कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६६ ) बीजक कबीरदास ।
को जान्यों उनके शरीरको जब चाहे तब काल खाये उनको पीड़ा नहीं होय
है उनको साहेबै सर्वत्र देखि परै है साहबकी प्राप्तिही बनी रहै है ॥९८॥
करक करेजे गड़ि रही, वचन वृक्षकी फांस ॥
निकसाये निकसै नहीं, रही सो काहू गाँस ॥ ९९ ॥
विरह रूप कहे, सब जीवको साहब की अप्राप्ति रूप जो भुवंगम है करककहैं
पीड़ा गड़िरही है कहै गुरुवनके बैन वृक्षकी फांसको लगोद छोलिकै काठ के
बाण बनावै है ताकी फाँस अथवा वृक्षते शरइव आयगई ताकी फाँस करेजे में
गड़िरही है सो निकासेते नहीं निकसै है अर्थात् जिनको गुरुवालोग धोखाब्रह्ममें
लगायदिये हैं ते पलटाये नहीं पलटै हैं वाहीकों गहै हैं। काहूके तो बाण
सहित गाँसी के अटकिरहै हैं तें वही ब्रह्मको प्रतिपादन करै हैं सत् मतको
खंडन करै हैं औ वे जे ऊपरते भेष बनाये हैं भीतर धोखाब्रह्मही घुसो है
तिनकें भीतर करेजे में गाँसिही भर अटकी है तामें प्रमाण ॥ अन्तश्शाक्ता ब-
हिश्शैवाः सभामध्ये च वैष्णवाः । नानारूपधराः कौला विचरंति महीतले” । अथवा
गुरुवालोग जो और और देवतन को मत सुनायो है सोई उनके अंतःकरणमें
जाइकै अज्ञानरूपी वृक्ष जाम्यो है तौनेकी कुमतिरूपी फाँस याके करेजे में
गड़िरही है सो वह करक कहे जनन मरणरोग नहीं जायहै अर्थात् वा फाँस
काहूकी निकासी नहीं निकसै केतो उपदेश कोई करै सो कबीरजी कहै हैं कि
काहू गुरुवनकी यहजीव कें कहा गाँस कहै बैररह्यो है जो ऐसी फाँस मारच्यों
जो अबलौं निकासी नहीं निकसै ॥ ९९ ॥
काला सर्प शरीरमें, सब जग खाइसि झारि ॥
बिरलै जन बचिहैं जोई, रामहिं भजैं विचारि ॥ १०० ॥
कालरूप जो सर्प सो सबजीवन के शरीरमें बसै है शरीरके साथै उत्पन्न
भयो है जेती अवस्थाजायहै तेतीकाल खातोजाय है जब आयुर्दाय पूरिगई तब
सबकाल खाय लियो याहीभाँति बस जगत्को कालझारादै खाये लेइहै जे सबमतकों
छोड़ि परम पुरुष श्रीरामचन्द्रको बिचारिकै भजै हैं तेई बिरलैबाचै हैं तामें प्रमाण