कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 367, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३१७ )
अथ सत्तावनवां शब्द ॥ ५७ ॥
ना हरि भजै न आदत छूटी ।
शब्दै समुझि सुधारत नाहीं अँधरे भये हियोकी फूटी ॥१॥
पानी माहँ पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका ।
सहस घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेका सूखा ॥ २ ॥
सेते सेते सेत अंग भो शयन बढ़ी अधिकाई ।
जो सनिपात रोगि अहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥
अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी ।
निकट पयाना यमपुर धावै बोलहि एकहि बानी ॥ ४ ॥
सतग रु मिले बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै ।
कह कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥५॥
ना हरि भजै न आदत छूटी ।
शब्दै समुझि सुधारत नाहीं अँधरे भये हियो की फूटी ॥१॥
ना तैं हरि भजै है अरु ना तेरी आवागमनकी आदत कहे स्वभाव छूट्यो ।
यह अर्थ साहबके कहे शब्दको सुनिकै औ बिचारिकै जो आपनो नहीं सुधारैहै
सो काहे नहीं सुधारैहै । काहेते कि, साहब कहतई जाइहैं कि, जो मो कों
अबहूं जीव जानै तौ कालते छोड़ाय लेउँ । ताते आंधर भये हियोकी तिहारी
फूटिगई कहे यहै आदत करत करत वृद्धावस्था पहुँची इन्द्रियन जवाब दियों
तामें प्रमाण । “ नेह गये नैना गये, गये दांत औ कान । प्राण छरीदा
रहिगये, तेऊ कहत हैं जान ” ॥ अबहूं तौ जानौ भजन करिकै छूटिजाउ ॥ १॥
पानीमाहँ पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका ॥
सहस घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेका सूखा ॥ २ ॥