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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 600

( ५६० ) बीजक कबीरदास ।
जाकी जिह्वा बंद नहीं है जौने मतको चाहै तौनेन मतको प्रतिपादन करै है
औजिनके हृदयमें साहबके नामरूपादिक नहीं हैं तिनके संग कबहूं न लागिये
वें कच्चे हैं उनके संग लागेते संसारमें परौगे ॥ ८२ ॥
पानी तो जिहैं ढिगै, क्षण क्षण बोल कुबोल ॥
मन घाले भरमत फिरैं, काल देत हींडोल ॥ ८३ ॥
पानीरूप जो बानी है सो याके जीभके ढिगै है छिन छिनमें कुबोलई
बोलबोलै है असतबाणी बोलि २ बानीरूप पानीमें भूड़िगयो अथवा ब्रह्ममायाकी
आगी बुझावनवारो पानी याके जीभहीके ढिगहै सो नहीं कहै है छिन छिन
कुबोलंही बोलै है सो मनकें घालेकहे फेरि संसारमें भरमत फिरै है काल जो
है सो याको हिंडोल रूप शरीर दियाहै सो झूलत फिरै है कबहूं मानुष होय है
कबहूं पशु पक्षी इत्यादिक शरीर धारण करै है ॥ ८३ ॥
हिलगैं भाल शरीरमें, तीर रहींहैं टूटि ॥
चुम्बक बिन निकसैं नहीं, कोटि पहन गये फूटि ॥८४॥
जिन मतनमें श्रीरघुनाथजी नहीं मिलैं हैं तेई मतनकें बाण याकें लगै हैं
नाना कुमतिरूपी गाँसी याके अटकी हैं सो रामनाम चुम्बक बिना वे नहीं
निकसैं हैं ॥ ८४ ॥
आगे सीढ़ी साँकरी, पाछे चकना चूर ॥
परदा तरकी सुन्दरी, रही धका दै दूर ॥ ८५ ॥
साहबके यहां की गैल बहुतै साँकरी है कोई कोई पावै है औ पाछे संसा-
रमें गिरै तौ चकनाचूर ह्वैजाय परदातरकी सुन्दरी जो माया सो जो कों
साहबसों लगनलगावन लागैहै ताको धका देईहै औ जो कोई साहबके सम्मुख-
भयो वही राह चढ़यो तेहिते दूरिरहै है धुनि या है। कि, जो वाके जायगी तौ
गैलसाँकरी है दूसरे की समाई नहीं है पीसिजायगी यहडरहै ॥ ८५ ॥
संसारी समय बिचारिया, क्या गिरही क्या योग ॥
अवसर मारो जात है, चेतु बिराने लोग ॥ ८६ ॥