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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

संभव भई, महाकाश सो शेष २१ ॥ साक्षी ॥ झांईंसंभवबुद्धि
ले, करीकल्पना अनेक ॥ सोपरकाशक जानिये, ईश्वरसाक्षी
एक ॥ साक्षी ॥ बिषमभईंशंकल्प जब, तदाकारसोरूप ॥ महा
अंधेरीकालसो, परेअविद्या कूप ॥ साक्षी ॥ महातत्व
त्रीगुणपांच तत्व, सैमष्टि ११७ व्यैष्टि ११३ परमान ॥ दोय प्रकार होयप्र-
गटे, ११९खंड १२०अखंडसोजान ॥ २२ ॥ रमैनी ॥ सदा अस्ति १२१भा
से निजभास ॥ सोईकहियेपरम प्रकाश ॥ परमप्रकाशले झां-
ईं होय ॥ महदअकाश होयबरते सोय॥बरतेवर्त मानपरचंड॥
१२२भासक तुरियातीतअखंड ॥ कालसंधिहोये उश्वास ॥ आगे
पीछे अनवनि भास ॥ विविधि भावना कल्पित रूप ॥ परका-
शी सोसाक्षि अनूप ॥ शून्य अज्ञान सुषुप्तिहोय ॥ अकुलाहट
ते नादै सोय ॥ (शून्य ज्ञान सुषुप्ती होय ॥ अकुलाहटसे नादी
सोय ) ॥ नादवेद अकर्षण जान ॥ तेजनीर प्रगटे तेहिआन ॥
पानी पवन गांठि परिजाय ॥ देही देह धरे जग आय ॥ सो
कौआर शब्द परचंड ॥ बहुव्यवहार खण्डब्रह्माण्ड ॥ साक्षी ॥
जतन भये निज अर्थ को, जेहि छूटे दुख भूरि १२३॥ धूर परी
जब आंखमें, सूझे किमि निजसूर ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ पांजी
परख जबै फरिआवै ॥ तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द
सुधारिके रहे अकरम ॥ स्वाती भक्ति के खोटे भरम ॥ काल
जाल जो लखि नहिं आवै ॥ तौलौ निजपद नहीं पावै ॥
झांई संधि काल पहिचान ॥ शार शब्द बिनु गुरु नहिं-
जान ॥ परखे रूप अवस्था जाए ॥ आन विचार न ताहि
समाए॥ १२४झांईं संधि शब्दले परखे जोय॥संशय वाकेरहै न कोय॥
११७ समूह जैसे बन ॥ ११३ एक जैसे एक वृक्ष ॥ ११९ अंस
॥ १२० पूर्ण ॥ १२१ सत्य ॥ १२२ अध्यास का कराने वाला ॥
१२३ ढेर्र समूह ॥ १२४ वेदांत ॥