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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

६ ॥ ७२ बाणी ॥` (wait, ६९६)

Line 26:
७३ फंस गया ॥ ७४ कठिन ॥ ७५ शब्द ॥ ७६ पांचतत्व ७७ कीचड़

Line 27:
पंक, कांदो ॥ ७८ निराकार ॥

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    रमैनी । ( ३९ )
    घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
    ^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
    ...
    Everything matches line-by-line precisely.रमैनी । ( ३९ )
    घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
    ^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
    केभाव ॥ ईसवकालशब्दकेदाव ॥ सोहंआत्माब्रह्मलखाव ॥
    [L

( ४० ) रमैनी ।
भरमबढ़ीशिरकेशबढावै ॥ तकेगगन कोइ बांह उठावै ॥ दैता
री करनाशाग है ॥ भरमिकगुरू बतावै लहै ॥ भरम बढ़ी अरु
घूमन लागे ॥ बिनु गुरु पारख कहु को जागे ॥ साक्षी ॥
कहैं कबीर पुकारके, गहहुशरणतजिमान ॥ परखावे गुरभर-
मको, बानि खानिसहिदान ॥ ११ ॥ रमैनी भरमजीव परमा
तममाया॥भरमदेहऔ भरम र्निकाया ॥ अनहदनाद औ ज्यो
ति प्रकास ॥ आदिअन्तलौभरमहि भास ॥ इत उत करे भरम
निर्रमान ॥भरम मान औभरमअमान॥कोहं जगतकहांसे भया॥
ईसबभरम अतीनिरमया ॥ प्रंलय चारि भ्रमपुण्य औ पाप ॥
मन्त्रजापपूजाभ्रमथाप ॥ साक्षी ॥ बाट बाट सब भर्म है,
माया रचीबनाय ॥ भेद बिना भरमें सकल,गुरु बिन कहांल-
खाय ॥ १२ ( बापपूत दोउ भरमहै, मायारची बनाय ॥ भेद
बिनाभरमे सकल, गुरु बिनकहाँलखाय ) ॥ साक्षी ॥
बापपूत दोऊ भरम, औधकोश नवपांच ॥ बिन गुरु भरम
नछूटे, कैसे आवैसांच ॥ १३॥ रमैनी ॥ कैलमा बाँग निर्माज
गुजारे॥भरमभई अल्लाहपुकारै ॥ अजबभरम एकभईतमासा॥
लाँ मुकाम बेचूँननिबासा ॥ वेनैमूनवहसब केपारा॥ आँखि-
रताको करे दिर्दारा ॥ रगड़ैनाक मँसजिदअचेत ॥ निंदे बुँत
७९ स्थित ॥ ८० नित्य प्रलय १ नैमित्तिक प्रलय २ महाप्रलय ३ आत्यं
तिक प्रलय ४ ॥ ८१ अधामात्रौ ॥ मुसलमानो का गुरु मन्त्र ला एला इलि-
ल्लाह मुहम्मदुर्रसू लिल्लाह ॥ ८३ अजान जो निमाज पढ़ने के थोड़ीही पहले
निमाज के समय सूचन करने को कलमा श० पुकारते हैं ॥ ८४ जो खुदा
के प्रार्थना पांच समय दिन और रात्री पढ़ते हैं पश्चिम मुह होंकर ॥ ८५
स्थान रहित ॥ ८६ निराकार ॥ ८७ अद्वितीय ॥ ८८ क्यामतके दिन,सृष्टि
के अंत में जब खुदा सबका न्याय करेगा ॥ ८९ दर्शन ॥ ९० मुसलमानों
के नेमाज पढ़ने की जगह ॥ ९१प्रतिमापूजक ॥

रमैनी । ( ४१ )
परसततोहिहेत ॥ बौवन तीसंबरन निरमान ॥ हिन्दू तुरुक
दाऊभरमान ॥ साक्षी ॥ भरमिरहेसब भरममहं, हिंदू-
तुरुकबखांन ॥ कहहिंकबीरपुकारिकै, बितुगुरूकोपहिचान
॥ १४ ॥ रमैनी ॥ भरमत भरमतसबै भरमाने ॥ रामसनेही
बिरलेजाने ॥ तिरदेवा सबखोजतहारे ॥ सुरनरमुनिनहिपा-
वतपारे ॥ थकितभयातबकहावेअन्ता ॥ विरहैंनिनारिरही
बितु कैन्ता ॥ कोटिनतरक करें मनमाहीं ॥ दिलकी दुबिधा
कतहूँनजाही ॥ कोई नख शिखजटा बढ़ावै ॥ अरमिभरमि-
सबजहँतहँधावैं ॥ बाटनसूझै भईअँधेरी ॥ होयरहीबानी कीं
चेरी ॥ नाना पन्थ बरनिनहिंजाई ॥ ( जातिकर्म गुन नाम
बड़ाई ) जाति वरणकुलनामवड़ाई ॥ रैन दिवसवे ठाँठेरहहीं
वृक्ष पहारकाहेंनहितरहीं ॥ साक्षी ॥ खेसमनचीन्हे बावरी,
परपूरुषलौलीन ॥ कहंहिकबीर पुकारके परीनबानीचीन
॥ १५ ॥ रमैनी ॥ कैनरसकी मतवालीनारि ॥ कुँटनीसेखो-
जे लैंगवारि ॥ कुटनीआंखिन कौंजरदियऊ । लागिवैंतावन
ऊपरपीयऊ ॥ काजरलेकेहूवैगईअंधी ॥ समुझनपरीबाँतेंकी
१०४ संधी ॥ बाजेकुटनीमोरे १०५ मँटकी ॥ ई सब छिनरोतामहँअ-
टकी ॥ विरहिनिहोय के देहसुखावै ॥ कोई शिरमह केशब-
ढ़ावै ॥ मानि मानि सब कीन्ह सिंगारा ॥ बिनपियपरसैंस-
बैंअंगारा ॥ साक्षी ॥ अटकीनारिछिनारि सब, हर-
दम कुटनीद्वार ॥ खसम न चीन्हेबावरी, घरघरफिरतखु-
९२ संस्कृत वर्णमाला के ५२ अक्षर ॥ ९३ मुसलमानीवर्णमाला के
३० अक्षर ॥ ९४ मुसलमान ॥ ९५ वियोगिन ॥ ९६ पिया मालिक ॥
९७ खड़े ॥ ९८ मालिक ॥ ९९ बाणी ॥ १०० गुरुआ लोग ॥
१०१ आशना, जार ॥ १०२ झूठा उपदेश ॥ १०३ उपदेश करने
लगी ॥ १०४ मिलावट ॥ १०५ इशारा ॥

( ४२ ) रमैनी ।

वार ॥ १६ ॥ रमैनी ॥ नवदरवाजाभरमविलास ॥ भरमहि-
वावनबहेवतास ॥ ^१०६कैंनउजबावनभूतसमान ॥ कहं लगिगनों
सो प्रथमउडान ॥ माया ब्रह्मजीवअनुमान ॥ मानतही मालि-
क बौरान ॥ अकबकभूतवके परचंड ॥ व्यापि रहा सकलों
ब्रह्मांड ॥ ई भर्म भूत की अकथकहानी ॥ ^१०७गोत्योजीवजहांन-
हिंपानी ॥ तनकतनकपरदौरे बौरा ॥ जहांजायेतहंपावेन-
ठौरा ॥ साक्षी ॥ योगी रोगीभक्तबाबरा, ज्ञानीफिरे
^१०८निखटू ॥ संसारीको ^१०९चैन नहींहै, ज्योंसरांयकाटटू ॥ १७
रमैनी ॥ इतैंउंतदौरैसबसंसार ॥ छुटेनभरमकिआउपचार ॥
जरैजीवकोबहुरिजरावै ॥ काटे ऊपर लोनलगावै ॥ योगी
ऐसी हालबनाई ॥ ^१११उलटी वत्ती नाक चलाई ॥ कोइविभूति-
मृगछालाडारे ॥ अगमपन्थकी राहनिहारे ॥ काहूको जलमां-
झसुतावे ॥ कहंरतहीं सबरैनगंवावै ॥ भगती नारी कीन
श्रृंगार ॥ बिन प्रिया परचै सबै अंगार ॥ एकगर्भ ज्ञानअनु-
मान ॥ नारि पुरुषकाभेदनजान ॥ संसारीकहूंकलनाहिंपावे
॥ ^११२कहरतजगमेंजीवगंवावे ॥ चारिदिशामें मंत्रीझांरे ॥
लियेपलीतामुलनाहारे ॥ जरैनभूतबड़ो वरि^११४खारा ॥ काजी
पण्डित [पचिपचि] पढ़िपढ़ि हारा ॥ इन दोनोंपरएकै भूत ॥
झारेंगे क्यामाकी चूत ॥ साक्षी ॥ भूत नउतरे भूतसों, सन्तों
करोविचार ॥ कहैंकबीरपुकारिके, बिनुगुरु नहिंनिस्तार ॥
साक्षी॥परमप्रकाश ^११५भाँसजो, होत ^११६प्रौढाविशेष॥ तद् प्रकाश

१०६ अक्षर १०७ डुबाया ॥ १०८ उदास ॥ १०९ सुख ॥ ११० यहां
बवां ॥ १११ नेती धोती बाहर कराता है ॥११२ हाय २ करतें २ ॥
११३ पंडित लोग ॥ ११४ मजबूत बलीबलवान ॥ ११५ अध्यास
॥ ११६ दृढ़ ॥

संभव भई, महाकाश सो शेष २१ ॥ साक्षी ॥ झांईंसंभवबुद्धि
ले, करीकल्पना अनेक ॥ सोपरकाशक जानिये, ईश्वरसाक्षी
एक ॥ साक्षी ॥ बिषमभईंशंकल्प जब, तदाकारसोरूप ॥ महा
अंधेरीकालसो, परेअविद्या कूप ॥ साक्षी ॥ महातत्व
त्रीगुणपांच तत्व, सैमष्टि ११७ व्यैष्टि ११३ परमान ॥ दोय प्रकार होयप्र-
गटे, ११९खंड १२०अखंडसोजान ॥ २२ ॥ रमैनी ॥ सदा अस्ति १२१भा
से निजभास ॥ सोईकहियेपरम प्रकाश ॥ परमप्रकाशले झां-
ईं होय ॥ महदअकाश होयबरते सोय॥बरतेवर्त मानपरचंड॥
१२२भासक तुरियातीतअखंड ॥ कालसंधिहोये उश्वास ॥ आगे
पीछे अनवनि भास ॥ विविधि भावना कल्पित रूप ॥ परका-
शी सोसाक्षि अनूप ॥ शून्य अज्ञान सुषुप्तिहोय ॥ अकुलाहट
ते नादै सोय ॥ (शून्य ज्ञान सुषुप्ती होय ॥ अकुलाहटसे नादी
सोय ) ॥ नादवेद अकर्षण जान ॥ तेजनीर प्रगटे तेहिआन ॥
पानी पवन गांठि परिजाय ॥ देही देह धरे जग आय ॥ सो
कौआर शब्द परचंड ॥ बहुव्यवहार खण्डब्रह्माण्ड ॥ साक्षी ॥
जतन भये निज अर्थ को, जेहि छूटे दुख भूरि १२३॥ धूर परी
जब आंखमें, सूझे किमि निजसूर ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ पांजी
परख जबै फरिआवै ॥ तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द
सुधारिके रहे अकरम ॥ स्वाती भक्ति के खोटे भरम ॥ काल
जाल जो लखि नहिं आवै ॥ तौलौ निजपद नहीं पावै ॥
झांई संधि काल पहिचान ॥ शार शब्द बिनु गुरु नहिं-
जान ॥ परखे रूप अवस्था जाए ॥ आन विचार न ताहि
समाए॥ १२४झांईं संधि शब्दले परखे जोय॥संशय वाकेरहै न कोय॥
११७ समूह जैसे बन ॥ ११३ एक जैसे एक वृक्ष ॥ ११९ अंस
॥ १२० पूर्ण ॥ १२१ सत्य ॥ १२२ अध्यास का कराने वाला ॥
१२३ ढेर्र समूह ॥ १२४ वेदांत ॥

साक्षी ॥ धन्य धन्य तरण तरण, जिन परखा संसार ॥
बंदी छोरकबीरसों, परगटगुरू विचार ॥ २४ ॥ रमैनी ॥
शब्द संधि ले ज्ञानी मूढ ॥ देह करमजगत आरूढ़ ॥ नौंइंसं-^१२५
धिलै सपना होय ॥ झांईं शून्य सुषोपति सोय ॥ ज्ञान प्रका-
शक साक्षी संधि ॥ तुरियातीत अभास अबंधि ॥ झांईं ले
बरते वर्तमान ॥ सो जो तहां परे पहिचान ॥ काल अस्थिति
के भासनशाए ॥ परख प्रकाश लक्ष बिलगाए ॥ बिलगेलक्ष
अपन ^१२६पौ जान ॥ आपु अपन पौ भेद न आन ॥ साक्षी
॥ आप अपन पौ भेद बिनु, उलटिपलटि अरझाय ॥ गुरु बि-
न मिटे न दुगदुगी, अनबनीयतभनशाय ॥ २५ ॥ रमैनी ॥
निज प्रकाश झांई जो जान ॥ महा संधि माकाश बखान ॥
सो ईं^१२७पांजी ल बुद्धि विशेष॥प्रकाशक तुरियातीत अरुशेष॥
विविध भावना बुधि अं^१२८नुरूप ॥ विद्यामाया सोई स्वरूप ॥
सो संकल्प

रमैनी । ( ४५ )
पहिरें चीर॥युग युग नाचे दास १३५कबीर ॥ २१ ॥ रमैनी ॥भासे
जीवरूप सो एक ॥ तेही भास के रूप अनेक ॥ कोई १३६मैंगन
रूप लौलीन ॥ कोई १३७अँरूप ईश्वर मन दीन ॥ कोई कहै कर्म-
१३८रूप है सोय ॥ शब्द १३९निरूपेन करे पुनि कोय ॥ १४०संशय रूप
कोई भगवान ॥ कर्त्ता न्यारा १४१कोई अनुमान ॥ कोई कहै
१४२ईश्वरै ज्योतिहिं जान ॥ आतम को कोई १४३स्वतः बखान ॥
कोई कहै सब १४४पुनि सबते न्यारा ॥ आपै राम विश्व विस्ता-
रा ॥ शब्द १४५भौंव कोई अनुमान ॥ अद्वै रूप १४६भई पहिचान ॥
१४७डेंगडुग रही को बोलै बात ॥ बोलतही सब तत्व नशात ॥
बोल १४८अंबोल लखे पुनि कोय ॥ भास जीव नहिं परखै सोय
॥ साक्षी ॥ निज अँध्यास झांई अहै, सोसंधिक औभास ॥
प्रथम अनुहारी कल्पना, सदा करे परकास ॥ २६ ॥ रमैनी॥
लख चौराशी योनि जेते ॥ देही बुद्धि जानिये तेते ॥ जहं
जेहि भास सोई सोइ रूप ॥ निश्चै किया परा भवकूपं ॥ नाना
भांति विषय रस लीन ॥ अरुझि २ जिव मिथ्या दीन ॥
१५०दाँवा १५१विषयै जरै सब लोय ॥ बांचा चहै गहै पुनि सोय ॥दृढ़
विश्वास १५२भरोसा राम ॥ कबहूं तो वे आवैं काम ॥ १५३विषयै
विकार मांझ संग्राम ॥ राम खटोला किया अराम ॥ घायल
बिना तीर तरवार ॥ सोइ १५४अभरैंण जेहि रीझे भरतार ॥
१३५ भक्त लोग ॥ १३६ सगुण उपासक ॥ १३७ निर्गुण उपासक ॥
१३८ पूर्व मीमांसक ॥ १३९व्याकरणी ॥ १४० वैशेषिक ॥ ( काल वादी )
१४१ तर्क वादी नैयाइक ॥ १४२ योगी ( पातांजल ) १४३ सांख्यक ॥
१४४ वेदांती ॥ १४५ बोलता ॥ १४६अद्भुत रूप ॥ १४७ शंका ॥
१४८ विज्ञानी ॥ १४९ कल्पना ॥ १५० उसके बुद्धि का जो विषय ॥
१५१ अग्नि ॥ १५२ आशा ॥ १५३॥ क्षोभ, ऐब ॥ १५४ गहना ॥

( ४६ ) रमैनी ।
कामिनी पहिर पिया सों राँ१५५ची ॥ कहैं १५६कबीर भव बूड़त
बांची ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ भव बूड़त बेड़ौ१५७ भगवान ॥ चढ़े
धाये लागी लौ ज्ञान ॥ थाह न पावे कहे अथाह ॥
डोलत करत तराहि तराह ॥ सूझ परे नहिं वार न पार ॥
कहै अपार रहे मैंझधार ॥ मांझधारमें किया विवेक॥कहां के
दूजा कहांके एक ॥ बेरा आपु आपु अवधार ॥ आपै उतरन
चाहेपार ॥ बिन जाने जाने है और॥आपै राम रमैसब ठौर॥
बार पार ना जाने जोर ॥ कहै कबीर पार है ठौर ॥ २४ ॥
रमैनी ॥ अक्षर खानी अक्षर वानी ॥अक्षर ते अक्षरउतपानी
अक्षर करता आदि प्रकास ॥ ताते अक्षर जगत विलास ॥
अक्षर ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ अक्षर रज सत तम उपदेश ॥
छिति जलपावक मरुत अकाशा॥ये सब अक्षर मो परकाशा ॥
दश औतार सो अक्षर माया ॥ अक्षरनिर्गुणब्रह्मानिकाया ॥
अक्षर काल संधि अरु झांई ॥ अक्षर १५९दहिने अक्षर १६०बाँई ॥
अक्षर आगे करे पुकार ॥ अँटके नर नहिं उतरे पार ॥
गुरुकृपा निजैं१६१ उदैयविचार१६२ ॥ जानिपरी तब गुरुमत-
सार ॥ साक्षी ॥ जहां ओसको लेश नही, बूडे सकल
जहांन ॥ गुरु कृपानिज परखबल, तब ताको पहि-
चान ॥ २७ ॥ रमैनी ॥ अक्षर काया अक्षर माया ॥ अक्षर
सतगुरु भेद बताया ॥ अक्षर यन्त्र मन्त्र अरु पूजा ॥ अक्षर
ध्यान धरावत दूजा ॥ अक्षर पढि २ जगत भुलान ॥ अक्षर
बिनु नहिं पावै ज्ञान ॥ बिन अक्षर नहिं पावे गैती१६३ ॥ अक्षर
१५५ लगी ॥ १५६ गुरू ॥ १५७ नाव किश्ती ॥ १५८ बीच
धारमें ॥ १५९ दक्षिण पंथ ॥ १६० वाममार्ग ॥ १६१ अपना ॥ १६२ प्रकाश ॥
१६३ मुक्ति ॥

रमैनी । ( ४७ )

बिन नहिं पावै १६४रंती ॥ अक्षर भए अनेक उपाय ॥ अक्षर
सुनि २ शून्य समाय ॥ अक्षर से भव आवै जाय ॥ अक्षर
काल सबनको खाय ॥ अक्षर सबका भाषे लेखा ॥ अक्षर
उत्पति प्रलय विशेखा ॥ अक्षरकी पावै सहिं१६५दानी ॥ कहैं क-
बीर तब उतरे प्रानी ॥ साक्षी ॥ परखावे गुरुकृपा
करि, अक्षर की सहिदानि ॥ निज बल उदथ विचारते,
तब होवे भ्रम हानि ॥ २८ ॥ रमैनी ॥ बावन के बहु बने
तरंग ॥ ताते भासत नाना रंग ॥ उपजे औ पालै अनुसरै ॥
बावन अक्षर आखिर करै ॥ राम कृष्ण दोउ लहर अपार ॥
जेहिपद गहि नर उतरै पार ॥ महादेव लोमश नहिं बांचे ॥
अक्षर त्रास सबै मुनि नाचे ॥ ब्रह्मा विष्णु नाचै
अधिकाई ॥ जाको धर्म जगत सब गाई ॥ नाँचै गण गंधर्व
मुनि देवा ॥ नाचै सनकादिक बहु भेवा ॥ अक्षर १६६त्रास सबन
को होई ॥ साधक सिद्ध बचे नहिं कोई ॥ अक्षर त्रास लखे
नहिं कोई ॥ आदि भूल बंधे सब लोई ॥ अक्षर सागर अक्षर
नाव ॥ करणधार अक्षर समुदाय ॥ अक्षर सबका भेद
बखान ॥ बिन अक्षर नहिं अक्षर जान ॥ अक्षर आसते फंदा
परे॥ अक्षर लखे ते फंदा टरे॥ गुरु शिष अक्षर लखलखावे ॥
चौराशी फंदा मुक्तावै ॥ बिनु गुरु अक्षर कौन छोडावे ॥
अक्षर जाल ते कौन बचावै ॥ संचितँ १६७ क्रिया उदय जब होय ॥
मानुष जन्म पावै तब सोय ॥ गुरुपारख बल उदय विचार ॥
परख लेहु जगत गुरुमुख सार ॥ अस्ति हंसप्रकाश अपार॥


१६४ प्रवृत्ति ॥ १६५ चिह्न, पारख, पहिचान, ॥ १६६ भय ॥
१६७ जन्मांतरोंमें संचित किया हुआ कर्म ॥

( ४८ ) रमैनी ।
गुरुमुख सुख निज अति दातार २७ ॥ साक्षी ॥ अक्षर है
तिहु भर्मका, बिनु अक्षर नहिं जान॥ गुरु कृपानिज बुद्धिबल,
तब होवे पहिचान २९ ॥ साक्षी ॥ १६८जँहवां से सब प्रगटे, सो
हम समझत नाहि ॥ यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म
कहि ताहि ॥ ३० ॥ साक्षी ॥ ब्रह्म विचारे ब्रह्मको, पारख
गुरु १६९प्रसाद ॥ १७०रहित रहे पद परखिके, जिव से होय
१७१अंवाद ॥ ३१ ॥ मूल रमैनी सम्पूर्णा ॥ कठिन शब्द जेते रहे,
टिप्पणी करि बनाय ॥ बाकी अब कछु होय जो दीजो संत
जनाय ॥ १ ॥ गुरुथल १७२हौता जानिये, १७३शिवहर जन्म स्थान॥
युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ २ ॥
१६८ जहांसे ॥ १६९ दया, कृपा ॥ १७० अलग ॥ १७१ वाद
रहित ॥ . १७२ जिला सारन डा० घ० कुवाहकोटकें इलाकेमें और
हथुआसें पांच कोस उत्तर पर है ॥ १७४ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें
राजस्थान हैं ।
इति श्रीमूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधिता समाप्ता ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाणा—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेंकटेश्वर ” ( स्टीम् ) यन्त्रालय-बम्बई.

सत्यनाम
बीजक कबीरदास ।
अथ आदिमंगल ।
दोहा—प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि बिधि उपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
तवसतगुरु मुखबोलिया, सुकृतसुनोसुजान ॥
आदि अन्त की पारचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
प्रथमसुरति समरथ कियो, घटमें सहजउचार ॥
ताते जामन दीनिया , सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चितमनसातो कीन्ह ॥
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तवसमरथ के श्रवणते, मूलसुरति भै सार ॥
शब्द कला तातेभई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचै अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइ इच्छा तहँ गुप्तहैं, सो सुकृत चितचीन्ह ॥ ६ ॥

(२) बीजक कबीरदास ।
योगमया यकु कारणे, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
याअविगतिसमरथकरी, ताहिगुतकरिदीन्ह ॥ ७ ॥
श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड आंचित्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अंड शिखा पर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
ते अचिन्त के प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगै, देवी सुरति निरबान ॥
श्यामवरण यकअंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दशद्वारे कढ़ि वाप ॥ १४ ॥
तेहिते ज्योति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीनों देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारिखानितिनसिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशादै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥

आदिमंगल। ( ३ )
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥१८॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ॥
उत्पतिपरलयदुःखसुख, फिरिआवहिंफिरिजाहिं १९
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उतपती, सो तुमसों कहिदेत ॥२०॥
सात सुरति सवमूलहै, प्रलयहु इन्हीं माहिं ॥
इन्हीं मासे ऊपजे, इन्हीं माँह समाहिं ॥२१॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाइ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ॥२२॥
सात सुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥२३॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥२४॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥२५॥
वस्तुनिर्देशात्मक मंगल ।
दोहा-प्रथमै समरथ आपरहे, दूजा रहा न कोय ॥
दूजा केहिविधि उपजा, पूंछतहौं गुरुसोय ॥१॥
कबीरजीकी वाणीके अर्थ करिवेकों मोमें सामर्थ्य नहींरही परंतु साहब यह
विचारिकै कि कबीरजीके बीजकको पाखण्ड अर्थलगाइकै जीवबिगरे जाँयहैं सो

साहब तो परमदयालु हैं उन कों करुणाभई तब कबीरजीको भेज्यो याकहि कै
कि आगे हम तुमको भेज्यो हतो सो तुम ग्रन्थबनाइकै बहुत जीवनको उप-
देशकरिकै उद्धार कियो सो अब तिहारे ग्रन्थको पाखंड अर्थकरिकै पाखंडी हैं
कै जीव बिगरे जायँ हैं औ बहुत बिगरिगये सो तुमनाइकै जौन अर्थ तुम बीज-
कमें राख्योहै सो अर्थ विश्वनाथ सों बनवावो जाते सो अर्थ समुझिकै जीव
हमारे पास आवैं सो कबीरजी आयकै मोसों कह्यो कि तुम बीजकको अर्थ
बनावो हम तुमको बतावेंगे सो उनके हुकुमते मैं बीजकको अर्थ बनाउं हौं
बतावने वाले श्रीकबीरहीजी हैं मोमें ताक़त नहीं है जो मैं बनायसकौं और ना-
भाजी भक्तमालमें लिख्योहै कि “कबीर कानि राखी नहीं बरणाश्रम षटदरशनी”
सो इहां कबीरजी को सिद्दात मत मैं कहौंगो औ सर्वसिद्धांतग्रंथ जो मैं बनायोहै
तामें सबको सिद्धांत यथार्थ राख्योहै सो यहां बीजकके तिलक में साहबको औ
कबीरजीको हुकुम यहीहै कि एक सिद्धांत रहै जो सबतेपरैहै और सिद्धांत सबखंडन
हैजायँ सो सबके सिद्धांतनको खण्डन करिकै एक सिद्दात मैं वर्णन करौंहौं सों
सुनिकै साहब के हुकुमी जानिकै साधुलोग पंडितलोग और और मत वाले जेहैं
ते मेरे ऊपर खफा न होयँ प्रसन्न रहैं ना समुझिपरै तौ प्रसन्नहोइकै गुरुसों पूँछि-
लेइँ अब अर्थ लिखैहैं ।
अर्थ-प्रथम समरथ जे श्रीरामचन्द्रहैं ते आपही हैं दूसरा कोई नहीं
रह्यो जो कहौ उनके लोक में तौ हंस हंसिनी सब वर्णन करैहैं उनके
पार्षद सबहैं ताको वर्णन निर्भय ज्ञानमें विस्तारते हैं सो इहां संक्षेप तें
सूचित किये देई हैं ॥ “सत्य पुरुष निर्भय निरबानां । निर्भय हंस तहँ
निर्भयज्ञाना ॥ ” इत्यादिक बहुत वर्णन निर्भयज्ञानमें कबीरजी कियोहै तुम
एकही कैसे कहौ है सो सत्यहै उहांके जीवसनातन पार्षद बने रहैहैं औ साहब
औ साहबको लोक सनातन बनो रहैहैं परंतु उहांके पार्षदजीव और उहांकी
सब बस्तु साहबहीके रूपहै औ सब चिन्मयहै सो वेद कहैहैं ॥ श्लोक॥ “सच्चि-
दानन्दो भगवान् सच्चिदानन्दात्मिकास्यव्यक्तिः॥”औ वह अयोध्या नगरी ब्रह्मके
परैहै ब्रह्म वाको प्रकाशहै औ रघुनाथजी के समीप के जे पार्षद हैं ते साहबकें
स्वरूपहैं तामें प्रमाण ॥ “ अयोध्यापरंब्रह्म सरयू सगुणःपुमान् ॥ तन्निवासी-
जगन्नाथः सत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ १॥ अयोध्यानगरीनित्यासच्चिदानन्दरूपिणी ॥

आदिमंगल । ( ५ )
यदंशांशेनगोलोकः वैकुण्ठस्थःप्रतिष्ठितः ॥ २ ॥” इति वसिष्ठसंहितायाम् ॥
‘‘ देवानांपूरयोध्या तस्यांहिरण्मयः कोशः स्वर्गेलोकोज्योतिषावृतः ’’ इतिश्रुतेः॥
सो इहां कहैंहैं कि प्रथमतौ समर्थ साहब वह लोक में आपही आपहै दूजा कोई
नहीं रह्यो दूजा जो रह्यो सो तौ साहबके लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें रह्योहै
सो कबीरजीते धर्मदास कहे हैं कि हे गुरुजी मैं तुमसे पूछौंहौं कि साहबकें
लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें जो समष्टि जीव वह दूजारह्यो सो केहिविधितें
उपज्यो संसारी भयो काहेतें कि साहबतो दयालुहैं जीवों को संसारते छुड़ाइदे-
इहैं जीवोंको संसारी नहीं करिदेइहैं औ वह समष्टि जीवके तब मनादिक नहीं
रहे शुद्धरह्योहै उपजिबे की सामर्थ्य नहीं रहीहै औ साहब सामर्थ्य दैके जीवोंकों
संसारी करबही नकरेंगे सो दूसरा जो है समष्टिजीव सो उपजिकै व्यष्टिरूप
संसारी केहि बिधित भयो औ जीवके अपने ते उपजिबे की सामर्थ्य नहींरही
तामेंप्रमाण ॥ ‘‘ कर्तृत्वंकरणत्वंचसुभावश्चेतनाधृतिः ॥ तत्मसादादिमे

( ६ ) बीजक कबीरदास ।
प्रथम समर्थजे साहब श्रीरामचन्द्रहैं साकेत निवासी दयालु जिनके लोकके
प्रकाशमें समष्टिरूपते यह जीव है ते श्रीरामचन्द्र परमदयालु यह जीवको देखि-
कै कि कछू बस्तुकों याकों ज्ञान नहीं है जब यह जीवपर साहबकी दयाभई तब
सुरतिमात्र दैकै अपने जानिबेकों वाको समर्थ करतभये कि जब याकें सुरति-
हौयगी तब मोकोजानैगो मैं हंसस्वरूप दैकै अपनेलोक लैआउंगो । जहां मन-
मायां कालकीगतिनहींहै तहां सुखपावैगो अबैतो याको सुखको ज्ञानही नहीं है ।
यह करुणा करिकै वह समष्टिरूप जीवके घटमें सहजही सुरति को उच्चारकरत
भये कहे अंकुर करतभयें । सो साहबतो अपने जानिबेको सुरतिदियो कि मों-
कोजानै औ यह जीव वही सुरति कों पाइकै औ मनादिकन को कारण इनकें
रहंबई करै औ शुद्ध रहै दूधरहै जीव अपनी शुद्धता रूप दूधमें जगत्को कारण
बनोई रहै तामें वही सुरति को जामन दैदियो सो बिनशिगयो सो वह सुरति
पाइकै साहबकेपास तो न गयो जीव बिनशिकै इच्छादिक जे सात तिनको
बिस्तार करत भयो । औ यह चैतन्य जीवको सुरति दैकै साहब चैतन्य करैहै ।
साहब चैतन्यो को चैतन्यहै तामें प्रमाण श्लोक॥ “नित्योनित्यञ्चेतनश्चेतनानां।
द्रव्यंकर्मचकालश्चस्वभावोजीव एवच।यदनुग्रहतःसंतिनसंति यदुपेक्षया इति भाग-
वते॥”औ इच्छादिकन को कौन सात.बिस्तार करतभयो सो आगेकहैहैं ॥३॥
दोहा- दूजेघटइच्छाभई, चितमन सातौकीन्ह ॥
सातरूपनि रमाइया, अबिगतकाहुनचीन्ह ॥ ४ ॥
जब याकों साहब सुरति दीन तब जीवके जगत को कारणमें रामाज्ञान
बनोईरहै तेहिते सुरति साहबमें न लगायो जगत् मुख लगायो । जब सुरति
जगत् मुखलाग्यो तबप्रथम जगत्को कारण पुष्टभयो विनशिगयो तेहिते दूसर
इच्छा रूप अंकुरभयो तीसर चित्तभयो चौथमनभयो पांचौंबुद्धिभई छठौं अहंकार
भयो सातौं अहंब्रह्म कहेअनुभवते भयोजो ब्रह्म ताकोमान्यो कि मैंहींब्रह्महौं सों
शुद्धते अशुद्ध ह्वैकै सातबिस्तार करिकै समष्टिरूपजो जीव सो अहंब्रह्मास्मिमान्ये
तब याको अनुभव ब्रह्ममाया सबलित भयो, ताहीद्वारा जगत् उत्पन्न भयों,
ताहीद्वारा यहंजीवौ उत्पन्नभयो अर्थात् समष्टिरूप जीवको अनुमान जो ब्रह्म सों

आदिमंगल । (७)
इच्छा कियो एकते अनेकहोऊं सो वा अनुमान ब्रह्मसमष्टिजीवकोहै यहिहेतु तें
वहसमष्टिजीव एकतेअनेकहैगयो । औ फिरि वहसमष्टिरूपजीवको जो अनुमान
ब्रह्मसो बिचार्यो कि ई जे अशुद्धरूपजीवात्मा तिनमें प्रवेश कैकै नामरूपकरों
याही अर्थमें प्रमाणश्लोक ॥ “सदैवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं तदैक्षतबहुस्यां
अनेनजीवेनात्मनानुप्रविश्यनामरूपेव्याकरवाणित्यादिश्रुतयः॥” जो कहो वा सत्
ब्रह्मजीवको अनुमानकैसेकहौहौं ब्रह्महीसभयो ऐसोकाहेनहींकहौतौ ॥ “यतो
वाचोनिवर्त्तन्तेअप्राप्यमनसासहं ॥” इत्यादिक श्रुतिनकरिकैमनबचनकेपरेहैं सत्-
नाम कहनोवामें नहीं संभवितहै काहेते वो निर्विकारहै सविकार हैकै एकतें
अनेक हैजैबो नहीं सम्भवै या हेतुते यह समष्टि जीवही अपनो अनुमान रूप
धोखा ब्रह्मठाटकैकै माया सबलित हैकै तद् द्वारा जगत् उत्पन्नकैकै तद्द्वारा
आपों उत्पन्नहैके समष्टिते व्यष्टिहैगये । अविगति समर्थ जे साहब हैं
तिनको ना चीन्हत भये । यह संक्षेप सूक्ष्मरीतिते जो उत्पत्ति भई सो कहिदियो।
औ जब जीव साहब के जानिबे को समर्थ भयो तब जैसी उत्पत्ति भई है सो
कहैंहैं साहब जो सुरति दियो सोतौ अपने में लगायबेको दियो यह संसार में
लगायो परंतु जो संसारते खैंचिकै अजहूं सुरति सम्हारै साहब मेलगावै तो साहब
के हजूर आठौपहर बनोरहै अर्थात् साहबै सर्वत्र देखैपरै संसारदेखिही ना परै
तामें प्रमाण कबीर जी को साखी ॥ सुरति फँसी संसार में, तेहिसे परिगा-
दूर सुरति बांधि स्थिर करै, आठौपहर हजूर ॥ १ ॥ आगे जौनीतरह ते उत्प-
त्ति भई साहबको त्यागि संसारीभयो सुरति पाय काजकरिबेको समर्थभयो
तबहूं साहब सारशब्दको उपदेश दियोहै ताको साहबमुख अर्थ ना समुझिकै
संसारमुख अर्थ समुझिकै ब्रह्मकी कल्पना कैकै संसार को उत्पन्न कैकै संसारी
भयो है यह जीव सो आगे कहैंहैं ॥ ४ ॥
दोहा—तब समरथके श्रवणते, मूल सुरति भइसार ॥
शब्द कला ताते भई, पांच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
साहब को दियो सुरति पाइकै समरथ भयो जो समष्टि जीव ताके श्रवण
में मूलसुरति जो साहब अपने जानिबे को दियो है सो सार भई कहे रामनाम

( ८ ) बीजक कबीरदास ।
रूपते प्रकटभई साररामनामको कहैहैं तामेंप्रमाणसाखी कबीरजीकी ॥ रामैना-
मअहैनिजसारू । औसबझूठसकलसंसारू ॥ १ ॥ साहब जो सुरति दियोहै सो वह
सुरतिके चैतन्यताते नामसुन्यो अर्थात् साहबजो याको गोहरायो कि रामनाम-
को जपिकै विचारिकै मोकोजानो तो मैं हंसस्वरूप दैके अपने पास बुलाइलेउँ
सो सुनिकै रामनाममें जगत् मुख अर्थ है ताको ग्रहण कियो औ शब्दमें लगाइ
दियो । वही राम नाम लैके शब्दरुप बाणी उचरीहै सो कबीर जीकी रमैनी
में आगे लिख्योहै ॥ “ रामनामलै उचरी बाणी ” ॥ औ वही रामनाम
ते शब्द कलाबाणी होतभई सो पांच ब्रह्म के अनुहार हैं । पांच ब्रह्म कौनहैं ते
कहै हैं सोहं, ररंकार, ओंकार, अकार, पराशक्तिरूप र परम श्री कबीर
जी के भेदसारग्रन्थ को प्रमाण ॥ “ प्रथम शब्द सोहं जो कीन्हा । सबघट
माहीं ताकर चीन्हा ॥ ररंकार यक शब्द उचारी । ब्रह्मा विष्णु जपैं त्रिपुरा-
री ॥ ओंकार शब्द जो भयऊ । तिनसबही रचना करिलयऊ ॥ शब्दस्वरूप
निरंजन जाना । जिनयह कियो सकलबंधाना ॥ शब्दस्वरूपी शक्ति सो बोले ।
पुरुष अडोल न कबहुं बोले ॥ ५ ॥
दोहा-पांचौ पांचै अंडधरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइइच्छा तहँगुप्तहैं, सो सुकृतचितचीन्ह ॥ ६ ॥
ते पचहुंनको पांचअंडकहे पांचस्वरूप बनाइकै एकएकस्वरूपमें एक एक
अक्षर राखत भये औ दुइ इच्छाजे प्रथमकहिआयेहैं एक वह इच्छा कारणरूपा
जब साहब सुरति दियो है तब जो रहीहै साहब मुख- नहीं होनदिया याको
बिनशिकै जगत् मुख कियो औ दूसरी वह सुरति पाइकै जगत्मुख होइकै
अपने अनुभव ब्रह्मको खड़ाकियो वह ब्रह्म मायासबलित हैगई तौन माया
आदिशक्ति गायत्रीरूपा इच्छा । सो ये दोनों इच्छा पचहुंनमें गुप्तहै सो कबीर-
जी कहैहैं कि हे सुकृतचित्तमें चीन्हों मैं वर्णन करौहा बिचारिकै देखो ये पच-
हुंनमेंदोनों इच्छाहैं कि नहीं ? ये सिगरेब्रह्म जे सारशब्द के जगतमुख अर्थ
ते भये हैं ते माया सबलित हैं कि नहीं ? तुम चीन्हों सो आगे कहै हैं ॥ ६ ॥

आदिमंगल। (९)
दोहा-योग मया यकु कारनो, ऊजो अक्षर कीन्ह ॥
या अविगति समरथकरी, ताहि गुप्त करि दीन्ह॥७॥
कारण रूप सुरति औ योगमाया गायत्री ये जे दुइइच्छा हैं ते वे पांचों ब्र-
ह्माको करती भई सो सर्वत्र तो यह सुनै हैं कि ब्रह्मते सब होइ है औ यहांइन-
ते ब्रह्म होईहै पांचौ, यह बड़ो आश्चर्य है। यह अबिगति समर्थ जे परमपुरुष
श्री रामचन्द्र हैं ते जब सुरति दियो है तब ये सब भये हैं । तिनको गुप्त करि
दियो अर्थात् इन्हीं पांचौ ब्रह्ममें औ जीवमें नामको अर्थ लगाय दियो है तें
पचहुनको बतावैहै ॥ ७ ॥
दोहा-श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हों संत सुजान ॥ ८ ॥
यह सोहंशब्द वह परम पुरुष जो है समष्टिजीव ताके श्वासाते उपज्यो
सोई बतावैहै कि, "सोहं कहे सः अहं सो जौह अनुभवगम्यब्रह्मसो मैंहौं" औ
वही आदिपुरुष समष्टि जीव श्वासा ते अमीबंधन करतभयो कि इनकी मिठाई
पाइकै लोग लोभायजायँ कौन अमी बंधान करत भयो वही श्वासाते आठअंश बना-
वतभये, कहेआठौ सिद्धि निकासतभये आठौ सिद्धिकेनाम ॥ "अणिमामहिमा
चैव गरिमालघिमातथा । प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वंवशित्वंचाष्टसिद्धयः ॥"
अथवाआठअंश निरमाइया कहे आठ प्रधान ईश्वर प्रकटकियो तेई परम पुरुष
समष्टि जीवके मंत्रीभये। तामेंप्रमाण महातंत्रमें महादेवको बाक्य ॥ "काली-
च्चकौशिकीविष्णुः सूर्योहेंगणनायकः" ॥ "ब्रह्माचभैरक्योबई छबराइति कीर्ति-
ताः १ यह प्रमाण शतानन्दभाष्य में विस्तार कैकैहै सो हेसंतसुजानौ तुम
चीन्हत जाउ वह जोसार शब्द रामनामहै सो साहब समष्टि जीव पुरुषको
बतायो सो सुंन्यो औ साहबको न जान्यो धोखाब्रह्मरूप आपहैकै वाको औरई
जगद्रूप अर्थ निकालिलियो । औ वह जो सोहं शब्द प्रकटभयो सो संकर्षणहै
काहेते कि, सोहंशब्द जीवमें घटित होईहै कि, वह जीव जौहै सोई बिचारकरै
है कि, सो जौहै ब्रह्म सो अहंकहे महीं हैं एक और दूसरो कोई नहीं है।

( १० ) बीजक कबीरदास ।
सो उन्हीं को आदिपुरुष औ बिराट् औ हिरण्यगर्भ कहैहैं औ सहस्रशीर्षापुरुष
कहैहैं । औ ई समष्टिरूपजीव पुरुषहै सोवही समष्टिरूपते संकर्षण स्थूलरूप
धारणकारिकै प्रकट भयो । “सबको आकर्षण करिकै एकह्वैरहै ताकोसंकर्षण-
कही समष्टि जीव” काहेते महाप्रलयमें जबजीव समष्टिजीवमें रहे हैं औव्यंजन
मकार पचीसौंबर्णहैं सोजीव बाचकहै ताको अर्थ समष्टिजीवरूप संकर्षण समुझ्यो
औ रामनामकी जो मकार है सोतौ बर्णातीतहै पचीसौ वर्ण नहीं है । रामनामके
व्यंजन मकार में संकर्षणके अंशी जे हैं लक्ष्मण तिनको अर्थ न समुझ्यो
वहांपांच ब्रह्म कहि आयें हैं सो इहां एकब्रह्मकी औ रामनामके एकमात्रराकी
प्राकट्य भई ॥ ८ ॥
दोहा-तेजअण्ड आचिन्त्यका, दीन्होसकलपसार ॥
अण्डशिखापर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
अचिन्त्यजो है रामनाम ताकोतेज अंडजोहै रामनामको रेफ तौने रेफकों
अर्थलैकै सर्वत्र पसराइ दियो अर्थात् रेफ अर्धमात्रा को अर्थ पराआद्याशक्ति
ब्रह्मस्वरूपासमुझ्यो सोसब जगत्मेंपसराइदियो वहीमाया ते संपूर्ण जगत् होतं
भयो सो वह पराआद्या शक्ति अंडजोहै ब्रह्मांड ताकी शिखापर बैठिकै अधरदीप
कहे नीचे के ब्रह्मांडनको निरधारकहे प्रकाशकारिकै निर्माण करत भई सो
वहीको योगीलोग ब्रह्मांडमें प्राण चढाइकै वही ब्रह्म ज्योति को ध्यानकरैं हैं
औ वही ज्योति में जीवको मिलावैहैं । औ रेफ पद वाच्य ते श्री जानकी जी हैं
सो अर्थ न समुझ्यो इहां दूसरे ब्रह्मकी प्राकट्य भई ॥ ६ ॥
दोहा-ते अचिन्त्यके प्रेमते, उपज्यो अक्षर सार ॥
चारिअंशनिरमाइया, चारिवेदविस्तार ॥ १० ॥
तौन जो अचिन्त्यरामनाम ताकेप्रेमते कहे जब वामें प्रेमकियो कि याको समुझै कहा
है तब रामनाममें जो है रकार तेहिमें जोहै लघुअकार तौनेके शक्तिहू अक्षर सार जो है,
रामनामसो प्रणवरूपते प्रकटहोतभयो ताहीको शब्दब्रह्मरूप करिकै समुझतभयें
तौनेप्रणवकीचारि मात्राहै आकार उकार मकार बिंदुते एकएक मात्रा ते एकएक