कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१२ ) बीजक कबीरदासँ ।
छेरी ताको पति बोकरा है सो छागर कहावै । तेई माया में लपटे किसान गुरु-
वा लोग सो जोतिकै उपदेश रूप धान बोवत भये । औ तौने नवानाके जे
भुलुइया कहे भुलावनहारे पण्डित तेई चाखुर फेरैं कहे निरावै हैं अर्थात् तातें
वृत्ति करिकै वेद जो साहब को बतावै है ताको अर्थ फेरिडारै हैं ॥ २ ॥
कागा कपरा धोवन लागे बकुला किररै दांता ।
माछी मूड़ मुड़ावन लागी हमहूं जाब बराता ॥ ३ ॥
नाना पाखंड मतमें परे ऐसे जे हैं मलिन पाखंडी जीव तेई काग हैं । ते
कपरा धोवनलगे कहे सबको उपदेश करै हैं कि, हमारेमत में आवो तौ हम
तुम्हारो अंतःकरण शुद्ध करिदेहूँ ! औ रूपकपक्षमेंजब बरात जाइहै तब सबुनी
करिकै लोग जाइहैं ताते यहां सबुनी करिबो लिख्यो । अरु जिनके अंतःकरण-
रूपी धोवनको वे उपदेशकियो तेई बकुलाभये कहे ऊपरते तो वेष बनाये चन्दन
टोपी दिये हैं औ अंतःकरण मलिनहै बिषयमें चित्तलगाये रहे हैं । जहां कोई
संत मत कहन लगे है ताको खण्डन करिदारै हैं । दांत किररै हैं कहे कोप
करै हैं जैसे बकुला ऊपरते तोस्वच्छ है औ नदी के तीर मछरी खाइबेको बैठे
है । भीतर बासना मलीन भरी है; हंस आवै हे तिनको डेरवाय कै बैठन नहीं
देइहै दांतकिररै है! तैसे बरात जब चलै है तब कारिंदा कामकाजी सफेद कपरा
पहिरि दांत किररै हैं कि, यह कामकरो वह कामकरो कहा बैठे हौ यह रिस करै ।
औ माछी कहे जो माया ते क्षीण हैबेको बिचारकरै हैं, ते माछी कहवावै हैं ।
अर्थात् मुमुक्षू ते नाना मतके जे गुरुवा लोग हैं तिनके यहां मूड़ मुड़ावै हैं कि,
हमहूं बरात जाब कहे हमहूं मुक्त होब । सो वहां मुक्तितो पायो नहि पर गुरु
वनकी मीठी बानी में परिकै आपने को ब्रह्म मानत भये तेहिते स्वस्वरूपको ज्ञान
न रहिगयो मायामें फँसिगये औ रूपक पक्षमें दुलहा के संगती जे हैं ते बार
बनवावै हैं ॥ ३ ॥
छेरी बाघहि ब्याह होत है मंगल गावै गाई ।
वनके रीझ धै दाइज दीन्हो गोह लोकंदै जाई ॥ ४ ॥