कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ३०२ ) बीजक कबीरदास ।
हे पंडित ! यह संसाररूपी वृक्षको जो तैं बूझि राखै है कहे मानि राखै है
सो तैं बूझतौ जितने बिचार होइहैं तिनको यह मिथ्याही है । हरिकेचिद्अचिद्
रूपसे सत्यहै। यह संसार वृक्ष आधा पुरुष है आधा प्रकृति है अर्थात् चित् पुरुष
जीव औ अचित् मायादिक इनहीते संपूर्ण जगत्है ॥ १ ॥ पुनि कैसोहै संसार-
रूपी बिरवा याको स्वर्गशीश कहे ब्रह्मांडको जो खपरा है सो शीश है अरु
याकी जर पातालमें गई है ॥ २ ॥
वारह पखुरी चौबिस पाता।घन बरोह लागी चहुँ घाता ॥३॥
फलै न फुलै वाकि है वानी।रैनि दिवस विकार चुव पानी॥४॥
औ बारह महीना जे हैं ते बारे पंखुरी हैं अर्थात् काल औ चौबिस तत्त्व
वाके चौबिस पातहैं औ घन कहे नाना कर्मनकी वासना तेई घन बरोह चारों
ओर लगीहैं ॥ ३ ॥ या संसाररूपी वृक्ष साहबको ज्ञान रूप फल नहीं फूलै
औ साहबको भक्तिरूप फल नहीं लगै है या संसारके बाहर भयेते होयहै औ
राति दिन बिकाररूप पानी चुवै है ॥ ४ ॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिविरवाप्रतिपालततहिया ५
सो कबीरजी कहै हैं कि, जहां हरि परम पुरुष श्रीरामचन्द्र जाके अंतःकर-
णमें भागवत धर्म रूपी बिरवनकी बाग प्रतिपालै हैं तिनको यह संसाररूपी
बिरवा अच्छो नहीं है । व्यंग यह है कि,माली जो होइहै सो कांटा वाला पेड़
निष्काम अलग कै देइहै इहां हरि संसार रूपी बिरवा अलग कै देइ है भागवत
धर्मरूप बिरवा श्रीकबीरजी रेखता में कह्यो ॥ “धर्मकी बाग फुलवारि फूली
रही शील संतोष बहुतक सोहाई । भक्तिका फूल कोड संत माथे धरे ज्ञान मत
भेद सतगुरु लखाई ॥ विवेक बिचार सोइ बाग देखन चले प्रेम फल पाइ तोरै
चखाई । पराहै स्वाद जब और भावै नहीं तजैगा माणकी बहवाई ॥ ५ ॥
इति पचासवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३०३ )
अथ इक्यावनवां शब्द ॥ ५१ ॥
बुझवुझपण्डितमनचितलाय।कवहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
खन उवै खन डुबैखन अवगाहा।रतन नमिलै पावनहिं थाह२
नदिया नाहिं सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
कह कबीर यह मनका धोका।बैठा रहै चला चह चोखा४
बुझबुझपंडितमनीचितलाय।कबहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
हे पंडित ! सारासारके बिचार करनवाले ते तो विवेकी कहावै हैं चित्त
लगाइकै यह मनको बूझि, तौ कबहूं भरलकहे कबहूं तो तैं आपनेको मानिले-
इहै कि, मैंही ब्रह्महौं आनंदते भरिजायहै औ कबहूं वहज्ञान बहिजायहै तब
सुखाइ जाइहै अर्थात् वह आनंद नहीं रहिजाइहै ॥ १ ॥
खन उवै खन डुबै खन अवगाह।रतननमिलैपाव नहिंथाह२
नदिया नाहि सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
तब क्षणमें संसारते मन ऊबिउठै है कहे बैराग्य ह्वैआवै है औ क्षणमें वही
मनरूपी नदी हिलै है बूडिजाय है अर्थात् संसारके विषयमें बूडिजाय है।
औ क्षणमें अवगाहैहै कहे नानामतमें बिचार करै है कि, संसार छूटिजाय सो
मनरूपी नदीकी थाह नहीं पावै है तेहिते रत्न जो है स्वस्वरूप सो नहीं मिलै है
विचारही करत रहिजायहै॥२॥सो मनरूपी नदियाहै नहीं जो तैं विचारकरै तू तो
मनके बाहर है परंतु सरस नीर सङ्कल्पबनै है। अब मच्छको मारनवालो केवट
ज्ञान तीर में बनै है परंतु काम क्रोधादिक मच्छ तेरे मारे नहीं मरैं हैं॥ ३ ॥
कह कबीर यह मनको धोखा। बैठा रहै चला चह चोखा ४
सो कबीरजी कहैहैं कि, नाना मतमें परिकै संसार छूटिबेको नहीं उपाय करौ
हौ औ चोखे कहे नीके चला चाहौहौ परंतु हौ बैठे कहे साहबके मिलिबेको उपाय
ये एकउ, नहीं हैं काहेते कि, पश्चिमको ग्राम नगीचऊ होइ औ तहांजाइबो चाहै औ
जसजस पूर्वको मेहनत करिकै मंजिलकरै तौ, तस तस दूरिही परतु जाइहै यह संसार
मनको धोखा मिथ्याहै सो मनते भिन्न हैकै साहबमें लगै तबहीं साहब मिलैंगे ४
इति इक्यावनवां शब्द समाप्त ।
( ३०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बावनवां शब्द ॥ ५२ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगे खायो ।
उदधि माहिते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
मेढ़क सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान विवाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझे अद्भुत कथ्यो न जाही ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन वन घेरे पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहिं बूझै ।
बिनु पंखै उड़िजाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
हे ब्रह्मज्ञानी ! आप बूझिये तौ घोरिघोरि कहे नये नये ग्रन्थन को बनाइकै
कहे माया ब्रह्मजीव एकैमें मिलाइडारचो कि, एक ही ब्रह्म है । वही वाणी
शिष्यनके श्रवण में वर्षा ऐसो वर्षावोहै परन्तु तुम्हारे बानीरूप पानी को बुंदहू
न उनके पर्यो अर्थात् तनकऊं ज्ञान न भयो वे ब्रह्म कबहूं न भयो सो तुम्हारो
यह हवाल हैरह्यो है ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो ।
उदधि माहिंते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
चींटी कहिये बुद्धिको काहेते कि, सूक्ष्म होइ है कुशाग्रवर्त्ती शास्त्रमें कहै हैं ताके
पाइमें मतङ्गरूप जोमनहै ताको बांधिदियो मनबड़ा है। औ दुर्वारमतहै याते हाथीकहो
शब्द । ( ३०६ )
तब छेरी जो है माया सो बीगा जो है जीव ताको खाइ लियो जीवको बीगा काहेतें
कह्यो कि, जो जीव अपने स्वरूप को जाने तौ छेरी जो है माया ताको नाशकै देइ
सो छेरी मायही बीगा जीवको आपने पेटमें डारिलियो । अरु छेरी मायाको
कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहितशुक्लकृष्णां” इत्यादि । सो लोक
मकाश जो उदधि तहांतें निकरिकै चौड़ी छांछरी जो संसार तामें मच्छरूप
जीव घर मायाते बनवायो अर्थात् संसारी है गयो ॥ २ ॥
मेढुक सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान बियाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझै अदभुत कथो न जाही ३॥
वह कैसो संसारहै जहां मेढुक ( जीव ) औ सर्प ( काल ) एकैसंगरहै हैं ।
नाना शरीरंनको काल खात जाइहै पुनि पुनि शरीर होत जाइहै । अरु बिल्ली
जो है मानसी वृत्ति सो श्वान स्वानुभवानन्द ताको बिवाहीगई अर्थात् वाही
में लगिगई । वृत्तिकोबिल्ली काहेते कह्यो कि, बिल्ली जहां गोरस देखै है तहँ
जाइहै औ यह वृत्ति जो है सोऊ जहै रस जो है सुख सो देखैहै तहँ जाइहै ।
सो स्वानुभवानन्दमें बहुत सुख देख्यो याते वाहीको बिवाहीगई । तब नित-
उठिकै सिंह जो ज्ञान सो सियार अज्ञानते मारो जाइहै । जो कहो ज्ञान तो
अज्ञानको नाश करनवारो है अज्ञानते ज्ञान कैसे नाश होइहै ? सो वह जो
ब्रह्मज्ञान कियो कि, हम ब्रह्म हैं सो अद्भुत है कहिबेलायक नहीं है नेति कहैह
अर्थात् कोई जीव ब्रह्म नहीं भयो यह कौनेहू शास्त्र पुराणमें नहीं कह्यो कि,
फलानो जीव ब्रह्म है गयो याही ते मूलाज्ञानमें ठहराये हैं ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन बन घेरे पारथ बाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
येई दुइतुक अधिकसे जानेपरैहैं परन्तु पोथीमें लिखो लख्यो अर्थ करिदयो
सो शरीरबनको संशय जो मिरगा है सो घेरे है औ पारथ जे हैं गुरुवा लोग
ते संशयरूपी मृगाके मारिबेको बाण जो है नानाप्रकारको उपदेशरूप बाणी
ताको मेलैहैं सो उनको बाणीन ते संशय तो नहीं दूरि होइहै । संशय कहा
है सो कहै हैं सायर जो है बिबेकसागर सो जरिजाइ है औ नाना शरीर जे
( ३०६ ) बीजक कबीरदास ।
बन हैं ते लाय देइ हैं अर्थात् गुरुवनकी बाणी सुनि सुनिकै शिष्यलोग जब
और और जीवनको उपदेश कियो तब उनको सबको साहबको विवेकजरिजरि-
गयो औरैऔर में लगिगये विवेक करिकै साहबको ज्ञानजो हैबेको रहै सो न
भयो तब संसार समुद्रमें मच्छ जोहै काल सो अहेर खेलै है अर्थात् जीवनको
खाइ है ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि बूझै ।
बिनु पंखे उड़ि जाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, यह संसार अद्भुतहै औ ब्रह्म अद्भुत है इन दूनोंको
ज्ञान जिनको है कि, ये धोखा है ऐसो को है ? अर्थात् कोई नहींहै परन्तु जों-
कोई बिरला बूझनवारो होइ औ मन माया है दोनों धोखा हैं येई तहँ उड़ै
हैं नाना पदार्थनको स्मरण होइहै नाना योनि पावैहै संसारमें तिनको छोड़ि
एक परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही को ह्वैरहै तौ ब्रह्म जो है आकाश ताते उड़ि
कहैं निकसिकै साहबके यहां पहुंचै जाइ जो कहो बिना पखना कैसे उड़ि-
जाय । सो यहां उपासना दुइप्रकारकी हैं एक बांदर कैसो बच्चा भजन करैहै
कि, बांदरको बच्चा अपनी माताको आपही धरे रहै है सो यहजीव नाना प्रका
रकै शास्त्रादिकनते विचार करिकै औ असांच मत खंडन करिकै आपही अपने
साहबको धरे रहै है भ्रम में नहीं परै है । औ दूसरी उपासना बिलारीके
बच्चाकीसीहै बिलारीको बच्चा और सबकी आशा तोरे माताकी आशा किये रहैहै
सों वह बिलारी अपने बच्चाको जहां सुपास देखै है तहां आपही उठाइ लैजाइहै।
तैसें यह जीव वेद शास्त्रको छोड़िकै न काहूके मतके खंडन करिबेकी सामर्थ्य है
न अपने मतके मंडन करिबेकी सामर्थ्यहै साहबको जानै है कि, मैं साहब का
हौं दूसरो मत सुनतही नहीं है सो जब सब पक्ष को छोड़िकै साहब कों
ह्वैरह्यो, तब याको साहबही हंसस्वरूप ह्वैकै अपने लोकको उठाइ लैजाइहै ॥५॥
इति बावनवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३०७ )
अथ तिरपन्वां शब्द ॥ ५३ ॥
गुरुमुख ।
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
विरवा एक सकल संसारा। पेड़ एक फूटल तिनडारा ॥२॥
मध्यकेडार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनतको बागा॥३॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। वांधेते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पण्डित होय सो करै विचारा ५
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
जो बिरवाको आगे वर्णनकरै हैं ताको जो कोई चीन्है औ असार मानि
लेइ औ सार जो साहबहैं तिनको जानै सोपार्षद स्वरूप ह्वैजाइ औ जन्म मर-
णते रहित ह्वैजाइ ॥ १ ॥
बिरवा एक सकल संसारा । पेड़ एक फूटल तिन डारा ॥२॥
मध्यके डार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनत को बागा॥३॥
सो एक बिरवा सब संसार है तौने बिरवाको पेड़ कहे मूल विराट् पुरुष है
तौनेमें ब्रह्मा विष्णु महेश तीनिडार फूट्यो है ॥ २ ॥ सो मध्यकी डार जे
विष्णुहैं तिनमें अर्थ धर्म काम मोक्ष येचारि फल लागत भये चारि फलके देवै-
या विष्णुह । सो जो कोई विष्णुका उपासक होइ सो चारों फलको पावै है ।
डारन जो डौरया कहै हैं ते शाखा कहावै हैं । सो ब्रह्मा विष्णु महेश जे तीनि
डौरै हैं तिनते नाना देव नाना मत भये। तेई शाखा हैं। तिनको को गनत बा-
गहै अर्थात् उनको अन्त कोई नहीं पायो औ सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी जे
नाना वासना होतभई तेई पत्र हैं ॥ ३ ॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। बाँधे ते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पंडित होय सो करै विचारा ५॥
( ३०८ ) बीजक कबीरदास ।
- वृक्षमें बेलि लपटै है सो यह संसाररूपी वृक्षमें आशारूपी बेलि लपटि गई
है तामें बँधिकै प्राणी छूटै नहीं है ॥ ४ ॥ साहब कहै हैं कि. हे कबीर !
कहै जीव तोको संसार जातमें हम पुकारा है रामनामको जो पंडित होइ है
बिचार करिलेइ अर्थात् असार जो रामनाममें जगत् मुख अर्थ ताको छोड़ि
राममें सार जो मैं ताको जानिकै रामनाम जपिकै मेरे पास आवै ॥ ५ ॥
इति तिरपनवां शब्द समाप्त ।
अथ चौवनवां शब्द ॥ ५४ ॥
सोईके सँग सासूर आई ।
संग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपनेकी नाई ॥ १ ॥
जना चारि मिलि लगन शोचाई जना पांचमिलि मंडपछाई।
सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई ॥ २ ॥
नाना रूप परी मन भांवरि गांठि जोरि भई पति आई ।
अरघे दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई सँग साईं ॥३॥
भयो बिवाह चली बिन दूलह वाट जान समधी समुझाई।
कह कबीर हम गौने जैवै तब कंतलै तूर बजाई ॥ ४ ॥
यह जीव परमपुरुष श्रीरामचन्द्रकी शक्ति है सो जौनी भांतिते याको आपने
स्वरूपको ज्ञान रह्यो है औ फिरि भयो है सो लिखै हैं ॥
सांईके सँग सासूर आई ।
सङ्ग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपने की नाई १
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके लोकको प्रकाश जो ब्रह्म है ताको सांई मानिकै
ताही सङ्ग सासूर जो यह संसार है तहां आई । सासूर संसार काहेते ठहरयों
कि, अहंब्रह्मबुद्धि संसारहीमें होइहै । जब संसारकेबाहिरे रहै है तबतो याको
सुधिही नहीं रहैहै । जब महाप्रलय है जाइहै तब सत् जो है साहबके लोकको
शब्द । ( ३०९ )
प्रकाश ब्रह्म नाहीमें सब रहे हैं । जब उत्पत्तिको समय भयो सुरति पायो तब
आपनेको लोकप्रकाश ब्रह्म मान्यो तब मनभयो । मनते इच्छाभई । तब यह
ब्रह्मकहै हैं कि, मैं जीवात्मामें प्रवेश करिकै नामरूप करि हौं। सो जीवात्मामें प्रवेश
करिकै नाम रूप जीवात्माके करतभयो याहीते याको साँई मानिकै चित् शक्ति जीव
सासूर जो संसार तहां आवत भयो । सो वह ब्रह्मको खसम मानि लेबो धोखा-
है काहेते कि, वह तौ निराकारहै सो वाके संग न सोवत भई, न स्वाद पावत भई
नानारूप धरत भई तेई यौवन है जे सपने की नाई जातभये सो जौनी भांति
चितशक्ति जीव सांईके संग ससुरेमें आई सो लिखेहै अपनेको ब्रह्म मान्यो तब
संसार की उत्पत्ति भई तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दमंगलको ॥ ( सो उत्पत्ति
बीजहै, शून्य प्रलय कर ठाउं । तन छूटे कह जाइहौ, अकह बजायो गाउँ ॥ १॥)
जना चार मिलि लगनशोचाई जना पांच मिलि मंडप छाई।
सखी सहेली मंगल गावैं। दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई॥२॥
जना चार कहे मन बुद्धि चित्त अहंकार ये जे अंतःकरण चतुष्टय हैं तेई
मिलिकै लग्न शोचावतभे अर्थात् जीवको शरीरकी लग्न लगावतभे । औ जनापांचैं
कहें पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश येपांचौं तत्त्व मिलिकै मंडप छावत भये अर्थात्
शरीर बनावत भये । औ सखी सहेली जे हैं पांच कर्मेन्द्रिय ते मंगल गावैंहैं गाइबो
कहाहै कि, रूप रस गंध स्पर्श शब्द ये विषयको लेन लगे । और नाना प्रकारकी
जे पुण्य पापकी वृत्तिहैं तेई कुवांरी कन्याहैं सो नानाप्रकारके पुण्य पाप कराइ-
कै दुःख सुख की हरदी जीवरूप दुलहिनिके माथे चढ़ावै हैं ॥ २ ॥
नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पति आई ।
अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई संग सांई॥३॥
औ नानारूप कहे नाना भांति की जे वासनाहैं तिनहीकी याके मनमें भांवरि
परिगई है । औ चित् अचित्की गांठी परिगई ताहीते ब्रह्मको पति आई कहे पति
आइ गई है अर्थात् ब्रह्मको पति मानिलियो है कि, वह ब्रह्म मैंहीं हौं । हेतु यहहै
( ३१० ) बीजक कबीरदास ।
कि, जब विवाहद्वै जाइहै तब स्त्री अर्द्धांगी ह्वैजाइहै औ सुवासिनि वे कहावैहैं जे या
कुलकी कन्या अनत बिवाही रहैहैं सो जब संसारमें जीव ब्रह्म फांसमें फँसिगयो
तब सुवासिनि जे हैं साहबके जनैया तिनको ब्रह्मसों विवाह नहीं भयो ते अरघ
दैके कहे उपदेश करिकै वाको लैचले सो यद्यपि याको चौका बनोहीहै मड़ये
के तर बैठीही है अर्थात् यद्यपि संसारमें शरीर धारण किये है परंतु तहँ राँढ़
ह्वैगई ब्रह्मको पतिमानि राख्योहै । सो बिचारा मरिगयो अर्थात् वाको धोखा-
समुझि लियो यहां रांड़ हैबो कहिआये औ सांच सांईको संग बनैहै यह जों
कह्यो सो साहब सर्वत्र बनैहै वह अहंब्रह्मको बिचार मिटिगयो ॥ ३ ॥
भयो बिवाह चलीबिनु दूलह वाट जात समधी समुझाई ३
कह कबीर हम गौने जैबे तरब कंतलै तूर बजाई ॥ ४ ॥
सोइ सत रहते विवाह भयो कहे इस तरहते संसारी भयो । औ पुनि बिन
दूलह चलतभई कहे अहंब्रह्म बुद्धि न रहिगई मुक्ति हैकै चित्शक्ति जीव साह-
बके पास जाइबेकी गैल लियो सो वह बाट जातमें समधी जो है शुद्ध समष्टि
जवि सो याको समुझावत भयो कि, जैसे हम शुद्ध हैं तैसे तुमहूं शुद्ध हौ ।
अर्थात् जब जीव साहबके लोक प्रकाशको बेधिकै साहबके लोकको चल्यो तब
यह समुझत भयो किं, जैसे ये शुद्ध रहे हैं तैसे हमहूं शुद्ध रहेहैं, यह बीचहीमें
धोखा भयो है। उनको देखिकै यह ज्ञान भयो यही उनको समुझाइबो है । सो कबीर
जो है कायाको बीर जीव सो कहैहै कि, मन बचनके परे जो साहब के ऊपर
दूसरो साहब नहीं है जासों हमारो विवाह ह्वैबेको नहीं है । वह हमारो सदा
कौं कंत है । तहां हम गवनजाइहै अर्थात् तहांको हम गवन करेंगे । अरु वाही
कंतको लैके कहे पाइकै तरिजाब । औरे कंतको लैके न तरेंगे । औ तहँ परम
मुक्ति रूपी तूर बजावेंगे । अर्थात् और ईश्वरनमें लागे औ आपनेको ब्रह्म माने
मुक्तिरूपी तूर न बाजैगो अर्थात् संसार औ सब उपासना औ ब्रह्म ह्वैजाइबो
ये सब तुरिकै साहबके पास जाइकै अर्थात् डंकादैके जाइगो ॥ ४ ॥
इति चौवनवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३११ )
अथ पचपनवां शब्द ॥ ५५ ॥
नलको ढाढ़स देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ १ ॥
सिंह शार्दुल यक हर जोतिनि सीकस बोइनि धाना ।
बनकी भलुइया चाखुर फेरै छागर भये किसाना ॥ २ ॥
कागा कपरा धोवन लागे बकुला किररै दांता ।
माछी मूड़ मुड़ावन लागी हमहूं जाव वराता ॥ ३ ॥
छेरी बाघहि ब्याह होतहै मंगल गावै गाई ।
बनके रोझ धै दाइज दीन्हो गोह लोकंदै जाई ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जो यह पद अर्थावै ।
सोई पँडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५ ॥
जिनको सद्गुरु मिले तिनको या भांतिउद्धार है गयो औ जिनको सद्गुरु
नहीं मिले जे सद्गुरुको नहीं मान्यो तिनको गुरुवा लोग और और मतमें
लगाइदेइ हैं वे साहब को नहीं जाने हैं सो कबीरजी कहै हैं ॥
नलको ढाढ़स देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ १ ॥
साहब कहते हैं कि, हे भाई! हेसंतौ! ढाढ़सदेखो यहजीव मेरो अंशहै सो
मोको नहीं जानै है और औरमें लागिकै खराब होइ है नाना दुःखसहै है मोकों
जानिकै दुःख नहीं त्यागकरै है बड़ो ढाढ़सी है । सो हे भाइउ ! ढाढ़स करिकै
जौनेके लिये जामें यह लगै है सो ब्रह्म अकथ कथा है कहिबे लायक नहीं है ।
वह ब्रह्म विचार झूठा है वहां कछु प्राप्ति नहीं है सो अकथ कथा कहै हैं ॥ १ ॥
सिंहशार्दुल यकहरजोतिनि सीकस बोइनि धाना ।
वनकी भलुइया चाखुरफेरै छागरभयेकिसाना ॥ २ ॥
यहां सिंह जो है जीव शार्दूल जो है मन येई दोऊ बैल हैं । कर्म जो हैं
सोई हर संसार सीकस भूमि है कहे ऊषर भूमि है । अजा कहावै है माया सोई
( ३१२ ) बीजक कबीरदासँ ।
छेरी ताको पति बोकरा है सो छागर कहावै । तेई माया में लपटे किसान गुरु-
वा लोग सो जोतिकै उपदेश रूप धान बोवत भये । औ तौने नवानाके जे
भुलुइया कहे भुलावनहारे पण्डित तेई चाखुर फेरैं कहे निरावै हैं अर्थात् तातें
वृत्ति करिकै वेद जो साहब को बतावै है ताको अर्थ फेरिडारै हैं ॥ २ ॥
कागा कपरा धोवन लागे बकुला किररै दांता ।
माछी मूड़ मुड़ावन लागी हमहूं जाब बराता ॥ ३ ॥
नाना पाखंड मतमें परे ऐसे जे हैं मलिन पाखंडी जीव तेई काग हैं । ते
कपरा धोवनलगे कहे सबको उपदेश करै हैं कि, हमारेमत में आवो तौ हम
तुम्हारो अंतःकरण शुद्ध करिदेहूँ ! औ रूपकपक्षमेंजब बरात जाइहै तब सबुनी
करिकै लोग जाइहैं ताते यहां सबुनी करिबो लिख्यो । अरु जिनके अंतःकरण-
रूपी धोवनको वे उपदेशकियो तेई बकुलाभये कहे ऊपरते तो वेष बनाये चन्दन
टोपी दिये हैं औ अंतःकरण मलिनहै बिषयमें चित्तलगाये रहे हैं । जहां कोई
संत मत कहन लगे है ताको खण्डन करिदारै हैं । दांत किररै हैं कहे कोप
करै हैं जैसे बकुला ऊपरते तोस्वच्छ है औ नदी के तीर मछरी खाइबेको बैठे
है । भीतर बासना मलीन भरी है; हंस आवै हे तिनको डेरवाय कै बैठन नहीं
देइहै दांतकिररै है! तैसे बरात जब चलै है तब कारिंदा कामकाजी सफेद कपरा
पहिरि दांत किररै हैं कि, यह कामकरो वह कामकरो कहा बैठे हौ यह रिस करै ।
औ माछी कहे जो माया ते क्षीण हैबेको बिचारकरै हैं, ते माछी कहवावै हैं ।
अर्थात् मुमुक्षू ते नाना मतके जे गुरुवा लोग हैं तिनके यहां मूड़ मुड़ावै हैं कि,
हमहूं बरात जाब कहे हमहूं मुक्त होब । सो वहां मुक्तितो पायो नहि पर गुरु
वनकी मीठी बानी में परिकै आपने को ब्रह्म मानत भये तेहिते स्वस्वरूपको ज्ञान
न रहिगयो मायामें फँसिगये औ रूपक पक्षमें दुलहा के संगती जे हैं ते बार
बनवावै हैं ॥ ३ ॥
छेरी बाघहि ब्याह होत है मंगल गावै गाई ।
वनके रीझ धै दाइज दीन्हो गोह लोकंदै जाई ॥ ४ ॥
शब्द । ( ३१३ )
अब ब्याहको रूपक कहैं हैं । गुरुवा लोग जे हैं तेई पुरोहित हैं उपदेश करन
वारे ते छेरी जो है माया ताको औ बाघ जो है जीव ताको ब्याह होतहै अर्थात्
जीवको मायामें डारिदेइ हैं । औ छेरी जो है माया ताको वाघ जो है जीव
सो खाइलेनवारो है अर्थात् जो जीव आपने स्वरूपको जानै तौ मायाको नाश
करिदेई । अरु तहांगायरूपी जो गायत्री है सो मंगल गावै है अर्थात् सब
जीवको कर्त्तव्य गायत्री गावै है वेद गायत्री ते कह्यो है औ वन कहे वाणीकों
रोझ जो है प्रणव ताको दाइज दीन्हो । यहां रोझको प्रणव काहेते कह्यो
कि, रोझ गवै कहावै हैं काहेते कि, गोकी सदृश होइ है । सो गैया
जो है गायत्री ताके सदृश प्रणवही है अर्थात् वह गायत्री प्रणवही ते निकसी
है । प्रणव ब्रह्म है ताको दाइज दीन्हो कहे ब्रह्म मैंहीं हौं । यही प्रणवको
अर्थ समुझाइ दीन्हो । कन्याकेसाथ जो डोलहाइ जाइ हैं तेलोकंदी
[L13
( ३१४ ) बीजक कबीरदास ।
श्रीकबीरजी साहब की उक्तिमें कहैहैं गुरुमुख ।
अथ छप्पनवां शब्द ॥ ५६ ॥
॰ नरको नहिं प्रतीति हमारी ।
झूठे बनिज कियो झूठे सन पूजी सबै मिलि हारी ॥ १ ॥
षट दर्शन मिलि पंथ चलायो तिर देवा अधिकारी ।
राजा देश बड़ो परपंची रइअत रहत उजारी ॥ २ ॥
इतते उत औ उतते इत रहु यमकी सांट सँवारी ।
ज्यों कपि डोर बांधि वाजीगर अपने खुशी परारी ॥ ३ ॥
यहै पेठ उत्पत्ति प्रलय को विषया सबै विकारी ।
जैसे श्वान अपावन राजी त्यों लागी संसारी ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो वचन हमारो ।
अजहूं लेहुं छोड़ाय कालसों जो घट सुरति सँभारो ॥५॥
नरको नहिं प्रतीति हमारी ।
झूठे बनिज कियो झूठे सन पूजी सबै मिलि हारी ॥१॥
सबते गुरु परम परपुरुष पर श्रीरामचन्द्र कहै हैं कि, नरको हमारी पर
तीति नहीं है सब लोग झूठेसों झूठी बनिज करत भये । कहे झूठे ब्रह्ममें जे
लगावैं हैं ऐसे जे गुरुवा लोगहैं सौदागर तिनसा झूठी बनिज करतभये कहे झूठे
ब्रह्मम लगावैं हैं अर्थात् जो वे उपदेश कियो कि, "तुमहीं ब्रह्महौ" सो झूठा है
तासों बनिज करिकै पूजी सब हारिगयो कहे अपनी आत्माको ज्ञान भूलि गयो ।
कौन ज्ञान भूलिगये कि, यह आत्मा तो मेरो सदाको दास है बद्धहूमें मुक्तहूमें
है ताम प्रमाण॥ "दासभूताः स्वतः सर्वे ह्यात्मानः परमात्मनः । नान्यथा लक्ष-
णन्तेषां बंधे मोक्षे तथैव च" ॥ इति पद्मपुराणे ॥ १ ॥ जो कहौ भुलवाइ कौन
दियो ? सो आगे इसका समाधान करते हैं ।
शब्द । ( ३१५ )
षट दर्शन मिलि पंथ चलायो तिर देवा अधिकारी ।
राजा देश बड़ो परपंची रइअत रहत उजारी ॥ २ ॥
औ षट् दर्शन जे हैं ते मिलिकै नानापंथ चलावत भये । कोई योगीह्वैकै
योग धारण करन लग्यो, औ कोई अनुभव कथिकै शून्य ज्ञान पंथ चलायो, अरु
कोई नाना प्रकार के कर्म करने लगे, औ कोई नाना उपासना करने लग्यो,
औ कोई मैं ब्रह्महौं यह कहने लग्यो, औ कोई कर्त्ता न्यारा है यह कहने लग्यों
औ कोई मतछोड़िकै आत्मामें स्थित भयो । या ब्रह्मांडमे ब्रह्मा विष्णु महेश
अधिकारी हैं ते सब मतनके अधिष्ठाता हैं या हेतुते सत रज तमते कोई नहीं
छूट्यो । औ ओई राजाहैं जे हैं ब्रह्मा विष्णु महेश आ उनको देश जोहै सत
रज तम सो बड़ो परपञ्ची है याहीतें रइअत जे और सब जीवहैं तिनके अन्तः-
करण उजारि रहे हैं जो है भक्ति मोर, जो है ज्ञान मोर, सो उनको अन्तःकरण
में नहीं होन पावै हैं ॥ २ ॥
इतते उत रहु उतते इत रहु यमकी सांट सँवारी ।
ज्यों कपि डोर बांधि वाजीगर अपने खुशी परारी॥३॥
तेहिते इत उत कहे कहूं स्वर्ग जाइहै, कहूं नरक जाइ है, कहूं अपने
उपास्य देवतनके लोक जाइ फिरि इहां आयकै उनहींकी उपासना करै है औ
पुनि जब उपासना भूलै तब पुनि पापकरिकै नरक जाइहैं तिनके वास्ते यमकी
सांठ सँवारी कहे यमके दंडते नहीं बचैहै । जौने कपि कहे बाँदर को बाजीगर
आपनी डोरि ते बांधैहै औ वह बांदर बाजीगरके वश ह्वैगयो तब आपनी खुशी तें
बाके बंधनमें परो रहै है नाना नाच नाचै है प्रथम चित् शक्ति में जगतको
कारण रूप बनो रह्यो याही भांति सब जीव माया ब्रह्मके बश ह्वैगयो, तब वहीं
बंधन में अपनीखुशी ते परे रहे हैं; वही ब्रह्मको ज्ञान करे हैं मोको नहीं जानेहैं ॥ ३ ॥
यहै पेठ उत्पत्ति प्रलयको विषया सबै विकारी ।
जैसे श्वान अपावन राजी त्यों लागे संसारी ॥ ४ ॥
यहै माया ब्रह्म उत्पत्ति प्रलयको पेठहै । अरु संसारमें जे संपूर्ण बिषय हैं
तेई विकार हैं याते मोहिंते व्यतिरिक्त जे पदार्थ संसार में ज्ञान योग वैराग्य
( ३१६ ) बीजक कबीरदास ।
भक्ति आदिक जेहैं ते सब विषय हैं या हेतुतें कि, जामें जामें मन लगैहै तेंसब
मनके विषय हैं । ते सब बिकारई हैं औ जो "यहै पेठ उत्पत्ति प्रलयको सौदा
सबै बिकारी"ऐसो पाठ होइ तौ यह अर्थ पेठ नाऊं हाटको यह देश भाषा है सों
अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनके उत्पत्ति प्रलय को माया ब्रह्म दोनों तरफकी पेठ कहे
बजार हैं । सो यह जगत शहरहै विषयरूपी सौदा जो है ताके संसारी जीव लग-
वारे हैं सो जैसे श्वान ( कुत्ता ) सो अपावन जो हाड़है ताको चाटैहै तब वोहीं-
के दांतते लोहू निकसै है सो हाड में लगैहै सोऊ चाटतै जायहै, वही में राजी
रहैहै; तैसे यह आत्मा अपने भ्रममें परा है वहीको भ्रम नाना विषयमें सुखरूप
देखो परैहै । सो विषयतो जड़है विषय में सुख नहीं है याहीको सुख बिषयन
में जाइरहैहै आपनोई सुख विषयमें पावै है अरु मानै है कि, मैं बिषयको सुख-
पाऊं हौं अरुपर वह ब्रह्मको अनुभव कियो तहां वाके आत्मैको सुख मिलै है;
जानै यह है कि, मोको ब्रह्मानन्द भयोहै । काहेते कि, जब भर अहं ब्रह्म बुद्धि
रहैहै तबभर तो मूलाज्ञान ठहराइ है जब सबको निराकरण है गयो एक आत्मा
ही को ज्ञान रहिगंयो सो ब्रह्मानंद रूप होइहै तेहिते वहब्रह्मानन्द आत्माहीकों
आनन्दहै सो जैसे श्वान आपनेही लोहूके स्वादते हाड़को चाटैहै तैसे यहौं आप-
नो सुख विषय ब्रह्ममें पाइकै भूलि रह्यो संसारी ज्ञान याके लगीरह्यो है ॥४॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो वचन हमारो ।
अजहूं लेहुं छोड़ाय कालसों जो घट सुरति सँभारो ५
सो हे कबीर कायाके बीर जीवो ! हम तुमसों यह अद्भुत ज्ञान कहैहैं
हमारो बचन मानौ जो अपने घटमें सुरति सँभारो औ वह सुरति मोमें लगावों
तौ अबहूं कहे माया ब्रह्ममें तुम परेहौ ताहूपर तुमको मैं कालते छोड़ायलेउँ
अथवा अजहूं को भाव यह है कि, कालकी दाढ़ में तुम परिचुके हौ सो कालते
तुमको छोड़ाइ लेउँगो ॥ ५ ॥
इति छप्पनवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३१७ )
अथ सत्तावनवां शब्द ॥ ५७ ॥
ना हरि भजै न आदत छूटी ।
शब्दै समुझि सुधारत नाहीं अँधरे भये हियोकी फूटी ॥१॥
पानी माहँ पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका ।
सहस घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेका सूखा ॥ २ ॥
सेते सेते सेत अंग भो शयन बढ़ी अधिकाई ।
जो सनिपात रोगि अहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥
अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी ।
निकट पयाना यमपुर धावै बोलहि एकहि बानी ॥ ४ ॥
सतग रु मिले बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै ।
कह कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥५॥
ना हरि भजै न आदत छूटी ।
शब्दै समुझि सुधारत नाहीं अँधरे भये हियो की फूटी ॥१॥
ना तैं हरि भजै है अरु ना तेरी आवागमनकी आदत कहे स्वभाव छूट्यो ।
यह अर्थ साहबके कहे शब्दको सुनिकै औ बिचारिकै जो आपनो नहीं सुधारैहै
सो काहे नहीं सुधारैहै । काहेते कि, साहब कहतई जाइहैं कि, जो मो कों
अबहूं जीव जानै तौ कालते छोड़ाय लेउँ । ताते आंधर भये हियोकी तिहारी
फूटिगई कहे यहै आदत करत करत वृद्धावस्था पहुँची इन्द्रियन जवाब दियों
तामें प्रमाण । “ नेह गये नैना गये, गये दांत औ कान । प्राण छरीदा
रहिगये, तेऊ कहत हैं जान ” ॥ अबहूं तौ जानौ भजन करिकै छूटिजाउ ॥ १॥
पानीमाहँ पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका ॥
सहस घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेका सूखा ॥ २ ॥
( ३१८ ) बीजक कबीरदास ।
हे जीवौ ! तुम बड़े जड़ हौ जैसे पानीमें पाषाणकी रेखा कहे छोटी शरबती
पथरी डारि राखै तो और भभूका आगीकों उठनलगे है । चकमक में ठोंकेते
तैसे जस जस साधुलोग उपदेश करत जाइहैं तस तस साहब को भजन तौ
नहीं करौहौ और काम क्रोध आदिक जे आगी हैं तें तुमको जोर करत जाइ
हैं । अर्थात् जब उपदेश करन लगे है तब अधिक रिस करन लगौहौ, जैसे
पाषाणमें नित हजारन घड़ा जल ढोरै पै पाषाण भीतर सूखै रहै है तैसे
केतऊ ज्ञान उपदेश करै परन्तु हे जीवौ । तुम जड़के जड़ही बने रहौहौ ॥२॥
सेते सेते सेत अंगभो शयन बढ़ी अधिकाई ।
जो सनिपात रोगिअहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥
सेत सेत जो ब्रह्महै तामें लगे लगे तुम भीतर बाहर सफेद द्वैगये अर्थात्
बुढ़ाय गये ऊपरौ के रोमा बुढ़ाय गये । ब्रह्ममें सोवत सोवत तोको आपनों
स्वरूप भूलिगयो तब शयनमें कहे सो वन अधिकाई बढ़ी कहे अधिक सोव-
नलगे अर्थात् समाधिकरनलगे । अपनीआत्माको ज्ञान औ साहबको ज्ञान औ
जगत् भूलिगयो पिशाचवत् मूकवत् जड़वत् उन्मत्तवत् बालवत् तेरीदशाद्वैगई ।
सोई लक्षण सन्निपातमें होइहै सो तोको सन्निपात भयो है । सन्निपातरोंग
याको मारैहै औ उनको आत्माको ज्ञान भूलि जाइहै । ब्रह्म हैबो साधुलोग
सिद्धि पाईहैं कि, हम सिद्धहैं यह मानि ले ही आत्माको ब्रह्म हैबो असिद्धहै
सो आगे कहैं हैं । " सीते सीते पाठहोइ तौ ज्ञान करत करत कि, संसार
ताप हमारो छूटि जाइ शीत अंग द्वैगये । कहे सन्निपातकी अधिकाई तुम्हारे
अङ्गमें बढ़िआई अर्थात् सन्निपात में खबरि देह की भूलि जाइहै । औ रोगी-
यनका मारै है सोई साधुलोग सिद्धिपाई है कि, हमको देहकी खबरि भूलिगई
हम सिद्ध द्वैगये ॥ ३ ॥
अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी ॥
निकट पयाना यमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ ४ ॥
वह जो ब्रह्म है ताकी हद नहीं है ताको अनहद कहत कहत कहे नेति
नेति कहत २ संसार विनशि गयो । अनहद जो ब्रह्म है तामें सृष्टिके सब
शब्द । (३१९)
लोग समाइगये औ सृष्टिमें वह अनहदब्रह्म समाइ गयो सो मानत तों यहहै
कि, सब ब्रह्महीमें समाइहै कहे ब्रह्म ह्वै जाइहै परन्तु निकट पयाना यमपुर-
हीको धाइबो है अर्थात् अपनेको ब्रह्ममानिकै ब्रह्मनहीं होइहै यमपुरही को
चलेजायाँहैं तेऊ एकही वाणी बोलैहैं कि, एक ब्रह्मही है दूसरा नहीं है ।
तामें धुनि यहहै कि, अरे मूढ़ एकतो ब्रह्म है नरकै कौन जायहै ॥ ४ ॥
सतगुरु मिले बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै ।
कह कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥५॥
हे जीवौ! तुमको सतगुरु मिलै तौ वे राम नाम रूपी पदमें साहब मुख अर्थ
बताइ देइं । तौनेको जोतुम बिचारौ तौ बहुत सुख पावो श्रीकबीरजी कहैहैं जे
शब्दन्को अनर्थ अर्थ बताइकै गुरुवालोगन बिगारि डारचो है ते शब्द सतगुरु
सुधारैहैं काहेते अनर्थ अर्थ खंडन करिकै वे वेद शास्त्रादिकन के शब्दके तात्प-
र्यार्थ छोड़ाइकै साहब मुख अर्थ बताइदेइहैं । सो जो वा शब्द जो, रामनाम ताकों
जगद् मुख' अर्थ बताइ देइहै सो जो कोई राम नामरूपी पद में साहब मुख
अर्थ बिचार सो सदा सुखी रहैहै ॥ ५ ॥
इति सत्तावनवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठावनवां शब्द ॥ ५८ ॥
नर हर लागी दव विकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा।
मैं जानों तोहींते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
पानी माहूँ अगिनिको अंकुर मिल न बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥ २ ॥
शहर जरै पहरू सुख सोवै कहै कुशल घर मेरा ।
कुरिया जरै वस्तु नेज उबरे विकल राम रँग तेरा ॥ ३ ॥
कुबिजा पुरुष गले एक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जन्म गो खीसा ई तन रहल असाधा ॥४॥
( ३२० ) बीजक कबीरदास ।
जानि बूझि जो कपट करतहै तेहि अस मंद न कोई ।
कह कबीर सब तरि रामकी मोते और न कोई ॥ ६ ॥
नर हर लागी दव बिकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा ।
मैं जानों तोहीं ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
हे नरहर दवलागी कहे तेरे स्वरूप की हरनवारी मायारूपी दवारि लगी है ।
तैं कैसैहै ? विकार बिन । तौ माया मोको काहेको लगीहै ? तौ विना ईंधन
को बुझावनवारो तोको नहीं मिल्यो, जो तोको समुझाइ देई कि, तैं बिन
विकारको है जो मिलौहै सो नाना उपासना नाना मत रूप ईंधन डानर वारो
मिलाहै । साहबको ज्ञान रूप जल डारै माया रूप दवारि कैसे बुझाइ सो मैं
जानौ हौं या मायारूपी दवारि तोहीते उत्पन्न भै अर्थात् मायादिक तोहीं तें
भये ताहीमें सब संसार जरो जाइहै ॥ १ ॥
पानी माँह अगिनिको अंकुर मिलन बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥२॥
सो वह मायारूपी अग्निको अंकुर पानीमें है कहे नाना वेद शास्त्रादिक वाणीमें
हैं ते वेद शास्त्रादिकनके अर्थको बदलिकै साहबको छिपाइक मायारूपी अग्निको
प्रकट कियो औ तोकोऔरै औरैमें लगाइ दियो । अर्थात् वे सब मतनको फल
ब्रह्मह्वै जाइबो बताइ दियो । वह अग्निको बुझावन को वेद शास्त्रादिकन को जो
सांच अर्थहैं जल सो नहीं मिलै है । अथवा जे वेद शास्त्रादिकन के सांच अर्थ
मुनि जन लोग बनाइ गये हैं, बशिष्ठ संहिता, शुक संहिता हनुमत्संहिता, अग-
स्त्यसंहिता, सदाशिवसंहिता, सुन्दरीतंत्रादिक ग्रन्थ औ वेदशिरोपनिषद्
विश्वम्भरोपनिषदादिक सांचे मतके कहनवारेते जल नहीं मिलैहै । सो जब वह
आगि लगी तब अद्वैत करिकै बहुत समुझावैहैं परन्तु एक वह आत्मा नहीं जरै
औ साहबमें जे नवधा भक्तिहैं ते नव नारी हैं ते जरैहैं सोयह युक्ति कोई नहीं
जान्यो कि आत्मा ब्रह्म नहीं होइहै औ साहब को जानै तौ वे नवधा भक्ति
न जरैं ॥ २ ॥
शब्द । ( ३२१ )
शहर जरै पहरू सुख सोवै कहै कुशल घर मेरा ।
कुरिया जरै वस्तु निज उवरै विकल राम रंगतेरा ॥३॥
औ शहर कहै साहबके मिलिबे के जेते ज्ञानहैं जीवात्मा के ते जरै जाइहैं
औ पहरू जो आत्मा सो सुखसों सोवै है कहै साहबके बतावनवारे संतनहीं दुरैहैं
जे आपने बाणीरूप जलसों माया ब्रह्म रूपी आगी बुतावै । सोवतै रहैहै औ
यह कहै है कि, मैं सच्चिदानन्द हों, सो मेरोघर जोहै सच्चिदानन्द सो कुशलहै यह
नहीं जानै है कि, ये सब तो जरिही गये सो मैंहू जरिजाउँगो। एक माया ब्रह्मरूपी
आगिही रहिजायगी । वही आगिमैं तेरी कुरिया जोहै स्वस्वरूप ज्ञानकी सोऊ
जरिजाइगी । अर्थात् जब ब्रह्मास्मि में सुषुप्ति होयगी तब मैं सच्चिदानन्द
रूपहौं यहू ज्ञान न रहिजाइगो । याही ते तैं विकल है सो यह करु जाते तेरी
वस्तुजो है साहब में नवधा भक्ति सो उबरै औरे औरे रंगमें लगिबो तेरो रंग
नहीं है श्रीरामचन्द्रके रंगमें रंग यही तेरो रंग है ॥ ३ ॥
कुबिजा पुरुष गले एक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जन्मगो खीसा ई तन रहल असाधा ॥ ४ ॥
कुबिजा पुरुष कहै अंगभंग पुरुष जो वह ब्रह्म है नपुंसक ताको एकमानिकै
कि, एक ब्रह्मही है ताकेगले में, हे साहबकी जीवरूपाशक्ति ! तैं लागी सो
जैसे नपुंसक पुरुषकेसंग स्त्रीकी साधनहीं पूजै है तैसे वह ब्रह्म में लगे
तुम्हारी साध नहीं पूजै है कहै वामें आनंद नहीं मिलैहै । वही ब्रह्मको विचार
करत जन्म खीस कहै वृथा जाइ है । तन कहै यह मनुष्य शरीर पाइकै
असाध रहै है कहै साहबके मिलनको सुख नहीं पावै है ॥ ४ ॥
जानि बूझि जो कपट करतहै तेहि अस मंद न कोई ।
कह कबीर सब नारि रामकी मोते और न होई ॥ ५ ॥
सो जानि बूझिकै जे लोग कपट करै हैं कहै वह धोखा ब्रह्ममें लगे हैं तिन
ऐसो मंद कहै मूढ कोई नहीं है । सो कबीरजी कहै हैं कि, जहांभर चित्
शक्ति जीव हैं ते सब श्रीरामचन्द्रकी नारी हैं सो मैं जानौ हौं, याते मोते और
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