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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 766 में से

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पृष्ठ 548

( ५०४ ) बीजक कबीरदास ।
चाचरिमें स्त्री भोंडरकी ढाल आगेंकरि पांव पीछेको नहीं टारै हैं सो खेल-
निहारी जे हैं ते जब पतिको पाय जाय हैं तब कहैं हैं कि, खेलि लेउ अब
ऐसो दाँव न मिलैगो। औ यहां मायाजो है सोऊ अज्ञानकी ढाल आगे लीन्हे है,
जाको पांव ज्ञानभक्ति बैराग्यकरैं टारे नहीं टरै सो, खेलनिहारी जो माया सो
खेलैबै करी ऐसो दाँव वाको फिरि न मिलैगो अपने बशकरि पायोहै ॥७॥ औ
चाचरि में स्त्रिनते पुरुष हारि जाइहैं सुख मानै हैं औ माया जो है ताहूसों
सुर जेहैं देवता, नर जेहैं मनुष्य, मुनि जेहैं ज्ञानी, भूदेव जे हैं ब्राह्मण, गोरख
जे हैं योगी कवि, दत्तात्रेयजे हैं अवधूत, ब्यास जे हैं कवि, सनकसनंदनजे हैं
त्यागी ते सब हारिगये औरकी कौन गिनती है ॥ ८ ॥
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो वश आपने, फिरि फिरि चितवत जात॥९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लिये है हाथ ।
शिव सँग ब्रह्मा लीन्हिया, और लिये सब साथ॥ १०॥
चाचरि में नारी रंगकी पिचकारो गात में सींचि आपने बश करि फिरि
फिरि चितवत कहे कटाक्ष करै हैं इसी प्रकार मायाजोहै सोऊ थोथे कहे झूठे-
प्रेमसो संसार राग सबको गातसींचैहै आपनेबश करिलियोहै औ फिरिफिरि
चितवत जातै है कहे सबको ताकेरहै है कि कोऊ बाच्यौतौ नहीं ॥९॥ औचाच-
रिमें स्त्री लोग रंगकेहौदमें डारिदेइ हैं औ फूलनके मालामें हाथबांधै हैं पुरुषन-
को वैसेही माया जोहै सोऊ ज्ञानके गाड़में ब्रह्मादिक देवतनको डारिकै त्रिगुण
की फांसीमें बांधि लियो ॥ १० ॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करिलिय एकै छाप ॥ ११ ॥
जेते थे तेते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेख हैं, अदग न कोई जाय ॥ १२ ॥
इन्द्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन निज ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥