कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ३५४ ) बीजक कबीरदास ।
जौन तू धोखाब्रह्म सर्वत्र पूर्ण मानै है सो तेरी यह पेखनी नटवत बाजी
पेखनी है अर्थात् झूठहै बाजीगरकी बानी है अर्थात् सांच असांच देखावै असांच
सांच देखावैहै सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतो ! सुनो उनको राजाविराजी ह्वै
गई कहै सर्वत्र पूर्ण सत्य जे साहबहैं ते उनको नहीं जानिपरैहैं वही धोखाब्रह्म
में लगे हैं असत्यही सर्वत्र देखे हैं मनमाया को राज हैरहो है साहबको राज्य
नहीं है ॥ ६ ॥
इति चौहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ पचहत्तरवां शब्द ॥ ७५ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषाको नारी ॥ १ ॥
माटीको घट साज बनाया नादे बिंदु समाना ।
घट बिनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना॥२॥
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद यक मुद्रा ।
एक बिंदुते सृष्टि रच्योहै को ब्राह्मणको शुद्रा ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहै कबीर राम रमि रहिया हिन्दू तुरुक न कोई ॥ ४ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषा को नारी ॥ १ ॥
ऐसो कहै यहितरहते जैसो आगे कहै हैं तैसो चिन्मात्र जीव को बिगारिबों
भर्मते बहुत भारी है काहेते कि भर्म ते दुबिधा कहिकै वह सार पदार्थ को
न जान्यो हिन्दू मुसल्मान दोऊ बिगरिगये हिन्दू वेद की राहते नाना मत
बनाय लेतभये औ मुसल्मान किताबनकी शरा लैके नाना मत दूसरो दीनकों
खड़ा करत भये हिन्दू नरक स्वर्ग मुसल्मान बिहिश्त दोज़ख़ कहतभये जों
शब्द । ( ३५५ )
वेद किताबकें तात्पर्यते देखौ तौ न कोई पुरुष जानिपरै न नारी जानिपरै सों
जब पुरुषही नारीको भेद नहीं है तौ हिन्दू मुसल्मान कैसे भेद भयो ॥ १ ॥
माटी को घट साज बनाया नादे विंदु समाना ।
घट विनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना २
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद् यक मुद्रा ।
एक विंदुते सृष्टि रच्यो है को ब्राह्मण को शूद्रा ॥ ३ ॥
नाभीके तरे जो दश आंगुरकी ज्योतिहै औ तौनेमें जब प्राण बायुको
संयोग होइहै तब नाद उठै है तामें बिंदु समाइगयो तब माटीको घट यह
पिंडभयो ताहीको नाम धरावैहै जब याको घट बिनशिगयो कहे शरीर छूटि-
गयो तब याको क्या नाम धरोगे अर्थात् नामरूप याके सब मिथ्या हैं अहमक
जो है जीव सो नाम रूपके खोजनमें भुलाइ गयो ये सब जीवात्मा के नाम रूप
नहीं हैं ॥ २ ॥ सो एकै हाड़ादिकनते औ एकै बिंदुते कहे वीर्य ते सकल
सृष्टि भई है काको हिन्दू कहैं काको मुसल्मानकहैं काको ब्राह्मण कहैं काकों
शूद्रकहैं शरीरमें यही साज सबकैं हैं अरु वेदमैं कर्म किताब में शरायंही तें
नानाभेद लगे हैं जो विचारिकै देखो तौ नाम रूपहीको भेद लगि रह्यो है
आत्मा तो सबको चितही है औ मांस चाम सबके पांचभौतिकही हैं अब जे
गुणाभिमानी हैं तिनको कहैं हैं ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहैं कबीर राम रमि रहिया हिंदू तुरुक न कोई ॥४॥
वही नाम रूप के भेदते ब्रह्मा रजोगुणी शंकर तमो गुणी विष्णु सतोगुणी
भये औ वही नामके भेदते मुसल्मानमें इनहीं को अजाजील मैकाइल इजराईल
कबीरजी कहै हैं कि येतो सबनाम रूपके भेदहैं इनको सबको आत्मा एकई है
तिनमें अंतर्यामी रूपते मनवचनके परे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रई रमि रहे
हैं । जो कहो राम नामौ तौ नाममें आवै है तौ रामको नाम मन वचनमें
नहीं आवै है आपही स्फुरित होइहै तेहिते नामत्व नहीं है अरु श्रीरामचन्द्र
( ३५६ ) बीजक कबीरदास ।
निर्गुण सगुणके परे हैं तिनको जानै औ जो आत्मा नाम रूपते भिन्नहै न हिन्दू है
न तुरुक है तामें येई राम रमि रहे हैं या हेतुते सबको आत्मा इन्हींको दासहै
तेहिते इन्हींको जो जाने सोई मुक होइहै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र निर्गुण
सगुणके परे हैं तिनहींको राम नाम जाने मुक्ति होइ है तामें प्रमाण ॥
“रामके नामते पिंड ब्रह्मांड सब रामका नाम सुनि भर्म मानी । निर्गुण निरा-
कार के पार परब्रह्महै तासुका नाम रंकार जानी । विष्णु पूजाकरैं ध्यान शंकर
धरैं भनैं सुबिरंचि बहु बिबिध बानी । कहै कबीर कोइ पार पावै नहीं रामका
नाम अकह कहानी” ॥ ४ ॥
इति पचहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ छिहत्तरवां शब्द ॥ ७६ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकि मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो ।
ऐसेहि मद गज फटिकशिलापर दशननि अनिअरो॥२॥
मर्कट मुठी स्वाद ना बिहुरै घर घर नटत फिरो ॥
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकिं मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो
ऐसेहि मद गज फटिक शिलापर दशननि आनि अरोर
अपनपौ कहे आपने जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र हैं तिनको आपही तें
यह जीव बिसरि गयो जैसे कूकुर कांचके मंदिरमें आपनो रूप देखि देखि
भर्मते भूँकि भूँकि मरैहै ॥ १ ॥ अरु जैसे केहरि कूपके जलमें अपनी प्रतिमा
शब्द । ( ३५७ )
देखिकै कूदि परैहै अरु ऐसेही प्रतिबिंब देखि स्फटिक शिलामें हाथी दांत
टोरि डारैहै ॥ २ ॥
मर्कट मुठी स्वाद न विहुरै घर घर नटत फिरो
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अरु जैसे मर्कट मूठीमें जेहि दाना ताके स्वादके लिये फँसि गये बाजी-
गरके साथ नाचत वाँगैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि जैसे इनके सबके भ्रम
होइहै तैसे हे जीव तैंही सब कल्पना करिलियो है अपनी कल्पनाने तोहींको
भ्रम होइहै नाना उपासना नाना ठाकुर खोजत फिरैहैं। विचारिकै देख तौ जब
तेरे कल्पना नहीरही तबते शुद्ध रहैहै जैसे सुवा ललनीको पकरि लेइहै तैसे
तैंही ये सब कल्पना करिकै कल्पनामें बँधोहै जैसे सुवा ललनी को जो छेड़ि-
देइ तौ वृक्षमें पहुंचै जाइ तैसे तैंहूं जो कल्पनाको छोड़िदेइ तौ तोको कौन
पकरयोहै।परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र के पास पहुंचै जाइ जब सब कल्पना छोड़ि
शुद्ध है जाइ है तब साहब अपनो विग्रह देइहै तामें स्थितहै साहबके लोकको
जाइहै तामें प्रमाण॥ "आदत्ते हरिहस्तेन हरिपादेन गच्छति" इतिस्मृतिः॥ अरु
श्रीकबीरऊ जी को मंगल प्रमाण ॥ " चलो सखी बैकुण्ठ बिष्णु माया
जहां चारिउ मुक्ति निदान परम पद लेतहां ॥ आगे शून्य स्वरूप अलख नहिं
लाखि परै । तत्त्व निरंजन जान भरम जनि जनि चितधरै ॥ आगे है भगवंत
तो अक्षर नाउँहै । तौन मिटावै कोटि बनावै ठाउँहै ॥ आगे सिंधु बलंद
महा गहिरो जहां । कोनैया लैजाय उतौरै को तहां ॥ कर अजपाकी नाव तो
सुरति उतारैहै । लेइहौं अज्जरनाउँ तो हंस उबारिहै ॥ पार उतर पुरुषोत्तम
पैरख्यो जानहै । तहँवां धाम अखंड तो पद निर्वान है ॥ तहँ नहिं चाहत
मुक्ति तो पद डारे फिरै । सुरत सनेही हंस निरंतर उचरै ॥ बारह मास
बसंत अमर लीला जहां । कहैं कबीर बिचारि अटल है रहुतहां " ॥ ३ ॥
इति छिहत्तरवां शब्द समाप्त ।
( ३५८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सतहत्तरवां शब्द ॥ ७७ ॥
आपन आश किये बहु तेरा। काहु न मर्म पाव हरि केरा ॥१॥
इन्द्री कहां करै विश्राम । सो कहँ गये जो कहते राम ॥२॥
सो कहँ गये होत अज्ञान।होय मृतक वहि पदहि समान॥३॥
रामानंद् राम रस छाके।कह कबीर हम कहि कहिथाके॥४॥
आपन आश किये बहुतेरा । काहु न मर्म पाव हरि केरा ॥१॥
आपने स्वरूपके चीन्हिबे की बहुतेरा कहे बहुत आशकिये कि हमारों
आत्मै सबको मालिकह यहीके जानेते हम मुक्त ह्वै जाइँगे परन्तु मुक्त न भये
अरु हरि जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र सबकें कलेश हरनवारे हैं तिनकों
मर्म न पायो अर्थात् उनको कोई न चीन्ह्यो ॥ १ ॥
इंद्री कहांकरै विश्राम । सो कहँगये जो कहते राम॥२॥
अरु यह कोई नहीं विचार करै है कि इन्द्री कहा बिश्राम करै है काहेतें
कि इन्द्रीके जे देवता हैं तिनते समेत इन्द्रीतो मनते चैतन्य हैं औ मन जीवात्मा
ते चैतन्यहै औ जीवात्मा परमपुरुषपर श्रीरामचंद्र के प्रकाशते चैतन्य है सो
जे आपने स्वरूपको बिचार करै हैं कि महीं रामहौं ते वे रामभर कहांगये अर्थात्
नहीं गये ब्रह्ममें समान रहे अरु एक एकते चैतन्यहै तामें श्रीगोसाई तुलसीदास
को प्रमाण ॥ ‘‘ बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एकते एक सचेता ॥
सबकर परम प्रकाशक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ जगत प्रकाश
प्रकाशक रामू । मायाधीश ज्ञान गुणधामू ’’ ॥ २ ॥
सो कहँगये होत अज्ञान । होय मृतक यहि पदहि समान॥३॥
रामानंद राम रसछाके। कह कबीर हम कहि कहि थाके॥४॥
जीव ब्रह्ममें समान रह्यो शुद्ध रह्यो जब मनकी उत्पत्ति भई अज्ञान भयो सों
कहांगयो अर्थात् तब मृतक ह्वैकै आपने स्वरूपको भुलायकै यहि पदहि कहे यहि
संसारमें समान॥ ३॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि हम चारों युगमें कहि कहि थकिगये
शब्द । ( ३५९ )
कि रामानंद जेहैं तेई राम कें रसमें छके हैं अरु तेई परमपुरुषपर श्रीरामचंद्रके
धामको गये हैं और कोई नहीं परम मुक्ति पाई है तुमहूं रामानंद होतजाउ
अर्थात् तुमहूं रामहींते आनंद मानतजाउ यह हम चारोंयुग में सबको समझा-
यो परंतु कोई हमारो कह्यो न मान्यो राममें आनंद कोई न मान्यो सब वही
माया ब्रह्ममें लगिकै संसारी होतभयो ॥ ४ ॥
इति सतहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ अठहत्तरवां शब्द ॥ ७८ ॥
अब हम जाना हो हरि बाजीको खेल ।
डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ १ ॥
हरि बाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया ।
घरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ २ ॥
बाजी झूठ बाजीगर सांचा साधुनकी मति ऐसी ।
कह कबीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी ॥ ३ ॥
अब हम जाना हो हरि बाजी को खेल ।
डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ १ ॥
हेहरि ! हे साहब ! संसाररूप बाजीके खेलको हेतु अब हम जान्यो । अब जो
कह्यो तामें धुनि यहहैं कि, तब यह विचारत रहे कि साहब तो दयालुहै शुद्धजी-
वको संसार रचि अशुद्ध काहे करिदिये यह शंका रही सो अब जब छूटी तब
साहबको हेतु जान्यो साहब जो सुरति दियो सो अपनेपास लिवाय सुखलिये
डङ्क बजाय कहे रामनाम शब्द सुनायकै तमाशा देखाय कहे जगत् मुख अर्थ
द्वार संसार तमाशा देखायकै बहुरि सो लेत सकेल कहे जो कोई जीव साहब
के सम्मुख भयो ताको साहब मुख अर्थ बताइकै चित अचितरूप विग्रह जगत्
खायकै संसार सकेलि लेय है अर्थात् संसार देखि नहीं परै ॥ १ ॥
( ३६० ) बीजक कबीरदास ।
हरिवाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया ।
घरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ २ ॥
वाजी झूठ वाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी
कह कबीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी॥३॥
हरि जे साहब तिनकी बाजी जोसंसार तामें साहबको हेतु न जानिकै सुर-
नर मुनि जे हैं ते रामनामको संसार मुख अर्थ करिकै मायाके चेटकमें जहँडि-
गये अर्थात् भूलिगये सो माया इनको घर जो संसार तामें डारिकै भरमायदियो
हृदयमें ज्ञान न होतभयो तौन हम जान्यो साहब सुरतिदियो तैं अपने पास बोला-
वैको सो या जीव आपहीते संसार बाजीरचि भूलिगयो॥२॥ बाजी जो संसार सो झूठ
बाजीगर जो जीव सो सांचहै सो साधुनकी मति तो ऐसी है और जे सबहैं बद्धजीव
ते जैसे समुझिनि है ताकी तैसी ही गति भई है सो गतिहू सब अनित्य है ॥३॥
इति अठहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्नासीवां शब्द ॥ ७९ ॥
कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतनहारे चेतु सुभागा ॥ १ ॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा ॥ २ ॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं।सोतो आहि अमर पद माहीं ३॥
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४॥
कहो हो अम्बर कासों लागा। चेतन हारे चेतुं सुभागा॥ १॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा॥२॥
तैंतों सुभागाहै साहब कोहै तैं काहे मन माया ब्रह्ममें लगिकै अभागा ह्वैरहैहै
चेत करनवारे तैं चेत तोकरु अंबर जो है लोक प्रकाश रूप ब्रह्म सो कहां
लागाहै अर्थात् वह काको प्रकाशहै वह साहब साहबके लोकको प्रकाशहै चेततों
करु ॥ १ ॥ वह अम्बर जोहै लोक प्रकाश ब्रह्म तामें तारा देखाइहै कहैं
शब्द । ( ३६१ )
जबतें उहां अहं ब्रह्म बुद्धि करै है, तबहीं जगवरूप तारा उत्पत्ति होइहै तौनेही
जगत्में एक गुरु होइहै सो चेतावैहै अरु एक शिष्य होइहै सो चेतकरैहै ॥२॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं। सोतो आहि अमर पद माहीं ४
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४
सो ज्यहि आपने स्वरूपको तें खोजै है कि मैं आपने स्वरूपको जानिकै मुक्त
हैजाउँ सो उहां वागुरुवनको ज्ञानमें नहीं है औ न वह लोक प्रकाशमें है काहेते
कि जे जे देवनमें वे लगावैंहैं तेई अमर नहीं हैं तौ तोको कहां मुक्ति करेंगे
अरु महा प्रलयमें जब लोक प्रकाशमें लीन होइहै तब उहौंते उत्पत्ति होइहै
तेहिते उहाँ गये अमर नहीं होइहैं तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर नहीं होइहै
तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर पदमें है साहबको अंशहै साहबको जानिले तौ
अमर हैजाइ ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि यह अमरपद आपनो स्वरूप कोई
बिरला बूझैहै कौन जाके सम अधिक नहींहै ऐसो जो है एक रामनाम सो जाके
मुखहृदय में होइहै सोई बूझैहै ॥ ४ ॥
इति उन्नासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अस्सीवां शब्द ॥ ८० ॥
बन्दे करि ले आप निबेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अन्त कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतो कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥
बन्दे करि ले आप निवेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अंत कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥
( ३६२ ) बीजक कबीरदास ।
हे बंदे अपनेमें तो निबेरा करिलै अपने जियत अपना ठौरं तौ करु मुयेते
तेरा घर कहाहै अर्थात् जो सत् असत् कर्म करैगो सो सब नरक स्वर्गादिकनमें
भोग करैगो तेतो कर्मके घरहैं तेरे घर नहींहैं औ जो ज्ञान करिकै आपने कों
ब्रह्म मानिकै ब्रह्म प्रकाशमें हैकै शुद्ध जीवन कहैगो सो ब्रह्म होनातौ धोखाहै
जब फेरि उत्पत्ति समय होइगो तब माया धरि लै आवैगी पुनि संसारी हैजाइगो
अरु और और देवतनकी उपासना करिकै उनके लोक जाइ जो तेऊ तेरे घर
नहींहैं जब माया धरि लै आवैगी तब संसारी हैजाइगो जब मरैगो औ ये घरनमें
जाइगो तब बिचार करनेकी सुधि न रहि जाइगी तेहिते जीतही आपनो घर
बिचारु तेरो घर वहहै जहांके गये फिरि न आवै सो तैं साहबको अंशहै सो साहब-
के पास घर करु कहे ठौर करु जाते फिरि न संसारमें आवै ॥१॥ सो कबीरजी
कहैहैं कि हे प्राणियु यहि अवसरमें कहे मनुष्य शरीर में जो साहबको नहीं
जानौहौ तौ हे संतौ ! सुनौ तुमको अंतकालमें यह कठिन जो कालको घेराहै ताते
कौन बचावैगो अर्थात् जहां जहां जाहुगे तहां तहांते काल तोको खाइ
लेइगो साहब बचावनवारे खड़े हैं ताको प्रमाण आगे लिखिही आये हैं ॥
“अजहूं लेहुं छुड़ाइ कालसों जो घट सुरति सँभारै” सो साहबको जानिकै साह-
बके पास जाय जनन मरण छूटि जाय ॥ २ ॥
इति अस्सीवां शब्द समाप्त ।
अथ इक्यासीवां शब्द ॥ ८१ ॥
तूतो ररा ममा की भांति हौ संत उधारन चूनरी ॥ १॥
बाल्मीकि बन वोइया चूनिलिया शुकदेव ।
कर्म बिनौरा ह्वैरह्यो सुत कातै जयदेव ॥ २ ॥
तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश।
नाम लेतैं मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ ३ ॥
शब्द । ( ३६३ )
जिन जिह्वा गुण गाया विन वस्तीका गेह ।
सूने घरका पाहुना तासों लावै नेह ॥ ४ ॥
चारि वेद केंडा कियो निराकार कियरास ।
बिनै कबीरा चूनरी पहिरैं हरिके दास ॥ ५ ॥
तूतो ररा ममा की भांति हौ संत उधारन चूनरी ॥ १ ॥
जो तुम मनमाया ब्रह्ममें लगि रह्योहै सो तुम इनके नहीं हौ तुमतो ररा
ममा की भांतिहौ अर्थात् राम जो मैंहौं तिनकी भांतिहौ जैसे मैं विष्णु चैतन्य
हौं तैसे तुम अणु चैतन्यहौ मेरे अंशहौ सो मेरो जो रामनामहै ताको उधार-
न नामकी चुनरी कबीरसंत मेरो बनायो है । यही रकार बीज मों मकारहू है
यहि हेतुते साहब रकारहीको कहै हैं अर्थात् जब राम नाममें जपोगे तब यह
जानि जाहुगे कि मकार मेरो स्वरूपहै रकार साहबको स्वरूप है औ कबीर
संत असार जो है जगतमुख अर्थ ताको त्यागिकै सार जो है साहबमुख अर्थ
ताको ग्रहण करिकै चूनरी बनाई है सो कहैहैं ॥ १ ॥
वाल्मीकि वन बोइया चूनि लिया शुकदेव ।
कर्म बेनौरा है रह्यो सुत कातै जयदेव ॥ २ ॥
माटीको है बहुत छिद्रहैं याते शरीर बल्मीक कहे बेमौरी है तामें जो रहै
सो वाल्मीकि कहावै सो वाल्मीकि आत्मा है सो वाणी रूपी जो वन कहे कपा
सहै ताको बोवत भयो अर्थात् वहीकी इच्छा शक्ति भई है। औ शुच शोके धातु
है तेहिते शुक शब्द होइहै-ताको जो देव होइ सो शुकदेव कहावै है।
सो शोच मनके होइ है अर्थात् सङ्कल्प बिकल्य मनके होइ है सो
शुकदेव मन है । सों आत्माते जो बाणीरूपी कपासके ढेढ़ाको अनुसार
भयो ताको चुनि लियो अर्थात् बाणी मनै ते निकसी है अरु जय करिकै
क्रीड़ाकरै अथवा जय बिषय क्रीड़ाकरै सो जयदेव कहावै सो सबको जीति
लियो है अज्ञान सो मूलाज्ञान जयदेव है तौनेमें कर्म बेनौरा है रह्यो है। बिद्या
अविद्या माया सोई सुत है जाको मूलाज्ञान जो अहंब्रह्म बुद्धितौनहै। जाके ऐसों
( ३६४ ) बीजक कबीरदास ।
जो जीव जयदेव सो कातै है अर्थात् अहंब्रह्म बुद्धि जब समष्टि जीव कियोहै
तबहीं मनकी उत्पत्ति भई कर्म भयो है संसार प्रकट भयो है ॥ २ ॥
तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश ।
नाम लेत मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ ३ ॥
तीनलोक जोहै सोई ताना तन्यो है ताको तीनि खूंटाहैं रजोगुण ब्रह्मा
मृत्युलोक के सतोगुण विष्णु आकाशके तमोगुण महेश पातालके। अरु अनेक जे
नामहैं अनेक जे मतहैं अनेक जे ज्ञान हैं वेदमें सोई कपरा तयारभयो तिनको
नाम लेत मुनि औ इंद्र औ सबराजा हारिगये। वही ब्रह्मरूपी कपराके गठियामें
कसे रहिगये वासों निकसिकै मुक्ति न पावत भये अर्थात् मोको न जानत भये ॥३॥
बिन जिह्वा गुण गाइया बिन वस्ती का गेह ॥
सूने घर का पाहुना तासों लावै नेह ॥ ४ ॥
कहत का भये कि बिन जिह्वा जो गुण गावै है कहे अजपा जो है सोहं
तौने अजपाको साथ गाइकै कहे जपि जपिकै बिन बस्तीको गेह जो है ब्रह्म
झूठा तौने कपराके गठिया के भीतर बँधि जातभये कहे यह मानत भये कि
हमहीं ब्रह्महैं । सो वह घरतो देशकाल बस्तु परिच्छेदते शून्य है सो जैसे सूनें
घरमें पाहुना जाय औ कुछ न पावै तैसे जीव उहां कुछ न पावतभयो
येतौ रामनामको जगतमुख अर्थ करि सब यह कपरा बिनो अरु श्रीकबीरजी
साहबमुख अर्थकरि कौन कपरा बिनै हैं सो कहे हैं ॥ ४ ॥
चारि वेद केंडा कियो निराकार किय रास ।
बिनै कबीरा चूनरी पहिरैं हरिके दास ॥ ५ ॥
चारिवेद को केंडा करिकै औ निरङ्कारको राशि बनाइकै वही निरङ्कारके
भीतरते निकासि लैजाइकै । अर्थात् प्रकाशरूप ब्रह्म कौनको प्रकाशै ? तब यह
बिचारेउ साहबके लोकको प्रकाशहै । लोक कौनको है । यही बिचार करिबो है
ब्रह्मते वेदको तात्पर्य निकसिबो है सो चारिउ वेदको केंडा करिकै ब्रह्म जो है
राशि तौनेते वेदको तात्पर्य निकासि रामनामकी चूनरी श्रीकबीरजी कहैं कि
: is it a 'ख'?
Wait, look at गूंंटा? Why would it be गूंंटा?
In standard Bijak Shabd 81:
"ब्रह्मा विष्णु महेश खूंटा भये तब वाल्मीक शुकदेव जयदेव कहवां रहे"
Yes! The word is ALWAYS "खूंटा" (the peg for weaving on the loom / tana-bana)! "ताना तानि गये, खूंटा भये"!
A loom uses pegs (खूंटा).
Yes, 100% "खूंटा"!
Wait, let's re-verify "मंदिरवाजै" vs "मंदिर वाजै":
In line 15:
त्रिकुटि कुँडल मधि मंदिरवाजै औघट अंबर भीजै ॥४॥
Is there a space between मंदिर and वाजै?
Look at मंदिर and वाजै: they touch or almost touch, under a continuous shirorekha! Yes, मंदिरवाजै.
Everything looks extremely accurate and thoroughly verified.शब्द । ( ३६५ )
मैं बिनौहौं । ताको हरिके जानिवेमें दक्ष कहैं दक्ष जे कोई बिरले दासहैं ते पहि-
रै हैं अर्थात् रामनाम जपिकै साहबको जानैं हैं । यहि पदमें वाल्मीकि को शुकदे-
वको जयदेवको जो अर्थ हम
( ३६६ ) बीजक कबीरदास ।
बाजै है अर्थात् पराबाणी उहैं तें निकसै है . सोई पश्यंती तें मध्यमा आइ वैख-
रीमें प्रकट होइ है । षटचक्रको बेधिकै कुण्डलिनी शक्ति नागिनी जायहै ताके
साथ त्रिगुण ते युक्त जो एक सगुणजीव है सो जायहै सो वाकी विधि आगे
लिखि आये हैं । सो वृषभ तो वहां नहीं चलै है औ कोल्हू जो कुंडलिनीशक्ति
सो मांजै कहे देह मांजिकै उठै है सो पांच हजार कुंभक कियो तब श्वासनते
तपित होइहै अथवा खेचरीतें सुधाबिंदु वाके ऊपर पर्यो ताकी शीतलता पाइकै
उठै है सो ब्रह्मांड में जाइकै अर्थात् जेतने रोज समाधि लगायो तेतने दिन रही
ताके साथ जीवहू गयो।सो कहै हैं किं,ब्रह्मांड जोरजोगुणहै ताको योगाग्निमें होमि
दियो सो रजोगुण जरयो तौ तमोगुण जरै है । अरु भक्ष जो जीवहै सो नाभीके
जलमें रह्यो तहांतें चलिकै गगन जो ब्रह्मांडहै तहां गाजै है कहै यह कहै है कि
महीं मालिक हौं ॥ १ ॥ २ ॥
नितै अमावस नितै ग्रहण होय राहु ग्रास नित दीजै ।
सुरभी भक्षण करै बेद मुख घनबरसै तन छीजै ॥ ३ ॥
पुहुमिक पानी अंबर भरिया यह अचरज को कीजै ।
त्रिकुटी कुंडल मधि मंदिर बाजै औघट अंबर भीजै ४
खेचरी की दृष्टि तीनहै तामें एक पूर्णिमाहै कहे सर्वत्र पूर्ण देखै है । औ
ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा है । औ अंतरदृष्टि अमावस है । सो जब अंतर खेचरी चढ़ी
औ काऊपूतरी आकाशमें वेधी कहे ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा में बेधी तब अंधकार अविद्या
ग्रहण ह्रैकै चैतन्यको छाइ लियो । अर्थात् प्रथम अंधकार देखोपर्यो और कछु न
देखि पर्यो । पुनि बिजुली ऐसी चमकी तब तारागण वीर्य है ताकी गति मालूम
भई।तब प्रथम सूर्य मण्डल पुनि चंद्र मण्डल देखोपर्यो ।सो वही ज्योतिमें लीन
रहैहैं समाधि लगी रहैहै जब समाधि उतरी तब जीवको अमावस भई तममें पर्यो
आइ । तब सूर्य प्रकाश देखत रह्यो ताको मायारूपी राहु ग्रसि लियो अथवा जब
नागिनिको सुधा पिआवैहै तब बहुत दिनकी समाधि लगैहै।अब जौन पुरुष रोज
समाधि लगावैहै औ उतरै है सो कहैहैं जब समाधि चढ़ाय लैगयो तब याको
अमावस ह्रैगयो पुनि तममें पर्यो औ नित्य ग्रहण होइहै वे चंद्रमा औ सूर्य दुइ
शब्द । ( ३६७ )
नाड़ीहैं तिनकों सुषुम्णारूपी राहु ग्रास देइहै अर्थात् ग्रसन करावै है वही सुषु-
म्णामें लीन कै देइहै। जब समाधि लगी तब सुरभी जोहै गायत्री माया कुंडलि-
नी शक्ति सो वेदमूख बाणी भक्षण कैलियो अर्थात् बाणीरहित ह्वैगयो। औ तन
छीनै है कहे दूबर ह्वै जाइहै सो घन बरसै है कहै सुधा बरसै है याते बनो रहै
है। पुहुमी का पानी जब अंबरमें भरन लगैहै कहे नीचे को वीर्य ब्रह्मांडमें चढ़ा-
वन लगैहै तब शिशे की सराई बनाइकै लिंगद्वार में डारै है पानी खेंचैहै जब
राह साफ़ ह्वै जाइहै तब पवनके साथ वीर्य चढ़ैहै तब पवन वीर्यके साथ जीवात्मा
चढ़ि जाइहै त्रिकुटी में त्रिबेणीको स्नान करिकै दशौ अनहद सुनन लाग्यो तामें
मंदिर कहे मृदंगौ हैं सो बाजै हैं औ घटते कहे बङ्कनालकी राहते जब जीवात्मा
जाइहै तब अम्बर जो है गैबगुफाको आकाश सो भीजै है अर्थात् उहां वीर्य
पहुंचि जाइहै सो यह आश्चर्य का कीजै ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनौ हो संतो योगिन सिद्धि पियारी ।
सदा रहे सुख संयम अपने वसुधा आदि कुंवारी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतौ ! यहि तरहकी जो सिद्धिहै सो योगिनकों
पियारिहै सो प्रथमतौ सिद्धिही नहीं होइहै जो घुनाक्षर न्याय ते सदा सुख
संयम में रहै औ सिद्धि भई समाधि लगी ताते फेरि वैसेही योगी भये अथवा
पुहुमीपति भये योग करिकै हम यह शरीरके मालिक ह्वैगये मनादिक हमारे
बश ह्वैगये परंतु जब यह शरीर छूटि जाइहै और शरीर होइहै तब वह-सुधि
सब भूलि जाइहै अरु जब पुहुमीपति भयो आपनेको राजा मानि लियो सो जब
मरिगयो तब पुहुमी आनही की ह्वै जाइहै पृथ्बी कुमारिही रहि जाइहै ॥ ५ ॥
इति बयासीवां शब्द समाप्त ।
अथ तिरासीवां शब्द ॥ ८३ ॥
भूला वे अहमक नादाना । तुम हरदम रामहिं ना जाना १
बरबस आनिकै गाय पछारा गला काटि जिउ आप लिया ।
जीता जिव मुरदा करि डारै तिसको कहत हलाल किया २
( ३६८ ) बीजक कबीरदास ।
जाहि मासुको पाक कहतहैं ताकी उतपति सुनु भाई ।
रज वी रजसों मासु उपानी मासु नपाक जो तुम खाई ॥३॥
अपनो दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बड़ैन किया ।
उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया॥४॥
स्याही गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरै भीतर बैठ मुआ॥५॥
पंडित वेद पुराण पढ़ै औ मोलनापढ़ै सो कुराना ।
कह कबीर वे नरकगये जिन हरदम रामहिं ना जाना॥६॥
१-५ तक के पदको अर्थ स्पष्टई है अंतके छठे तुकको अर्थ करैहैं। सब समें-
टिकै जे हरमद कहे हर साइत श्वास श्वाशमें रामको नहीं जानते हैं ते नादान
कहे बेवकूफ भूले अथवा हरदम कहे हरएकके दम कहे प्राणमें अंतर्यामी रूपतें
ब्यापक परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र को जे बेवकूफ नहीं जानते हैं ते मोलना
पंडित भूलिगये जो वे आपने हुजरामें बैठिकै रोजा निमाज किया औ कुरान
किताब पढ़ा औ जो पंडित अपने घरकी कोठरीमें एकांत बैठिकै बहुत वेद
शास्त्र को पढ़ा तौ का किया आखिर नरकही में गये [अत्र पूर्ण देखें] कि काहूकों
न सुन्यो कि बिना रामको जाने मुक्त ह्वैगये ॥ ६ ॥
इत तिरासीवां शब्द समाप्त ।
अथ चौरासीवां शब्द ॥ ८४ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रह्यो निशि बासर मति एकौ नहिं जाना॥१॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौंगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करतहै आपुहिं काटि किन आई॥२॥
शब्द । ( ३६९ )
सुनाति कराय तुरुक जो होना औरत की का कहिये ।
अर्द्धशरीरी नारि वखानै ताते हिंदू रहिये ॥ ३ ॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरीको क्या पहिराया ।
वो तौ जन्म कि शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥४॥
हिंदू तुरुक कहांते आया किन यह राह चलाई ।
दिलमें खोज खोजु दिलहीमें भिश्त कहां किन पाई ॥५॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जोर करतुहौ भारी ।
कविरन ओट रामकी पकरी अंत चला पचिहारी ॥ ६ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रहौ निशिवासर मति एकौ नहिं जाना॥ १ ॥
हे काजी ! तुम कौन किताबको बखानत रहौहौ। निशिबासर वही किताबकों
बकत रहौहौ अरु बाहीमें झंखत कहे शंका करत रहौहौ सो कुरान किताब
तात्पर्यते जो एक साहबको बर्णन करै है ताको जो तुम्हारी मति न जानत
भई तौ तुम कुरान किताबकी एकऊ बस्तु न जानत भये ॥ १ ॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौँगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करति तौ आपु काटि किन आई२॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरी को क्या पहिराया ।
वोतो जन्म की शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ३॥
सुनति किये जो मानतेहौ कि,हम मुसलमान हैं औ या नहीं मानते हौ कि,
शक्ति जो माया सोई करैहै सो हे भाई ! मैं न बदौँगा जो खोदाय तेरी सुनति
करतो तौ पेटही ते कटी आउती ॥ २ ॥ सो हे पंडित ! आपनी आत्माकों
साहबकी शक्ति न मान्यो। अरु ब्रह्मसाहबको न जान्यो जनेऊ पाहिरिकै तुमतों
ब्राह्मणभये औ अपनी मेहरीको कहा पहिरायौहै जाते वह ब्राह्मणी भई सों
२४
( ३७० ) बीजक कबीरदास ।
तिहारी स्त्री तो जन्मकी शूद्रिनिहै सो परुसैहै औ हे पांडे ! तुम खाउहौ तातें
तुम कैसे ब्राह्मण भये ब्राह्मण तौ ब्रह्म जानेते कहावैहै ॥ ३ ॥
हिन्दू तुरुक कहांते आया किन यह राह चलाई ।
दिलमें खोज खोजु दिलहीमें भिश्त कहां किन पाई॥४॥
आत्मातौ एकईहै हिंदू तुरुक ये शरीरके भेदहैं यह शरीर कहां ते आयोहै
औ यह राह कौन चलायो है अर्थात् बीचैते आये हैं बीचैते जायँगे सो दिलमें
तुम खोजौ उसका खोज दिलही में है औ कौन भिश्त पायोहै अर्थात् खोदा-
यका बंदा जो तिहारो जीवात्मा है जो हिंदू तुरुकमें एकई है सो तिहारे दिल-
हीहै उसको जानो तो जानि परै उसके मिलनको खोज कहै राह वही
आत्माहै जब आपने स्वरूपको जानोगे तब वाको पावोगे ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जोर करतु है भारी ।
कविरन ओट रामकी पकरी अंत चला पचिहारी ॥५॥
कबीरजी कहैहैं कि हे संतौ! सुनौ
शब्द । ( ३७१ )
अथ पचासीवां शब्द ॥ ८५ ॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा वर वामें फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्तीमें से दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महलमें बीच मियांको डेरा ॥ ३ ॥
नौ मन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म २ अरुझेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निबेरा ॥४॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा घरवा में फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥१॥
साहबको पार्षदरूप जो है हंसस्वरूप आपनो सांच शरीर ताको भूले लोग
कहैहैं कि यह मिथ्या जो स्थूलशरीर सो हमारौहै सो जा घर स्थूल शरीरमें तैं
फूलाडोलै है मेरो शरीरहै सो तेरा घर कहे शरीर नहीं है ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्ती मेंसे दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महल में बीच मियां को डेरा ॥ ३ ॥
बहुत हाथी घोड़े बैल इत्यादिक बाहनको संग्रह कियो परंतु जब तैं शरीर
रूपी बस्तीते खदेरि जाइगो कहे शरीर छूटि जाइगो तब जंगलमें कहीं पीपर के
तर भूत हैकै बसेर कहे बास करैगो अरु वह शरीरहूको बाहर खदेरिलै श्मशा-
नमें जारि देइँगे तब वह हाथी घोड़े औरहीके है जाइँगे ॥ २ ॥ गांठी बांधि-
धरचो अरु खर्च न पठयो कहे पुण्य न कियो जो वह लोकमें मिलिकै बहुरिकै
( ३७२ ) बीजक कबीरदास ।
फेरा न कियो कहैं यह शरीरमें नहीं पावैहै सो बीबी जो है साहबकी दई
सुरति सो बाहरहै कहे संसार मुख है रही है औ हरम कहे लौंडी जो है माया
सो महलमें है कहै सब शरीरन में है ताके बीचमें मियां जो है जीव ताको डेराहै
ताकों वह माया घेरे है ॥ ३ ॥
· नौमन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म जन्म अरु झेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निवेरा ॥४ ॥
सों नौमन कहे नित्यही नवीन जो मनहै अर्थात् मनके दिये नाना शरीर
होयहैं सो नाना कर्म नाना मत जे सूतहै तिनमें अरुझिकै सुरझै नहीं है सो
कबीरजी कहैहैं कि हे संतो! यह पद को निबेरा करो कहे पाँचौं शरीरमें अरुझो
जो है मन ताते भिन्नहोउ तौ तुम शरीरनते भिन्न ह्वैजाउ ॥ ४ ॥
इति पचासीवां शब्द समाप्त ।
अथ छियासीवां शब्द ॥ ८६ ॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सब देही नाद बिंदु विस्तारा ॥ २ ॥
सकल कबीरा बोलै बानी पानीमों घर छाया ।
लूट अनंत होत घट भीतर घटका मर्म न पाया ॥ ३ ॥
कामिनि रूपी सकल कबीरा मृगा चरिंदा होई ।
बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई॥ ४ ॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर पुरंदर पीपा प्रहलद चाखा ।
हिरणाकुश नख उदर विदारा तिनहुंक काल न राखा॥५॥
शब्द । ( ३७३ )
गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नामदेव जयदेव दासा ।
उनकी खबरि कहत नहिं कोई कहां कियेहैं वासा ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दमदमकी कोइ खबरि न जानै करि न सकै निरवारा॥७॥
चारि दिशा महिमंड रचोहै रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कछु अजब तमाशा मारैहैं यम किल्ली ॥ ८ ॥
सब अवतार जासु महिमंडल अनत खड़ो कर जोरे ।
अद्भुत अगम अथाह रचोहै ई सबशोभा तोरे ॥ ९ ॥
सकल कबीरा बोलै बीरा अजहुं हो हुशियारा ।
कह कबीर गुरु सिकिली दर्पण हरदम करो पुकारा॥१०॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १ ॥
कबीरजी कहैहैं कि हे कबिरा! कायाके बीर जीव तेरो घर तो कँदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सारांश जो है साहबको धाम तहां है तेरो घर या
जगवमें नहीं है तैं नाहक भुलान रहै है यहां गुरु कहे सबते श्रेष्ठ जे परमपुरुष
पर श्रीरामचन्द्र कहै हैं कि अबहूं जो मोको जानो तौ मैं कालते छोड़ाइ लेउँ
तिनको कह्यो कोई न मानिकै अरु आनंदको कंद उनको धाम छोड़िकै अमहल
महल कहे जो कछु वस्तु नहीं है ऐसो जो है धोखा ब्रह्म तामें अरु कोई
माया के प्रपंचमें देवाना है रह्यो है ॥ १ ॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सबदेही नाद विन्दु विस्तारा ॥ २ ॥
हे हंस! कबीर कायाके बीर जीवते साहबको ब्रह्मही कहै हैं तिनको कहिबों
कागन कैसी चोंचको पसारिबों है जैसे कागनके आगे जो दूध भात औ