
आपनोगुण साहबको प्राप्त होइबो जानतै । ता तिल तिलमें गरुई होतजातो कहै
तिलतिल वह ज्ञान बढ़तौ औ ठीक जो है शुद्ध साहबके जनैया जीवात्मा ताकें
मोल है जातो कहै यहै अमर है जातो जे साहबसों मेल किये रहै हैं शरीरहू

, धरती हतो न नीर ।
उतपति परलय नाहती, तबकी कही कबीर ॥"
The commentary literally paraphrases:
"कबीरजी कहै हैं कि जब येसबै नहीं भये तबकी कहै हैं ॥"
"येसबै" means "all these" (referring to the five things mentioned in the doha)!
It is 100% "येसबै"! The type for 'स' was just slightly worn/ink-blotted.
Wait, let's look at whether it's "येसबै" or "येहसबै".
There is definitely no 'ह' before 'स'. It's just "येसबै"!

Wait, let's check line 22:
"जौलौं सूर्य नहीं उगै हैं तौ लगि तारा जग मगायहैं ऐसे जौलौं साहबक"
Wait, is it "साहबक" or "साहबको"?
Look at the end of line 22:
"साहबक" - wait, is there an 'ो' matra?
No, the line ends right at the margin with 'क'!
Wait, is there an 'ो' matra at the beginning of line 23?
Line 23 starts with: "पूरो ज्ञान नहीं होयहै"!
Wait! Could it be "साहबको" where the 'ो' matra was omitted by the typesetter, or "साहबका"?

साखी। ( ६०३ )
नाम न जाने ग्रामको, भूला मारग जाय ॥
काल गड़ेगा कांटवा, अगमन कस न खोराय ॥२०२॥
अरे साहबके तो नगरको नामही नहीं जाने है और मतन मारगमें काहे भूला
जायहै यह काल रूप कांटा तेरें गड़ेगा काल तोकों मारि डारैगा तेहिते अगमन
कहे आगे वह खोरिकहे राहमें आवै जेहिते कालते बचिजाय ॥ २०२ ॥
संगति की जै साधुकी, हरै और की व्याधि ॥
ओछी संगति क्रूरकी, आठौ पहर उपाधि ॥ २०३ ॥
जो साधुकी संगति करिये जे साहबकों जनाय देनवारे हैं तौ साहबको
जानिकै औरकी ब्याधि हरै औजो क्रूर जे असाधु तिन की संगति करै तौ
आठौ पहर उपाधिही लगी रहै है ॥ २०३ ॥
जैसी लागी औरकौ, तैसी निबहै थोरि ॥
कौड़ी कौड़ी जोरिकै, पूज्यो लक्ष करोरी ॥ २०४ ॥
और ते जो थोरहूथोर साहबमें लगे भक्ति करै औ तैसे छोरलों निबहिजा
यहै तो जो थोरऊ थोर साहबमें लगे औ साहबकी भक्तिकैरै तौ जैसे कौड़ी
कौड़ी जोरे केतो करोरि है जायहै ऐसे वाकी भक्ति हू हैजायहै अनेक जन्मकी
संसिद्धिते मुक्तहै जायहै ॥ २०४ ॥
आजु काल्हि दिन एकमें, अस्थिर नहीं शरीर ॥
केते दिनों राखिहौ, काचे बासन नीर ॥ २०५ ॥
आजु काल्हि यहि कलिकालमें एको दिनमें शरीर स्थिर नहीं है केतनीबेरधौं
शरीर छूटिजाय आगे तो प्रमाण रह्यो है कि येती आयुर्दाय मनुष्यकी है
अबतो कछू प्रमाणै नहीं है केती बेर शरीर छूटिजाय तेहिते साहब को भजन
करो कच्चे बासन शरीरमें केते दिन नीर राखौगे ॥ २०५ ॥
करु बहियां बल अपनी, छाडुबिरानी आस ॥
जाके आंगन नदी बहै, सो कस मरै पिआस ॥२०६॥

( ६०४ ) बीजक कबीरदास ।
अरै और औरै मतनमें जो लगेहै तिनमें न लागु बिरानी आशा छोड़िदें
तैं काहूके छुड़ायें न छूटैगो अपनी बहियांको बल करु तेरे उद्धार करिबेकों
तेरी बंहियां श्रीरामचन्द्रहैं सो आगे कहिआये हैं कि मोटे की बाँहले औ जाकें
आँगन में नदिया है सो का पिआसन मरै है तेरा तो साहब ऐसो रक्षकबनोहै तैं
काहे साहब को भूलि औरै औरे मतनमें लगे है ॥ २०६ ॥
बहु बन्धनते बाँधिया, एक बिचारा जीव ॥
का बल छूटै आपने, जो न छुड़ावै पीव ॥ २०७ ॥
कबीरजी कहै हैं कि ये बिचारे जीव तें बहुत बंधन ते बंध्यो है बहुत
गरीबहैं सो जो तैं आपने बिचारते छूटा चाहै तौ तैं न छूटैगो बिना श्रीराम-
चन्द्रके छोड़ाये वोई तेरे पीउ हैं उनकी या प्रतिज्ञा है कि जो एकहू बार
मोको जीव गोहरावै तौ मैं वाको छुड़ाय लेवहौं ताते तैं साहबकी शरण जाय
जाते संसार ते छूटि जाय जे साहबकी शरण जाय हैं ते कालहूके माथ पै लात
दै चले जाय हैं तामें प्रमाण श्रीकबीरजीको ॥
कालके माथे पग धरी; सतगुरुके उपदेश ।
साहब अङ्क पसारिकै, लैगे अपने देश ॥ १ ॥
गगन मँडल दृग महलमें, द्वे घाटीके ईश ।
नाम लेत हंसा चले, काल नबावै शीश ॥ २ ॥
औ जे राम नाम नहीं लेइ हैं ते नहीं मुक्त होय हैं तामें प्रमाण ।
यहि औतार चेतो नहीं, पशु ज्यों पाली देह ।
रामनाम जान्यो नहीं, अन्त परा मुख खेह ॥ २०७ ॥
जिवमति मारहु बापुरा, सबका एकै प्राण ॥
हत्या कबहुँ न छूटि है, कोटि न सुनै पुराण ॥२०८॥
जीव घात ना कीजिये, बहुरिलेत वह कान ॥
तीरथ गये न बाचिहौ, कोटि हिरादे दान ॥ २०९॥

साखी । (६०५)
तीरथ गये सो तीन जन, चितचंचल मन चौर ॥
एकौ पाप न काटिया, लादे दशमन और ॥२१०॥
इनके अर्थ स्पष्टई हैं ॥ २०८ । २०९ । २१० ॥
तीरथ गये ते वहि मुये, जूड़े पानी न्हाय ॥
कह कबीर संतौ सुनौ, राक्षस है पछिताय ॥ २११ ॥
तीर्थ में जे जायं हैं ते तीर्थके जूड़े पानी में नहायकै बहि मुये कहे खराबह्वै
मुये काहे ते कि जौन तीर्थजाबे नहाबेकी विधि है सो एकौ न किये काहूकों
धक्का मार्यो काहूपै कोप कियो सो कबीरजी कहै हैं कि हे सन्तौ सुनौ ते
नर राँक्षक होइकै पछिताय हैं कि हम सों न बनी ॥ २११ ॥
तीरथ भै बिष बेलरी, रही युगन युग छाय ॥
कबिर न मूल निकन्दिया, कौन हलाहल खाय ॥२१२॥
तीरथ कहे तीन हैं रथ जाके सतरजतम ऐसी जो त्रिगुणात्मिका माया सो
विष बेलरीभै चारिउयुगमें छाय रही है कबिरन मूलनिकन्दिया कहे मूल जों
रामनाम है ताको कबीरा जे जीव हैं ते निकन्दिया कहे न ग्रहण करते भयें
जो कोई कहबौकियो ताहूको खण्डि डारत भये सो या नाना कुमति रूप
हलाहल खाय जीव क्यों न नरकै जाय जाबेही चाहै ॥ २१२ ॥
हे गुणवन्ती बेलरी, तव गुण वरणि न जाय ॥
जर काटेते हरि अरी, सींचेते कुंभिलाय ॥२१३॥
हे गुणवंती बेलरी माया बाणी तेरो गुण बरणि नहीं जाय है कहांलौं वर्णन
करें जब तेरी जर काटन चलैं हैं तीर्थ करिकै अहंब्रह्मास्मि कैकै तौ अधिक
हरिअरी होय है महीं ब्रह्महौं या अभिमान बढ़्यो अधिक हरि अरी भई
तामें प्रमाण ॥ “ कुशलाब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः सुरागिणः ॥ तेपि यान्तित-
मौनूंनं पुनरायान्तियान्ति च ” ॥ २१३ ॥

( ६०६ ) बीजक कबीरदास ।
बेलि कुठंगी फलबुरो, फुलवा कुबुधि वसाय ॥
मूल विनाशी तूमरी, सरोपात करुआय ॥२१४॥
यह मायारूपी जो बेलि है सो कुठंगी है काहेते कि याको दुःख रूपी फल
बुरो है औ कुबुधि जो है सोई फूलहैं वाकी नाना वासना जें हैं सोई बास बसायहै
सो यह मूल विनाशीहै अर्थात् मिथ्याहै याको मूल नहीं है आपहीते उत्पत्ति
भई है औ जेते भर मायिक पदार्थ हैं ते पातहैं तिनमें सबमें करुआई है अर्थात्
साँचे सुख नहीं हैं ॥ २१४ ॥
पानीते अति पातला, धूवाँते अति झीन ॥
पवनहुँते अति उतला, दोस्त कबीरा कीन ॥२१५॥
पानिहुँते पातर धूमाँ ते झीन औ पवनौते चंचल ऐसो जो क्षुद्रमन ताको
कबीराजे जीव ते दोस्त किये हैं सो चौरासी लक्षयोनिमें डारदियो ॥२१५॥
सतगुरुबचनसुनौहोसन्तौ, मतिलीजैशिरभार ॥
होहजूर ठाढ़ारकहौं, अबतें समर संभार ॥ २१६ ॥
साहब कहैं हैं सतगुरु जो कबीर तिनको वचन सुनिकै हे संतौ आपनेमें
मनको भारामति लेहु तुमसों समर ह्वै रह्यो है सो मनको जीति लेहु मैं हजूरमें
ठाढ़कहौं हौं अर्थात् दूरि नहींहौं जो तुम मनको जीतौ तौ मैं अपनायलेहुं २१६
ये करुआई बेलरी, औ करुवा फलतोर ॥
सिंधुनाम जब पाइये, बेलबिछोहा होर ॥ २१७ ॥
हे कल्पणारूप बेलि! तेरा फल बहुतकडुवाहै जो कल्पना करै है सो नरकही को
जायहै सो तब सिंधुनाम पावैगो जौने जगतमुख अर्थवेद शास्त्रमाया ब्रह्मजीव
सब जगत्भरोहै तौनेको जब पावैगो तब साहबमुख अर्थ जानिकै साहब रत्नको
पावैगो तब कल्पना बेलि को बिछोह ह्वै जायगो ॥ २१७ ॥
परदे पानी ढारिया, संतौ करहु विचार ॥
शरमी शरमा पचि मुआ, काल घसीटन हार॥२१८॥

गुरुमुख ॥ परदेते पानी ढरियाकहे गुरुवालोग नये मंत्र बनायकै परदे
परदे उपदेशकियो औ सिखापनदियो कि काहूसों कहियो नहीं सब वेदशास्त्र
झूठे हैं जीवात्मै सत्य है ताही मानो या समुझायदियो सो वही धरे धरे जीव नर
कको गये जो साँचो राम नामहै ताको न जान्यो वही गुरुवनको बताओ मंत्र
ताहीके भरोसे सब पूजापाठ धर्मकर्म सब छांडिदियो कहैहै हमनिष्कर्म हैं और
यहबात नहीं जानैं है कि भगवान् पूजादिक ये कर्मनमें नहीं हैं तामें प्रमाण
श्रीकबीरजीको॥ “और कर्म सब कर्म हैं भक्ति कर्म निष्कर्म। कहैं कबीर पुकारिकै
भक्तिकरौ तजि भर्म”॥ सो देखो तो भाजीके लियेतौ बाजारमें मूड़फोरै हैं भगवा-
नकीभक्ति कारिबेको कहैहैं हम निष्कर्म हैं पिसानकै चौकडारि मालपुवा धरिकै
चौकाकरैं हैं आरतीकरैं हैं औ भगवान्की आरती करिबेको कहै हैं हमहीं मालिक
हैं हमारी आरती सब जने करतेजाउ सो हे सन्तो! विचारते तौ जाउ यह अपने
शरमा शरमीमें पचिमुवाहै या कहैहै कि हम गुरुवन को उपदेश न छांड़ेंगे या नहीं
जानै हैं कि या शरम में हमको औ हमारे गुरुवौ को यम घसीटिडारेंगे नरकमें
डारि देयहैं तब मालिक है कै न बचौगे तब कौन रक्षा करैगो साहबको तो जनबै
न कियो । जिन साहबको जान्यो है हनुमान् अंगद कबीरतैं अबलौं बने है तेहि
ते साहबको भजन करो जेहिते कालते बचिजाउ नहीं तो शरमा शरमीमें नर-
कमें पचिमरौगे । औ तुम भगवान्को नहीं मानौहौ भगवान्के पाछे नहीं चलौ
हौ सो ब्रह्म राक्षस होइगो तामें प्रमाण ॥ “नानुव्रजति यो मोहाद्व्रजन्तं जगदी-
श्वरम् । ज्ञानाग्निदग्धकर्मापि स भवेद् ब्रह्मराक्षसः” ॥ इति पुरुषोत्तम माहा-
त्म्ये॥औ सब झूठा है साहबको भजन साँचा है तामें प्रमाणकबीरजीको॥
“ कञ्चन केवल हरि भजन, दूजी कथा कथीर ।
झूठा आल जंजाल तजि, पकरो साँच कबीर ॥ १ ॥
जो रक्षक है जीवको, नाहिं करो पहिंचान ।
रक्षकके चीन्हे बिना, अंत होइगी हान” ॥ २ ॥
तेहिते तुम साहबको भजनकरो जाते साहब के लोकैजाउ जहां कालकी
गम्यनहीं है तांमें प्रमाण ॥

( ६०८ ) बीजक कबीरदास ।
" जहां कालकी गमि नहीं, मुआन सुनिये कोई ।
जो कोइ गमि ताको करै, अजर अमर सो होइ " ॥ १ ॥
साहबते बिमुख करनवाले गुरुवालोग यम दूतहैं तामेंप्रमाण ॥"॥ नानारू-
पधरा दूता जीवानांज्ञानहारकाः ॥ कालाज्ञांसमनुप्राप्य विचरन्तिमहीतले "॥२॥
औ कबीरजी चौकामेंरघुनाथजीकी पूजा षोड़शही प्रकारकी लिख्यो है तामें
प्रमाण ॥
चौकाविधानका शब्द ।
अगर चंदन घसि चौक पुरावा सत सुकृत मन भावा ॥
भर झारी चरणामृत कीन्हा हंसनको बरतावा ।
पूरन मौज और रखवारा सतगुरु शब्द लखावा ॥
लौंग लायची नारियल आरति धोती कलश लसावा ।
श्वेत सिंहासन अगम अपारा सो अति बर ठहराया ॥
छांड़े लोक अमृतकी काया जगमें जोलह कहाया ।
चौरासीकी बंदि छोड़ाया निर अक्षर बतलाया ॥
साधु सबै मिलि आरति गावैं सुकृत भोग लगाया ।
कहै कबीर शब्द टकसारा यमसों जीव छुड़ाया ॥ १ ॥
पूरण मासी आदि जों मङ्गल गाइये ।
सतगुरुके पद परशि परम पद पाइये ।
प्रथमै मँदिर झराय कै चँदन लिपाइये ॥
नूतन बस्त्र अनेक चँदोवा तनाइये ।
तब पूरण गुरु के हेतु तौ आसन बिछाइये ॥
गुरुके चरण परछालि तहाँ बैठाइये ।
गज मोतिनकी चौक सु तहां पुराइये ॥
तापर नारियल धोती मिष्ठान्न धराइये ।
केला और कपूर तौ बहु बिधि ल्याइये ॥
अष्ट सुगंध सुपारी लो पान मँगाइये ।
पलौ सहित सो कलश सँवारिकै ज्योति बराइये ॥

साखी । (६०९)
ताल मृदङ्ग बजाइकै मङ्गल गाइये ।
साधु सङ्ग लै आरति तबहिं उतारिये ॥
आरति करि पुनि नारियल तबहिं मोराइये ।
पुरुषको भोग लगाइ सखा मिलि खाइये ॥
युग युग क्षुधा बुझाइ तौ पाइ अघाइयें ।
परम अनंदित होइ तौ गुरुहि मनाइये ॥
कहै कबीर सत भाय सो लोक सिधाइये ।
इहां पूजा के मंत्र नहीं लिख्यो सो पुरुष सूक्तनके मंत्र हैं ताते नहीं लिख्यो है॥
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा। सो कड़हार बैठही चोखा।
दशौ दिशा कर लेखा जानै। सो कड़हार आरती ठानै॥
दशइंद्रीकै पारिख पावै। सो कड़हार आरती गावै।
जो नहिं जानै एतिक साजै। चौका युक्ति करै क्यहि काजै॥
हिंस कारण करहिं गुरुआई। बिगरै ज्ञान जो पंथ पराई।
पद साखी अरु ग्रंथ दृढ़ावै। बिन परखन उत्तम घर पावै॥
शब्द साखीसिखिपारस करहीं। होय भूत पुनि नरकहि परहीं।
विना भेद कड़हार कहावै। आगिल जन्म श्वानको पावै॥
पद साखी नहिं करहि बिचारा। भूंकि रजस मरै सियारा।
पद साखी है भेद हमारा। जो बूझै सो उतरहि पारा॥
जबलग पूरा गुरू न पावै। तब लग भवजल फिरिफिरि आवै।
पूरा गुरु जो होय लखावै। शब्द निरखि परगट दिखलावै॥
एक बार जिय परचौ पावै। भव जल तरै बार नहिं लावै।
साखी-शब्द भेद जो जानहीं, सो पूरा कड़हार ॥
कह कबीर धूमक्ष है, सोहं शब्दहि पार ॥ २१८ ॥
आस्ति कहो तो कोइ न पतीजै, बिना आंस्ति को सिद्ध॥
कहै कबीर सुनो हो सन्तो, हीरै हीरा विद्ध ॥ २१९ ॥
३९

( ६१० ) बीजक कबीरदास ।
कबीरजी कहै हैं कि आस्तिकमत जो मैं सबको बताऊं हौं तो कोई नहीं पति
आयहैं काहेते कि गुरुवा लोगनकी बाणी मानि उनको सिद्धजानै हैं या नहीं
जानै हैं कि ये आस्तिकनहीं हैं साहब को नहीं जानै हैं इनते संसार न छूटैगौ
साहबके जाननवारे जे सांचे साधु हैं तिन्हीं ते संसार छूटै है काहेते हीरा ही
रैते बेधि जाय है ॥ २१९ ॥
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार ॥
दुर्ज्जन कुम्भ कुम्हारके, एकै धका दरार ॥ २२० ॥
सज्जन साधुजन जे हैं ते सोना है जो सैकरनवार टूटै फिरि फिरि जुरिजायहै
औ दुर्जन जे हैं कुम्हारके कुम्भ कहे घड़ा जो फूटा तो फिरि नहीं जुरै है अर्थात्
जो साधुजन कहूं मांगमें भूलिहू जायँ परंतु फिरि समझाये वाहीमें लगिजायहैं
खोटी राह छांड़ि देइ हैं औ दुर्जन जे हैं ते घड़ासे फूटिजायहैं अर्थात् जौने
कुसंगमें परे तौनेहीके भये फिरि नहीं बूझै हैं ॥ २२० ॥
काजर केरी कोठरी, बूडन्ता संसार ॥
बलिहारी तेहि पुरुषकी, पैठिकै निकसन हार ॥२२१॥
यह काजरकै कोठरी मायाहै तौने में यह संसार बूड़िगयो सो वह जीवकी
बलिहारी है जो मायामें आय निकसि जाय ॥ २२१ ॥
काजरही की कोठरी, काजरहीका कोट ॥
तौभी कारा ना भया, रहाजो ओटहि ओट ॥ २२२ ॥
गुरुमुख ।
साहबकहै हैं कि यह माया काया काजरकी कोठरी है याके काजरहीके कोट
बने हैं नाना आशा नानामत माने हैं सो यद्यपि ऐसेहू रह्यो परंतु मोको रक्षक
माने रह्यो मेरी भक्तिकी ओट ही ओट बचि गयो अर्थात् मायाते बचिगयों२२२
अर्बखर्ब लौं दर्व है, उदय अस्तलौं राज ॥
भक्ति महातम ना तुलै, ये सब कौने काज ॥ २२३ ॥

साखी । ( ६११ )
अर्बखर्बलौं द्रव्यभई अथवा अर्बखर्बलौं विद्याको पढजाता भयों साखी शब्द
चौपाई दोहा कंठ भये सब शास्त्र कंठभये औ उदय अस्तलौं राज्यभयो बड़ों
बादशाह भयो सबको अपने बश कैलियों अथवा महंत भयो पंडित भयों
सबको उदय अस्तलौं चेला करिलियो औ शास्त्रार्थ करिकै जीतिलियो औ मन
न जीत्यो तौ कहा कियो भक्तिके माहात्म्यको नहीं तुलैहै ॥ २२३ ॥
मच्छ बिकाने सब चले, ढीमरके दरबार ॥
रतनारी अँखियांतरी, तूं क्यों पहिराजार ॥ २२४ ॥
मनमें लगिकै सबजीव मच्छमायाको अनुभव ब्रह्म है ताहीके हाथ जीव
बिकाय गये औ ढीमरके दरबार सब चले जायहैं अर्थात् काल मनरूपी जालमें
सबको फँदायलेइहै ताहीके दरबार सब चलेजायाँहैं अर्थात् मायाके मारिबेकों
सब उपायकरै हैं कि माया को नाशकैकै ब्रह्महैजायँ मनरूपी जालमें फन्दे
मछरी जो मायाको अनुभव ब्रह्म ताही के साथ बिकाय गये अर्थात् वही में
लीनभये ताहूपै कालते न बचे सो साहब कहै हैं कि तैतो मेराहै तेरे ज्ञान
नयन रतनार रहेहैं कहे मोमें तेरो अनुराग रह्यो है तैं काहे मनरूपी जालमें
परिकै कालके दरबार चलो जायहै जामें मेरो अनुरागहै वे आपनो ज्ञान नयन
खोलु मेरी निर्गुण भक्ति छागुणवारी है सो करु मेरे पास आइकै मन मायाँ
कालते बची जायगो ॥ २२४ ॥
पानी भीतर घरकिया, शय्या किया पतार ॥
पांसापराकरमको, तबमैं पहिरा जार ॥ २२५ ॥
जीवमुख ।
जीवकहै हैं कि मैं वाणीरूप पानीमें घरकियाहै गुरुवालोगँ वाणीको उपदेश
करिकै वही वाणीरूप पानीमें डारि दिये औ संसाररूपी जोपतारहै बन तामें
शय्याकिया तब कर्मको पांसापर्यो तामें मनरूपी जाल मैं पहिरयो अर्थात्
मनरूपजाल में फँदिगयो ॥ २२५ ॥