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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

( ३५४ ) बीजक कबीरदास ।
जौन तू धोखाब्रह्म सर्वत्र पूर्ण मानै है सो तेरी यह पेखनी नटवत बाजी
पेखनी है अर्थात् झूठहै बाजीगरकी बानी है अर्थात् सांच असांच देखावै असांच
सांच देखावैहै सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतो ! सुनो उनको राजाविराजी ह्वै
गई कहै सर्वत्र पूर्ण सत्य जे साहबहैं ते उनको नहीं जानिपरैहैं वही धोखाब्रह्म
में लगे हैं असत्यही सर्वत्र देखे हैं मनमाया को राज हैरहो है साहबको राज्य
नहीं है ॥ ६ ॥
इति चौहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ पचहत्तरवां शब्द ॥ ७५ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषाको नारी ॥ १ ॥
माटीको घट साज बनाया नादे बिंदु समाना ।
घट बिनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना॥२॥
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद यक मुद्रा ।
एक बिंदुते सृष्टि रच्योहै को ब्राह्मणको शुद्रा ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहै कबीर राम रमि रहिया हिन्दू तुरुक न कोई ॥ ४ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषा को नारी ॥ १ ॥
ऐसो कहै यहितरहते जैसो आगे कहै हैं तैसो चिन्मात्र जीव को बिगारिबों
भर्मते बहुत भारी है काहेते कि भर्म ते दुबिधा कहिकै वह सार पदार्थ को
न जान्यो हिन्दू मुसल्मान दोऊ बिगरिगये हिन्दू वेद की राहते नाना मत
बनाय लेतभये औ मुसल्मान किताबनकी शरा लैके नाना मत दूसरो दीनकों
खड़ा करत भये हिन्दू नरक स्वर्ग मुसल्मान बिहिश्त दोज़ख़ कहतभये जों