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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

शब्द । (३१९)
लोग समाइगये औ सृष्टिमें वह अनहदब्रह्म समाइ गयो सो मानत तों यहहै
कि, सब ब्रह्महीमें समाइहै कहे ब्रह्म ह्वै जाइहै परन्तु निकट पयाना यमपुर-
हीको धाइबो है अर्थात् अपनेको ब्रह्ममानिकै ब्रह्मनहीं होइहै यमपुरही को
चलेजायाँहैं तेऊ एकही वाणी बोलैहैं कि, एक ब्रह्मही है दूसरा नहीं है ।
तामें धुनि यहहै कि, अरे मूढ़ एकतो ब्रह्म है नरकै कौन जायहै ॥ ४ ॥
सतगुरु मिले बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै ।
कह कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥५॥
हे जीवौ! तुमको सतगुरु मिलै तौ वे राम नाम रूपी पदमें साहब मुख अर्थ
बताइ देइं । तौनेको जोतुम बिचारौ तौ बहुत सुख पावो श्रीकबीरजी कहैहैं जे
शब्दन्को अनर्थ अर्थ बताइकै गुरुवालोगन बिगारि डारचो है ते शब्द सतगुरु
सुधारैहैं काहेते अनर्थ अर्थ खंडन करिकै वे वेद शास्त्रादिकन के शब्दके तात्प-
र्यार्थ छोड़ाइकै साहब मुख अर्थ बताइदेइहैं । सो जो वा शब्द जो, रामनाम ताकों
जगद् मुख' अर्थ बताइ देइहै सो जो कोई राम नामरूपी पद में साहब मुख
अर्थ बिचार सो सदा सुखी रहैहै ॥ ५ ॥
इति सत्तावनवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठावनवां शब्द ॥ ५८ ॥
नर हर लागी दव विकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा।
मैं जानों तोहींते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
पानी माहूँ अगिनिको अंकुर मिल न बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥ २ ॥
शहर जरै पहरू सुख सोवै कहै कुशल घर मेरा ।
कुरिया जरै वस्तु नेज उबरे विकल राम रँग तेरा ॥ ३ ॥
कुबिजा पुरुष गले एक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जन्म गो खीसा ई तन रहल असाधा ॥४॥