कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१८ ) बीजक कबीरदास ।
हे जीवौ ! तुम बड़े जड़ हौ जैसे पानीमें पाषाणकी रेखा कहे छोटी शरबती
पथरी डारि राखै तो और भभूका आगीकों उठनलगे है । चकमक में ठोंकेते
तैसे जस जस साधुलोग उपदेश करत जाइहैं तस तस साहब को भजन तौ
नहीं करौहौ और काम क्रोध आदिक जे आगी हैं तें तुमको जोर करत जाइ
हैं । अर्थात् जब उपदेश करन लगे है तब अधिक रिस करन लगौहौ, जैसे
पाषाणमें नित हजारन घड़ा जल ढोरै पै पाषाण भीतर सूखै रहै है तैसे
केतऊ ज्ञान उपदेश करै परन्तु हे जीवौ । तुम जड़के जड़ही बने रहौहौ ॥२॥
सेते सेते सेत अंगभो शयन बढ़ी अधिकाई ।
जो सनिपात रोगिअहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥
सेत सेत जो ब्रह्महै तामें लगे लगे तुम भीतर बाहर सफेद द्वैगये अर्थात्
बुढ़ाय गये ऊपरौ के रोमा बुढ़ाय गये । ब्रह्ममें सोवत सोवत तोको आपनों
स्वरूप भूलिगयो तब शयनमें कहे सो वन अधिकाई बढ़ी कहे अधिक सोव-
नलगे अर्थात् समाधिकरनलगे । अपनीआत्माको ज्ञान औ साहबको ज्ञान औ
जगत् भूलिगयो पिशाचवत् मूकवत् जड़वत् उन्मत्तवत् बालवत् तेरीदशाद्वैगई ।
सोई लक्षण सन्निपातमें होइहै सो तोको सन्निपात भयो है । सन्निपातरोंग
याको मारैहै औ उनको आत्माको ज्ञान भूलि जाइहै । ब्रह्म हैबो साधुलोग
सिद्धि पाईहैं कि, हम सिद्धहैं यह मानि ले ही आत्माको ब्रह्म हैबो असिद्धहै
सो आगे कहैं हैं । " सीते सीते पाठहोइ तौ ज्ञान करत करत कि, संसार
ताप हमारो छूटि जाइ शीत अंग द्वैगये । कहे सन्निपातकी अधिकाई तुम्हारे
अङ्गमें बढ़िआई अर्थात् सन्निपात में खबरि देह की भूलि जाइहै । औ रोगी-
यनका मारै है सोई साधुलोग सिद्धिपाई है कि, हमको देहकी खबरि भूलिगई
हम सिद्ध द्वैगये ॥ ३ ॥
अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी ॥
निकट पयाना यमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ ४ ॥
वह जो ब्रह्म है ताकी हद नहीं है ताको अनहद कहत कहत कहे नेति
नेति कहत २ संसार विनशि गयो । अनहद जो ब्रह्म है तामें सृष्टिके सब