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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

( ३६० ) बीजक कबीरदास ।
हरिवाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया ।
घरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ २ ॥
वाजी झूठ वाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी
कह कबीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी॥३॥
हरि जे साहब तिनकी बाजी जोसंसार तामें साहबको हेतु न जानिकै सुर-
नर मुनि जे हैं ते रामनामको संसार मुख अर्थ करिकै मायाके चेटकमें जहँडि-
गये अर्थात् भूलिगये सो माया इनको घर जो संसार तामें डारिकै भरमायदियो
हृदयमें ज्ञान न होतभयो तौन हम जान्यो साहब सुरतिदियो तैं अपने पास बोला-
वैको सो या जीव आपहीते संसार बाजीरचि भूलिगयो॥२॥ बाजी जो संसार सो झूठ
बाजीगर जो जीव सो सांचहै सो साधुनकी मति तो ऐसी है और जे सबहैं बद्धजीव
ते जैसे समुझिनि है ताकी तैसी ही गति भई है सो गतिहू सब अनित्य है ॥३॥
इति अठहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्नासीवां शब्द ॥ ७९ ॥
कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतनहारे चेतु सुभागा ॥ १ ॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा ॥ २ ॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं।सोतो आहि अमर पद माहीं ३॥
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४॥
कहो हो अम्बर कासों लागा। चेतन हारे चेतुं सुभागा॥ १॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा॥२॥
तैंतों सुभागाहै साहब कोहै तैं काहे मन माया ब्रह्ममें लगिकै अभागा ह्वैरहैहै
चेत करनवारे तैं चेत तोकरु अंबर जो है लोक प्रकाश रूप ब्रह्म सो कहां
लागाहै अर्थात् वह काको प्रकाशहै वह साहब साहबके लोकको प्रकाशहै चेततों
करु ॥ १ ॥ वह अम्बर जोहै लोक प्रकाश ब्रह्म तामें तारा देखाइहै कहैं