कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबसंत । (४१९)
जैसे हम रामनाम दैके जीवनको उद्धार करते हैं तैसे तुमहूं करोगे । तब तस
देखोगे कि राम नामते कैसेहू विषयी होइ पै वाको उद्धारई होइ जाइहै। औ काशीमें
रामनामही ते मुक्तिहोइहै रामई नाम महादेव देइहैं तामें प्रमाण ॥ “पेयं पेयं-
श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् । जलपं
जलपंप्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यांवीथ्यामटतिजटिलः कोपि काशी
निवासी । इतिस्कांदे” ॥ ९ ॥
इति ग्यारहवां बसंत समाप्त ।
अथ बारहवां बसंत ॥ १२ ॥
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वा के लगनै जाय ॥२॥
सोतो कहिये अतिहि अबूझ। खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
आपन आपन चाहहिं मान । झूठ परपंच सांचकै जान॥४॥
झूठा कबहूं करौ नहि काज । मैं तोहिं बरजौं सुनु निरलाज ५
छाड़हु पाखंड मानहुं बात । नहिंतौ परिहौ यमके हात ॥६॥
कहै कबीर नर चले न सोझ। भंटकि मुये जस वनके रोझ ७
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वाके लगनै जाय ॥ २ ॥
सो तौ कहिये अतिहि अबूझ । खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हमरे कहे ये जीव कोई नहीं पतियायहैं साहब
में कोई नहीं लगते हैं; आपने खुशीते बानी रूप सलिलमें बूड़े जाते हैं बानी को
पानी आगे कहि आये हैं ॥ १ ॥ आंधर जे गुरुवा लोगहैं ते नाना मतनको
बतावै हैं और आँधर जे जीव तें ग्रहण करै हैं साहब को नहीं जानै हैं जैसे
बेश्या की लगन, वह तो नाना पुरुषते रमै है एकको जानतिही नहीं है ऐसे नाना
उपासना मानै हैं सो साहब को मानतही नहीं हैं ॥ २ ॥ सो ते जीवन को