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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

सूंघते संतोषहैजाय । औ न ऐसे विषय जीवही पायो कि जामें संतुष्ट हैजाय ।
अर्थात् विषयसुख जीव कियो परन्तु अन्तमें निराशही हैजाय है सो प्रकटही है
वह सुख नहीं रहिजायहै परन्तु मूढ़जीव नहीं छोड़ै है ॥ ९० ॥
भंवर जाल बगु जाल है, बूड़े जीव अनेक ॥
कह कबीर ते बाचिहैं, जिनके हृदय बिबेक ॥ ९१ ॥
भ्रमर जाल जो हैं संसारसागरके विषयको अनेक फेरो सो कैसे हैं कि
बकुलाजे जीव हैं तिनके बोरिबेको जालहैं, तामें बहुतजीव बूड़िगये । सो कबी-
रजी कहै हैं कि, जिनके हृदयमें विवेकहै असार बाणीको छोड़िकै सारजो
रामनामरूपी जहाज ताको विवेक करि गहि लियो है तेई संसारसागर के
पारजाइहैं ॥ ९१ ॥
तीनि लोक टीडी भई, उड़िया मनके साथ ॥
हरि जन हरि जाने बिना, परे कालके हाथ ॥ ९२ ॥
टींडीके जब पखना जामा तब जहैं जाइहै तहँ मरिही जायहै सो तीनिलोकके
जीवनके मनरूपी पखनाजामे सो जहां जाय हैं तहां मरिही जायहैं सो हैं तो ये
हरिकेजन हरिके अंश पै अपनो स्वामी औरक्षक हरिजे हैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र
सबके क्लेश हरनेवाले तिनके बिना जाने कालके हाथमें परे औ मनके साथ
उड़ैहैं सो मरतमें जहँ मनजायहै तौनैरूप हैजायहै तामेंप्रमाण ॥ “अंते या मतिः
सा गतिः”॥ औ कबीरजी हूको प्रमाण॥“जाकी सुरति लागिहै जहँवां। कहैकबीर
सो पहुँचे तहँवां” ॥ ९२ ॥
नाना रंग तरंग हैं, मन मकरन्द अबूझ ॥
कहै कबीर पुकारिकै अकिल कला लै बूझ ॥ ९३ ॥
सङ्कल्प विकल्परूप नानारङ्गकी हैं तरंगै जामें ऐसो जो मन तामें काहेते
तरंग उठै है कि, मकरन्द जो विषयरस ताको पान करिकै मतवालो है गयो
है सो जो मतवालो होय है सो औरको और करै चाहै । श्रीकबीरजी पुकारिकै
कहै हैं कि, अकिल जो बुद्धि तामें निश्चय करिकै कला जो है रेफ अर्ध-
मात्रा ताको लैके बूझ अर्थात वही अर्ध मात्रामें स्थितिकी विधि पाछे लिखि