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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

शब्द । ( ३६३ )
जिन जिह्वा गुण गाया विन वस्तीका गेह ।
सूने घरका पाहुना तासों लावै नेह ॥ ४ ॥
चारि वेद केंडा कियो निराकार कियरास ।
बिनै कबीरा चूनरी पहिरैं हरिके दास ॥ ५ ॥
तूतो ररा ममा की भांति हौ संत उधारन चूनरी ॥ १ ॥
जो तुम मनमाया ब्रह्ममें लगि रह्योहै सो तुम इनके नहीं हौ तुमतो ररा
ममा की भांतिहौ अर्थात् राम जो मैंहौं तिनकी भांतिहौ जैसे मैं विष्णु चैतन्य
हौं तैसे तुम अणु चैतन्यहौ मेरे अंशहौ सो मेरो जो रामनामहै ताको उधार-
न नामकी चुनरी कबीरसंत मेरो बनायो है । यही रकार बीज मों मकारहू है
यहि हेतुते साहब रकारहीको कहै हैं अर्थात् जब राम नाममें जपोगे तब यह
जानि जाहुगे कि मकार मेरो स्वरूपहै रकार साहबको स्वरूप है औ कबीर
संत असार जो है जगतमुख अर्थ ताको त्यागिकै सार जो है साहबमुख अर्थ
ताको ग्रहण करिकै चूनरी बनाई है सो कहैहैं ॥ १ ॥
वाल्मीकि वन बोइया चूनि लिया शुकदेव ।
कर्म बेनौरा है रह्यो सुत कातै जयदेव ॥ २ ॥
माटीको है बहुत छिद्रहैं याते शरीर बल्मीक कहे बेमौरी है तामें जो रहै
सो वाल्मीकि कहावै सो वाल्मीकि आत्मा है सो वाणी रूपी जो वन कहे कपा
सहै ताको बोवत भयो अर्थात् वहीकी इच्छा शक्ति भई है। औ शुच शोके धातु
है तेहिते शुक शब्द होइहै-ताको जो देव होइ सो शुकदेव कहावै है।
सो शोच मनके होइ है अर्थात् सङ्कल्प बिकल्य मनके होइ है सो
शुकदेव मन है । सों आत्माते जो बाणीरूपी कपासके ढेढ़ाको अनुसार
भयो ताको चुनि लियो अर्थात् बाणी मनै ते निकसी है अरु जय करिकै
क्रीड़ाकरै अथवा जय बिषय क्रीड़ाकरै सो जयदेव कहावै सो सबको जीति
लियो है अज्ञान सो मूलाज्ञान जयदेव है तौनेमें कर्म बेनौरा है रह्यो है। बिद्या
अविद्या माया सोई सुत है जाको मूलाज्ञान जो अहंब्रह्म बुद्धितौनहै। जाके ऐसों