कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) रमैनी ।
कामिनी पहिर पिया सों राँ१५५ची ॥ कहैं १५६कबीर भव बूड़त
बांची ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ भव बूड़त बेड़ौ१५७ भगवान ॥ चढ़े
धाये लागी लौ ज्ञान ॥ थाह न पावे कहे अथाह ॥
डोलत करत तराहि तराह ॥ सूझ परे नहिं वार न पार ॥
कहै अपार रहे मैंझधार ॥ मांझधारमें किया विवेक॥कहां के
दूजा कहांके एक ॥ बेरा आपु आपु अवधार ॥ आपै उतरन
चाहेपार ॥ बिन जाने जाने है और॥आपै राम रमैसब ठौर॥
बार पार ना जाने जोर ॥ कहै कबीर पार है ठौर ॥ २४ ॥
रमैनी ॥ अक्षर खानी अक्षर वानी ॥अक्षर ते अक्षरउतपानी
अक्षर करता आदि प्रकास ॥ ताते अक्षर जगत विलास ॥
अक्षर ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ अक्षर रज सत तम उपदेश ॥
छिति जलपावक मरुत अकाशा॥ये सब अक्षर मो परकाशा ॥
दश औतार सो अक्षर माया ॥ अक्षरनिर्गुणब्रह्मानिकाया ॥
अक्षर काल संधि अरु झांई ॥ अक्षर १५९दहिने अक्षर १६०बाँई ॥
अक्षर आगे करे पुकार ॥ अँटके नर नहिं उतरे पार ॥
गुरुकृपा निजैं१६१ उदैयविचार१६२ ॥ जानिपरी तब गुरुमत-
सार ॥ साक्षी ॥ जहां ओसको लेश नही, बूडे सकल
जहांन ॥ गुरु कृपानिज परखबल, तब ताको पहि-
चान ॥ २७ ॥ रमैनी ॥ अक्षर काया अक्षर माया ॥ अक्षर
सतगुरु भेद बताया ॥ अक्षर यन्त्र मन्त्र अरु पूजा ॥ अक्षर
ध्यान धरावत दूजा ॥ अक्षर पढि २ जगत भुलान ॥ अक्षर
बिनु नहिं पावै ज्ञान ॥ बिन अक्षर नहिं पावे गैती१६३ ॥ अक्षर
१५५ लगी ॥ १५६ गुरू ॥ १५७ नाव किश्ती ॥ १५८ बीच
धारमें ॥ १५९ दक्षिण पंथ ॥ १६० वाममार्ग ॥ १६१ अपना ॥ १६२ प्रकाश ॥
१६३ मुक्ति ॥