कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३५६ ) बीजक कबीरदास ।
निर्गुण सगुणके परे हैं तिनको जानै औ जो आत्मा नाम रूपते भिन्नहै न हिन्दू है
न तुरुक है तामें येई राम रमि रहे हैं या हेतुते सबको आत्मा इन्हींको दासहै
तेहिते इन्हींको जो जाने सोई मुक होइहै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र निर्गुण
सगुणके परे हैं तिनहींको राम नाम जाने मुक्ति होइ है तामें प्रमाण ॥
“रामके नामते पिंड ब्रह्मांड सब रामका नाम सुनि भर्म मानी । निर्गुण निरा-
कार के पार परब्रह्महै तासुका नाम रंकार जानी । विष्णु पूजाकरैं ध्यान शंकर
धरैं भनैं सुबिरंचि बहु बिबिध बानी । कहै कबीर कोइ पार पावै नहीं रामका
नाम अकह कहानी” ॥ ४ ॥
इति पचहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ छिहत्तरवां शब्द ॥ ७६ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकि मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो ।
ऐसेहि मद गज फटिकशिलापर दशननि अनिअरो॥२॥
मर्कट मुठी स्वाद ना बिहुरै घर घर नटत फिरो ॥
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकिं मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो
ऐसेहि मद गज फटिक शिलापर दशननि आनि अरोर
अपनपौ कहे आपने जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र हैं तिनको आपही तें
यह जीव बिसरि गयो जैसे कूकुर कांचके मंदिरमें आपनो रूप देखि देखि
भर्मते भूँकि भूँकि मरैहै ॥ १ ॥ अरु जैसे केहरि कूपके जलमें अपनी प्रतिमा