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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

बसंत । ( ४९७ )
संसार सागरको पार करनवारो एक राम नामही है तामें प्रमाण पद ॥ "माधव
दुख दारुण सहि न जाइ । मेरी चपल बुद्धि ताते का बसाइ ॥ तन मन
भीतर बस मदन चोर । तब ज्ञान रतन हरि लीन मोर ॥ हौं मैं अनाथ प्रभु
कहौं काहि । अनेक बिगूंचे मैं को आहि ॥ औ सनकसनंदन शिव शुकादि ।
आपुन कमला पति भो ब्रह्मादि ॥ योगी जंगम यति जटाधारि अपने अवसर
सब गयेहारि॥ सो कह कबीर करि संत सात । अभ्यंतर हरिसों करहु बात॥
मन ज्ञान जान करि करि बिचार । श्री राम नाम भजु होउ पार"॥ १-६ ॥
इति दशवां बसंत समाप्त ।
अथ ग्यारहवां बसन्त ॥ ११ ॥
शिवकाशीकैसीभैतुम्हारि।अजहूँहोशिवदेखहुविचारि ॥१॥
चोवाअरुचन्दनअगरपान। सबघरघरस्मृतिहोइपुरान॥२॥
बहुविधिभवननमेंलगैभोग।असनगरकोलाहलकरतलोग३
बहुविधिपरजानिर्भयहैंतोर। तेहिकारणचितहैढीठमोर॥४॥
हमरेवालककरयहैज्ञान । तोहींहरिकोसमुझवैआन ॥ ५ ॥
जगजो जेहिसों मनरहल लाय। सोजिवकेमरेकहुक हँ समाय ६
तहंजोकछुजाकरहोयअकाज।हैताहिदोषनहिंसाहवलाज ७
तवहरहर्षितसोकहलभेव । जहँहमहींहैंतहँदुसरकेव ॥ ८ ॥
तुमदिनाचारिमनधरहुधीर।पुनिजसदेखहुतसकहकवीर९॥
शिवकाशीकैसीभैतुम्हारि।अजहूँहोशिवदेखहुविचारि ॥१॥
चोवाअरुचन्दनअगरपान।सबघरघरस्मृतिहोइपुरान ॥२॥
बहुविधिभवननमेंलगैभोग।असनगरकोलाहलकरतलोग ३
बहुविधिपरजा निर्भयहैंतोर।तेहिकारणचितहैढीठमोर ॥४॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि जब मैं बालपन में साधन करत रह्यों है तबहीं
देवतनको दर्शन होत रह्यो है । सो मैं महादेवजीते पूछ्यो कि, यह काशी
३२

(४९८) बीजक कबीरदास।
तुम्हारी कैसी भई है, अजहूं तो बिचारि देखो । तुम्हारी काशीमें चन्दन चोवा
अगर लगावैं हैं, पान खायहैं घर घर स्मृति पुरान होइहैं, बिविध भांतिके
मेवा पकवान भोग लगावै हैं, यही रीतिते नगरमें कोलाहल लोग करिरहे हैं
ऐसे परजा तुम्हारे निर्भय होइ रहे हैं तौने कारणते मोरौ चित ढीठ होइ गयो है १-४
हमरेबालककोयहैज्ञान । तोहिंहारिकोसमुझवैआन ॥ ५ ॥
जगजो जेहिसों मनरहललाय।सोजिवकेमेरेकहुकहँसमाय६॥
सो हम जे सब बालक हैं तिनकर यहै ज्ञान है तुम जे हौ महादेव औ हरि
जे हैं श्रीरामचन्द्र तिनको तो समुझावै आनहैं काहेते कि, वेद द्वार यह कहते हैं
कि, जब संसारछूटै है ज्ञान होईहै तब मुक्ति होईहै और ये सब काशीमें जे
नाना विषय भोग करै हैं संसारमें लिप्त रहे हैं सो यहू वेदैके प्रमाणसे मुक्त हो
यबो मानत है ॥५॥ और जगत् में जो जौनेमें मनलगावै है सो शरीरछूटै कहो
कहां समायहै अर्थात् जाहीमें मन लगावै है ताहीमें समाय है यहू वेद में लिखे
है॥ "अन्ते या मतिः सा गतिः॥" सोहम तुमसों पूछै हैं कि विषयमें मन लगाये
मरे जे काशीके लोग ते कहां जायँहैं ? ॥ ६ ॥
तँहजोकछुजाकरहोइअकाज।हैताहिदोषसाहवनलाज ॥७॥
हरहर्षितह्वैतवकहलभेव । जहँहमहींहैंतहँडुसरकेव ॥ ८ ॥
तुमदिनाचारमनधरहुधीर।पुनिजसदेखहुतसकहकवीर॥९॥
सो जाकर अकाज होईहै ताहीको दोष है काहेते, वाके कर्मही ते अकाज
होईहै । साहब जो आपहै श्रीरामचन्द्र तिनको कौन लाज है जो आप काशीके
जीवनको मुक्ति देइहैं सो कौने हेतुते कहा ? औरे संसार क्या आपका नहीं है
काशी ही आपकी है ? ॥ ७ ॥ तब हर्षित ह्वैकै हर मोसे भेद बतायो
कि, जहां हमहैं तहां दूसरको है काशीमें औ सब संसारमें जहां हमहैं अर्थात्
हमको जे जानै हैं तेके कर्म औ कालई कैसे जोर कैसकैं काहेते कि जब हम ब्रह्माते राम
नाम पायो है तब जान्यो है ताहीते मुक्त करै हैं राम नामको उपदेश करि
श्रीरघुनाथजीको ज्ञानदेइहै वाको तब मुक्त होईहै । सोकाशीहूमें रामनाम दै
मुक्त करै है। औरहू देशमें राम नाम पाइकै मुक्तह्वै जाइहै ॥ ८ ॥ सो दिन-
चार तुम मनमें धीर धरो पुनि जस देख्यो तस हे कबीर तुम कह्यों अर्थात्

बसंत । (४१९)
जैसे हम रामनाम दैके जीवनको उद्धार करते हैं तैसे तुमहूं करोगे । तब तस
देखोगे कि राम नामते कैसेहू विषयी होइ पै वाको उद्धारई होइ जाइहै। औ काशीमें
रामनामही ते मुक्तिहोइहै रामई नाम महादेव देइहैं तामें प्रमाण ॥ “पेयं पेयं-
श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् । जलपं
जलपंप्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यांवीथ्यामटतिजटिलः कोपि काशी
निवासी । इतिस्कांदे” ॥ ९ ॥
इति ग्यारहवां बसंत समाप्त ।
अथ बारहवां बसंत ॥ १२ ॥
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वा के लगनै जाय ॥२॥
सोतो कहिये अतिहि अबूझ। खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
आपन आपन चाहहिं मान । झूठ परपंच सांचकै जान॥४॥
झूठा कबहूं करौ नहि काज । मैं तोहिं बरजौं सुनु निरलाज ५
छाड़हु पाखंड मानहुं बात । नहिंतौ परिहौ यमके हात ॥६॥
कहै कबीर नर चले न सोझ। भंटकि मुये जस वनके रोझ ७
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वाके लगनै जाय ॥ २ ॥
सो तौ कहिये अतिहि अबूझ । खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हमरे कहे ये जीव कोई नहीं पतियायहैं साहब
में कोई नहीं लगते हैं; आपने खुशीते बानी रूप सलिलमें बूड़े जाते हैं बानी को
पानी आगे कहि आये हैं ॥ १ ॥ आंधर जे गुरुवा लोगहैं ते नाना मतनको
बतावै हैं और आँधर जे जीव तें ग्रहण करै हैं साहब को नहीं जानै हैं जैसे
बेश्या की लगन, वह तो नाना पुरुषते रमै है एकको जानतिही नहीं है ऐसे नाना
उपासना मानै हैं सो साहब को मानतही नहीं हैं ॥ २ ॥ सो ते जीवन को

( ५०२ ) बीजक कबीरदास ।
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो बश आपने, फिरि फिरि चितवत जात ९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लियो है हाथ ।
शिव सन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥१०॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लीनो यक छाप ॥११॥
जेते थे ते ते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेखहै, अदग गया नहिं कोय ॥१२॥
इंद्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन दोउ ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥१३॥
खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार ।
कटि कहेरि गज गामिनी, संशय कियो शृंगार ॥१॥
रचै रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरै आय ।
शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा वरणि न जाय ॥ २ ॥
जौन माया सब संसार को जेर कियो है सो मोहिनी माया चाचरि खेलै
है । केहरि जो है काल सब को खाइलेनवारो सो वाकी कटिहै कहैं मध्यभाग
है । मध्य में बैठिकै अधो ऊर्ध्व को खाय है । औ मन गज है तेही कारिकै
चलै है । औ संशय रूप श्रृङ्गार किये अर्थात् जहँ बहुत संशय होईहै तहँ माया
बहुत शोभित होइ है ॥ १ ॥ नारी लोग रचैकहे जो पीउ को रुचैहै सो चूनरी
पहिरे हैं औ माया नाना विषय जो जीवन को नीक लगै ताकी चूनरी पहिरैं
है अद्भुत शोभा स्त्रियनहूं की होईहै यहै मायौकी अद्भुत शोभा है ॥ २ ॥
चन्द्र बदनि मृग लोचनी, बिन्दुक दियो उगालि ।
यती सती सब मोहिया, गज गति बाकी चालि ॥३॥

चांचर । (५०३)
नारदको मुखमाड़िकै, लीन्हो बदन छिपाय ।
गर्व गहेली गर्वते, उलटि चली मुसकाय ॥ ४ ॥
औ नारी चंद्र बदनी मृग नयनी बिंदुक दीन्हे घूँघुट उवारि गज की नाईं
चलि सबको मोहै हैं । माया कैसी है कि, चंद्रबदनी है चन्द्रमाके समान
याहू आपने पदार्थते सबको आनन्द देय है । मृगनयनी कहे यहू चंचल
है । बिंदुक दीन्हे उघारि कहे आपने रागको फैलाय देइहै गजगति कहे धीरे
धीरे यती सती सबको मोहै है ॥ ३ ॥ वै स्त्री नारद कहे जाके रद कहे दांत
नहीं हैं ऐसे जे वृद्ध पुरुष तिनको मुख माड़िकै बदन कहे बोलिबो छिनाय
लेती हैं । अर्थात् और बोलिबो सो छूटि जाइहै नारी नारी यहै कहै हैं ।
चाचरि वोऊ गावै लगै हैं । अथवा माया जो है सो नारद ऐसे मुनिको बांद-
रकी नाईं मुख कै दियो । शीलनिधि राजाकी कन्याको काज करै चलै ।
और स्त्री गर्व को गहे लोगनके मोहिबे को चाचरि में मुसक्याय चलैहै ।
औ माया जो है सोऊ नारदके गर्वको गहि कै मुसक्यायकै चली है ॥ ४ ॥
शिव अरु ब्रह्मा दौरिकै, दोनों पकरे जाय । फगुवा लीन
छिनायकै, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि
बाजा बजै, श्रवण सुनत भो चाव । खेलनि हारी खेलिहै,
जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥
स्त्री जेहैं ते पुरुषनते चाचरि में पकारि फगुवा लैके आपस में छिटकाय कहे
बांंटिलेय हैं तैसेही मायाजो है सोऊ ब्रह्मा शिव तिन को पकरिकै फगुवा जो
नाना मत सो लैिकै अनेक ब्रह्मांडनमें छिटकाय दीन्हों ॥ ५ ॥ चाचरि में
बाजा बजै है ताको सुनिकै चाव होइ है खेलनिहारी आपनो दावँ ताकि ताकि
खेलै हैं । औ माया जो है सोऊ अनहद बाजा बजाइ जौनके सुनतमें योगिन
के चाव होइहै सो खेलनिहारी जो कुंडलिनी शक्ति सो जैसो वाको दावँ है तैसो
खेलै है जीवको चढ़ावै औ उतारै है ॥ ६ ॥
आगे ढाल अज्ञानकी, टारे टरत न पाव। खेलनिहारी खे
लिहै,बहुरि न ऐसीदाव७सुरनर मुनि भूदेवता,गोरख दत्ता
व्यास।सनक सनन्दनहारिया,और कि केतिक आस॥८॥

( ५०४ ) बीजक कबीरदास ।
चाचरिमें स्त्री भोंडरकी ढाल आगेंकरि पांव पीछेको नहीं टारै हैं सो खेल-
निहारी जे हैं ते जब पतिको पाय जाय हैं तब कहैं हैं कि, खेलि लेउ अब
ऐसो दाँव न मिलैगो। औ यहां मायाजो है सोऊ अज्ञानकी ढाल आगे लीन्हे है,
जाको पांव ज्ञानभक्ति बैराग्यकरैं टारे नहीं टरै सो, खेलनिहारी जो माया सो
खेलैबै करी ऐसो दाँव वाको फिरि न मिलैगो अपने बशकरि पायोहै ॥७॥ औ
चाचरि में स्त्रिनते पुरुष हारि जाइहैं सुख मानै हैं औ माया जो है ताहूसों
सुर जेहैं देवता, नर जेहैं मनुष्य, मुनि जेहैं ज्ञानी, भूदेव जे हैं ब्राह्मण, गोरख
जे हैं योगी कवि, दत्तात्रेयजे हैं अवधूत, ब्यास जे हैं कवि, सनकसनंदनजे हैं
त्यागी ते सब हारिगये औरकी कौन गिनती है ॥ ८ ॥
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो वश आपने, फिरि फिरि चितवत जात॥९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लिये है हाथ ।
शिव सँग ब्रह्मा लीन्हिया, और लिये सब साथ॥ १०॥
चाचरि में नारी रंगकी पिचकारो गात में सींचि आपने बश करि फिरि
फिरि चितवत कहे कटाक्ष करै हैं इसी प्रकार मायाजोहै सोऊ थोथे कहे झूठे-
प्रेमसो संसार राग सबको गातसींचैहै आपनेबश करिलियोहै औ फिरिफिरि
चितवत जातै है कहे सबको ताकेरहै है कि कोऊ बाच्यौतौ नहीं ॥९॥ औचाच-
रिमें स्त्री लोग रंगकेहौदमें डारिदेइ हैं औ फूलनके मालामें हाथबांधै हैं पुरुषन-
को वैसेही माया जोहै सोऊ ज्ञानके गाड़में ब्रह्मादिक देवतनको डारिकै त्रिगुण
की फांसीमें बांधि लियो ॥ १० ॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करिलिय एकै छाप ॥ ११ ॥
जेते थे तेते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेख हैं, अदग न कोई जाय ॥ १२ ॥
इन्द्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन निज ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥

चाचर । ( ५०५ )
औ चाचारिमें दुइ पारा होयहैं एकओर स्त्री एकओर पुरुष होइहैं ऐसें सुर
नर मुनि सब एक ओर माया अकेली आप है दृष्टिपरे काहूको नहीं छोड़ैहै ॥ ११ ॥
वैसे स्त्री जे हैं ते आपने घूंघुट में सबको मन समाय लेइहैं सबके काजर
लगाइदेइ हैं अदगकोई नहीं जायहै वैसे माया जो है सोऊ अपनेमें सबको
समाय लियो है सबकें एकदाग लगाइ दियो है अदग कोई नहीं बच्यो ॥ १२ ॥
चाचरि में स्त्रिनके द्वारे इन्द्र कृष्ण सबखड़े रहै हैं लोचन देखिबेको ललचायहैं
ऐसे माया जोहै ताहूके द्वारमें इन्द्रकृष्णजे हैं उपेन्द्र ते खड़ेहैं मायाके देखिबे
को लोचन ललचाय हैं सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि तेई पुरुष उबरे हैं जे मोहमें
नहीं समाने हैं ॥ १३ ॥
इति पहिली चाचर समाप्त ।
अथ दूसरी चाचर ।
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समुझ मन बौराहो ॥ १ ॥
काल बूतको हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रच्यौ जगदीश समुझ मन बौराहो ॥ २ ॥
बिना नेइको देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहागिलकै ईंट समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥
तन धन सो क्या गर्व समुझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समुझ मन बौराहौ ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समुझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊँच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समुझ मन बौराहो ॥ ६ ॥

( ५०६ ) बीजक कबीरदास ।
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग मन बौराहो ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिनी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा मर्म विचारि समझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समझ मन बौराहौ ॥ १० ॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाय ममुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हाने को तीरथघनी मन बौराहो ।
पूजैका बहुदेव समझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिनपानी नर बूड़िया मन बौराहो ।
तुम टेकहु राम जहाज समझ मन बौराहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
तुम छोड़े हरिका सेव समझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समझ मन बौराहो ॥ १ ॥
कालबूतकी हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रचो जगदीश समझ मन बौराहो ॥ २ ॥

साखी प्रकरण: सम्पूर्ण ३५३ साखियों की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या एवं उपसंहार

चाचर । (५०७)
बिना नेइ को देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहगिलकै ईंट समझ मन बौराहो॥ ३ ॥
हे मन करिकै बौरा जीव ! जौनेमें शोक संताप अनेक पावै है तें सब ऐसो
जगतको नेहरा समझिकै जारिदे ॥ १ ॥ औ या जगतकालबूत जो धोखा
ताकी हस्तिनी है अर्थात झूठो है जौनरूपते देखै जगदीश जो साहब ताको
रचो यह चित्रहै सो बिचारिकै छांड़ो । औ या देह कैसीहै जैसे बिना नेइको
देवाला औ धन कैसो है जैसे बिना गिलावाकी ईंट अर्थात् देवालकी नाईं
या तन गिरिही जायगो ईंट की नाईं जैसेईंट खरकिजाइहै तैसेतन खरकिही
जायगो २ । ३ ॥
तन धन सों क्या गर्ब समझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समझ मन बौराहो ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊंच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समझ मन बौराहो॥ ६ ॥
सों ऐसे नाशवान् तनधनको क्या गर्बकरै है भस्म औ कीराकी साजु है ।
सोतें जैसे कामते आंधर ह्वैकै हाथी हथिनी वास्ते बँधिकै अंकुश शीशमें सहै हैं
ऐसे तैं बिषयको बश परिकै नाना प्रकारके दुःखसहै है ऊंचनीच न पहिंचानै
द्वार द्वार बागत फिरै है ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग समझ मन बौराहो ॥ ८ ॥
जैसे मर्कट स्वादके लिये भुजा पसारि चना लेइहै मूठी नहीं छांड़ै है ऐसे तैं
मुक्तिकें लिये नानामतनमें परिकै दृढ़कैलियो है साहब को नहीं जानै है सो तोंको

( ५०८ ) बीजक कबीरदास ।
संसारतें छूटिबेकी संशय आइपरी है यमके घर लाठी खायहै पै मतनहीं छांड़ै
है सो हे बौरा जीव ! मन करिकै समुझुतौ ॥ ७ ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिगी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा भर्म बिचारि समुझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समुझ मन बौराहो ॥ १० ॥
जैसे नलिनीको सुवा भ्रमतै गहै है कोऊ धरै नहीं है ऐसे तुहूं आपने भ्रमतै
बँधो है सो साहबको जानै विचार करै तौ छूटिही जायहै । जो सुवा पढ़े गुने
बहुत भयो तौ का भयो बिलैया तो अंतमें खाय है सो ऐसेंतें बहुत पढ़ि गुनि
नाना मत कीन्हें परन्तु जौने में मीचते बचै सोतौ करबही न कियो॥९।१०॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाइ समुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हानेका तीरथ घना मन बौराहो ।
पूजैको बहु देव समुझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिन पानी नर बूडिया मन बौराहो ।
टेकहु राम जहाज समुझ मन बौरहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
छोड़े हरिको सेव समुझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
सो तैं शून्य धोखा ब्रह्ममें लगिकै सूना घरको पाहुना भयो जैसे आयो
तैसे चल्यो मुक्ति न भई । सो जो मुक्ति न भई तौ का बहुत तीर्थ नहाये
भयो का बहुत देव पूजे भयो तैंतो बिना पानी को जो संसार समुद्र तौनैन में
बूड़िगयो । सो तैं श्रीरामनामरूपी जहाज समुझिकै धरु । श्रीकबीरजी कहै हैं
कि, हे मन करिकै बौराजीव! जगत्में भर्मिया कहे भ्रमत फिरै है हरि जे साह-
बहैं तिनकी सेवाछोड़िकै सो हे मन बौरा अबहूं समुझ ॥११।१२।१३।१४॥
इति चाचरि समाप्त ।

ॐ
अथ बेलि प्रारम्भ ।
हंसा सरवर सरिरहो रमैया राम ।
जगत चोर घर मूसल हो रमैया राम ॥ १ ॥
जो जागल सो भागल हो रमैया राम ।
सोवत गैल बिगोय हो रमैया राम ॥ २ ॥
आज बसेरा नियरे हो रमैया राम ।
कालिह बसेरा दूरि हो रमैया राम ॥ ३ ॥
परेहु बिराने देश हो रमैया राम ।
नैन मरेंगे ढूँढ़ि हो रमैया राम ॥ ४ ॥
त्रास मथन दधि मथन कियो हो रमैया राम ।
भवन मथ्यो भरि पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥
हंसा पाहन भयल हो रमैया राम ।
बेधि न पद निरवान हो रमैया राम ॥ ६ ॥
तुम हंसा मन मानिक हो रमैया राम ।
हटल न मानल मोर हो रमैया राम ॥ ७ ॥
जस रे कियो तस पायो हो रमैया राम ।
हमर दोष जनि देहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥
अगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम ।
सहज कियो बैपार हो रमैया राम ॥ ९ ॥

( ५१० ) बीजक कबीरदास ।
राम नाम धन बनिजहु हो रमैया राम ।
लादेहु वस्तु अमोल हो रमैया राम ॥ १० ॥
नौ बहिया दश गौन हो रमैया राम ।
पांच लदनवा लादे साथ हो रमैया राम ॥ ११ ॥
पांच लदनवा परे हो रमैया राम ।
खाखरि डारिनि खोरि हो रमैया राम ॥ १२ ॥
शिर धुनि हंसा चले हो रमैया राम ।
सरवर मीत जोहार हो रमैया राम ॥ १३ ॥
आगी सरवर लागि हो रमैया राम ।
सरवर भो जरिक्षार हो रमैया राम ॥ १४ ॥
कहै कबीर सुनो सन्तो हो रमैया राम ।
परखिलेहु खर खोट हो रमैया राम ॥ १५ ॥
हंसासरवरसरिरहोरमैयाराम।जागतचोरघरमूसलहोरमैयाराम १
जोजागलसोभागलहोरमैयाराम । सोवतगैलबियोगहोरमैयाराम २
सो हे राम नामकेँ रमनवारे हंसा ! या शरीर रूप सरवरमें तेरो ज्ञान जाग-
तमें चोरमूसि लियो ॥ १ ॥ जो जागतहै मोहनिशाते सो भागै है संसारते सो
हे राममें रमनवारे मोहनिशामें सोवत सब बिगोय गये हैं कहे नानायोनिमें
संसारस्वप्रमें भटकत फिरै हैं ॥ २ ॥
आजबसेरानियरेहो रमैयाराम।कालिहबसेरा दूरि होरमैयाराम३
परेहु बिराने देश हो रमैयाराम।नैन मेरेंगे ढूंढ़िहो रमैयाराम४
सो हे राममें रमनवारे! आजु बसेरा नेरे है कहे मानुष शरीरई में ज्ञान होइ
है सो पायेहै काल्हि कहे जब या शरीर छूटि जायगो तब बसेरा दूरि ह्वैजायगों

बेलि । ( ५११ )
अर्थात् अनेक योनिनमें भटकत फिरौगे तब मेरो ज्ञान होयगों ? तैं जागतै में
लूटिगयो है तैं का जागत रहे है नहीं जागत रहे ॥ ३ ॥ हे राममें रमनवारे !
आपनो देश साकेत ताको छोड़िकै विराने कहैं मनकेदेशमें परचोहै तैसो
अनेक योनिनमें तेरी आंखी आंशू ढारिढारि फूटिजायँगी ॥ ४ ॥
त्रास मथन दधि मथन हो रमैया राम ।
भवन मथ्यो भरि पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥
हंसा पाहन भयल हो रमैयाराम ।
बेधि न पद निर्वाण हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
तुम हंसा मन मानिक हो रमैयाराम ।
हटल न मानेहु मोर हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
त्रास मथन जो है रामनाम तौनै है दधिमथन कहै मथानी तौनेते हे राम-
नामके रमनवारें ! भव समुद्र जो तेरे हृदयमें भरपूरि है ताको काहे नहीं मथ्यो ?
॥ ५ ॥ हेरामनामके रमनवारे ! तैंतो चैतन्य है मँनके साथ तुहूं जड़ह्वैगये है
काहेते कि निर्वाणपदको न बेधि कै तैं जड़ ह्वैगये है जो निर्वाणपद को बेधते
तो मेरे साकेत को जाते ॥ ६ ॥ हे हंसा तुम्हीं मन में मानिकै कहो तो जब
तुम राम नामको जगतमुख अर्थ करन लग्यो है तब मैं हटक्यों है सो तुम
नहीं मान्यो है सो तुमतो रामनाम के रमैयाहो परंतु राम नाम जो मोको वर्ण-
नकरै ताको अर्थ नहीं जान्यो संसारमें परचो है ॥ ७ ॥
जसरे कियो तस पायो हो रमैयाराम ।
हमर दोष जनि देहु हो रमैयाराम ॥ ८ ॥
अगम काटि गम कीन्हों हो रमैयाराम ।
सहज कियो वैपार हो रमैयाराम ॥ ९ ॥
राम नाम धन बनिजहु हो रमैयाराम ।
लादेहु वस्तु अमोल हो रमैयाराम ॥ १० ॥

( ५१२) बीजक कबीरदास ।
हे रामनामके रमनवारे हंसा ! जस कियों तस पायो हमारो दोष
जनि देहु ॥ ८ ॥ अगम जो राम नाम ताको काटि गम कीन्हों अर्थात् साहब
मुख अर्थ छांड़ि जगत् मुख अर्थ कियो फिरि वही रामनाम को ब्रह्ममुख अर्थ-
करि सहज व्यापार कहे सहज समाधि लगावनलगे कि, हमहीं ब्रह्म हैं ॥ ६ ॥
हे रामनाम के रमनवारे ! रामनाम धनको बनिज करिकै रामनाम अमोल बस्तु
लादेहु परंतु अर्थ न जान्यो । जो " बनिजहु लादहु " पाठहोइ तौं
यहअर्थ है अगम जो है रामनाम ताको काटिकै कहे बीजक में बनाइकै तुमकों
गमकै दियो कहे सुगम कैदियो समुझनलगे रामनाम को व्यापार तुम कों
सहज कै दियो अर्थात् रामनाम की सहज समाधि तुमकों कोंउ बतायदियो सों
रामनाम अमोल है ताको बनिज करो औ वही धनकों लादो यह सांच है
और सब झूठहै ॥ १० ॥
पांच लदनवा लादे हो रमैयाराम ।
नौ वहिया दश गोन हो रमैयाराम ॥ ११ ॥
पांच लदनवा आगे हो रमैयाराम ।
खाखरि डारिनि खोरि हो रमैयाराम ॥ १२ ॥
शिर धुनि हंसा उड़ि चले हो रमैयाराम ।
सरवर मीत जोहार हो रमैयाराम ॥ १३ ॥
ताही ते पांच लदनवा लादें अर्थात् पांचभौतिक शरीर धारण कीन्हे ते जौने-
में दशौ गोन दश इंद्रिय हैं तांमें मन बुद्धि चित्त अहंकार पांचौ प्राण ते बहि-
या हैं अर्थात् बहनवारे हैं चलावन वारे हैं ॥ ११ ॥ खाखरि जो शरीर तौन
जब खोरिमें डारेनि अर्थात् नाश भयो तब पांच लदनवा कहे वही पांचभौतिक शरीर
आगे मिलैहै। "पांच लदनवा गिरि परे" पाठ होइ तो यह अर्थ है कि जब इंद्रिय
न रहिगई तब शरीरौ छूटिजाइ है ॥ १२ ॥ सो हंसा जो जीव है सो शिर-
धुनिकै सरवर जो शरीर मीत तौने को जोहारिकै उड़ि चलै है ॥ १३ ॥

आगि लगी सरवरमें हो रमैयाराम ।
सरवर जरिभो क्षार हो रमैयाराम ॥ १४ ॥
कहै कबीर सुनो संत हो रमैयाराम ।
पंरख लेहु खर खोट हो रमैयाराम ॥ १५ ॥
जब हंसा उड़ि चलैहै तब सरवर जो शरीर तामें आगि लगै है सरवर
जरिकै क्षारहै जाइ है सो हे रामनाम के रमनवारे तुम तो संसारमुख अर्थकैकै
संसारमें परचो सो तुम्हारी यहदशा होतभई ॥ १४ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं
कि, हे सन्तो! साहब जो कहै हैं ताको सुनते जाउ । तुमतो रामनाममें रमन-
वारेहो सो रामनामको जगतमुख अर्थ छांडिकै साहब मुख अर्थ करिकै साहब
में लागो साहब की बाणी गहो खरखोट परखिलेहु कौन खराहै कौन खोटाहै
साहबमुख अर्थ खराहै काहेते साहिबै अपने मुख कहै हैं जगतमुख अर्थ खोटाहै
सो खोट छांड़िकै साहबमें लागो ॥ १५ ॥
इति प्रथम बेलि समाप्त ।
अथ द्वितीयबेलि ।
भल सुस्मृति जहडायहु हो रमैयाराम ।
धोखा कियो बिश्वास हो रमैयाराम ॥ १ ॥
सोतो हैं बन सीकसि हो रमैयाराम ।
शिरकै लियो विश्‍वास हो रमैयाराम ॥ २ ॥
ईतौ हैं बिधि भाग हो रमैयाराम ।
गुरु दीन्हों मोहिं थापि हो रमैयाराम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैयाराम ।
परिहरि जैहो खेत हो रमैयाराम ॥ ४ ॥
३३

( ५१४ ) बीजक कबीरदास ।
बुधि बल तहां न पहुंचै हो रमैयाराम ।
खोज कहांते होय हो रमैयाराम ॥ ५ ॥
सुनि मन धीरज भयल हो रमैयाराम ।
मन वढ़ि रहल लजाय हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
फिरि पाछे जनि हेरहु हो रमैयाराम ।
काल बूत सब आय हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
कह कवीर सुनौ संतो हो रमैयाराम ।
मति ढिगही फैलाव हो रमैयाराम ॥ ८ ॥
भल सुस्मृतिजहडायहु हो रमैयाराम ।
धोखा कियो विश्वास हो रमैयाराम ॥ १ ॥
साहब कहैं हैं हे रामनामके रमनवारे जीव तुम भली तरहते स्मृतिमें जह-
ड़ाय गयो । स्मृतिको तात्पर्यार्थ जो मैं ताको न जान्यो काहेतेकि धोखा
ब्रह्ममें विश्वास कीन्ह्यो ॥ १ ॥
सो तौ है बनसी कसि हो रमैयाराम ।
शिर कै लियो विश्वास हो रमैयाराम ॥ २ ॥
सोतौ है कहे सो धोखाब्रह्म बंशीकी नाईं है जो मछरीबंशीमें लागै है ताको
प्राण छूटिजाइहै, ऐसे तूहूं वामें लगैहै सो तेरो जीवत्व न रहैगो । अर्थात् तेरो
स्वरूप भूलि जाइगो मुरदाकी नाईंटँग्यो रहैगो। तौनेधोखा ब्रह्ममें शिरकै बिश्वास
कै लिये है । अथवा जे गुरुवालोग तोको धोखा ब्रह्ममें बिश्वास कराइ देइहैं
स्मृतिन का अर्थ फेरिकै ते बनके सीगट हैं । उहां हैं वा जो ब्रह्महै सो तैं आहे
यही कहै हैं अथवा हुआहै हुआ है या कहैं हैं कि तैं लगा सो ब्रह्महुआ जैसे
सीगटनकी बाणीमें अर्थ नहींहै ऐसे गुरुवा लोगनकी बाणी में अर्थनहीं है तैं
ब्रह्म कबहूं न होइगो तैं रामनाममें रमनवारो है सो ताहीमें रमै तबहीं
तेरोबनैगो ॥ २ ॥

बेलि । ( ५१५ )
ई तो है विधि भाग हो रमैयाराम ।
गुरु दीन्ह्यो मोहिं थापि हो रमैयाराम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैयाराम ।
परिहरि जैहो खेत हो रमैयाराम ॥ ४ ॥
साहब कहैं हैं कि रामनामके रमनवारे यहस्मृति विधि निषेधका भागकहावै
तौने भागबश मोको गुरुवा लोग बहँकाइ दियो मैं काकरों मेरोदोष कौन
है तौ हमारो महल छोड़ि तहीं गोबरको कोट उठायहुहै जो तैं गुरुवालोगनके
न जाते और उपासना न पूछते तौ वे काहेको बतौते सो मोको परिहरिकै
तैं संसाररूप खेत में जाय है जहां सब उत्पत्तिहोइहै ॥ ३ ॥ ४ ॥
बुधि बल तहां न पहुंचै हो रमैयाराम ।
खोज कहांते होय हो रमैयाराम ॥ ५ ॥
सुनि मन धीरज भयल हो रमैयाराम ।
मन बढ़िरहल लजाय हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
सो धोखाब्रह्म में बुद्धि बल नहीं पहुँचे है शून्य है खोज कहां ते होई । जो
कहो कि आपै में तो बुद्धि बल नहीं पहुंचै है तौ जो कोई मेरे रामनाममें रमैहै
मोको जानै है ताकोमहीं बताइ देउँ हौं नयनइन्द्रिय देउँहौं ताहीमें मोहिंदेखै है
॥५॥ गुरुवनकी बाणी सुनिकै जो तेरे मनमें धैर्य भयो कि हम ब्रह्म है जाइँगे
सो हे राम में रमन वारे वा ब्रह्ममें मन बढ़िकै कहे बिचार करत करत लजाय
गयो ब्रह्म न भयो मन अपनी गति जब नहीं देखै है तब सकुचिकै वाही में
रहिजाइहै मनको नाश नहीं होयहै ॥ ६ ॥
फिरि पाछे जनि हेरौ हो रमैयाराम ।
काल बूत सब आय हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
कह कबीर सुनौ संतौ हो रमैयाराम ।
मति ढिगही फैलाव हो रमैयाराम ॥ ८ ॥

( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
तुमतों रामनाममें रमनवारे हौ ई तो सब तुमते पाछे हैं तिनकी ओर जनि
हेरौ । माया ब्रह्म कालके पराक्रम आय जो इनके ओर हेरोगे तौ ये कालकें
बूत आय कहै कालके पराक्रमहैं अर्थात् मायै ब्रह्म द्वारा काल नाश सबको कै
देइ है ॥ ७ ॥ सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि हेसंतौ ! साहब कहै हैं सो सुनते जाउ
तुम तो राम नाम में रमन वारेहौ दूरिदूरि कहां खोजौहौ, मतिको ढिगहीमें
फैलाव अर्थात् अपने स्वरूपको विचारु कि मैं कौन को हौं तौ या जानि लेइ
तैं कि मैं राममें रमनवारो हौं रामनाम स्मरण करौगे तबहीं मुक्ति होयगी
तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“असचिरित देखि मन भ्रमै मोर । ताते निशि दिन गुण रमा तोर ॥
यक पढ़हिं पाठ यक भ्रम उदास । यक नगन निरंतर रह निवास ॥
यक योग युक्ति तिन होहिं खीन । यक राम नाम सँग रहल लीन ॥
यक होहिं दीन यक देहिं दान । यक कलपि कलपि कै होयँ हरान ॥
यक तन्त्र मंत्र औषधीवान । यक सकल सिद्धि राखैं अपान ॥
यक तीरथ व्रत करि काय जीति । यक राम नामसों करत प्रीति ॥
यक धूम घोटि तन होहिं श्याम । तेरी मुक्ति नहीं बिन राम नाम ॥
सतगुरु शब्द तोहि कह पुकार । अब मूल गहो अनुभव बिचार ॥
मैं जरा मरणते भयउँ थीर । मैं राम कृपा यह कह कबीर ॥ ८ ॥
इति बेलि समाप्त ।

ॐ
अथ बिरहुली ।
आदि अंत नहिं होत बिरहुली ।
नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली ॥ १ ॥
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली । कथि गये योग अपार बिरहुली ३
मास असाढ़हि शीत बिरहुली । बोइन सातौ बीज बिरहुली ४
नित गोड़ै नित सिंचै बिरहुली । नित नव पल्लव पेड़ बिरहुली ५
छिछिल बिरहुली छिछिल बिरहुली। छिछिल रही तिहुँलोक बिरहुली
फूल एक भल फुलल बिरहुली । फूलि रहल संसार बिरहुली ७
ते फुल बंदै भक्त बिरहुली । वांधि कै राउर जाहि बिरहुली ॥ ८ ॥
ते फुल लेहीं संत बिरहुली । डसिगो वेतल सांप बिरहुली ॥ ९ ॥
विषहर मंत्र न मान बिरहुली । गाडुरि बोले आर बिरहुली १०
विष की क्यारी बोयो बिरहुली। लोरत का पछिताय बिरहुली ११
जन्म जन्म अवतरे बिरहुली। फल यक कनयल डार बिरहुली १२
कह कबीर सचु पाय बिरहुली। जो फल चाखहु मोर बिरहुली १३
आदि अंत नहिं होत बिरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली १
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली। कथि गये योग अपार बिरहुली ३

( ५१८ ) बीजक कबीरदास ।
बी कहैं दुइ विद्या अविद्या रूपको, रहुली कहै रहनवाली जो माया ताको ।
सो कबीरजी कहै हैं कि, विद्या अविद्या दुहुनको न आदि है न अंत है अर्थात्
विचार कीन्हे भ्रममात्रै है जीव छूटि मात्र जाइ है । सो बिरहुली जो माया
ताके न जड़ है न पेड़ है न पल्लव है अर्थात् विचार कीन्हे मिथ्या है ॥ १ ॥
जब निशिवासर नहीं होत है तबहूं बिरहुली माया रही है जब पानी पवन
नहीं रह्यो तबहूं बिरहुली माया रही है औ ब्रह्मा सनकादिककी आदि बिरहुली
है औ जोन योग अपार कथि गये हैं सोऊ बिरहुली है ॥ २ ॥ ३ ॥
मासअसाढ़हिशीतविरहुली।बोइनसातौबीजविर हुली ॥४॥
नितगोड़ैनितसिंचैविरहुली।नितनवपल्लवपेड़बिरहुली॥५॥
जब प्रथम उत्पत्ति भई है सोई आषाढमास है काहेते चौमास को आदि
आषाढ है । तैसे युगनको आदि सतयुग है सो कैसा है शीतकहे शुद्ध सतोगुण
है तौनेमें जीव को जो सातौ सुरति तेई हैं बीज तेके बोवत भये ते सब बिरहुलिन
आइ सो मंगलमें लिखि आये हैं कि ॥ “ सात सुरति सब मूल हैं । मलयडु
इनहीं माँह ” ॥ सो जीव नितगोड़ै है गुरुवनते वोई कर्म्म पूछै है खोदि
खोदि नित सींचै है कहे वोई कर्म्म करै है जाते बिरहुली कहे माया बढ़तै
जाइ है ॥४॥ ५ ॥
छिछिलबिरहुलीछिछिलबिरहुली।छिछिलरहलतिहुँलोकबिरहुली ६
फूलएकभलफूललविरहुली।फूलिरहलसंसारविरहुली॥७॥
कहूं विद्यारूपते छिछिली है बिरहुली माया; कहूं अविद्या रूपते छिछिली
है बिरहुली माया । यही रीतिते तीनों लोकमें बिरहुली छिछिलरही है । सो
यही माया बिरहुली में कहूं कर्म्मत्यागरूप एक फूल धोखा ब्रह्म फूलि रह्यो है
ताही में सब संसार लगिकै फूलि रहे कहे आनन्द मानि लिये हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥
तेफुलबन्दैभक्तिबिरहुली । वांधिकैराउरजायविरहुली ॥८॥
तेफुललेहींसंतविरहुली । डसिगोबेतलसांपबिरहुली ॥९॥