कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०२ ) बीजक कबीरदास ।
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो बश आपने, फिरि फिरि चितवत जात ९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लियो है हाथ ।
शिव सन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥१०॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लीनो यक छाप ॥११॥
जेते थे ते ते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेखहै, अदग गया नहिं कोय ॥१२॥
इंद्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन दोउ ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥१३॥
खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार ।
कटि कहेरि गज गामिनी, संशय कियो शृंगार ॥१॥
रचै रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरै आय ।
शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा वरणि न जाय ॥ २ ॥
जौन माया सब संसार को जेर कियो है सो मोहिनी माया चाचरि खेलै
है । केहरि जो है काल सब को खाइलेनवारो सो वाकी कटिहै कहैं मध्यभाग
है । मध्य में बैठिकै अधो ऊर्ध्व को खाय है । औ मन गज है तेही कारिकै
चलै है । औ संशय रूप श्रृङ्गार किये अर्थात् जहँ बहुत संशय होईहै तहँ माया
बहुत शोभित होइ है ॥ १ ॥ नारी लोग रचैकहे जो पीउ को रुचैहै सो चूनरी
पहिरे हैं औ माया नाना विषय जो जीवन को नीक लगै ताकी चूनरी पहिरैं
है अद्भुत शोभा स्त्रियनहूं की होईहै यहै मायौकी अद्भुत शोभा है ॥ २ ॥
चन्द्र बदनि मृग लोचनी, बिन्दुक दियो उगालि ।
यती सती सब मोहिया, गज गति बाकी चालि ॥३॥