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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

( ५६४ ) बीजक कबीरदास ।
आये हैं अथवा नानारंगकी जामें तरङ्ग उठतीं हैं ऐसा जो मकरन्द पुष्परस
कहावै है सो महुवाके फूलका रस मदिरा समुद्र मनसो अमूझकहैं अपारहै
वारपार नहीं सूझिपरै है सो कहा ते मनरूपी मद भरचो है सो अपनी अकिलते
कहैं बुद्धिते बह कलाल कहे कलार को तो बूझ ॥ ९३ ॥
बाजीगरका बंदरा, ऐसा जिउ मन साथ ॥
नाना नाच नचायकै, राखै अपने हाथ ॥ ९४ ॥
ये मन चंचल चोर ई, ई मन शुद्ध ठहार ॥
मनकरि सुर मुनि जहाड़िया, मनके लक्ष दुवार ॥ ९५ ॥
ये दोनों साखिनको अर्थ स्पष्टई है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
विरह भुवंगम तन डसा, मन्त्र न मानै कोइ ॥
राम वियोगी ना जियै जियै सो बाउर होइ ॥ ९६ ॥
विरह भुवङ्गम कहे जिनको साहबकी अप्राप्तिहै तिन जीवनको अज्ञान भुव-
ङ्गम डस्यो है ताते ज्ञान भक्ति वैराग्य योग ये मंत्र नहीं मानै हैं काहेते कि
जिनमें साहबको ज्ञान नहीं है तैं भक्ति वैराग्य ते विमुखहैं । सो कबीरजी
कहै हैं कि रामके वियोगी जे जीवहैं ते जियै नहीं हैं विषयमें लागेहैं काल
उनको खायलेइहै । औ जे योग करिकै वैराग्य करिकै भक्तिकरिकै जियेहैं
विषय छाड़िकै संसारको छोड़ै हैं ते बाउर ह्वैजायहैं । कहैं बहुत दिन जीबों-
किये ब्रह्महूमें लीन भये तौ पुनि संसारमें तो आवही करेंगे। काहेते कि, अपने
स्वामीको तो चीन्हबही न किये अर्थात् बैकल ह्वैगये हैं जो बैकलाय हैं सो
औरको और करैहैं यथार्थ बात नहीं करै हैं ॥ ९६ ॥
राम वियोगी विकल तन, जानि दुखबो इन कोइ ॥
छूवतही मरि जायँगे, ताला बेली होइ ॥ ९७ ॥
श्रीकबीरजी गुरुवालोगनते कहै हैं जे साहबके बियोगीजीव ह्वैरहेहैं तिनकों
तुम काहे दुखावतेहों अर्थात् नाना मतनमें नाना उपासनामें काहे भटकावतेहों
जरैमें लोंन मींजतेहौ इनके भीतर आपहीते तालाबेली परिरही है नाना मत