कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२० ) बीजक कबीरदास ।
जानि बूझि जो कपट करतहै तेहि अस मंद न कोई ।
कह कबीर सब तरि रामकी मोते और न कोई ॥ ६ ॥
नर हर लागी दव बिकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा ।
मैं जानों तोहीं ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
हे नरहर दवलागी कहे तेरे स्वरूप की हरनवारी मायारूपी दवारि लगी है ।
तैं कैसैहै ? विकार बिन । तौ माया मोको काहेको लगीहै ? तौ विना ईंधन
को बुझावनवारो तोको नहीं मिल्यो, जो तोको समुझाइ देई कि, तैं बिन
विकारको है जो मिलौहै सो नाना उपासना नाना मत रूप ईंधन डानर वारो
मिलाहै । साहबको ज्ञान रूप जल डारै माया रूप दवारि कैसे बुझाइ सो मैं
जानौ हौं या मायारूपी दवारि तोहीते उत्पन्न भै अर्थात् मायादिक तोहीं तें
भये ताहीमें सब संसार जरो जाइहै ॥ १ ॥
पानी माँह अगिनिको अंकुर मिलन बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥२॥
सो वह मायारूपी अग्निको अंकुर पानीमें है कहे नाना वेद शास्त्रादिक वाणीमें
हैं ते वेद शास्त्रादिकनके अर्थको बदलिकै साहबको छिपाइक मायारूपी अग्निको
प्रकट कियो औ तोकोऔरै औरैमें लगाइ दियो । अर्थात् वे सब मतनको फल
ब्रह्मह्वै जाइबो बताइ दियो । वह अग्निको बुझावन को वेद शास्त्रादिकन को जो
सांच अर्थहैं जल सो नहीं मिलै है । अथवा जे वेद शास्त्रादिकन के सांच अर्थ
मुनि जन लोग बनाइ गये हैं, बशिष्ठ संहिता, शुक संहिता हनुमत्संहिता, अग-
स्त्यसंहिता, सदाशिवसंहिता, सुन्दरीतंत्रादिक ग्रन्थ औ वेदशिरोपनिषद्
विश्वम्भरोपनिषदादिक सांचे मतके कहनवारेते जल नहीं मिलैहै । सो जब वह
आगि लगी तब अद्वैत करिकै बहुत समुझावैहैं परन्तु एक वह आत्मा नहीं जरै
औ साहबमें जे नवधा भक्तिहैं ते नव नारी हैं ते जरैहैं सोयह युक्ति कोई नहीं
जान्यो कि आत्मा ब्रह्म नहीं होइहै औ साहब को जानै तौ वे नवधा भक्ति
न जरैं ॥ २ ॥