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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ५५२ ) बीजक कबीरदास ।
सुखं मया दैत्याश्चहरिणा हताः। तज्ज्योतिर्भेदनेसक्ता रसिका हरिवेदिनः"। औ
साहब के लोकमें जे हैं तिनकी सर्व्वत्र गति है तामें प्रमाण ॥ “सस्मृत्युन्त
रतिससर्व्वेषु लोकेषुकामचारो भवति ”॥ इति श्रुतेः ॥ ६० ॥
दोहरा तो नव तन भया, पदहि न चीन्है कोइ ॥
जिन यह शब्द विवेकिया, छत्र धनी है सोइ ॥ ६१ ॥
सेव्य सेवक भाव मान्यो साहबको जान्यो तब दोहरा नव तन भया कहैं
हंस शरीर पायो, परा भक्ति पायो तौनै पदकहे साहबके लोकमें प्रवेशकरै है
सों वो लोकको नहींचीन्है । जो कहौ ब्रह्मरूप हैकै कैसे सेव्य सेवक भाव
साहबते कियो तुम बनायकै कहौ हौ तौ श्रीकबीरजी कहै हैं जिन यहशब्द
द्विवेकिया कहै जिन साहब यह बिबेककारि शब्द बतायो सोई छत्रधनी है
अर्थात् साहिबै मोको बतायो है मैं बनायकै नहीं कहौं हैं तामें प्रमाण ॥
श्रीक

साखी। ( ५५३ )

अथवा हम जौनचाल बतावैं हैं तौने चाल नहींचलते हो औ हमारो नामलेतेहो
कि, हम कबीरपंथी हैं। सो लम्बी टोपी दीन्हे औ बिना छिद्रको चंदन दिये औ
बहुत साखी शब्द कण्ठ करलिये हमारे फिरका न पावोगे मतको न पावोगे यमके
धक्काते न बचोगे। तामें प्रमाण॥ "हमारा गाया गावैगा। अजगैबी धक्कापावैगा ॥
मेराबूझायबूझैगा। सोतीनलोकमेंसूझैगा" ॥१॥ कबीर की साखी शब्दी पढ़िकै
और बितण्डाबाद अनर्थ करनेलगे औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वेदशास्त्रको झूठक-
रनलगे आपने जीवै को सत्य करनलगे ते यमको धक्का पावैचाहैं । औजे कबीरकी
साखी बूझिकै औ परमपुरुष श्रीरामचंद्रको अंशहै जीव श्रीरामचंद्र याके रक्षकहैं
ऐसो जे बूझ्यो ते तीनलोकमें सूझबई करेंगे काहेते उनके रक्षक परमपुरुष
श्रीरामचंद्र तो बनेई हैं सर्वत्र रक्षा करिलेईहैं ॥ ६२ ॥
सबते सांचा है भला, जो सांचा दिल होइ ॥
सांच बिना सुख नाहिं ना, कोटि करै जो कोइ ॥६३॥
जो आपना साँचादिलहोइ तो सबते साँचे जेपरमपुरुष श्रीरामचंद्र औउन्हींको
अंशजीवहै औ उन्हींको मैं साँचो दासहौं यह मत सबते साँचहै सोईभलाहै। सो
यह साँच मत बिना सुख काहूको नहीं है कोटिन उपायकरै । औ श्रीरामचंद्र
सत्यहैं औजीव सत्यहै औ जीवको औ श्रीरामचंद्रको भेदसत्यहै तामेंप्रमाण ॥
"सत्यंभिदः सत्यंभिदः" ॥ इत्यादि औ श्रीकबीरजीकी साखिहूको प्रमाण ॥
"सत्य सत्य समरथ धनी सत्य करो परकाश । सत्यलोक पहुँचावहू, छूटै
भवकी आश ॥ ६३ ॥
साँचा सौदा कीजिये, अपने मनमें जानि ॥
साँचे हीरा पाइये, झूठे मूरौ हानि ॥ ६४ ॥
आपने मनमें पारिखकै लीजिये तब साँचा सौदा कीजिये कहे ऐसी खानि
खुदाइये जाते साँचे हीरा पाइये वही में कच्चे हीरा निकसैं हैं तिनको छाड़िदी-
जिये । ऐसे वेदपुराण खानिहैं तिनमें साहबको मत निकासि लीजिये यह साँचों
सौदा कीजिये और मतनको त्यागि दीजिये काहेते झूठे मत मैं लागे आपनों
स्वरूप जो है साहब को अंश मूर ताकी हानिह्वैजायहै अर्थात् भुलिजायहै॥६४॥

( ५५४ ) बीजक कबीरदास ।
सुकृत वचन मानै नहीं,आपु न करै विचार ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, सपन्यो गो संसार ? ॥ ६५ ॥
सुकृतसाहब अथवा सुकृतसन्त अथवा सुकृत बचन जो मैं कहौंहौं कि साह-
बको भजनकरो सो नहीं मानै हैं जो मनमें आवै है सो विचारकरै हैं । सों
कबीरजी पुकारिकै कहैंहैं का उनको स्वप्न्यो में संसार गयो ? अर्थात् स्वप्नेहूमें
संसार नहीं गयो यह काकुहै ॥ ६५ ॥
लागी आगि समुद्रमें,धुआँ प्रकट नहिं होइ ॥
की जानै जो जरि मुवा, की ज्याहि लाई होइ ॥ ६६ ॥
समुद्रमें आगिबड़वाग्नि लगी है औ वाको धुआँ नहीं प्रकट होइहै सो वाकों
सो जानै है जो वामें जरिजाय कि जाकी वह बड़वाग्नि लाई कहे लगाई होय सो
जानै अर्थात् संसारमें मायाब्रह्म की अग्नि लगिरही है ताको वही जानै जाकोग्यान
भयोहोय या समझैकि माया ब्रह्मकी अग्निमें हम जरेजाय हैं । अथवा सो जानै
जाकी अग्नि बनाई है संसार रच्यो है ॥ ६६ ॥
लाई लावनहारकी, जाकी लाई पर जरै ॥
बलिहारी लावन हारकी, छप्पर वाचै घर जरै॥ ६७ ॥
यहअग्नि किसकी लगाई है ताकेलायेते सगुणनिर्गुण जेदोनों परहैं ते जरै हैं
औ घरजे हैं पांचों शरीरते जरिजाते हैं तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“ अबतौ अनुभव अग्निहि लागी । घेरि घेरि तन जारन लागी ॥
यह अनुभव हम कासों कहिये बूझै कोउ बैरागी ॥
ज्येठरी लहुरी दोनों जरिया जरी कामकी बारी ।
अगम अगोचर समुझि परै नहिं भयो अचम्भौ भारी ॥
सम्पति जरी सम्पदा उबरी ब्रह्म अगिनि पसारी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तौ बड़ी सो कुशल परी ॥ ६७ ॥
बुन्द जो परा समुद्रमें, सो जानै सब कोइ ।
समुद्र समाना बुन्दमें, बूझै बिरला लोइ ॥ ६८ ॥

साखी। ( ५५५ )
यहब्रह्म ईश्वर माया आदिदै कै जो संसारसागरहै तामें बुन्द जो जीवहै सो
पर्यो या सबै जानैहैं कि जीव संसारी ह्वैगयो है वेदशास्त्रमें सर्वत्र लिखैहै अरु
यह सिगरो संसारसमुद्र बुन्दरूप जीवमें समायजाय है अर्थात् ईश्वर मायाब्रह्ममय
जो संसार ताको जीवही अनुभव करि लियोहै सो जबजीव याभांतिते अनुभवत्यागै
कि बिषय इंद्रीमें इंद्रीमनमें मन चित्तमें चित्त प्राणमें प्राण जीवात्मामें लीनकैकै
दैदे तब संसारसागर बुन्दरूप जीवमें समायजायहै अर्थात् संसार मिटिजायहै
जीव साहबको जानि जाय है ॥ ६८ ॥
जहर जिमी दै रोपिया, अमि सींचै सौ बार ॥
कविरा खलकै ना तजै, जामें जौन विचार ॥ ६९ ॥
जिमीमें जहर को थलहादै कै जो बीज बोवै है सो वामें जो सैकड़ों बार
अमृतौ सींचै तो वहि बीजा में जहरको असर आयबोई करैगो तैसे यह खलक
कहै संसारमें मायाकी जिमी है विषय को थलहा है ताते केतिकौ कोई उपदेश
करै परन्तु मायाको असर कबिरा जे जीव हैं तिनके आयही जाय है जोई
बिचारआवै है सोई करै हैं सो संसार नहीं छोड़ैं ॥ ६९ ॥
दौकी दाही लाकरी, ऊभी करै पुकार ॥
अबजो जाउँ लोहार घर, दाहै दूजी बार ॥ ७० ॥
दावानलकी दाही कहे जरी जो लकरी है सोई लाई भई वहै पुकारिकै
कहै है कि अब जो लोहारके घरजाउं तो दूजी बार लोहार मोको दाहै कहै
जारै । सो दावाग्नि जोहैं ब्रह्माग्नि तौनेते जो सम्पूर्ण कर्म जरिहुगे तौ कोयला
रहिजायहै कहे वहै कैवल्य शरीर रहिजायहै । सो कहै हैं कि, जो अब लोहार
जे सतगुरु हैं तिनके इहां जाउं तौ कैवल्यौ शरीर छूटै मुक्त ह्वै जाउँ अर्थात्
जो साहब को न जान्यो औ कर्म सब जरिगये तो कैवल्य शरीर रहिगयो
अर्थात् सब संसारहीमें आवैहैं। जो कैवल्य शरीर छूटै तो हंस शरीते मुक्त
ह्वै जाय काहेते कर्मनके जरे कैवल्यशरीर नहींछूटैहै ॥ ७० ॥
विरहकि ओदी लाकरी, सपचै औ गुंगुआय ॥
दुखते तबही बाचिहौ, जब सगरो जरिजाय ॥ ७१॥

(५५६) बीजक कबीरदास ।
बिरहकी जरी लांकरीहै अर्थात् याको साहब को बिरहभयो है सोवह बिर-
हते ओदी है याहीते सपचै है औगुंगुआयहै नानादुःखपावैहै सो जब पांचौशरीर
जारिजायहैं हंसशरीरपाय साहब के पासजायहै तब दुःखते बचैहै । जो कहौ
इहांतो सगरोशरीर को जरिजायबों कह्यो हंस शरीरको जरिबो काहे न कह्यों
तो हंसशरीर याको न होय वा साहबके दिये मिलै हैं त्यहिते याहीके पांचौ
शरीर जबजरैहैं तब सतई जगह भूमिकाते नाघिकै आठई भूमिकामें जायहै तब
चितमात्र रहिजायहै तब साहब हंसशरीर देइहैं तामें टिकिकै साहबके पासजा-
यहै सो पाछे लिखि आये हैं ॥ ७१ ॥
विरह बाण ज्यहि लागिया, औषध लगत न ताहि ॥
सुसुकि सुसुकि मरि मरि जियैं, उठै कराहिं कराहि ॥७२॥
साहबको विरहरूपीबाण जाकेलग्यो अर्थात् जिनको यहजानिपर्यो कि हमतें
साहबते बिछोहुद्वै गयोहै ते विरहवारनको ज्ञान योगादिक औषध नहींलगै है
बिरहबाणाग्निते तन जरै है मरिमरि जियैहै । याजो कह्यो सो बिरहाग्निते जरै
है स्थूलशरीरको जब अभिमान छूट्यो तब सूक्ष्मशरीरमें जियो, जबसूक्ष्म
शरीर छूट्यो तब कारण शरीरमें जियो, जब कारणशरीरछूट्यो तब महाकारण
शरीरमें जियो, जब महाकारण शरीर छूट्यो तब कैवल्यशरीरमें जियो, यही
मरिमरिजीबोहै । औ तहौं कराहि कराहि उठैहै कहे एकौ शरीर नहीं आछे
लगै हैं ॥ ७२ ॥
सांचा शब्द कबीरका, हृदया देखु विचार ॥
चितदै समझै मोहिं नहिं, कहत भयल युगचार ॥७३॥
साहब कहैं हैं कि साँचाशब्द जो कबीरका राम नाम ताको हृदयमें बिचा-
रिकै देखु तो तैं चित्तदैके नहीं समझै है । मोको चारोंयुग वेद शास्त्रमें कहत-
भयो । औ कबीरजे हैं तेऊ चारोंयुगमें कहतआये हैं । सत्ययुगमें
सत्यसुकृत नामते त्रेतामें मुनीन्द्रनामते । द्वापर में करुणामय ना-

मतें । औ कलियुगमें कबीर नामतें एक रामनामै को उपदेशकियो सो जो तैं
वह रामनामको जानते तो तेरे समीप मोको आवननपरतो हंसशरीरदै अपनेपास
लैआवतो ॥ ७३ ॥
जो तू साँचा बानियाँ, साँची हाट लगाउ ॥
अंदर झारू दैकै, कूरा दूरि बहाउ ॥ ७४ ॥
हेजीव! जो तैं अपने स्वरूपको चीन्है तो तैंसाँचा बानियाँ है सो साँची हाट-
लगाउ कहे साँचे जे साहब तिनकोजानु औ उनके नामरूप लीलाधाम सब
साँचेहैं तिनकीहाट लगाउ कहे स्मरणकरु । औ अन्दरमें झारूदैकै विषय बास-
ना औ नाना मत जे कूरा हैं तिनको दूरि बहायदे तू साँचा है साहबको है
असाँचैन मान लागु ॥ ७४ ॥
कोठी तौ है काठकी, ढिग ढिग दीन्ही आगि ॥
पण्डित तो झोला भये, साकठ उबरे भागि ॥ ७५ ॥
कोठीजे हैं चारौ शरीर ते तो काठकी हैं जरन वारी हैं ज्ञानाग्नि ढिग
ढिग उनके लगी है । वेदशास्त्र पुराण साहबको बतावै हैं सो जे पण्डितरहे तें
सारासारको विचारकर साहब जे सार तिनको जान्यो ते उसअग्निमें परिकै झो-
लाह्वैगये । यै कहे उनके सबशरीरजरिगये । अर्थात् संसारते मुक्तह्वैगये । औ
साकठ जे हैं शाक्ते भागिकै उबरेकहे जो वेदशास्त्र साहबको प्रतिपादनकरै है
तोके डांड़े नहीं गये खण्डन करनलगे उनसों भागिकै संसारमें परे मायामें लपटे
हैं मायैको स्मरण करनलगे ॥ ७५ ॥
सावन केरा मेहरा, बुंद परा असमान ॥
सब दुनियाँ वैष्णव भई, गुरू न लाग्यो कान ॥ ७६ ॥
जैसे श्रावणके मेहको असमान बुन्द परै है तैसे सब दुनिया वैष्णवहोत
भई । सब बीज मन्त्र लेत भये जैसे लोक में को गुरु हजारनचेला एकैबार बैठा-
यकै मन्त्र गोहरायदेय हैं याही भाँति श्रावण कैसोमेह सबको मन्त्रदेइ हैं चेला-
मन्त्रलेइहैं । याही रीति गुरुवालोग उपदेश करतभये कोटिन बैष्णवहोत भयें

( ५५८ ) बीजक कबीरदास ।
गुरु कबै कानलग्यो ? अर्थात् नहीं लग्यो । अरु गुरुतो वाको कहै हैं जो अज्ञानको
नाशकरै सो जो चेलाको अज्ञान न नाशभयो तौ गुरुचेला दोऊ नरकको जायहैं
तामेंप्रमाण ॥ “हरैं शिष्य धन शोक न हरहीं । ते गुरु घोर नरकमें पर-
हीं ॥ ” सो जो वो चेलाको अज्ञान दूरि न कियो तो कौन गुरु है औ जौन
गुरुते ज्ञानलै अज्ञान न नाश कियो तो वह कौन चेला है अर्थात् वह गुरुनहीं
है कायरक्रूर है और वह चेलानहीं है टूट मसखराहै और जो आज्ञानको नाशै
सोई गुरुहै तामेंप्रमाण ॥ “ अज्ञानतिगिरान्धस्यज्ञानाञ्जनशलाकया । चक्षुरुन्मी-
लितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः” औ जो संसार दूरि नहीं करै है सो गुरुनहीं है
तामेंप्रमाण ॥ “ गुरुर्न स स्यात् स्वजनोन स स्यात् पिता न स स्याज्जननी
न सा स्यात्। दैवन्न तत्स्यान्नपतिश्च स स्यान्न मोचयेद्यस्समुपेतमृत्युम् ॥ ”
श्रीकबीरजीकी गुरुपारख अंग की साखी ॥ “ गुरु सीख देवे नहीं, चेला गहै
न खूट । लोक वेद भांवे नहीं, गुरु शिष्य कायर टूट” ॥७६॥
ढिग बूड़ा उसला नहीं, यहै अँदेशा मोहिं ॥
संलिल मोहकी धारमें, क्या निंद आई तोहिं ॥ ७७ ॥
साहब कहै हैं कि हे जीवो! तुम सब संसार सागर के तीरही में बूड़िगये
एकहूबार न उसले,यहै मोको अँदेशाहै या संसारसागरके मोहरूपी सलिल धार-
में क्या तोको नींद आई है भला एक बारतो मूड़निकारि उसलि मोको पुकार-
तो तौ मैं तोको पारही लगावतो सर्वत्र पूर्णमैं बनोहौं तैं मेरे ढिगहीं बूड़ों
जातोहै अबहूं जो जानतो मैं पारही लगाय देहुं ॥ ७७ ॥
साखी कहैं गहैं नहीं, चाल चली नहिं जाय ॥
सलिल मोह नदिया बहै, पायँ नहीं ठहराय ॥७८॥
कबीरजी कहै हैं कि साखीतो कहै हैं औ जो मैं साखी कहो है ताको
गहैं नहीं हैं वाको विचारै नहीं हैं । औ जो मैं चाललिख्यो है सोऊ नहीं चली-
जाय संसाररूपी नदियामें मोहरूपी सलिलबहै है तामें पांव नहीं ठहराय जीव
विचारा क्याकरै या साहब सों अर्कैकै जीवको क्षमापन करावै है ॥ ७८ ॥

साखी । (५५९)
कहता तो बहुता मिला, गहता मिला न कोइ ।
सो कहता बहि जानदे, जो नहिं गहता होइ ॥ ७९ ॥
साहब कहे हैं याही भांति कहता तो बहुत मिल्यो गहता कोई नहीं मिलैहै
सो जो कोई गहता न होय ताको तैं बहिजानदे तोको कहापरी है ॥ ७९ ॥
एक एक निर्वारिया, जो निर्वारी जाय ॥
दुइ दुइ मुखको बोलना, घने तमाचा खाय ॥ ८० ॥
तामें पुनि कबीरजी कहै हैं कि हेसाहब! याको जीवको दोष नहीं है एक २
जो निर्वारतो तौ वेद शास्त्र ते याको निर्वार हैजातो अर्थात् जो एकमालिक
आपही ठहराय देतो तौ जीव गहिलेतो । दुइदइ मुखको बोलना वेद शास्त्रोंकों
अर्थात् कहीं ब्रह्मको, कहीं ईश्वरको, कहीं जीवको, कहीं कालको, कहीं कर्मको
मालिक बतायो सो या दुइमुख के बोलेते जीवघने तमाचा खायहै तुम कों
नहीं जानिसकै ॥ ८० ॥
जिह्वाको दै बंधनै, बहु बोलना निवारि ॥
सो परखी सों संग करु, गुरु मुख शब्द विचारि ॥८१॥
सोकबीरजी कहै हैं कि हेजीव! मैं साहबसों बिनती करिलियो है सो तुम
यहिरह चलो तुम्हारो उबार साहब करिलेइगे अपनी जिह्वाबंधनकरो असत्
वाक्य न बोलनेपावे एकरामनामहीं कहो औनाना मत जोकहौ है सो कहिबो
निवारि देउ । औ जौन सबमतनते पारिखकरिकै साहबको ठहरायो होय ऐसें
पारखीको संगकरु औगुरुमुख जोशब्दहै ताकों तू बिचारकरु काहेते साहब या
कह्यो है ॥ "अबहूं लेहुँ छुड़ाय कालसों जो घट सुरति सँभारै " ॥ सो तैं
सुरतिसँभारि साहबमें लगायदे अनत न जानदे साहब तोको संसार सागरतें
उबारिही लेइँगे ॥ ८१ ॥
जाकी जिह्वा बंद नहिं, हृदया नाहीं सांच ॥
ताके संग न लागिये, घालै बटिया कांच ॥ ८२ ॥

( ५६० ) बीजक कबीरदास ।
जाकी जिह्वा बंद नहीं है जौने मतको चाहै तौनेन मतको प्रतिपादन करै है
औजिनके हृदयमें साहबके नामरूपादिक नहीं हैं तिनके संग कबहूं न लागिये
वें कच्चे हैं उनके संग लागेते संसारमें परौगे ॥ ८२ ॥
पानी तो जिहैं ढिगै, क्षण क्षण बोल कुबोल ॥
मन घाले भरमत फिरैं, काल देत हींडोल ॥ ८३ ॥
पानीरूप जो बानी है सो याके जीभके ढिगै है छिन छिनमें कुबोलई
बोलबोलै है असतबाणी बोलि २ बानीरूप पानीमें भूड़िगयो अथवा ब्रह्ममायाकी
आगी बुझावनवारो पानी याके जीभहीके ढिगहै सो नहीं कहै है छिन छिन
कुबोलंही बोलै है सो मनकें घालेकहे फेरि संसारमें भरमत फिरै है काल जो
है सो याको हिंडोल रूप शरीर दियाहै सो झूलत फिरै है कबहूं मानुष होय है
कबहूं पशु पक्षी इत्यादिक शरीर धारण करै है ॥ ८३ ॥
हिलगैं भाल शरीरमें, तीर रहींहैं टूटि ॥
चुम्बक बिन निकसैं नहीं, कोटि पहन गये फूटि ॥८४॥
जिन मतनमें श्रीरघुनाथजी नहीं मिलैं हैं तेई मतनकें बाण याकें लगै हैं
नाना कुमतिरूपी गाँसी याके अटकी हैं सो रामनाम चुम्बक बिना वे नहीं
निकसैं हैं ॥ ८४ ॥
आगे सीढ़ी साँकरी, पाछे चकना चूर ॥
परदा तरकी सुन्दरी, रही धका दै दूर ॥ ८५ ॥
साहबके यहां की गैल बहुतै साँकरी है कोई कोई पावै है औ पाछे संसा-
रमें गिरै तौ चकनाचूर ह्वैजाय परदातरकी सुन्दरी जो माया सो जो कों
साहबसों लगनलगावन लागैहै ताको धका देईहै औ जो कोई साहबके सम्मुख-
भयो वही राह चढ़यो तेहिते दूरिरहै है धुनि या है। कि, जो वाके जायगी तौ
गैलसाँकरी है दूसरे की समाई नहीं है पीसिजायगी यहडरहै ॥ ८५ ॥
संसारी समय बिचारिया, क्या गिरही क्या योग ॥
अवसर मारो जात है, चेतु बिराने लोग ॥ ८६ ॥

क्या गिरही कहे गृहस्थ औ क्या योमवारे कहे योगी ज्ञानी ते श्रीरामचन्द्र
को छोड़ि छोड़ि और औरसाहब बिचारै हैं ते सब संसारीसमय बिचारते हैं परमा-
रथ कोई नहीं बिचारै हैं अर्थात् संसारहीमेंरहे हैं अर्थात् आपने इष्ट देवतन के
लोकगये अथवा ब्रह्म में लीन भये ज्योतिमें लीनभये पुनि संसार में आयगये
सो हे जीव ! तैं बिरानाहै साहबको है और काहूको नही है और मतनमें लागे
तैं न छूटेगो । जौनजाको होयहै तौन ताहीके छुड़ाये छूटै है सोया मानुष शरीर
पायकै अवसर मारो जायहै चेतुतौ तैं परमपुरुषश्री रामचन्द्रको है तिनहींकेछुड़ायें
संसारते छूटैगो । औ संसारी देवतनकों कहा परी है जो आपनेते छुड़ायकै
संसारतें छुड़ावेंगे वे तौ और संसारही में डारेंगे ॥ ८६ ॥
संशय सब जग खंधिया, संशय खँधै न कोय ॥
संशय खंधै सो जना, जो शब्द विवेकी होय ॥ ८७ ॥
संशय जो है मनको सङ्कल्प बिकल्प सो सब जगको खँधाइ लियोहै
कहे फँदाय लियो है औ संशय जो है मनको सङ्कल्प विकल्प ताको कोई नहीं
खँधि सकैहै अर्थात् मनको सङ्कल्पविकल्प काहूको नहीं छूटै है जो साहबके
शब्द रामनामको अर्थ बिचारत रहे हैं सोई संशयको खँधिसकै है अर्थात् ताहीके
मनको सङ्कल्पविकल्प छूटै है, संशय छूटिबे को उपाय याहीमें है ॥ ८७ ॥
बोलनाहै बहु भाँतिके, नयन कछू नहिं सूझ ॥
कहै कबीर बिचारिकै, घट २ वाणी बूझ ॥ ८८ ॥
सो बोलना तो बहुत प्रकारके हैं कहे बहुत प्रकारके शब्दहैं बहुत प्रका-
रके मतहैं तिन मतनमें ज्ञान नयनते सार पदार्थ जो जनन मरण छुड़ावे सो
कछू न सूझतभयो । सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि तैं बिचारिकै तौ देखु येजे
बाणी ते नानामत घटघटते निकसै हैं ते मनैके सङ्कल्प विकल्पते हैं, सो तौनेते
संकल्प विकल्प मनको कैसे छूटेगो येतो मनबचनमें है । वह घटघटकी बाणी
तो झूठकी कहांते निकसीहै वह वाणीको मूल औ मनबचनके परे ऐसो जो
रामनाम ताको बिचारकरि जानैगो तबहीं छूटैगों । यह सब बाणीको मूल रेफ
है सो नाभि स्थानमें है तहाँते बाणी उठै है सो जो मूल है सो तो साहबके
३६

( ५६२ ) बीजक कबीरदास ।
बतावै है रामनामही प्रथम प्रकटकरै है । औमूलाधार चक्रमें मूलजों रामनाम
है मनवचनकेपरे त्यहिते जो अनुसार भयो बाणीको ताहीको आभास परा बाणी
प्रकट भई रेफ, ताहीते अकार जब जारचों तब रकार रूप हृदयमें पश्यन्ती प्रकट होइ
है। औ फेरि जब एक अकार और आयो तब कण्ठ में मध्यमा प्रकट होइहै। औ
पुनि जब बैखरीमें एक अकार और प्रकटभयो जब ओठलग्यो तब व्यंजन
मकार भई तब वहै मन बचन के परे राम नाम सो आपने रूप को आभास
बैखरी में प्रकटकरै है सोई प्रथमभी कबीरजी लिख्यो कि ॥ “ रामनाम लै
उचरीबाणी ” ॥ सो प्रथम याको प्रतिलोम क्रमतें जप करत चारिउ बाणी
को स्वरूप जानै औ फेरि अनुलोम क्रमते रामनाम को उच्चारकरै घण्टा नाद वत
या भांतिते जो जपकरै तौ जानै कि,मन बचनके परे जो रामनाम ताको आभास
जो रामनाम है सो प्रथम याहीको लै कै बाणी उचरी है । फेरि प्रणवादिक
मन्त्र भये हैं यही घटघट बाणी को मूल तैं बूझ औ मन बचनते परे जे साहब
हैं तिनको पायजाय सो या भांतिते बाणीको मूल जो तैं घटघटमें बिचारै तौ
ये सब बाणी ऊपरते नानामत नाना सिद्धांत कहै हैं याको मूल सिद्धांत तौ
साहिबै को बतावै है त्यहितें चारोवेद छःशास्त्र तात्पर्य करिकै श्रीरामचन्द्रही
को बतावै हैं सो मेरे सर्व्व सिद्धांत ग्रन्थमें प्रसिद्ध है ॥ ८८ ॥
मूल गहेते काम है, तू मति भर्म भुलाय ॥
मनसा पर मन लहरि है, वहि कतहूं मति जाय॥८९॥
मन जो है सोई समुद्रहै मनसा कहें मनोरथ ताकी लहरि में बहिकै तैं
मतिजा अर्थात् मनको संकल्प विकल्प छोड़ि दे । नाना बाणी नानामत में तैं
न भूलिजाय, मूल जो रामनाम ताही को ग्रहणकरु, याही के गहेते तेरों
उबार होइगो संसार छूटैगो ॥ ८९ ॥
भँवर बिलम्बै बागमें, बहु फुलवनकी आश ॥
जीव बिलम्बै विषयमें, अन्तहु चलै निराश ॥ ९० ॥
जैसे भँवर बागमें बहुत फूलनकी आश करिकै बिलँबै है तैसे जीव संसारमें
बहुत विषयंकी आशकै पर्यो । सो ऐसो फूल भ्रमर न पायो कि एकैफूल

सूंघते संतोषहैजाय । औ न ऐसे विषय जीवही पायो कि जामें संतुष्ट हैजाय ।
अर्थात् विषयसुख जीव कियो परन्तु अन्तमें निराशही हैजाय है सो प्रकटही है
वह सुख नहीं रहिजायहै परन्तु मूढ़जीव नहीं छोड़ै है ॥ ९० ॥
भंवर जाल बगु जाल है, बूड़े जीव अनेक ॥
कह कबीर ते बाचिहैं, जिनके हृदय बिबेक ॥ ९१ ॥
भ्रमर जाल जो हैं संसारसागरके विषयको अनेक फेरो सो कैसे हैं कि
बकुलाजे जीव हैं तिनके बोरिबेको जालहैं, तामें बहुतजीव बूड़िगये । सो कबी-
रजी कहै हैं कि, जिनके हृदयमें विवेकहै असार बाणीको छोड़िकै सारजो
रामनामरूपी जहाज ताको विवेक करि गहि लियो है तेई संसारसागर के
पारजाइहैं ॥ ९१ ॥
तीनि लोक टीडी भई, उड़िया मनके साथ ॥
हरि जन हरि जाने बिना, परे कालके हाथ ॥ ९२ ॥
टींडीके जब पखना जामा तब जहैं जाइहै तहँ मरिही जायहै सो तीनिलोकके
जीवनके मनरूपी पखनाजामे सो जहां जाय हैं तहां मरिही जायहैं सो हैं तो ये
हरिकेजन हरिके अंश पै अपनो स्वामी औरक्षक हरिजे हैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र
सबके क्लेश हरनेवाले तिनके बिना जाने कालके हाथमें परे औ मनके साथ
उड़ैहैं सो मरतमें जहँ मनजायहै तौनैरूप हैजायहै तामेंप्रमाण ॥ “अंते या मतिः
सा गतिः”॥ औ कबीरजी हूको प्रमाण॥“जाकी सुरति लागिहै जहँवां। कहैकबीर
सो पहुँचे तहँवां” ॥ ९२ ॥
नाना रंग तरंग हैं, मन मकरन्द अबूझ ॥
कहै कबीर पुकारिकै अकिल कला लै बूझ ॥ ९३ ॥
सङ्कल्प विकल्परूप नानारङ्गकी हैं तरंगै जामें ऐसो जो मन तामें काहेते
तरंग उठै है कि, मकरन्द जो विषयरस ताको पान करिकै मतवालो है गयो
है सो जो मतवालो होय है सो औरको और करै चाहै । श्रीकबीरजी पुकारिकै
कहै हैं कि, अकिल जो बुद्धि तामें निश्चय करिकै कला जो है रेफ अर्ध-
मात्रा ताको लैके बूझ अर्थात वही अर्ध मात्रामें स्थितिकी विधि पाछे लिखि

( ५६४ ) बीजक कबीरदास ।
आये हैं अथवा नानारंगकी जामें तरङ्ग उठतीं हैं ऐसा जो मकरन्द पुष्परस
कहावै है सो महुवाके फूलका रस मदिरा समुद्र मनसो अमूझकहैं अपारहै
वारपार नहीं सूझिपरै है सो कहा ते मनरूपी मद भरचो है सो अपनी अकिलते
कहैं बुद्धिते बह कलाल कहे कलार को तो बूझ ॥ ९३ ॥
बाजीगरका बंदरा, ऐसा जिउ मन साथ ॥
नाना नाच नचायकै, राखै अपने हाथ ॥ ९४ ॥
ये मन चंचल चोर ई, ई मन शुद्ध ठहार ॥
मनकरि सुर मुनि जहाड़िया, मनके लक्ष दुवार ॥ ९५ ॥
ये दोनों साखिनको अर्थ स्पष्टई है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
विरह भुवंगम तन डसा, मन्त्र न मानै कोइ ॥
राम वियोगी ना जियै जियै सो बाउर होइ ॥ ९६ ॥
विरह भुवङ्गम कहे जिनको साहबकी अप्राप्तिहै तिन जीवनको अज्ञान भुव-
ङ्गम डस्यो है ताते ज्ञान भक्ति वैराग्य योग ये मंत्र नहीं मानै हैं काहेते कि
जिनमें साहबको ज्ञान नहीं है तैं भक्ति वैराग्य ते विमुखहैं । सो कबीरजी
कहै हैं कि रामके वियोगी जे जीवहैं ते जियै नहीं हैं विषयमें लागेहैं काल
उनको खायलेइहै । औ जे योग करिकै वैराग्य करिकै भक्तिकरिकै जियेहैं
विषय छाड़िकै संसारको छोड़ै हैं ते बाउर ह्वैजायहैं । कहैं बहुत दिन जीबों-
किये ब्रह्महूमें लीन भये तौ पुनि संसारमें तो आवही करेंगे। काहेते कि, अपने
स्वामीको तो चीन्हबही न किये अर्थात् बैकल ह्वैगये हैं जो बैकलाय हैं सो
औरको और करैहैं यथार्थ बात नहीं करै हैं ॥ ९६ ॥
राम वियोगी विकल तन, जानि दुखबो इन कोइ ॥
छूवतही मरि जायँगे, ताला बेली होइ ॥ ९७ ॥
श्रीकबीरजी गुरुवालोगनते कहै हैं जे साहबके बियोगीजीव ह्वैरहेहैं तिनकों
तुम काहे दुखावतेहों अर्थात् नाना मतनमें नाना उपासनामें काहे भटकावतेहों
जरैमें लोंन मींजतेहौ इनके भीतर आपहीते तालाबेली परिरही है नाना मत

खोजैहैं ये छुवतही मरि जायेंगे । अर्थात् धोखा ब्रह्म उपदेशदैतै में गहि लेइँगे
सो अबै तौ भला बद्धै भरिहैं नित्यबद्ध नहीं हैं जो कहूं साधुते भेंट ह्वैजाय
तो उबारहू ह्वैजाय जब धोखा ब्रह्म में लागैगो तब वाको न छोड़ैगो साहब
को मत खण्डन करैगो सो तुम ऐसे मरेनको काहे मारौहौ ॥ ९७ ॥
बिरह भुवंगम पैठिकै, कीन करेजे घाव ॥
साधुन अंग न मोरिहै, जब भावै तब खाव ॥ ९८ ॥
बिरहरूपी भुवङ्गम कहे साहबको अप्राप्तरूपी जो भुवङ्गम है सो पैठिकै
करैजेमें घाव करतभयो अर्थात् उत्पत्ति प्रकरणमें साहबकी अप्राप्ति जीवनको होत
भई जेहिते साहबते विमुख संसारी ह्वै गये । अथवा गुरुवालोग कानमें लगिकै
नाना मत नाना उपासना बताय करेजेमें घाव करिदियेहैं । अर्थात् औरईमें
लगाइके साहबके मिलबेके द्वारको निरोध कारिके साहबकी अप्राप्तिको उपाय
अच्छी प्रकार करते भये अर्थात् साहब ते बिमुख करिदिये । सो जेते असा-
धुरहे साहबकी भक्तिको कौने जन्मको संस्कार उनको न रह्यो तेतो मारेपरे
औ जे कौनेहू जन्ममें साहबको पुकार्योहै उपासना कियो है धोखेहु कबइ एकबार
सत्यप्रेम के साथ साहब को स्मरण कियोहै सो वाकी वासना बढत बढत बढ़
जायगी आखिर साहबको जानिकै साहबको प्राप्त होय जायेंगे । गुरुवा लोग
जब चाहें तब उनको खातरहैं, धोखामें लगावतरहैं धोखामें कबहूं न लगैंगे ।
ऐसो जो साधु सो साधु कबहूं न अङ्गमोरैगो काल उनको जब चाहै तब खाय,
वे जब जन्मधरेंगे तब साहिबै की उपासना करेंगे उपासना भये सिद्ध करि साहबके
पास पहुंचेंगे । तामें प्रमाण “अनेक जन्म संसिद्धिस्ततो याति परां गतिम्” ॥
जे धोखेहू साहबको जान्यो है ते शरीर धारन कारिके चौरासीमें नहीं जाइ हैं
और जो साहबको नहीं जानै हैं साहब को स्मरण नहीं कियौहै जे संसार मेंही
लगेरहैं हैं ते चौरासीमें बारम्बार पड़ेंगे। साहबको भजन करनवारो चौरासी नहीं
जाइहै तामें प्रमाण । चौरासी अंगकी साखीको ॥ “ भक्त बीज पलटै नहीं,
जो युग जाहिं अनंत ॥ नीच ऊंच घर अवतरै, होय संतको संत ” । अथवा
[सा]हबकी अप्राप्तिते जीव सब संसारी भये । ते जीवनमें जे साधु भये साहब

( ५६६ ) बीजक कबीरदास ।
को जान्यों उनके शरीरको जब चाहे तब काल खाये उनको पीड़ा नहीं होय
है उनको साहेबै सर्वत्र देखि परै है साहबकी प्राप्तिही बनी रहै है ॥९८॥
करक करेजे गड़ि रही, वचन वृक्षकी फांस ॥
निकसाये निकसै नहीं, रही सो काहू गाँस ॥ ९९ ॥
विरह रूप कहे, सब जीवको साहब की अप्राप्ति रूप जो भुवंगम है करककहैं
पीड़ा गड़िरही है कहै गुरुवनके बैन वृक्षकी फांसको लगोद छोलिकै काठ के
बाण बनावै है ताकी फाँस अथवा वृक्षते शरइव आयगई ताकी फाँस करेजे में
गड़िरही है सो निकासेते नहीं निकसै है अर्थात् जिनको गुरुवालोग धोखाब्रह्ममें
लगायदिये हैं ते पलटाये नहीं पलटै हैं वाहीकों गहै हैं। काहूके तो बाण
सहित गाँसी के अटकिरहै हैं तें वही ब्रह्मको प्रतिपादन करै हैं सत् मतको
खंडन करै हैं औ वे जे ऊपरते भेष बनाये हैं भीतर धोखाब्रह्मही घुसो है
तिनकें भीतर करेजे में गाँसिही भर अटकी है तामें प्रमाण ॥ अन्तश्शाक्ता ब-
हिश्शैवाः सभामध्ये च वैष्णवाः । नानारूपधराः कौला विचरंति महीतले” । अथवा
गुरुवालोग जो और और देवतन को मत सुनायो है सोई उनके अंतःकरणमें
जाइकै अज्ञानरूपी वृक्ष जाम्यो है तौनेकी कुमतिरूपी फाँस याके करेजे में
गड़िरही है सो वह करक कहे जनन मरणरोग नहीं जायहै अर्थात् वा फाँस
काहूकी निकासी नहीं निकसै केतो उपदेश कोई करै सो कबीरजी कहै हैं कि
काहू गुरुवनकी यहजीव कें कहा गाँस कहै बैररह्यो है जो ऐसी फाँस मारच्यों
जो अबलौं निकासी नहीं निकसै ॥ ९९ ॥
काला सर्प शरीरमें, सब जग खाइसि झारि ॥
बिरलै जन बचिहैं जोई, रामहिं भजैं विचारि ॥ १०० ॥
कालरूप जो सर्प सो सबजीवन के शरीरमें बसै है शरीरके साथै उत्पन्न
भयो है जेती अवस्थाजायहै तेतीकाल खातोजाय है जब आयुर्दाय पूरिगई तब
सबकाल खाय लियो याहीभाँति बस जगत्को कालझारादै खाये लेइहै जे सबमतकों
छोड़ि परम पुरुष श्रीरामचन्द्रको बिचारिकै भजै हैं तेई बिरलैबाचै हैं तामें प्रमाण

साखी । ( ५६७ )
कबीर जीको पद ॥
सन्तौ रामनाम जो पावैं । तौ वो बहुरि न भवजल आवैं ॥
जंगमतो सिद्धिहिको धावैं। निशिबासर शिव ध्यानलगावैं ॥
शिवशिवकरतगयेशिवद्वारा । रामरहेउनहूंतेन्यारा ॥
पण्डित चारिउ वेदबखानैं । पढ़ैं गुनें कछु भेदनआनैं ॥
संध्या तर्पण नेम अचारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
सिद्धएकजो दूधअधारा । कामक्रोधनहिंतजैं बिकारा ॥
खोजतफिरैंराजको द्वारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
बैरागी बहुवेश बनावैं । करमधरमकी युगुतिलगावैं ॥
घण्टबजाय करैं झनकारा । रामरहे उनहूतें न्यारा ॥
जंगमजीवकबौंनहिंमारैं । पढ़ैंगुनैं नहिं नामउचारैं ॥
कायहिको थापै करतारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
योगी एकयोग चितधरहीं । उलटे पवन साधना करहीं ॥
योगयुगुतिलै मनमें धारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
तपसी एकजो तनकोदहई । बस्तीत्यागिजङ्गलमें रहई ॥
कन्दमूलफलकरआहारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
मौनी एकजौं मौनरहावैं । और गाउँमें धुनीलगावैं ॥
दूध पूत दैचले लवारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
यती एक बहुयुगुतिबनावैं । पेटकारणे जटाबढ़ावैं ॥
निशिबासर जो करहङ्कारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
फुकरा लैजिय जबह कराहीं । मुखते सबतर खुदाकहाहीं ॥
लैकुतकाकहँ दम मदारा । रामरहैं उनहूंते न्यारा ॥
कहैकबीरसुंनोटाकसारा । सारशब्द हम प्रकटपुकारा ॥
जोनहिं मानहिं कहाहमारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥ १०० ॥
काल खड़ा शिर ऊपरे, जाग विराने मीत ॥
जाको घर है गैलमें, क्या सोवै निश्चीत ॥ १०१ ॥

: ( ५७० ) बीजक कबीरदास ।
मानुष ह्वैकै ना मुवा, मुवा सो डाँगर ढोर ॥
एकौ जीव ठौर नहिं लाग्यो, भया सो हाथी घोर १०८॥
जो कोई साहबके पास पहुँचे सोई मानुषहै अर्थात् साहब द्विभुजहैं यहौ
द्विभुज ह्वैकै साहबकें पास जाइहै औ कबहुँ मरै नहीं है सो साहबकें जाननवारें
नहीं मरैं या पीछे लिखि आयेहैं औ जे साहबको नहीं जानै हैं तेई मरै हैं ते वे
डाँगरढोरहैं ते मानुष नहीं हैं अर्थात् पशुहैं एकौ ठौर में नहीं लागैहैं कहे साह-
बके पास नहीं पहुँचे हैं हाथी घोर इत्यादिक नाना योनिमें भटकै हैं ॥१०८॥
मानुष तैं बड़ पापिया, अक्षर गुरुहि न मानि ॥
बार बार वन कूकूही, गर्भ धरे चौखानि ॥ १०९ ॥
हेमानुष ! तैंतो श्रीरामचन्द्रको अंशहै तेरो स्वरूप मानुष को है सो तैं बड़ो
पापी ह्वैगयो काहे ते किं साहब तोको बारबार गोहरायोःकि तैं मेरो है मेरे पास
आउ सो उनके कहे अक्षर न मान्यों आज्ञा भंगकियो तौने पापते बारबार जों
बनकी कुकुही कहे मुर्गी तिनके कैसोगर्भ चारिउ खानिके जीवनमें परिवारके पाल-
न पोषणमें लागिकै पुनि पुनि जन्मधरत भयो नानादुःख सहत भयो इहाँ
मुर्गी याते कह्योहैं कि बच्चा बहुतहोयहैं ॥ १०९ ॥
मनुष बिचारा क्या करै, कहे न खुले कपाट ॥
श्वान चौक बैठायकै, पुनि पुनि ऐपन चाट ॥११०॥
वेद शास्त्र पुराण इनकेकहे जो कपाटनहीं खुलै हैं अर्थात् ज्ञाननहीं होयहै तौ
मानुष बिचारा क्याकरै प्रथम साहबको कह्यो नहीं मान्यो याते मानुष पशुवत्
ह्वैगयो अज्ञान घेरे है सो जो कूकुर कुकुरिया को बिवाहकरै चौकमैं बैठाइये तौ
वे पुनि पुनि ऐपनै चाटै हैं तैसे जीवनको पशुवत् ज्ञान ह्वैगयो है फेरि फेरि
वही बिषयमें लागै हैं साहबकी ओर नहीं लागै हैं ॥ ११० ॥
मनुष बिचारा क्याकरै, जाके शून्य शरीर ॥
जो जिउ झाँकि न ऊपजै, काहि पुकार कबीर॥१११॥

साखी । ( ५७१ )
या मानुष बिचारा क्याकरै जाके शरीरमें शून्य जो धोखाब्रह्म सो समाय रह्यो
है सो धोखाब्रह्मको झाँकिउ कहे देखिउ चुक्यौ कि यहां कुछ बस्तुनहीं है औ
साहबको ज्ञान न उपज्यो तौ कबीरंजी कहै हैं कि मैं काको पुकारौं वहतौ बड़ो
अज्ञानी है बूड़िगयो जो प्रत्यक्ष देखों नहीं मानैहै किं यह शून्यही है यामें कछू
न मिलैगो तो मेरो कह्यो कैसे सुनैगो ॥ १११ ॥
मानुष जन्महिं पायकै, चूकै अबकी घात ॥
जायपरै भवचक्रमें, सहै घनेरी लात ॥ ११२ ॥
चौरासीलाख योनिनमें भटकत भटकत ऐसो मानुष शरीरपायकै अबकी जो
घातचूक्यो साहबकों न जान्यो तौ संसारचक्र में परैगो और यमकी घनेरी
लातैं सहैगो ॥ ११२ ॥
ज्ञान रतनको यतन करु, माटी का श्रृंगार ॥
आया कविरा फिरिगया, झूठा है हंकार ॥ ११३ ॥
साहबके ज्ञानरतनकों यतनकरु जांते साहब को ज्ञानहोय यहजो माटीकहें
शरीरको श्रृङ्गार करै है सो अनित्यहै कबीरांकहे कायाको बीर जीव यह संसा-
रमें आया और फिरिगया तबशरीर पराय जाताहै यह जो अहंकार करताहै
कि हम शरीरहैं हमब्राह्मणहैं क्षत्रियहैं वैश्यहैं शूद्रहैं सोसब झूठे हैं औ जो फीका
है संसार यह जो पाठहोय तौ यह अर्थ है कि साहब के ज्ञानरतनको जों
यतन करै है ताको या संसार फीकै लगेहै जो कोई दाखको खानवारो है ताको महुवा
फीकै लगै है ॥ ११३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, होय न दूजीवार ॥
पक्का फल जो गिरिपरा, बहुरि न लागैडार ॥ ११४ ॥
यह मानुष जन्म तिहारो बड़ो दुर्लभहै जोन अबैहो तौन फिरि न होउगे
पक्काफल गिरिपरै है तौ पुनि वह डारमें नहींलगै है अबै साहबके जानिबेकों
समयहै सो साहबको जानिलेउ ॥ ११४ ॥

( ५७२ ) बीजक कबीरदास ।
बांह मरोरे जातहौ, मोहिं सोवत लियो जगाय ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, यहि पेंडे हैकै जाय ॥ ११५ ॥
मुसलमानमें जे साहबके भक्त होयहैं तें जब भजन न करै हैं तब उनकों पीर
दस्तते दस्त मिलावै है सो दस्तमिलायकै साहब को बताइ देइहैं पास पहुँचाए
देयहैं तिनसों जीव कहै हैं कि हमारी बांहमरोरे चले जाउहौ हम संसारमें सोव
त रहेसो जगाय लियो तब उनके पीर जे हैं कबीर ते कहै हैं कियहि पेंड़े हैकै-
जाउ या कहिकै साहबके जायबेको राहवताय देइहैं तब उनके परमगुरु जे हैं
महम्मद आदिदैके पैगम्बर तिनके इहां पहुँचाय देय हैं तब उनके चेला वह
राहचलि महम्मद के पास पहुँचे हैं तब महम्मद साहबके पास पहुँचावै हैं औ
हिंदुनमें जे श्रीरघुनाथजी को स्मरणकरैं हैं तें गुरुद्वारा हैकै सुमिरनकरै हैं ते
गुरु परमगुरुको मिलावै हैं परमगुरु आचार्यको मिलावै हैं ते साहब को मिलाय
देइहैं जैसे रामानुज मतवारे आपने गुरुकों प्राप्तभये औ गुरु शठकोपाचार्यको
प्राप्तभये औ वे विष्वक्सेनकों प्राप्तकियो जीवको औ वे संकर्षणको प्राप्तकियो औ
वे जानकीजी को प्राप्त कियो जानकीजी श्री रामचन्द्रको प्राप्त कियो कबीरजी
रामानन्दके सम्प्रदायकेँ हैं तेहिते यह सम्प्रदाय संक्षेपते लिखिदियो है ऐसे सब
आचार्य लोग आपने आपने चेलनको साहबमें लगाय देइहैं ॥ ११५ ॥
और १ औरें प्रतिमें इसके पश्चात एक औरि साखी है पर इसमें नहीं दिया ।
बेरा बांधिन सर्पको, भवसागरके माहि ॥
छोड़ै तौ बूडत अहै, गहै तौ डसिहैवाहि ॥ ११६ ॥
पंचमुखी सर्प अहंकार ताके पांचमुखन में पांचमकारकी बाणी निकरी है
प्रथममुख विश्वहै ताते कर्मकांड निकरा औ दूसरामुख तजस तातें योगकांड़
निकरा औ तीसरामुख प्राज्ञ ताते उपासनाकांड निकरा औ चौथामुख प्रत्यगात्मा
१ दूसरी प्रतियोंमें यहाँ पर यह साखी है । पूरन साहबकी टीकाकी ११७वीं
साखी है ।
“साखि पुलंदर ढहि परे, बिवि अक्षर युगचार ।
रसना रम्भन होत है, कै न सकै निरुआर”

साखी। ( ५७३ )

तातें ज्ञानकांड निकरा औ पांचौँमुख निरंजन तातें अद्वैतबिज्ञान निकरा सो ऐसें
पंचमुखी सर्पमें बेराको बांध्यो आपने मनसे कल्पिकै भवसागर अनुमानकियो
ताको मान्यो तब ये नरदेहमें पंचमुखी सर्प अहंकार उठा तौने अहंकारकों
पहिरिकै वामें सब जीवचढ़े भवसागरपार होनके वास्ते सो अब जो बिचार करिकै
छोड़ाचाहै तौ भवसागरकी भय लागै है कि बूड़ि जायँगे औ धरे रहैं हैं तौ
सर्पदसै हैं सो पंचशरीराहंकार सर्पको बेराबने पर सब वाहिमें आरूढ़ हुये बेरा
समुद्रकै पार नहीं जायसकै हैं तीरहीमें रहिगये सो न बेराको गाहिसकै न बेराको
छोड़िसकै संसारसागरमें बूड़ते उतराते हैं ॥ ११६ ॥
कर खोरा खोवा भरा, मग जोहत दिन जाय ॥
कविरा उतरा चित्तसों, छाँछ दियो नहिं जाय ॥ ११७ ॥
गुरुमुख—जे साहबकें जनहैं ते कौनी भांतितें जाने जायहैं कि पूरहैं सर्वत्र साहब
को देखै हैं हाथमें खोवा भरा कटोरा लीन्हे राह जोहैं हैं कि कोई आवै खाय सो
सर्वत्र तो साहिबको देखै हैं ताते जोई आयकै खायहै ताको साहबै जानै है औ
साहिबै मानिकै आदरकरै हैं औ खोवा खवावै हैं औ कबहूं पुरुषबचन नहीं
बोलैहैं ते जीव साहबके प्यारे हैं औ जिनसों मारे दौरै हैं ते कबीर कायाकें बीर
जीव साहबके चित्तते उतरि जाय हैं अर्थात् वे मुक्ति कबहूं नहीं पावै हैं संसार
हीमें परै हैं। अथवा यह साखी गुरुमुख है ताते यह अर्थ है साहबकहैं हैं कि
खोवा भरा कटोरा हाथमें लियेहौं रामनाम उपदेश करौहौं यह कैसो है कि
कहतमें सरल है फिरि कायाको कलेश कौनौ न करनपरै औ सबको अधिकार है
जैसे खोवा खातमें न कौनौ अरसाहै न कौनौ श्रमहै ऐसे रामनाम रूपी खोवा
उपदेशरूप लियेहौं जो कोई याकों खाय अर्थात् स्मरणकरै तो मैं वाको संसारतें
छोड़ायदेउँ जो मेरें पास आवै तौनेकों। सोहे कायाके बीर कबीरजीव ! जो नहीं
ग्रहणकरै हैं तेमेरे चित्तमें उतरि जायहैं उनको छाँछऊ मोसों दियो नहीं जाय अरु
ज्ञानादिक कर्मादिक के फलतौ मैं देउहौं सोउनके उत्तम कर्महूंके फलमोंसो नहीं
दिये दै जायँ अर्थात् मेरो चित्तनहीं चाहै है कि छाँछ जे हैं ज्ञानादिक ते उनकें
उत्तम कर्मादिकके फलदेउँ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि अबै साहब समुझावै