कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचांचर । (५०३)
नारदको मुखमाड़िकै, लीन्हो बदन छिपाय ।
गर्व गहेली गर्वते, उलटि चली मुसकाय ॥ ४ ॥
औ नारी चंद्र बदनी मृग नयनी बिंदुक दीन्हे घूँघुट उवारि गज की नाईं
चलि सबको मोहै हैं । माया कैसी है कि, चंद्रबदनी है चन्द्रमाके समान
याहू आपने पदार्थते सबको आनन्द देय है । मृगनयनी कहे यहू चंचल
है । बिंदुक दीन्हे उघारि कहे आपने रागको फैलाय देइहै गजगति कहे धीरे
धीरे यती सती सबको मोहै है ॥ ३ ॥ वै स्त्री नारद कहे जाके रद कहे दांत
नहीं हैं ऐसे जे वृद्ध पुरुष तिनको मुख माड़िकै बदन कहे बोलिबो छिनाय
लेती हैं । अर्थात् और बोलिबो सो छूटि जाइहै नारी नारी यहै कहै हैं ।
चाचरि वोऊ गावै लगै हैं । अथवा माया जो है सो नारद ऐसे मुनिको बांद-
रकी नाईं मुख कै दियो । शीलनिधि राजाकी कन्याको काज करै चलै ।
और स्त्री गर्व को गहे लोगनके मोहिबे को चाचरि में मुसक्याय चलैहै ।
औ माया जो है सोऊ नारदके गर्वको गहि कै मुसक्यायकै चली है ॥ ४ ॥
शिव अरु ब्रह्मा दौरिकै, दोनों पकरे जाय । फगुवा लीन
छिनायकै, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि
बाजा बजै, श्रवण सुनत भो चाव । खेलनि हारी खेलिहै,
जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥
स्त्री जेहैं ते पुरुषनते चाचरि में पकारि फगुवा लैके आपस में छिटकाय कहे
बांंटिलेय हैं तैसेही मायाजो है सोऊ ब्रह्मा शिव तिन को पकरिकै फगुवा जो
नाना मत सो लैिकै अनेक ब्रह्मांडनमें छिटकाय दीन्हों ॥ ५ ॥ चाचरि में
बाजा बजै है ताको सुनिकै चाव होइ है खेलनिहारी आपनो दावँ ताकि ताकि
खेलै हैं । औ माया जो है सोऊ अनहद बाजा बजाइ जौनके सुनतमें योगिन
के चाव होइहै सो खेलनिहारी जो कुंडलिनी शक्ति सो जैसो वाको दावँ है तैसो
खेलै है जीवको चढ़ावै औ उतारै है ॥ ६ ॥
आगे ढाल अज्ञानकी, टारे टरत न पाव। खेलनिहारी खे
लिहै,बहुरि न ऐसीदाव७सुरनर मुनि भूदेवता,गोरख दत्ता
व्यास।सनक सनन्दनहारिया,और कि केतिक आस॥८॥