कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
शब्द । ( २८३ )
योगी कहै योग है नीको द्वितीया और न भाई ।
चुंडित मुंडित मौन जटा धरि तिनहुं कहां सिधि पाई २॥
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ये जो कहहिं बड़ हमहीं ।
जहँसे उपजे तहँहिं समाने छूटिगये सब तबहीं ॥ ३ ॥
जिनको जिनको यह पदमें कहि आये तेते आपने मतको सिद्धांत करतभये
कि, हमारही मत सिद्धांतहैं । परन्तु रक्षकके विनाजाने जहां ते उपजे तहँ
पुनि समाइ जानभये । अर्थात् जा गर्भते आये तौनेही गर्भमें पुनि गये, जन-
नमरण नहीं छूटै है । जब दूसरा अवतार लियो तब जौने जौने मतमें आगे
सिद्धांत करिराख्यो तेने मन सब छूटिगये । अथवा जहांते उपजे कहे जौने
लोक प्रकाशते उपजे हैं तहँ समाने महाप्रलयमें तब सब बिसरिगयो ॥ ३ ॥
वायें दहिने तजो विकारै निजुकै हरि पद गहिया ।
कह कबीर गूंगे गुरखाया पूंछेसों का कहिया ॥ ४ ॥
सो मंत्र शास्त्रमें जे वाममार्ग दक्षिण मार्ग हैं ते दोऊ विकारई हैं तिनको
दुहुनको छोड़िदेउ औ हरिजे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिहारे रक्षा करनबारे
तिनके पदको निजुकै कहे आपन मानिकै गहौ अथवा निजुकै कहे बिशेषिकै
तिनके पदको गहौ । जो कहो उनको बताइदेउ वे कैसे हैं तौ वे तौ मन बचनके
परे हैं उनको कोई कैसे बताइसकै । जो उनको जान्यो है ताको गूंगे कैसो
गुर भयो है कछू कहि नहिं सकै है इशाराहिते बतावै है । वेदशास्त्रको तात्पर्य
कै जो सज्जनलोग साहबको समुझावै हैं सोतात्पर्य वृत्तिही करिकै बतावै हैं ऐसे
तुमहूं जो भजन करोगे तौ तुमहूँ उनको जानि लेउगे कि ऐसे हैं ॥ ४ ॥
इति अड़तीसवां शब्द समाप्त ।
अथ उनतालीसवां शब्द ॥ ३९ ॥
ऐसे हरिसों जगत लरतूहै । पंडुर कतहूं गरुड़ धरतुहै॥१॥
मूस बिलारी कैसे हेतू । जम्बुककर केहरिसों खेतू ॥ २ ॥
(२८४) बीजक कबीरदास ।
अचरज यक देखा संसारा।सोनहा खेद कुंजर असवाग ॥३॥
कह कबीर सुनो संतो भाई। यह संधि कोइ विरलै पाई ॥४॥
ऐसे हरिसों जगत लरतुहै । पंडुर कतहुं गरुड़ धरतुहै ॥१॥
जैसे पूर्व कहिआये ऐसे रक्षक हरिसों जगत् लरतुहै कहे विरोध करतुहै ?
औ जे उनके भक्त उनको बतावै हैं तिनके मतको खंडन करै है। सो हे मूढ !
पंडुरकहे पनिहां पियरसर्प कहूं गरुड़को धरतुहै ? जो “डुंडुभ” पाठहोय तौ
डुंडुभ पनिहां सर्पका नामहै । सो रामोपासना गरुड़ है सो और मत जे सर्प
हैं तिनको कहां खंडनकीन होइहै वही सबको खंडन करनवारो है । जो वाकों
(रामोपासना को) मत अच्छी तरहते जानो होइ है ॥ १ ॥
मूस बिलारी कैसे हेतू । जंबुक कर केहरि सों खेतू ॥ २ ॥
सो हे जीवो ! तुम्हारो ज्ञानतौ मूस है औ गुरुवालोगन को ज्ञान बिलारीहै।
जे और और मतमें लगावै हैं तुमको और और मतमें लगाइकै खाइलेइंगे
तिनसों तुमसों कैसे हेतुभयो । जंबुक जो सियार सो केहरि जो सिंह है तासो
खेत करै है कहे लरैहै । सो जंबुक अज्ञान है सो सिंहजो तुम्हारो जीव सो लरैहै
वह सिंह जीव कैसो है अज्ञान को नाश कै देनवारोहै अर्थात् जब आत्माकों
ज्ञान होइ है तब अज्ञान नाश ह्वै जाइहै ॥ २ ॥
अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥३॥
कह कबीर सुनो संतो भाई। यह संधि कोई बिरले पाई ॥४॥
सो हम यह बड़ा आश्चर्य देख्योहै । सोनहा जो कूकुर सो कुंजर के अस-
वारको खेदै है । सो नानामतवारे जे हैं तेई कुत्ते हैं ते काउं काउं कहैं
शास्त्रार्थ करिकै कुंजरके असवार जे हैं रामोपासनाके साधक तिनको खेदैहैं ।
कहे उनसों वे कछुनहीं पावैहैं । यहां कुंजर मन है ताको परम पुरुष श्रीराम-
चन्द्र लगाइदियेहैं औ आप असवार हैं ॥ ३ ॥ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि,
हे संतो भाई ! तुम सुनौ मनते भिन्नह्वैकै साहबके मिलबेकी जोहै संधि भेद
ताको कोई बिरला पायेहै अर्थात् जबभर मन बनोरहै है तबभर वाको भूलिवे-
की संधि बनीही रहै है, मनते भिन्न ह्वैकै वाके भजन करिवेको उपायकोई
बिरला जानैहै ॥ ४ ॥
इति उनतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ चालीसवां शब्द ॥ ४० ॥
पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जा भाजै तौ दुनियाँ तरिजाई ॥२॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जँगलको तौ हरि सुरति न आनै ३
बिनु देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥४॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरि भगतनकी हांसी ।
कह कबीर यक राम भजे बिन वांधे यमपुर जासी॥५॥
पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
सो हे पंडितौ जो बाद बदौहौ सो झूठाहै काहेते कि, पंडिततो वह कहावै
है जाके सारासार बिचारिणी बुद्धि होइहै सो सारासार बिचारिणी बुद्धि तों
तिहारे है नहीं पंडित भर कहावौहौ । काहेते कि, सारशब्दको झूठा कहौहौ
यह बाद बदिकै रामके कहेते जो गति पावतो तौ खांड़ाकेहे मुखमीठ हैजातो॥ १॥
( २८६ ) बीजक कबीरदास ।
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जो भाजै तौ दुनियां तरिजाइ ॥ २ ॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जंगलको तौ हरि सुरति न आनै ॥३॥
जो पावकके कहे दाह पावतो तो जीभ जरिजाती, औ जलके कहे तृषा
बुझाइ जाती, औ भोजनके कहेते भूख भाजिजाती तौ, रामके कहेते दुनियाँ
तरिजाती ॥ २ ॥ नरके पढ़ाये सुवा राम राम कहैहै औ श्रीरामचन्द्रको
प्रताप नहीं जानै है, काहेते कि, जब कबहूं जंगलमें उड़िजाय है तब रामकी
सुरति नहींकरै है । ऐसे जोतुम रामनाम कहि हरिको प्रताप जाना चाहोगे
तो कैसे जानौगे ॥ ३ ॥
बिन देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥ ४ ॥
बिना देखे बिना स्पर्श किये नाम लिये कहा होइहै । अर्थात् जो कोई दूर-
होइ औ देखै न स्पर्श न होइ औ जो वाको नामलेइ तौ का जानि लेइहै ?
नहीं जानै है । धनके कहेते कोई धनिक ह्वैजातो तौ निर्धनी कोई न होतो
ऐसे नाम लिये जो मुक्ति होत तौ सब मुक्तै होइजात । सो हे पंडितौ तुम
ऐसे असंगत दृष्टांतदैके यहवाद बदौहौ सो झूठा है । काहेते कि, रामनाम तौ
मन बचनके परे है औ ये सब बचन में आवै हैं । औ वह राम नाम साहबके
दियेते स्फुरित होइहै । यहै रामनाम जपते औ ये सब अनित्य ह्वैजाइहैं ॥ ४ ॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरिभक्तनकी हासी ।
कह कबीर यक राम भजे बिनु बांधे यमपुर जासी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैं हैं कि, हे नास्तिक पण्डितौ ! विषय मायासों सांचीप्री-
ति करौहौ औ ऐसे ऐसे कुबाद बदिकै हरिभक्तनकी हासी करौहौ; नाम रूप
लीला धामको खण्डन करिकै । सो एक जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनके
नामके बिना भजन किये बांधे मोगरन की मार सहत यमपुरहीको जाहुगे ।
शब्द । (२८७)
जे परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र तिनते विमुख हैं ते सब लोकनमाँ निन्दित
हैं तामें प्रमाण-“ यश्चरामनपश्यत्तुयंचरामो नपश्यति । निन्दितस्सर्वलोकेषु
स्वात्माप्येनंविगर्हते ” ॥ ५ ॥
इति चालीसवां शब्द समात ।
अथ इकतालीसवां शब्द ॥ ४१ ॥
पण्डित देखौ मनमो जानी ।
कहुधौं छूति कहांते उपजी तवाहिं छूति तुम मानी ॥ १ ॥
नादै विन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सज्जै ।
अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहां उपज्जै ॥ २ ॥
लखचौरासी बहुत वासना सो सब सरिभो माटी ।
एकै पाट सकल बैठारे सींचि लेत धौं काटी ॥ ३ ॥
छूतिहि जेंवन छूतिहि अचवन छूतिहि जग उपजाया ।
कह कबीर ते छूति विवर्जित जाके संग न माया ॥ ४ ॥
पंडित देखौ मनमो जानी ।
कहुधौं छू
( २८८ ) बीजक कबीरदास ।
और जहां जहांकी बासना करिकै मरै है तौनी तौनी योनिमें प्राप्त होइ है एकै
जीव बासनन करिकै सर्वत्र होइहैं यह छूति कहांते उपजै है ॥ २ ॥
लख चौरासी बहुत वासना सो सब सरिभो माटी ।
एकै पाट सकल बैठारे सींचिलेत धौं काटी ॥ ३ ॥
यह जीव बहुत बासननमें परिकै चौरासी लाख योनिमें भटकैहै शरीर स-
रिकै माटी है जायहै एकै पाटमें कहै जगत्में नानां वासना करिकै
माया सबको बैठावतभई कहे शरीरधारी सबको करतभई अरु ये शरीर सब-
माटीही आई औ माटीमें मिलि जाइँगे औ जीव सबके एकही हैं औ एकही
पाटमें बैठे हैं सो वे जलको सींचिकै छूति काटि लेत हैं का जल सींचे छूति
मिटि जातहै ? नहीं मिटै ॥ ३ ॥
छूतिहि जेंवन छूतिहिअचवन छूतिहि जग उपजाया ।
कह कबीर ते छूति विवर्जित जाके संग न माया ॥ ४ ॥
सो वही छूति जो है बासना सो जब उठी तब जेंवन कियो औ वही वासना
उठी तब अँचयो । और कहांलौं कहैं वही बासना ते जगत् उपज्यो है । सो
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जाके संग माया नहीं है सोई वासनारूपी छूतिके
विवर्जितहै । सो हे पंडित ! माया को जो तुम छोड़यो नहीं छूति तिहारे
भीतर घुसी है ऊपर के छूति माने कहा होइ बड़ी छूतिकियो है बासनैते
चित्तकी वृत्ति उठै है तब यह मानै है कि, हम ब्राह्मणहैं क्षत्री हैं वैश्य
हैं शूद्रहैं ॥ ४ ॥
इति इकतालीसवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( २८९ )
अथ बयालीसवां शब्द ॥ ४२ ॥
पंडित शोधि कहहु समुझाई जाते आवागमन नशाई ॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौनदिशा वसभाई ॥ १ ॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरि जानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरतहैं सो डर हमारे नाहीं ॥ ३ ॥
पाप पुण्य की शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
वासना मायाके योगते होइहै सो माया जौनी प्रकारते छूटै है सो
उपाय कहै हैं अरु आचारको वहां खंडन करिआये सो अब जौनी दशामें अचार
नहीं है सो कहै हैं ॥
पण्डित शोधि कहहु समुझाई। जाते आवा गमन नशाई॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥१॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
हे पंडित! तुम तो सारासारको बिचार करौहौ सो तुम शोधिकै मोसों समुझाय
कहो जाते यह जीवात्माको आवागमन नशाइ । अर्थ धर्म काम मोक्ष ये फल
कौनी दिशामें रहै हैं? ॥ १ ॥ उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम स्वर्ग पाताल यहां
सर्वत्र मैं ढूंढ़ि डार्यों परन्तु विना गोपाल कहूं ठौर न देख्यों गोपाल कहे गों
जो इन्द्रिय जड़ मनादिक तिनके चैतन्य करनवारे जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहे
तिनहींको सर्वत्र देखत भयो । विषय इन्द्रियनते देवता मनते मन जीवते जीव
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रते चैतन्यहै सो जीव उनको चित्त शरीर अरु मायाकाल
१९
( २९० ) बीजक कबीरदास ।
कर्म स्वभाव उनको अचित शरीरहै तेहिते बिना गोपाल कहूं ठौर नहीं है। जीव
नरक स्वर्ग जायहै सो अब बतावैहैं ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरिजानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरत हैं सो डर हमरे नाहीं॥३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनजानेको नरक स्वर्ग है कहेनो कोई हरिको नहीं
जानैहै ताको स्वर्गहै और नरकहै । और जो कोई हरिको सर्वत्र जानैहै ताको न
नरकहै न स्वर्ग है । जौन डरको सब लोग डरायहैं माया ब्रह्म नरक स्वर्गादि-
कनको तौन डर उनको नहीं है काहेते वे तो सर्वत्र साहबैको देखैहैं ॥ ३ ॥
पाप पुण्यकी शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
औ न उनको पापपुण्य की शंका है काहेते कि, जो कोई बद्ध होइ सो
मुक्त होइ, तेहिते न वे बद्धही हैं न मुक्तही हैं तामें प्रमाण श्रीभागवते॥"बद्धो-
मुक्तइतिव्याख्या गुणतोमेनवस्तुतः । गुणस्यमायामूलत्वान्नमेमोक्षोनबंधनम्” ॥
हम तो सर्वत्र साहबहीको देखैहैं वे नरक स्वर्गको नहीं जाइहैं सो कबीर जी
कहैहैं कि हे संतो! सुनो ऐसी भावना जे नर करैं हैं ते नर जहां पद तहां समाहीं
कहे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो तिनहीं के स्थानमें जाइ हैं ॥ ४ ॥
इति बयालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेतालीसवाँ शब्द ॥ ४३ ॥
पंडित मिथ्या करौ विचारा। ना हां सृष्टि न सिरजनहारा १
थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरणि न नीरा ।
ज्योति स्वरूपी काल न उहँवां वचन न आहि शरीरा॥२॥
कर्म धर्म कछुवो नहिं उहँवां ना कछु मंत्र न पूजा ।
संयम सहित भाव नहिं एकौ सोतो एक न दूजा ॥ ३ ॥
शब्द । ( २९१ )
गोरख राम एकौ नहिं उहँवां ना ह्वां भेद विचारा ।
हरि हर ब्रह्म नहीं शिव शक्ती तिरथौ नहीं अचारा ॥ ४ ॥
माय वाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला ।
कह कबीर जो अबकी समझै सोई गुरू हम चेला ॥ ५ ॥
हे पंडित ! तुमतौ वहि ब्रह्मको मिथ्यै बिचार करोहो। जो यहिपदमें वर्णन
करिआये सो वहमें एकउ नहीं है वह तो धोखाही है सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो सो वह आत्माते दूसर है कि अकेल वह ब्रह्महै? जो अबकी समझै कहे यह
ज्ञान भये पर समझै कि, मैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको हौं वह ब्रह्म धोखा है
सोई गुरुहै । म चेलाहौं काहेते कि, मोहिं तो धोखई नहीं भयो है जो आप-
नेको ब्रह्ममानिकै औ साहबको समझै है औ वाको धोखा मानिलेइ सो मेरो
गुरुहै औमैं वाको चेलाहौं अर्थात् सोई मोसों अधिक है काहेते कि, वह धोखा
में परिकै निकस्यो है यह प्रशंसा कियो ॥ ५ ॥
इति तेतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ चवालीसवां शब्द ॥ ४४ ॥
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मणके घर ब्राह्मणी होती योगीके घर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरुकिती कलिमें रहै अकेली ॥२॥
वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्रजन्म होनिहारी ।
कारे मूँड़े यक नहिं छाँड़ै अवहूँ आदिकुवांरी ॥ ३ ॥
मायिक न रहै जाइ न ससुरे साई संग न सोवै ।
कह कबीर वे युगयुग जीवैं जाति पांति कुल खोवैं ॥४॥
यह मायाही सब जगतके जीवनको भरमायो है सोई कहैं ॥
( २९२ ) बीजक कबीरदास ।
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मण केरे ब्राह्मणी होती योगीके वर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरकिनी कलि में रहै अकेली ॥२॥
सो हे पंडित! तुम बूझौ औ विचारिकै काम करौ यहमाया पुरुषरूपहै कि
नारीरूपहै? यहमाया सबको लपेटि लियो है ॥ १ ॥ विद्या माया ब्राह्मणके तौ
ब्राह्मणी ह्वैकै बैठी है । ब्राह्मणकहैं हैं कि, हम ब्रह्मको जानै हैं ॥ "ब्रह्मजा-
नाति ब्राह्मणः" ॥ अरु घरमें ब्राह्मणी बैठायेरहै हैं, वाको स्त्रीको भाव करै हैं
बेटीसों बेटीको भाव, बहिनीसों भगिनीको भाव मानै हैं । सो कहो तो ब्रह्मभाव
कबभयो जो कहो जिनके स्त्री नहीं है तिनको तो ब्रह्मभाव ठीकहै तौ उनके
ब्रह्म जानपनीरूप ब्राह्मणीकी गरुरी बनी है । संयोगिनके तौ चेली ह्वै बैठी है
औ योगिनके योगिरूप ह्वै बैठी है। योगी महामुद्रा साधन करिकै वीर्यकी उलटी
गति कैदेइहैं । सो जब वृद्ध भये तब षोडशी कन्या एक घरमें रातिभरि राखिकै
संभोग करिकै उनको वीर्य लिंग द्वारते खैंचिकै कपारमें चढ़ाइ लेइहैं, तब आप
तरुणह्वै जाइहैं वह षोडशीकन्या मरिजाईहै। एतो बड़ो अनर्थकरै हैं। जे प्राणायाम
करिकै प्राणचढ़ाइ लै जाइहैं तिनके कुंडलिनी ह्वै बैठी हैं। औ मुसलमाननके जब
विवाह होइहै तब निगाह सों निकाह कै कलिमापढिकै तुरकिनी होइहै औ
मुसलमान होइहै । सो ये उपलक्षणहैं अर्थात् ब्राह्मणमें स्त्रीके साथ कर्मरूप
ह्वैकै औ योगिनके दशमुद्रा रूपह्वैकै औ मुसलमाननमें निकाह कलमा आदिकै
शरा अरूप ह्वैकै अकेली मायाही रहतभई साहबके काम ये एको नहीं हैं॥२॥
बर नहिं वरै ब्याह नहिं करई पुत्र जन्म होनि हारी ।
कारे मूड़े यक नहिं छाँड़े अवहूँ आदि कुवारी ॥ ३ ॥
वर कहे श्रेष्ठ जे हैं साहबके जाननवारे भक्त तिनको नहीं वरयो अर्थात्
उनको स्पर्श विद्या अविद्या ये दोनोंको नहीं है । अरु खसम ब्रह्म है सो व्याह
नहीं करैहै काहेते कि, धोखाकी भँवरी नहीं परै । औ मायाको पुत्र जगत् है
जाको गर्भ धारण करैरहै सो कारे कहे जिन के शिखाहै " हिंदू लोग " औ
शब्द । ( २९३ )
मूँड़े कहे जिनके शिखा नहीं है मुसलमान लोग तिनको एकऊ नहीं छोड़्यो ।
अबहूं भर वह आदिकहे आद्या जो मायाहै सो कुँवारीही बनी है अर्थात् हिंदू
मुसलमानको आपही बशकै लियो है इनके बश नहीं भई ॥ ३ ॥
मायिक न रहे जाइ न ससुरे सांई संग न सोवै ।
कह कबीर वे युगयुग जीवैं जाति पांति कुल खोवैं॥४
अरु मायिक जो है शुद्ध आत्मा जाके उत्पत्ति भईहै माया तहां तो रहतही
नहीं है वहां तौ जीवके साहबको अज्ञान रूप कारण मात्र रह्योहै । औ सासुर
जो है लोक प्रकाश ब्रह्म जहां जीव मान्यो है कि, ब्रह्म मैंही हों, सो धोखाहै ।
तहां नहीं जाइहै औ वही सांई कहे पतिहै काहेते कि, वही मायासबलित होइ
है तब जगत् होइ है ताके संग नहीं सोवैहै काहेते कि, वहतो धोखई है औ
वह माया धोखा है जो कछु वस्तु होइ तब न वाके संग सोवै । श्रीकबीरजी
कहैं कि, सब जगतको माया लपेटि लियो है । जे जीव साहब औ साहबकी
जाति आपको मानै हैं औ अपनी जाति पांति कुल खोवैं हैं सोई मायाते बचे हैं
औ युग युग जियै हैं और तो सबको माया खाइही लियो है अर्थात् उनहीं को
जनन मरण नहीं होयहै ॥ ४ ॥
इति चवालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ पैंतालीसवां शब्द ॥ ४५ ॥
कौन मुवा कहु पंडित जना।सो समुझाय कहौ मोहिंसना १॥
मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पावती सुत मुये गणेशा ॥ २ ॥
मूये चन्द्र मुये रवि केता।मुये हनुमत जिन्ह बांधी सेता३॥
मूये कृष्ण मुये करतारा। यक न मुवा जो सिरजन हारा॥४॥
कहै कबीर मुवा नहिं सोई । जाको आवा गमन न होई॥५॥
( २९४ ) बीजक कबीरदास ।
जिनको जिनको यापदमें वर्णन करिआये तेते सब महाप्रलयमें लीन होइहैं ।
एक कहे सम अधिकते रहित जो साहव नहीं मुवा । औ सिरजनहार जों
समष्टि जीव सो नहीं मुवाहै अर्थात् सो रहिजायहै । और कौन नहीं मुवा
तिनको कबीरजी बतावैं हैं । जीवतो मरै नहीं है शरीरहीमरैहै सो जे जे देवतं-
नको मुवा कहिआये ते जौन रूपते साहबके समीप रहै हैं सो स्वरूपइनको नहीं
मुवै है पार्षद शरीरते बनै रहै ह यहां अपने अंशन्ते जगत् कार्यकरै है सो
पूर्व लिखिआये हैं ॥ ५ ॥
इति पैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छियालीसवां शब्द ॥ ४६ ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांडी हाड़ हाड थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम करे मेरे भाई ।
जो तोहरे को ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिये कसाई ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
अब जे षट्कर्मी पंडित लोग बलिदान करिकै मांस खाइ हैं तिनको कहै हैं ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांड़ी हाड़ हाड़ थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
हे पंडित ! एक बड़ो आश्चर्य होइ है । एक मरै है ताके मरेते कोई
अन्न नहीं खायहै अरु वाके छुयेते अशुद्ध ह्वै जाइहै, अरु एक जीवको मारि
शब्द । ( २९५ )
लै आवै हैं तौने मुर्दाको रसोईमें सिझवै हैं ॥ १ ॥ औ नौ गुणको जनेऊ
कांधे में डारिकै स्नान करिकै बड़ो बेदना ऐसो तिलक दै कै बैठै हैं । सो कबीरजी
कूटकरै हैं कि, अब षट्कर्म बनि परचो कि, हांडीमें हाड़ है थारीमें हाड़है
मुखमें हाड़ है । व षट् कर्म ब्राह्मणके ये हैं । पढ़े पढ़ावै दान देइ लेइ यज्ञ
करै यज्ञ करावै । इहां ये षट्कर्म करै हैं एक हँड़िया दूजे हाड़ तीजे थारी
चौथे हाड़ पांचौ मुख छठों हाड़ अब ये अब षट्कर्म बनि परचो ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम कर मेरे भाई ।
जो तोहरेको ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिय कसाई ॥ ३ ॥
कह कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनिआई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
जहां धर्मको कथैहै कि, या यज्ञहै, देवपूजन पितर श्राद्धहै याधर्म है तहँ
जीवनको मारै है । सो हे भाइउ ! जो करिबेलायक कर्म नहीं है सोऊ करैहैं
ऐसे जे तुम्हारे कर्म हैं तिनको, तो ब्राह्मण कहेंगे ब्रह्मके जनैया कहेंगे तो
कसाई काको कहेंगे ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसे भ्रममें दुनियाँ भूलि
रही है । अपरमकहे परम नहीं ऐसी जो माया है ताते परब्रह्म है ताहूते पार
पुरुष समष्टि जीव हैं जाके अनुभवते ब्रह्म भयो है ताहूते उत्तम श्रीरामचन्द्र हैं
काहेते कि, वे विभु सर्वज्ञ हैं औ जीव अणु अल्पज्ञहै । ते श्रीरामचन्द्रकी जो
यहगति है ज्ञान सो कोई बिरलै पाई है अर्थात् कोई बिरला जान्यौ है कि,
सबते पर साहबई है । उनते सम औ अधिक कोई नहीं है । तामेंप्रमाण ॥
“सकारणकारणकारणाधिपोनचास्यकश्चिज्जनितानचाधिपः । नतस्य कार्यंकर-
णंचविद्यतेनतत्समश्चाभ्यधिकश्चदृश्यते ॥ इतिश्वेताश्वतरोपनिषदि ॥ समोन-
विद्यतेतस्यविशिष्टः कुतएवतु ॥ इति वाल्मीकीये । ” औकबीरौजीकोप्रमाण ॥
“साहब कहिये एकको दूजा कहो न जाइ । दूजा साहब जो कहैं, बाद
बिडंबन आइ ॥ जनन मरणते रहितहै, मेरा साहब सोय । मैं बलिहारी पीउकी,
जिन सिरजा सब कोय ॥ ४ ॥
इति छियालीसवां शब्द समाप्त ।
( २९६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सैंतालीसवां शब्द ॥ ४७ ॥
पंडित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी ।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते संरि माटी मासी ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया॥३॥
हाड़ झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांते आवै ।
सो तुम पाँड़े जेंवन बैठे मटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
वेद किताव छोड़ि दिहु पांड़े ई सब मनके कर्मा ।
कहै कबीर सुनोहो पांड़े ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
जे दंभ करिकै बड़ो आचार करैहैं जिनको चिद्अचिद् साहब को रूप है
यहबुद्धि नहीं है ताको कहै हैं ।
पण्डित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते सरिमाटी मासी ॥ २ ॥
सो हे पंडित! ज्ञानतो तिहारे है नहीं आचारकरौ हो सो तुम कहांको पानी
पियौ हौ। भला बूझिकै कहे बिचारिकै तौ पानी पियौ। जौने माटीके घरमें अर्थात्
पृथ्वीमें तुम बैठेहौ तौनमें सब सृष्टि समाइरहीहै ॥ १ ॥ औ जौनी पृथ्वीमें
छप्पन कोटि यादव औ अठासी हजार मुनि ये उपलक्षण हैं अर्थात सबजीवन-
के शरीर वही माटी में मिलि मिलिकै सारिगये अरु परग परगमें पैगम्बर गाड़ेहैं
शब्द । ( २९७ )
ते सब सरिकै माटी ह्वै रहेहैं तेहिते माटी मासी है कहे मांसमें मिलिरही है औ
माटी मासी कहे मधुकैटभके मांसकी आई ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार बियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥३॥
हाड झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांतै आवै ।
सो तुम पांडे जेवन बैठे मंटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
अरु नदियाके जलमें मत्स्य कच्छ घरियार बियाने कहे होयहैं औ रुधिर
नीर मल इत्यादिक वही नदियाके जलमें मिलिजाइ है औ पशु मानुष सँरिजा-
यहैं; ते वही पानी पियोहौ औ आचार करोहो ॥ ३ ॥ दूधो हाड़ते झरि झरि
गूदते गलिगलिकै लोहू भयो वही लोहूते दूध भयो ताहीको लैकै हे पंडित! तुम
जेवन बैठौहौ औ माटी जो मांसहै ताको छूति लगावो हौ कि,मांसबड़ो अपवित्र
है याको जे खाइहैं ते बड़ो निषिद्धकर्म करै हैं सो कहो तो वह दूध मांसते
कैसे भिन्नहै ॥ ४ ॥
वेद किताब छोडि दिहु पांडे ई सब मनके कर्मा ।
कहैं कबीर सुनोहो पांडे ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
सो हे पांडे! शुद्ध अशुद्ध तो वेद किताबते जानेजाइहैं ते वेद किताबकों तुम
छोड़िदियो ये जे सब कहिआये जे तुम धर्म करौहौ ते तौ सब तुम्हारे मनके
कर्म हैं आपने मनहींते ये सब तुम बनाइ लियोहै इनते तुम न निबहौगे। श्रीकबी-
रजी काकु करैहैं कि हेपांडे! बिचारिकै देखौ ये सब तुम्हारे धर्म हैं? अर्थात् नहींहै
तुम तौ साहबकेहौ । अथवा कबीरजी कहै हैं एते सब कर्म करौहौ अपने मनके
बनाये औ वेद किताबौके कहेते ये सब तुम्हारे धर्मकहे तुम्हार शरीरमा हैं ।
तेहिते शरीरते भिन्न ह्वैकै आपने स्वरूपको जानौगे तब आपने सांचे कर्मनको
जानौगे यह व्यंग्यहै ॥ ५ ॥
इति सैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
१ कहीं कहीं मट्टी मांसको भी कहैहैं परन्तु यहां तो मिट्टीसे आशय है मनुष्य
शरीरते क्योंकि, दम्भ करिके आपजी चहे कर्म करतेहै लोरे दूसरे पवित्र मनुष्यनते
छूत मानतैहै ।
( २९८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तालीसवां शब्द ॥४८॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी ॥ १ ॥
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वहि वरण न रूपा ॥२॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निवेरा ॥३॥
वेद पुराण कुरान कितेवा नाना भांति बखानी ।
हिंदू तुरुक जैनि औ योगी एकल काहु न जानी ॥ ४ ॥
छः दरशनमें जो परवाना तासु नाम मन माना ।
कह कबीर हमहीं हैं बौरे ई सब खलक सयाना ॥ ५ ॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी १
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वह वरणनरूपा २॥
हे पंडित! तुमतौ सारासारको विचार करौ हौ हृदयमें विचारि कै देखौ तो
कौन पुरुषहै कौन नारीहै वह आत्मा तो न पुरुष न नारी है ॥ १ ॥ जो कहौ
घटघटमें सहज जीव ब्रह्म समाइ रह्योहै वाको चरित्र अनूपहै सोई हमारो
स्वरूप है तो वाको नाम कहां कहि लीजै बाको तो न बर्ण है न रूपहै वह
तो धोखाहै ॥ २ ॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निबेरा ३
औ जो तैं मैं कहौहौ कि, तैं मैं आहो, मैं तैं आहो एकही ब्रह्मतौ है तैं
मैं कहा करैहै । बिचारिदेखु तौ क्या तेराहै क्या मेराहै सब साहबका तौ
जो तैं साहब होइ तब तेरा होइ। रामखोदाय औ शक्ति शिव जैहैं तिनमें कहुयौं तैं
काको निबेरा कियो है कि, एक यह जगतको मालिक है। औ वही मैं हौं। अर्थात्
इनकी सामर्थ्य तोमें एकऊ नहीं देखिपरेहै ताते इनमें तैं कोई नहीं है ॥ ३ ॥
वेद पुराण कुरान कितेवा नाना भांति बखानी ।
हिंदू तुरक जैनी औ योगी एकल काहु न जानी ॥४॥
वही साहबको नाना नाम लैके कहैहैं सो वेद पुरान कुरान किताबमें वही
साहबको सबने परे नाना भांतिते नाना नामलैके बर्णन कियो है यही हेतुते
हिन्दू तुरक जैनी योगी एकल कहे एक नामकरिकै कोई नहीं जान्यो कि,
एक यही सिद्धांतहै यही सबको मालिकहै । अथवा एकल कहे जौने करते जोने
उपायते मैं मन वचनके परे साहबको जान्यो है सो कोई नहीं जान्यो ॥ ४ ॥
छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना ।
कह कबीर हमहीं हैं बौरे ई सब खलक सयाना ॥ ५ ॥
छहउ दर्शनमें अरु जेते सब हिन्दू तुरुक आदि वर्णन करि आये तिन सबमें
जौन धोखा ब्रह्म को प्रमाण परैहै तौनेही को नाम सबके मनमें मानै है। कह-
ते तौ मन वचनके परे हैं परंतु कोई ब्रह्म कहिकै कोई अल्लाह कहिकै कोई
जीवात्मा कहिकै वाहीको सब मानै हैं। सो कबीरजी कहैहैं कि, सब खलक
सयाना है काहेते कि, कहते तो यह बात हैं कि, वहतो मन वचनमें आवते
नहीं है औ जे मन वचनमें आवै हैं तिन्हीं में फिरि लागे है ताते हमहीं बौरहाहैं
जो ऐसो कहैहैं कि, साहब आपही ते कृपा करिकै अनिर्वचनीय रामनाम स्फुरि-
त करि देइहैं ताहीके मिलनको उपाय बतावै हैं यह काकु करै हैं ॥ ५ ॥
इति अड़तालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ उनचासवां शब्द ॥ ४९ ॥
बुझ बुझ पण्डित पद निर्वांना । सांझ परे कहँवां बस भाना १
नीच ऊँच पर्वत ठेला न भीत । बिन गायन तहँवा उठ गीत २
( ३०० ) बीजक कबीरदास ।
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सह स्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नवग्रह बैठे पांति ४
मैं तोहिं पूँछौं पण्डित जना। हृदया ग्रहण लागु केहि खना ५
कह कबीर यतनौ नहीं जान। कौन शब्द गुरु लागा कान६
अब योगिनको कहैं ।
बुझ बुझ पंडित पद निरवाना। सांझ परे कहँवां बस भाना १
नीच ऊँच पर्वत ठेला न भीत। बिन गायन तहँवां उठ गीत२
हे पंडित ! तुम वह निर्वाणपदको बूझोतो जो त्रिकुटीमें ध्यान लगाइकै भानु
कहे सूर्य देखोहौं । सो सूर्य सांझपरे कहे जब शरीर छूटिगयो तबकहां बसैहै?
॥ १ ॥ नीचते ऊंचेको कहे कुंडलिनीते गैबगुफामें जब आत्मा जाइहै तौनै
पर्बतमें न ठेलाहै न भीतिहै। औ बिना गायन तहंवां गीत उठैहै कहे अनहदकी
ध्वनि सुनिपरै है ॥ २ ॥
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सहस्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
ओस जो वहां परे है कहे अमृत जो वहां झरे है ताको पान करिकैन प्यास
है जाइहै कहे पियास नहीं लगैहै । अर्थात् ओसन पियास नहीं जाइहै जो मानि-
राखेहैं कि, अमृत पीकै हम अमर ह्वैजाइँगे सो अमर न होउगे । औ जो गैब
गुफा पर्वतमें घरमानि राखैहैं सो वहाँतेरो मंदिर कहै घर नहीं है अर्थात् वहां
तो शून्यहै तहां सहस्र दलमें धेनु दुहावै है कहे धेनु जोहै गायत्री ताको अर्थ
जोहै वहदूध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म ताको बिचार करैहै आपने को ब्रह्म मानै हैं जब
शरीर सरिजाइ तब गैबगुफा जरिजाइहै औ फिरि शरीर धारणकरै है ॥ ३ ॥
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नव ग्रह बैठे पांति ४॥
औ तहां नित अमावस रहैहै चन्द्रमा सूर्यनके ओट ह्वैजाइ सो अमावस कहा-
वै है । सो यहांते आत्मा जाइकै ब्रह्मज्योतिमें लीन ह्वैजाइहै ताते नित
अमावस रहै है औ फिरि जब समाधि उतरी तब शंकामें परिगयो वही वाकों
शब्द । ( ३०१ )
नित संक्रांति है। औ नित नव ग्रह पांति जो है दुवार जामें ऐसो जो है यह
शरीर तौने की पांति बैठे है कहे इतना योग साधै है तऊ शरीर धारण करिबों
नहीं छूटै हैं ॥ ४ ॥
मैं तोहिं पूछौं पंडित जना। हृदया ग्रहण लागु क्यहि खना ५
कह कबीर इतनौ नहिं जाना।कौन शब्द गुरु लागा कान ६॥
: हे पंडित ! तुमसों हम पूछैं हैं कि, जब समाधि उतरि आवै है तब फिरि
माया तुमको ग्रहण करिलेइ है औ निर्वाण पद कहतहीहौ । सो निर्वाण पद
जो जाते तौ कैसे उलटि आवते औ कैसे नाना शरीर पावते सो देखतेहौ बूझते
नहींहौ,यह अज्ञानरूपी राहुते तुम्हारे ज्ञानरूपी चन्द्रमाको कब ग्रहणकियो॥५॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, इतनौ नहीं जानतेहौ कि शरीरके साधन यह ज्ञान
कियेते शरीर मिलैगो कि छूटैगो अर्थात् शरीरके साधन कियेते शरीरही मिलैगो
तेरे कानमें लागिकै गुरुवालोग कौनसो शब्दको उपदेशकियो है जाते परमपुरुष
श्रीरामचन्द्रको भूलि गेय ॥ ६ ॥
इति उनचासवां शब्द समाप्त ।
अथ पचासवां शब्द ॥ ५० ॥
बुझबुझ पंडितविरवा न होई।अधवस पुरुष अधा बस जोई १
बिरवा एक सकल संसारा।स्वर्ग शीश जर गयल पताला२
बारह पखुरी चौबिस पाता। घन बरोह लागी चहुँ घाता३
फलै न फुलै वाकिहै बानी। रैनिदिवस बिकार चुव पानी॥४॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिबिरवाप्रतिपालततहिया ५
बुझबुझपंडितविरवानहोई । अधवसपुरुषअधावसजोई॥ १॥
बिरवा एक सकल संसारा।स्वर्ग शीश जर गयलपताला २
( ३०२ ) बीजक कबीरदास ।
हे पंडित ! यह संसाररूपी वृक्षको जो तैं बूझि राखै है कहे मानि राखै है
सो तैं बूझतौ जितने बिचार होइहैं तिनको यह मिथ्याही है । हरिकेचिद्अचिद्
रूपसे सत्यहै। यह संसार वृक्ष आधा पुरुष है आधा प्रकृति है अर्थात् चित् पुरुष
जीव औ अचित् मायादिक इनहीते संपूर्ण जगत्है ॥ १ ॥ पुनि कैसोहै संसार-
रूपी बिरवा याको स्वर्गशीश कहे ब्रह्मांडको जो खपरा है सो शीश है अरु
याकी जर पातालमें गई है ॥ २ ॥
वारह पखुरी चौबिस पाता।घन बरोह लागी चहुँ घाता ॥३॥
फलै न फुलै वाकि है वानी।रैनि दिवस विकार चुव पानी॥४॥
औ बारह महीना जे हैं ते बारे पंखुरी हैं अर्थात् काल औ चौबिस तत्त्व
वाके चौबिस पातहैं औ घन कहे नाना कर्मनकी वासना तेई घन बरोह चारों
ओर लगीहैं ॥ ३ ॥ या संसाररूपी वृक्ष साहबको ज्ञान रूप फल नहीं फूलै
औ साहबको भक्तिरूप फल नहीं लगै है या संसारके बाहर भयेते होयहै औ
राति दिन बिकाररूप पानी चुवै है ॥ ४ ॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिविरवाप्रतिपालततहिया ५
सो कबीरजी कहै हैं कि, जहां हरि परम पुरुष श्रीरामचन्द्र जाके अंतःकर-
णमें भागवत धर्म रूपी बिरवनकी बाग प्रतिपालै हैं तिनको यह संसाररूपी
बिरवा अच्छो नहीं है । व्यंग यह है कि,माली जो होइहै सो कांटा वाला पेड़
निष्काम अलग कै देइहै इहां हरि संसार रूपी बिरवा अलग कै देइ है भागवत
धर्मरूप बिरवा श्रीकबीरजी रेखता में कह्यो ॥ “धर्मकी बाग फुलवारि फूली
रही शील संतोष बहुतक सोहाई । भक्तिका फूल कोड संत माथे धरे ज्ञान मत
भेद सतगुरु लखाई ॥ विवेक बिचार सोइ बाग देखन चले प्रेम फल पाइ तोरै
चखाई । पराहै स्वाद जब और भावै नहीं तजैगा माणकी बहवाई ॥ ५ ॥
इति पचासवां शब्द समाप्त ।