कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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वेद किताबकें तात्पर्यते देखौ तौ न कोई पुरुष जानिपरै न नारी जानिपरै सों
जब पुरुषही नारीको भेद नहीं है तौ हिन्दू मुसल्मान कैसे भेद भयो ॥ १ ॥
माटी को घट साज बनाया नादे विंदु समाना ।
घट विनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना २
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद् यक मुद्रा ।
एक विंदुते सृष्टि रच्यो है को ब्राह्मण को शूद्रा ॥ ३ ॥
नाभीके तरे जो दश आंगुरकी ज्योतिहै औ तौनेमें जब प्राण बायुको
संयोग होइहै तब नाद उठै है तामें बिंदु समाइगयो तब माटीको घट यह
पिंडभयो ताहीको नाम धरावैहै जब याको घट बिनशिगयो कहे शरीर छूटि-
गयो तब याको क्या नाम धरोगे अर्थात् नामरूप याके सब मिथ्या हैं अहमक
जो है जीव सो नाम रूपके खोजनमें भुलाइ गयो ये सब जीवात्मा के नाम रूप
नहीं हैं ॥ २ ॥ सो एकै हाड़ादिकनते औ एकै बिंदुते कहे वीर्य ते सकल
सृष्टि भई है काको हिन्दू कहैं काको मुसल्मानकहैं काको ब्राह्मण कहैं काकों
शूद्रकहैं शरीरमें यही साज सबकैं हैं अरु वेदमैं कर्म किताब में शरायंही तें
नानाभेद लगे हैं जो विचारिकै देखो तौ नाम रूपहीको भेद लगि रह्यो है
आत्मा तो सबको चितही है औ मांस चाम सबके पांचभौतिकही हैं अब जे
गुणाभिमानी हैं तिनको कहैं हैं ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहैं कबीर राम रमि रहिया हिंदू तुरुक न कोई ॥४॥
वही नाम रूप के भेदते ब्रह्मा रजोगुणी शंकर तमो गुणी विष्णु सतोगुणी
भये औ वही नामके भेदते मुसल्मानमें इनहीं को अजाजील मैकाइल इजराईल
कबीरजी कहै हैं कि येतो सबनाम रूपके भेदहैं इनको सबको आत्मा एकई है
तिनमें अंतर्यामी रूपते मनवचनके परे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रई रमि रहे
हैं । जो कहो राम नामौ तौ नाममें आवै है तौ रामको नाम मन वचनमें
नहीं आवै है आपही स्फुरित होइहै तेहिते नामत्व नहीं है अरु श्रीरामचन्द्र