कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५५८ ) बीजक कबीरदास ।
गुरु कबै कानलग्यो ? अर्थात् नहीं लग्यो । अरु गुरुतो वाको कहै हैं जो अज्ञानको
नाशकरै सो जो चेलाको अज्ञान न नाशभयो तौ गुरुचेला दोऊ नरकको जायहैं
तामेंप्रमाण ॥ “हरैं शिष्य धन शोक न हरहीं । ते गुरु घोर नरकमें पर-
हीं ॥ ” सो जो वो चेलाको अज्ञान दूरि न कियो तो कौन गुरु है औ जौन
गुरुते ज्ञानलै अज्ञान न नाश कियो तो वह कौन चेला है अर्थात् वह गुरुनहीं
है कायरक्रूर है और वह चेलानहीं है टूट मसखराहै और जो आज्ञानको नाशै
सोई गुरुहै तामेंप्रमाण ॥ “ अज्ञानतिगिरान्धस्यज्ञानाञ्जनशलाकया । चक्षुरुन्मी-
लितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः” औ जो संसार दूरि नहीं करै है सो गुरुनहीं है
तामेंप्रमाण ॥ “ गुरुर्न स स्यात् स्वजनोन स स्यात् पिता न स स्याज्जननी
न सा स्यात्। दैवन्न तत्स्यान्नपतिश्च स स्यान्न मोचयेद्यस्समुपेतमृत्युम् ॥ ”
श्रीकबीरजीकी गुरुपारख अंग की साखी ॥ “ गुरु सीख देवे नहीं, चेला गहै
न खूट । लोक वेद भांवे नहीं, गुरु शिष्य कायर टूट” ॥७६॥
ढिग बूड़ा उसला नहीं, यहै अँदेशा मोहिं ॥
संलिल मोहकी धारमें, क्या निंद आई तोहिं ॥ ७७ ॥
साहब कहै हैं कि हे जीवो! तुम सब संसार सागर के तीरही में बूड़िगये
एकहूबार न उसले,यहै मोको अँदेशाहै या संसारसागरके मोहरूपी सलिल धार-
में क्या तोको नींद आई है भला एक बारतो मूड़निकारि उसलि मोको पुकार-
तो तौ मैं तोको पारही लगावतो सर्वत्र पूर्णमैं बनोहौं तैं मेरे ढिगहीं बूड़ों
जातोहै अबहूं जो जानतो मैं पारही लगाय देहुं ॥ ७७ ॥
साखी कहैं गहैं नहीं, चाल चली नहिं जाय ॥
सलिल मोह नदिया बहै, पायँ नहीं ठहराय ॥७८॥
कबीरजी कहै हैं कि साखीतो कहै हैं औ जो मैं साखी कहो है ताको
गहैं नहीं हैं वाको विचारै नहीं हैं । औ जो मैं चाललिख्यो है सोऊ नहीं चली-
जाय संसाररूपी नदियामें मोहरूपी सलिलबहै है तामें पांव नहीं ठहराय जीव
विचारा क्याकरै या साहब सों अर्कैकै जीवको क्षमापन करावै है ॥ ७८ ॥