कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३१५ )
षट दर्शन मिलि पंथ चलायो तिर देवा अधिकारी ।
राजा देश बड़ो परपंची रइअत रहत उजारी ॥ २ ॥
औ षट् दर्शन जे हैं ते मिलिकै नानापंथ चलावत भये । कोई योगीह्वैकै
योग धारण करन लग्यो, औ कोई अनुभव कथिकै शून्य ज्ञान पंथ चलायो, अरु
कोई नाना प्रकार के कर्म करने लगे, औ कोई नाना उपासना करने लग्यो,
औ कोई मैं ब्रह्महौं यह कहने लग्यो, औ कोई कर्त्ता न्यारा है यह कहने लग्यों
औ कोई मतछोड़िकै आत्मामें स्थित भयो । या ब्रह्मांडमे ब्रह्मा विष्णु महेश
अधिकारी हैं ते सब मतनके अधिष्ठाता हैं या हेतुते सत रज तमते कोई नहीं
छूट्यो । औ ओई राजाहैं जे हैं ब्रह्मा विष्णु महेश आ उनको देश जोहै सत
रज तम सो बड़ो परपञ्ची है याहीतें रइअत जे और सब जीवहैं तिनके अन्तः-
करण उजारि रहे हैं जो है भक्ति मोर, जो है ज्ञान मोर, सो उनको अन्तःकरण
में नहीं होन पावै हैं ॥ २ ॥
इतते उत रहु उतते इत रहु यमकी सांट सँवारी ।
ज्यों कपि डोर बांधि वाजीगर अपने खुशी परारी॥३॥
तेहिते इत उत कहे कहूं स्वर्ग जाइहै, कहूं नरक जाइ है, कहूं अपने
उपास्य देवतनके लोक जाइ फिरि इहां आयकै उनहींकी उपासना करै है औ
पुनि जब उपासना भूलै तब पुनि पापकरिकै नरक जाइहैं तिनके वास्ते यमकी
सांठ सँवारी कहे यमके दंडते नहीं बचैहै । जौने कपि कहे बाँदर को बाजीगर
आपनी डोरि ते बांधैहै औ वह बांदर बाजीगरके वश ह्वैगयो तब आपनी खुशी तें
बाके बंधनमें परो रहै है नाना नाच नाचै है प्रथम चित् शक्ति में जगतको
कारण रूप बनो रह्यो याही भांति सब जीव माया ब्रह्मके बश ह्वैगयो, तब वहीं
बंधन में अपनीखुशी ते परे रहे हैं; वही ब्रह्मको ज्ञान करे हैं मोको नहीं जानेहैं ॥ ३ ॥
यहै पेठ उत्पत्ति प्रलयको विषया सबै विकारी ।
जैसे श्वान अपावन राजी त्यों लागे संसारी ॥ ४ ॥
यहै माया ब्रह्म उत्पत्ति प्रलयको पेठहै । अरु संसारमें जे संपूर्ण बिषय हैं
तेई विकार हैं याते मोहिंते व्यतिरिक्त जे पदार्थ संसार में ज्ञान योग वैराग्य