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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

शब्द । ( ३५७ )
देखिकै कूदि परैहै अरु ऐसेही प्रतिबिंब देखि स्फटिक शिलामें हाथी दांत
टोरि डारैहै ॥ २ ॥
मर्कट मुठी स्वाद न विहुरै घर घर नटत फिरो
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अरु जैसे मर्कट मूठीमें जेहि दाना ताके स्वादके लिये फँसि गये बाजी-
गरके साथ नाचत वाँगैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि जैसे इनके सबके भ्रम
होइहै तैसे हे जीव तैंही सब कल्पना करिलियो है अपनी कल्पनाने तोहींको
भ्रम होइहै नाना उपासना नाना ठाकुर खोजत फिरैहैं। विचारिकै देख तौ जब
तेरे कल्पना नहीरही तबते शुद्ध रहैहै जैसे सुवा ललनीको पकरि लेइहै तैसे
तैंही ये सब कल्पना करिकै कल्पनामें बँधोहै जैसे सुवा ललनी को जो छेड़ि-
देइ तौ वृक्षमें पहुंचै जाइ तैसे तैंहूं जो कल्पनाको छोड़िदेइ तौ तोको कौन
पकरयोहै।परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र के पास पहुंचै जाइ जब सब कल्पना छोड़ि
शुद्ध है जाइ है तब साहब अपनो विग्रह देइहै तामें स्थितहै साहबके लोकको
जाइहै तामें प्रमाण॥ "आदत्ते हरिहस्तेन हरिपादेन गच्छति" इतिस्मृतिः॥ अरु
श्रीकबीरऊ जी को मंगल प्रमाण ॥ " चलो सखी बैकुण्ठ बिष्णु माया
जहां चारिउ मुक्ति निदान परम पद लेतहां ॥ आगे शून्य स्वरूप अलख नहिं
लाखि परै । तत्त्व निरंजन जान भरम जनि जनि चितधरै ॥ आगे है भगवंत
तो अक्षर नाउँहै । तौन मिटावै कोटि बनावै ठाउँहै ॥ आगे सिंधु बलंद
महा गहिरो जहां । कोनैया लैजाय उतौरै को तहां ॥ कर अजपाकी नाव तो
सुरति उतारैहै । लेइहौं अज्जरनाउँ तो हंस उबारिहै ॥ पार उतर पुरुषोत्तम
पैरख्यो जानहै । तहँवां धाम अखंड तो पद निर्वान है ॥ तहँ नहिं चाहत
मुक्ति तो पद डारे फिरै । सुरत सनेही हंस निरंतर उचरै ॥ बारह मास
बसंत अमर लीला जहां । कहैं कबीर बिचारि अटल है रहुतहां " ॥ ३ ॥
इति छिहत्तरवां शब्द समाप्त ।