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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 602, कुल 766 में से

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पृष्ठ 602

( ५६२ ) बीजक कबीरदास ।
बतावै है रामनामही प्रथम प्रकटकरै है । औमूलाधार चक्रमें मूलजों रामनाम
है मनवचनकेपरे त्यहिते जो अनुसार भयो बाणीको ताहीको आभास परा बाणी
प्रकट भई रेफ, ताहीते अकार जब जारचों तब रकार रूप हृदयमें पश्यन्ती प्रकट होइ
है। औ फेरि जब एक अकार और आयो तब कण्ठ में मध्यमा प्रकट होइहै। औ
पुनि जब बैखरीमें एक अकार और प्रकटभयो जब ओठलग्यो तब व्यंजन
मकार भई तब वहै मन बचन के परे राम नाम सो आपने रूप को आभास
बैखरी में प्रकटकरै है सोई प्रथमभी कबीरजी लिख्यो कि ॥ “ रामनाम लै
उचरीबाणी ” ॥ सो प्रथम याको प्रतिलोम क्रमतें जप करत चारिउ बाणी
को स्वरूप जानै औ फेरि अनुलोम क्रमते रामनाम को उच्चारकरै घण्टा नाद वत
या भांतिते जो जपकरै तौ जानै कि,मन बचनके परे जो रामनाम ताको आभास
जो रामनाम है सो प्रथम याहीको लै कै बाणी उचरी है । फेरि प्रणवादिक
मन्त्र भये हैं यही घटघट बाणी को मूल तैं बूझ औ मन बचनते परे जे साहब
हैं तिनको पायजाय सो या भांतिते बाणीको मूल जो तैं घटघटमें बिचारै तौ
ये सब बाणी ऊपरते नानामत नाना सिद्धांत कहै हैं याको मूल सिद्धांत तौ
साहिबै को बतावै है त्यहितें चारोवेद छःशास्त्र तात्पर्य करिकै श्रीरामचन्द्रही
को बतावै हैं सो मेरे सर्व्व सिद्धांत ग्रन्थमें प्रसिद्ध है ॥ ८८ ॥
मूल गहेते काम है, तू मति भर्म भुलाय ॥
मनसा पर मन लहरि है, वहि कतहूं मति जाय॥८९॥
मन जो है सोई समुद्रहै मनसा कहें मनोरथ ताकी लहरि में बहिकै तैं
मतिजा अर्थात् मनको संकल्प विकल्प छोड़ि दे । नाना बाणी नानामत में तैं
न भूलिजाय, मूल जो रामनाम ताही को ग्रहणकरु, याही के गहेते तेरों
उबार होइगो संसार छूटैगो ॥ ८९ ॥
भँवर बिलम्बै बागमें, बहु फुलवनकी आश ॥
जीव बिलम्बै विषयमें, अन्तहु चलै निराश ॥ ९० ॥
जैसे भँवर बागमें बहुत फूलनकी आश करिकै बिलँबै है तैसे जीव संसारमें
बहुत विषयंकी आशकै पर्यो । सो ऐसो फूल भ्रमर न पायो कि एकैफूल