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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 597

मतें । औ कलियुगमें कबीर नामतें एक रामनामै को उपदेशकियो सो जो तैं
वह रामनामको जानते तो तेरे समीप मोको आवननपरतो हंसशरीरदै अपनेपास
लैआवतो ॥ ७३ ॥
जो तू साँचा बानियाँ, साँची हाट लगाउ ॥
अंदर झारू दैकै, कूरा दूरि बहाउ ॥ ७४ ॥
हेजीव! जो तैं अपने स्वरूपको चीन्है तो तैंसाँचा बानियाँ है सो साँची हाट-
लगाउ कहे साँचे जे साहब तिनकोजानु औ उनके नामरूप लीलाधाम सब
साँचेहैं तिनकीहाट लगाउ कहे स्मरणकरु । औ अन्दरमें झारूदैकै विषय बास-
ना औ नाना मत जे कूरा हैं तिनको दूरि बहायदे तू साँचा है साहबको है
असाँचैन मान लागु ॥ ७४ ॥
कोठी तौ है काठकी, ढिग ढिग दीन्ही आगि ॥
पण्डित तो झोला भये, साकठ उबरे भागि ॥ ७५ ॥
कोठीजे हैं चारौ शरीर ते तो काठकी हैं जरन वारी हैं ज्ञानाग्नि ढिग
ढिग उनके लगी है । वेदशास्त्र पुराण साहबको बतावै हैं सो जे पण्डितरहे तें
सारासारको विचारकर साहब जे सार तिनको जान्यो ते उसअग्निमें परिकै झो-
लाह्वैगये । यै कहे उनके सबशरीरजरिगये । अर्थात् संसारते मुक्तह्वैगये । औ
साकठ जे हैं शाक्ते भागिकै उबरेकहे जो वेदशास्त्र साहबको प्रतिपादनकरै है
तोके डांड़े नहीं गये खण्डन करनलगे उनसों भागिकै संसारमें परे मायामें लपटे
हैं मायैको स्मरण करनलगे ॥ ७५ ॥
सावन केरा मेहरा, बुंद परा असमान ॥
सब दुनियाँ वैष्णव भई, गुरू न लाग्यो कान ॥ ७६ ॥
जैसे श्रावणके मेहको असमान बुन्द परै है तैसे सब दुनिया वैष्णवहोत
भई । सब बीज मन्त्र लेत भये जैसे लोक में को गुरु हजारनचेला एकैबार बैठा-
यकै मन्त्र गोहरायदेय हैं याही भाँति श्रावण कैसोमेह सबको मन्त्रदेइ हैं चेला-
मन्त्रलेइहैं । याही रीति गुरुवालोग उपदेश करतभये कोटिन बैष्णवहोत भयें