कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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जबतें उहां अहं ब्रह्म बुद्धि करै है, तबहीं जगवरूप तारा उत्पत्ति होइहै तौनेही
जगत्में एक गुरु होइहै सो चेतावैहै अरु एक शिष्य होइहै सो चेतकरैहै ॥२॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं। सोतो आहि अमर पद माहीं ४
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४
सो ज्यहि आपने स्वरूपको तें खोजै है कि मैं आपने स्वरूपको जानिकै मुक्त
हैजाउँ सो उहां वागुरुवनको ज्ञानमें नहीं है औ न वह लोक प्रकाशमें है काहेते
कि जे जे देवनमें वे लगावैंहैं तेई अमर नहीं हैं तौ तोको कहां मुक्ति करेंगे
अरु महा प्रलयमें जब लोक प्रकाशमें लीन होइहै तब उहौंते उत्पत्ति होइहै
तेहिते उहाँ गये अमर नहीं होइहैं तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर नहीं होइहै
तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर पदमें है साहबको अंशहै साहबको जानिले तौ
अमर हैजाइ ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि यह अमरपद आपनो स्वरूप कोई
बिरला बूझैहै कौन जाके सम अधिक नहींहै ऐसो जो है एक रामनाम सो जाके
मुखहृदय में होइहै सोई बूझैहै ॥ ४ ॥
इति उन्नासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अस्सीवां शब्द ॥ ८० ॥
बन्दे करि ले आप निबेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अन्त कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतो कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥
बन्दे करि ले आप निवेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अंत कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥