कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१६ ) बीजक कबीरदास ।
भक्ति आदिक जेहैं ते सब विषय हैं या हेतुतें कि, जामें जामें मन लगैहै तेंसब
मनके विषय हैं । ते सब बिकारई हैं औ जो "यहै पेठ उत्पत्ति प्रलयको सौदा
सबै बिकारी"ऐसो पाठ होइ तौ यह अर्थ पेठ नाऊं हाटको यह देश भाषा है सों
अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनके उत्पत्ति प्रलय को माया ब्रह्म दोनों तरफकी पेठ कहे
बजार हैं । सो यह जगत शहरहै विषयरूपी सौदा जो है ताके संसारी जीव लग-
वारे हैं सो जैसे श्वान ( कुत्ता ) सो अपावन जो हाड़है ताको चाटैहै तब वोहीं-
के दांतते लोहू निकसै है सो हाड में लगैहै सोऊ चाटतै जायहै, वही में राजी
रहैहै; तैसे यह आत्मा अपने भ्रममें परा है वहीको भ्रम नाना विषयमें सुखरूप
देखो परैहै । सो विषयतो जड़है विषय में सुख नहीं है याहीको सुख बिषयन
में जाइरहैहै आपनोई सुख विषयमें पावै है अरु मानै है कि, मैं बिषयको सुख-
पाऊं हौं अरुपर वह ब्रह्मको अनुभव कियो तहां वाके आत्मैको सुख मिलै है;
जानै यह है कि, मोको ब्रह्मानन्द भयोहै । काहेते कि, जब भर अहं ब्रह्म बुद्धि
रहैहै तबभर तो मूलाज्ञान ठहराइ है जब सबको निराकरण है गयो एक आत्मा
ही को ज्ञान रहिगंयो सो ब्रह्मानंद रूप होइहै तेहिते वहब्रह्मानन्द आत्माहीकों
आनन्दहै सो जैसे श्वान आपनेही लोहूके स्वादते हाड़को चाटैहै तैसे यहौं आप-
नो सुख विषय ब्रह्ममें पाइकै भूलि रह्यो संसारी ज्ञान याके लगीरह्यो है ॥४॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो वचन हमारो ।
अजहूं लेहुं छोड़ाय कालसों जो घट सुरति सँभारो ५
सो हे कबीर कायाके बीर जीवो ! हम तुमसों यह अद्भुत ज्ञान कहैहैं
हमारो बचन मानौ जो अपने घटमें सुरति सँभारो औ वह सुरति मोमें लगावों
तौ अबहूं कहे माया ब्रह्ममें तुम परेहौ ताहूपर तुमको मैं कालते छोड़ायलेउँ
अथवा अजहूं को भाव यह है कि, कालकी दाढ़ में तुम परिचुके हौ सो कालते
तुमको छोड़ाइ लेउँगो ॥ ५ ॥
इति छप्पनवां शब्द समाप्त ।