कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ ) बीजक कबीरदास ।
हे बंदे अपनेमें तो निबेरा करिलै अपने जियत अपना ठौरं तौ करु मुयेते
तेरा घर कहाहै अर्थात् जो सत् असत् कर्म करैगो सो सब नरक स्वर्गादिकनमें
भोग करैगो तेतो कर्मके घरहैं तेरे घर नहींहैं औ जो ज्ञान करिकै आपने कों
ब्रह्म मानिकै ब्रह्म प्रकाशमें हैकै शुद्ध जीवन कहैगो सो ब्रह्म होनातौ धोखाहै
जब फेरि उत्पत्ति समय होइगो तब माया धरि लै आवैगी पुनि संसारी हैजाइगो
अरु और और देवतनकी उपासना करिकै उनके लोक जाइ जो तेऊ तेरे घर
नहींहैं जब माया धरि लै आवैगी तब संसारी हैजाइगो जब मरैगो औ ये घरनमें
जाइगो तब बिचार करनेकी सुधि न रहि जाइगी तेहिते जीतही आपनो घर
बिचारु तेरो घर वहहै जहांके गये फिरि न आवै सो तैं साहबको अंशहै सो साहब-
के पास घर करु कहे ठौर करु जाते फिरि न संसारमें आवै ॥१॥ सो कबीरजी
कहैहैं कि हे प्राणियु यहि अवसरमें कहे मनुष्य शरीर में जो साहबको नहीं
जानौहौ तौ हे संतौ ! सुनौ तुमको अंतकालमें यह कठिन जो कालको घेराहै ताते
कौन बचावैगो अर्थात् जहां जहां जाहुगे तहां तहांते काल तोको खाइ
लेइगो साहब बचावनवारे खड़े हैं ताको प्रमाण आगे लिखिही आये हैं ॥
“अजहूं लेहुं छुड़ाइ कालसों जो घट सुरति सँभारै” सो साहबको जानिकै साह-
बके पास जाय जनन मरण छूटि जाय ॥ २ ॥
इति अस्सीवां शब्द समाप्त ।
अथ इक्यासीवां शब्द ॥ ८१ ॥
तूतो ररा ममा की भांति हौ संत उधारन चूनरी ॥ १॥
बाल्मीकि बन वोइया चूनिलिया शुकदेव ।
कर्म बिनौरा ह्वैरह्यो सुत कातै जयदेव ॥ २ ॥
तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश।
नाम लेतैं मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ ३ ॥