कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी । (५५९)
कहता तो बहुता मिला, गहता मिला न कोइ ।
सो कहता बहि जानदे, जो नहिं गहता होइ ॥ ७९ ॥
साहब कहे हैं याही भांति कहता तो बहुत मिल्यो गहता कोई नहीं मिलैहै
सो जो कोई गहता न होय ताको तैं बहिजानदे तोको कहापरी है ॥ ७९ ॥
एक एक निर्वारिया, जो निर्वारी जाय ॥
दुइ दुइ मुखको बोलना, घने तमाचा खाय ॥ ८० ॥
तामें पुनि कबीरजी कहै हैं कि हेसाहब! याको जीवको दोष नहीं है एक २
जो निर्वारतो तौ वेद शास्त्र ते याको निर्वार हैजातो अर्थात् जो एकमालिक
आपही ठहराय देतो तौ जीव गहिलेतो । दुइदइ मुखको बोलना वेद शास्त्रोंकों
अर्थात् कहीं ब्रह्मको, कहीं ईश्वरको, कहीं जीवको, कहीं कालको, कहीं कर्मको
मालिक बतायो सो या दुइमुख के बोलेते जीवघने तमाचा खायहै तुम कों
नहीं जानिसकै ॥ ८० ॥
जिह्वाको दै बंधनै, बहु बोलना निवारि ॥
सो परखी सों संग करु, गुरु मुख शब्द विचारि ॥८१॥
सोकबीरजी कहै हैं कि हेजीव! मैं साहबसों बिनती करिलियो है सो तुम
यहिरह चलो तुम्हारो उबार साहब करिलेइगे अपनी जिह्वाबंधनकरो असत्
वाक्य न बोलनेपावे एकरामनामहीं कहो औनाना मत जोकहौ है सो कहिबो
निवारि देउ । औ जौन सबमतनते पारिखकरिकै साहबको ठहरायो होय ऐसें
पारखीको संगकरु औगुरुमुख जोशब्दहै ताकों तू बिचारकरु काहेते साहब या
कह्यो है ॥ "अबहूं लेहुँ छुड़ाय कालसों जो घट सुरति सँभारै " ॥ सो तैं
सुरतिसँभारि साहबमें लगायदे अनत न जानदे साहब तोको संसार सागरतें
उबारिही लेइँगे ॥ ८१ ॥
जाकी जिह्वा बंद नहिं, हृदया नाहीं सांच ॥
ताके संग न लागिये, घालै बटिया कांच ॥ ८२ ॥