कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
शब्द । ( २६३ )
मच्छ जो मत्स्योदरी सो शिकारी जो शांतनु ताकेसाथ भय ते रमन लगी ।
सिंहसमर्थ को कहै हैं सो समर्थ जे बड़े बड़े दानव थलके रहैया ते समुद्रमें
बसे जाय ॥ २ ॥
रेड़ा रूख भया मलयागिरि चहुं दिशि फूटी वासा ।
तीनि लोक ब्रह्मांड खंडमें देखै अंध तमासा ॥ ३ ॥
रेड़ा रूख जेहैं, सबरी, वानर, निषादादिक जिनको वेदकाअधिकार नहीं रह्यो,
तेऊ चंदनहैगये । उनकी बास चारिउदिशा फूटी कहै उनको यश सबकोई गावै
है । चंदन औरौ वृक्षनको चंदन करै है ऐसे औरहूको साधु बनावनवारे ये सब
भये तामें प्रमाण ॥ “नजन्म नूनं महतोनसौभगं नवाङ्नबुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । तैर्य-
द्विसृष्टानपिनोवनौकसश्चकारसख्येबतलक्ष्मणाग्रजः ” इतिभागवते ॥ औ आँध-
रेजे हैं धृतराष्ट्र तिनको कृष्णचन्द्र ब्रह्माण्ड भरेको तमाशा जिनकी सामर्थ्यते
शरीरहीमें देखायदियो । नारायण औ कृष्णचन्द्र साहबकी सामर्थ्यते करै हैं
तामेंप्रमाण ॥ “ यस्यप्रसादाद्देवेशमम सामर्थ्यमीदृशम् । संहरामिक्षणादेवत्रैलो-
क्यंसचराचरम् ॥ धातासृजतिभूतानि विष्णुर्द्धारयतेजगत् ” । इतिसारस्वततंत्रे ॥
कृष्णचंद्रको अवतार विष्णुहीते होइहै सो पुराणनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
पंगुल मेरु सुमेरु उलंधै त्रिभुवन मुक्ताडोलै ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशै अनहद वाणी बोलै ॥ ४ ॥
औ जिनके अघटित घटना सामर्थ्यते पंगु जे हैं अरुण ते पृथ्वीकी कीला
जे हैं सुमेरु तिसको रोज उलंधै हैं नांघै हैं । अथवा पंगुजो हैं राहु जाके शिरे
भरहै गोड़ हाथ नहीं है सोसुमेरु का नाघत रहे है औ मुक्ते जे हैं नारद
शुक कबीर आदिक जे संसार ते मुक्त हैकै मनादिकन को छोड़िकै साहब के
पास गये हैं औ यह शास्त्रमें लिखे है कि, उहांके गयेपुनि नहीं आवै है
परन्तु तेऊ साहबकी सामर्थ्यते त्रिभुवनमें डोलै हैं संसारबाधा नहीं करिसकै
है । आ जब शुकाचार्य निकसे हैं तब व्यास पछुआन जात रहे हैं तब गूंगे जे
बृक्ष हैं तेऊ व्यासको समुझायो है । औ मध्वाचार्य जब भिक्षाटन को निकसे
( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
तब शिष्यनके पढ़ाइबेको बरदाको कह्यो तबबरदा शिष्यनको पढ़ायो है । औ
जे साहबकी सामर्थ्यते ऐसी सामर्थ्य उनके दासनेके द्वैगई कि, वोई अनहद
वाणीको बोले हैं जाकी हद नहीं है ॥ ४ ॥
बाँधि अकाश पताल पठावै शेषस्वर्ग परराजै ।
कहै कबीर रामहै राजा जोकुछ करै सो छाजै ॥ ५ ॥
औ आकाश जो है आकाशवत् ब्रह्म तौनेको जोमानै है कि वह ब्रह्म
मैंहीं हौं ताको साहब अपनो ज्ञान कराइकै धोखा ज्ञानको बाँधि कै पतालमें
पठै दैहै । अर्थात् तेहि जीवको मूलज्ञान निर्मूलई करि देयहै । जैसे लोकमें
या बात कहै हैं कि, या खनिकै गाड़देव ऐसे गाड़दियो फिरि वा अज्ञानको अंकुर
नहीं होयहै । औ शेष कहे भगवत् शेषजो है जीव सो जे साहबकी सामर्थ्यते
स्वर्गादिकन के परे जोहै साहबको लोक तहाँ राजै हैं । "स्वर्गपदको अर्थ जो
दुःखते भिन्न स्थान होयहै सो कहावै स्वर्ग" । औ जो लोक मकाश ब्रह्म ताहूते परे
जो साहब तहाँराजैहै दुःखरहितस्थानको स्वर्ग कहै हैं तामें प्रमाण। "यन्नदुःखेनसंभिन्नं
नचग्रस्तमनंतरम् । अभिलाषोपनीतंच तत्पदंस्वःपदास्पदम्" इति॥ सो कबीरजी
कहै हैं कि यह अघटित घटना सामर्थ्य परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रही हैं वे रा-
जा हैं वे जोकुछकरैं सो सब छाजैहै चाहे रंकको राजा करैं चाहे राजाको रंक करैं
चाहे लौंगमें फल लगावैं चाहे चंदनमें फूल फुलाय देयँ चाहे मछरीको बनमें
रमावै चाहे सिंहको समुद्र में रमावैं चाहे रेंडारूखको चंदनकरैं. चाहै अंधाको
तीनउ लोक देखाय देयँ चाहे पंगुको सुमेरु नँघायदेयँ चाहे गूंगाको ज्ञान
कहवायदेइँ.चाहे आकाशको बाँधिके पातालैपठावैं चाहे पातालवासी जे शेष तिनको
स्वर्गपरराखैं, या सामर्थ्य उनमेंहै श्रीरामचंद्र तौराजा हैं तामेंप्रमाण ॥ "राजाधि-
राजस्सर्वेषां रामएवनसंशयः ॥"औ उनहींकी भयते सूर्य चन्द्रमा अवसरमेंउये हैं
औमृत्यु जबसमय आवैहै तबखायहै तामें प्रमाण॥ यद्भयाद्वाति वातोयं सूर्यस्त-
पतियद्भयात् ॥ वर्षतींद्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरति पंचमः ॥ इतिश्रीमद्भागवते ॥५॥
इति तेईसवां शब्द समाप्त ॥
शब्द । ( २५५ )
अथ चौबीसवां शब्द ॥ २४ ॥
अवधू सो योगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
पौ बिनु पत्र करह बिनु तुम्बा बिनु जिह्वा गुण गावै ।
गावनहारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ ३ ॥
पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ ४ ॥
अवधू सो योगी गुरुमेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढ़ो विन फूलै फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
वधू जाके न होइ सो अबधू कहावै सो हे अबधु जीवो! जो यह पदके अर्थको
निबेरा करिके जानै सो योगी गुरु कहे श्रेष्ठ है औमेरा है कहे मैं वाको आपनो
मानौहौं ॥ १ ॥ एकजो तरुवरहै सो बिन मूल ठाढ़ो है अरु वामें बिनाफूल
फल लागो हैं सो यहां तरुवर मनहै सो जड़है अरु आत्मा चैतन्य है शुद्ध है जो
कहिये आत्माते उत्पत्तिहै सो जो आत्माते उत्पन्नहोतो तौ आत्मा चतन्य है
याते यहू चैतन्य हो तो ताते आत्माते नहीं उत्पन्नभयी । यह आपई आत्माते
प्रकाशभयो जो बिचारैतौ वाकोमूल भगवत् अज्ञान सत नहीं है बिनामूल ठाढ़े
भयोहै अरु बिना फूलै फल लागोहै कहे जगत् उत्पादक क्रिया मननहीं कियो
मिथ्या संकल्पमात्रते जगद्रूप फललागवई भयो अरु वाके शाखापत्र कछू नहीं है
अर्थात् अंगनहीं है चित्त बुद्धि अहंकार येऊमिथ्याहैं निराकारहैं अरु यह मनैके
मुखते आठौ गगन जागतभये। सात सप्तावरणके आकाश अथवा चैतन्याकाश ॥ २ ॥
( २५६ ) बीजक कबीरदास ।
पौविनुपत्रकरहविनुतुम्बा बिनुजिह्वागुणगावै ।
गावनहारकेरूप न रेखा सतगुरुहोइलखावै ॥ ३ ॥
अब श्रीकबीरजी जीवात्मा को वृक्षरूप हैकै बर्णन करैं हैं पौबिनु कहे आत्माको
जगत्को अंकुर नहीं है मनके संयोगते दुःख सुखरूप पत्रदुइ लागबेई कियो औ
करहूजो कर्म है सो नहीं रह्यो आत्मामें जगतरूप तुम्बा लागबेई कियो । यह
जीवात्माकी दशाकाहेतेभई कि, बिनु जिह्वा जांहै निराकार ब्रह्म ताके जे गुणहैं
देश काल बस्तु परिच्छेद ते शून्यत्व सो आपने में लगावन लग्यो । ये गुण
मोहीं में हैं मेरोस्वरूप यही है सो जो या आपनेको ब्रह्ममान्यो तौ आत्माके
ब्रह्मकेरूपको रेखनहीं है काहेते याको देश बनो है समष्टि जीवलोक प्रकाशमें
रहैहैं, औ कालबन्यो है जैनेकालमें समष्टिते व्यष्टि होयहै, औ या देश काल
बस्तु परिच्छेदते संहितहै काहेते अणुहै भगवद्दासहै तामें प्रमाण॥ "बालाग्रशत-
भागस्यशतधाकल्पितस्यच॥ भागोजीवःसविज्ञेयः सचानंत्यायकल्पते" इतिश्रुतिः
अंशोनानाव्यपदेशांत्ते ॥ ३ ॥
पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरति की बलिहारी ॥४॥
ताते मीनकी नाईं संसारते उलटी गति चलिकै पक्षी जो हंस स्वरूप आपनो
ताको खोज कबीरजी कहैं हैं ये दोऊ भारी हैं संसारते उलटी गति होइबो:यह
भारी है, आपनो हंसरूप पाइबो यहू भारी है । सोसंसारते उलटी गति करि
हंसरूप पाइकै परमपर जो आत्मारूप पार्षदरूप ताहूते उत्तम जे परमपुरुष
पर श्रीरामचन्द्र तिनकी बलिहारी जाय । भाव यह है तब तेरो जनन मरण
छूटैगो ॥ ४ ॥
इति चौबीसवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( २५७ )
अथ पचीसवां शब्द ॥ २५ ॥
अवधू वोत तुरावल राता । नाचै वाजन वाज बराता ॥१॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोरि कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक वैठाये निरभय पद परभाता ।
मातहि उलटि बरातहिं खायो भली वनी कुशलाता ॥३॥
पाणि ग्रहण भये भव मंडौ सुषुमानि सुराति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पण्डित ज्ञाता ॥ ४ ॥
अवधू वोत तुराबल राता । नाचै वाजन वाज वराता॥१॥
हे जीवौ ! आपतौ अबधू रहेहौ कहे आपके बधू जो है मायासो नहीं रही
है परंतु रौर अब वह तत्त्वमें राते हैं । अथवा हे अबधू ! यह शरीरको राजा
है जीव सो अब वह तत्त्वमें राता है । कौन तत्त्वमें राता है ? सोकहै हैं;
जहां बाजन नाचै है, बरातंबजै है । सो इहां शरीर बाजनहै सो नाचै है
कहे जाग्रत् अवस्थामें स्थूल, स्वप्नअवस्थामें सूक्ष्म, औ सुषुप्ति में कारण, तुरि-
यामें महाकारण, येई नाचै हैं । तिनको जब इकट्ठा कियो अर्थात् एकाग्र मन
कियो उन्मनी मुद्राआदिक साधन करिकै तब पचीसौ जे तत्त्व हैं तेई बरात हैं
तेई बाजै हैं कहे तिनको जो संघट्ट हैबो है इंद्रियनमें तिनते जो ध्वनि निकसै
है तेई दशौ अनहदकी ध्वनि सुनि परती हैं तामेंप्रमाण कबीरहीजीको ॥
“उठतशब्द घनघोर शंखध्वनि अतिघना । तत्त्वोंकी झनकार बजतझी-
नीझना” ॥ १ ॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोर कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता॥२॥
नाभीमें चक्र है तामें नागिनीको बास है सो चक्रके द्वारमें मुड़दिये परी
है । आत्मानीचे है सो वह आत्मा दूलह है ताहीकी नागिनी मौर ह्वै रही
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है सो जब पांचहजार कुंभक कियों तब नागिनी जागी सो ऊपर को चढ़ी तब
चक्रको द्वार खुलिगयो तब आत्मातो दूलहहै सो चढ़िकै मौर जो नागिनीहै
ताके माथेपर गैब गुफ़ामें बैठयो जाइ । औ बरातनमें जो नहीं कहिबेलायक
झूठीबात सो गारीमें कहैहैं इहां शरीरमें ब्रह्म ह्वैजैबो अकथहै कहिबे लायक नहीं
है । सो कहै हैं कि, हम ब्रह्मह्वैगये । औ मड़ये के चारनको नेग समधी देइहै;
इहां मड़येके चारनके तेगनमें समधीही दीन्हेहै । मायाको पिता जो मनहै सो
एक समधीहै औ मनके समधी साहबहैं काहेते कि, यहजीव भगवद्वात्सल्यको
पात्रहै जबयह आत्मा विषयनमें रह्यो है तब बेजाने कबहूं कहतहू सुनतरह्यो
जबते ब्रह्मांड मड़वामें गयो तबते कबीरजी यहकूट करै हैं कि, मड़येके चारन में
समधीको दैराख्यो है कहे समधी जो साहब ताको कहिबो सुनिबो मिटिगयो ।
सो जानैतो यहहै कि, हम मायाते छूटिगये पै नागिनीको जै बुन्दसुधा देइहै तै
वर्ष वहां समाधि लागै है सो नागिनी ही वहां गोहरौख है सो पुत्र जो जीवहै
सो माता जो माया है ज्योतिरूप आदिशक्ति ताको बिवाहि लेयहै कहे वाहीके
संग ज्योतिमें लीनह्वै के वहां रहै है ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक बैठाये निर्भय पद परभाता ।
भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता॥३॥
चौक लीषिकै दुलिहिन को बैठावै हैं । यहां दुलहिन जो है माया जो जगत
रूप करिकै नानारूपहै ताको लीषिकै एक करिदार्यो कहे एक ब्रह्मही मान
भयो ताके ऊपर चौकबैठायो कहे चौक देत भयो । अर्थात् अन्तःकरणावच्छि
जो चैतन्य सो प्रमातृचैतन्य कहावै है । वृत्त्यवच्छिन्न जो चैतन्य सो
प्रमाणचैतन्य कहावै है । विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रमेय चैतन्य कहावै है।
स्फूर्त्यवच्छिन्नचैतन्य स्फूर्त चैतन्य कहावै है । सो ये चारों चैतन्यकें
चौकबैठायो कहे चौक पूरच्यो अर्थात् चारो चैतन्यको एक करिकै स्थितकियो।
बिवाह होत होत भिनसार होइ जायहै तब यह मन भयो कि, हम निर्भय
पदको पहुंचिगये प्रभात ह्वैगयो, मोहरात्री व्यतीत ह्वैगई । नागिनीको जो
अमृत सरोवर में अमृत पियावै है सोई भातहै सो नागिनी जब अमृतपियो तब
वहै भात बरात जो आगेवर्णनकरि आये पंचतत्त्व पचीसप्रकृति ताकोखाय
लियो अर्थात् कुछ सुधि न रहगई । सो कबीरजी कहै हैं कि भली कुशलात
बनीहै कि तब तो कुछसुधिहू रही अब कछू सुधिनहीं रहिगई ॥ ३ ॥
पाणि ग्रहण भये भव मंड्यो सुषुमनि सुरति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ ४ ॥
वहां मंडप परे पर पाणिग्रहणहोयहै यहां पाणिग्रहणभयेपर भव मंड्यो
अर्थात् जब पाणि ग्रहण मायाको ह्वै चुक्यौ कहैं नागिनी को जब सुधा पिआइ
चुक्यौ तब जै मुहुँ नागिनीको पानी दियो तैसेहि फल मिल्यो । एक मुंह
दियो तौ महीना भरेकी समाधि लगी औ दुइमुंहदियो तौ तीन महीनाकी
समाधिलगी औ चारि मुंहदियो तौ छः महीनाकी समाधि लगी. औ पांचमुंहदियों
तौ वर्षदिनकी, औछःमुंहदियो तौ तीन वर्षकी, औसातमुंहदियो तौ बारहवर्षकी,
समाधिलगी । और जो हजारनवर्ष समाधि लगावाचाहै तौ और मुंहदेय । सो
जब नागिनीको सुधा पिआयो तब जे मुँह दियो तेतनेनदिन भर सुषुमनि
सुरति समाता । अर्थात् सुषुम्णामें 'जीवकी सुरति समाईहै । पुनि जब समाधि
उतरी तब फिर भव मंड्यो कहे संसारी भयो अर्थात् पुनि ब्रह्मांड मंड्यो कि,
शरीरकी सुधि भई । सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! हे ज्ञाता पंडितौ !
तुम सुनौ तौ बूझौ तौ वे कहां मुक्तभये ? नहीं भये फेरि तौ संसारही में
उलटि आवै हैं ॥ ४ ॥
इति पचीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छब्बीसवां शब्द ॥ २६ ॥
कोई विरला दोस्त हमारा भाई रे बहुतका कहिये ।
गाठन भजन सवोरे सोइ ज्यों राम रखै त्यों रहिये ॥ १ ॥
आसन पवन योग श्रुति संयम ज्योतिष पढ़ि वैलाना ।
छौ दर्शन पाखंड छानबे येकल काहु न जाना ॥ २ ॥
( २६० ) बीजक कबीरदास ।
आलम दुनी सकल फिरि आये कलि जीवहि नहिं आना ।
ताही करिकै जगत उठावै मनमें मन न समाना ॥ ३ ॥
कहै कबीर योगी औ जंगम फीकी उनकी आसा ।
रामै राम रटै ज्यों चातक निश्चय भगति निवासा ॥ ४ ॥
कोई बिरला दोस्त हमारा भाईरे बहुत का कहिये ।
गाठन भजन सवारै सोइ ज्यों राम रखै त्यों रहिये ॥ १ ॥
कबीरजी कहै हैं कि, हे भाइउ जीवौ ! और और बहुत मतवारे तौ बहुत
जीव हैं तिनको कहा कहिये । रामोपासक हमारो दोस्त जैसे हम गाढ़ भजन
करिकै रामचन्द्र को देख रहे हैं ऐसे वह गाढ़ भजन करिकै रामचन्द्र
को देख रहे । औ जैसे हम को राम राखै है तैसही रहे हैं ऐसे वहू रहे हैं ।
क्षणभरि न भूलै ऐसा कोई बिरला है ॥ १ ॥
आसन पवन योग श्रुति संयम ज्योतिष पढ़ि वैलाना ।
छौदर्शन पाखंड छानवे येकल काहु न जाना ॥ २ ॥
अब बहुत मतवारे जे बहुतहैं तिनको कहै हैं कोई आसन दृढ़ करैहै कोई
पवन साधैहै कोई योग करैहै कोई वेद पढ़ैहै । कोई संयम करैहै कोई व्रत
करैहै कोई ज्योतिष पढ़ै है सो ये सब बैकलाइ गये । जो बैकल होइहै सो
झूठको साँच जानैहै औ साँच को झूठ मानैहं । सो छःदर्शन छानबे पाखण्ड-
वारे जे ये सबहैं एकल कहे एक स्वामी सबके परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं
तिनको न जान्यो अथवा एकल कहे जौने करते मैं उपासना करौहौं सो कोई
नहीं जानै है ॥ २ ॥
आलम दुनी सकल फिरि आये कलि जीवहि नहिं आना ।
ताही करिकै जगत उठावै मनमें मन न समाना ॥ ३ ॥
आलम कहे दुनियां संसार सो सब जीव दुनियामें फिरि आये गुरुवां लोगनके
यहांपर या कल जौनेकरते मैं उपासना श्रीरामचन्द्रकी करौ हौं सो आपने जियमें
न आनत भये जातेसंसार छूटिजाय साहब मिलैं जे नानामत आगेकहिआये ताहीं
शब्द । ( २६१ )
करिकै जगत्को उठावैहै कि, जगत् उठिजाय मरिहि जाइ । सो यह जगत्
तो मन रूपही है सो उनके मनमें मनरूप जगत् न समान्यो अर्थात् उनको
मिथ्या कियो न करि गयो । अथवा धोखाब्रह्म ताको मन कहे बिचार उनके
मनमें समाई रह्योहै ताही करिकै जगत को उठावै है कि, जगत् न रहिजाइ
सोऊ न उठ्यो ॥ ३ ॥
कहैकबीर योगी औ जङ्गम फीकी उनकी आसा ।
रामै नाम रटै ज्यों चातक निश्चय भक्ति निवासा ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि योगी जंगमन की सबकी आशा फीकी है काहेतें
धोखाब्रह्मके ज्ञानते संसार मिथ्यानहीं होइहै । जीवनके ब्रह्महोबेकी आशा
फीकी है सो जो रामनाम निशिवासर लेबहै औ जैसे चातक एक स्वातीही की
आशा करै है तैसे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रकी आशा करैहै ताहीके हृदयमें
उनकी भक्तिको निश्चय कै निवासहोइहै भक्तिरसरूपहै याते इनकी आशासरिसहै
अर्थात् सफलहै औ सोई संसार सागर ते उबरै है सो आगे रमैनीमें कहिआये
हैं ॥ “कहै कबीरते उबरे जोनिशिबासर नामहिलेव” ॥ ४ ॥
इति छब्बीसवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्ताईसवां शब्द ॥ २७ ॥
भाई अद्भुत रूप अनूप कथा है कहौं तो को पतिआई।
जहँजहँ देखों तहँतहँ सोई सब घट रह्यो समाई ॥ १ ॥
लछि बिनु सुख दरिद्र बिनु दुख है नींद बिना सुख सोवै।
जस बिनु ज्योति रूप बिनु आशिक रतन विहूना रोवै॥२॥
श्रम बिनु ज्ञान मनै बिनु निरखे रूप बिना बहु रूपा ।
थितिविनु सरति रहस बिनु आनंद ऐसो चरित अनूपा॥३॥
कहै कबीर जगत बिनु माणिक देखो चित अनुमानी ।
परिहरि लाभै लोभ कुटुंब सब भजहु न शारँगपानी॥४॥
( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
भाई अद्भुत रूप अनूप कथा है कहौं तोको पतिआई ।
जहँजहँ देखों तहँ तहँ सोई सबघट रह्यो समाई ॥ १ ॥
जाति करिकै सबजीव एकही हैं तातेजीवनको भाई कह्यो कि, हे भाई
जीवो ! वे जे हैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनको अद्भुतरूपहै, अरु वहि रूपकी
अनूपकथाहै सो मैं जो वाको दृष्टांत दैके समुझाऊं हौं कि, बाको रंग दूर्बा दलकी
नाईं है, अरसी कुसुमकी नाईं, नील कमलकी नाईं, तौ येई सबमें भेदपरै एक
एककी तरह नहीं है वहतो मनबचनकें परे है । ऐसेनाम रूप लीला धाम सबहै
वाको तौ कैसे समुझाऊं। काहेते जोमैं वाको समुझाइकें कहौं तौ कैसे कहो औ जों
कहबऊकरौं तौ कोई पतिआय कैसे । सो यहितरहको जो याको रूपहै सो जहां
जहां देखोहौं तहां तहां वहै रूप देखायहै । काहेते कि, सबघटमें समाय रह्यो
है । यहां सबघटमें समान्यों जोकह्यो ताते चितहू अचितहू में समाइरह्यो यह-
आयो जो व्यंग्य पदार्थहै जीव ब्रह्म माया काल कर्म स्वभाव ताहीको सब देखैहैं
औ जो व्यापक पदार्थ है ताको कोई नहीं देखैहै । जो चितहू अचितमें जो
कहो वही धोखा ब्रह्मको तुमहूं कहतेहौ जो सर्वत्र फैलि रह्यो है तौ वाको कोई-
नहीं कहतेंहैं; काहेते किं, अद्वैतबादी कहै हैं कि, सब पदार्थ वही ब्रह्मही है
वातें भिन्न दूसरो पदार्थ नहींहै औ हम कहैहैं कि, सबपदार्थ चित् अचित्
रूपते व्याप्य है औ हमारो साहब सर्वत्र व्यापक है सो जाको बिश्वास होइ
ताको वे साहब साकेत निवासी परम पुरुष श्रीरामचन्द्र सहजही प्रकट ह्वै
जायैं । सो जो मैं कहौंहौं ताको नहीं प्रतीत करै हैं। चित् जो है जीव औ ब्रह्म
ताहूमें श्रीरामचन्द्र व्यापक हैं तामेंप्रमाण ॥ “औंयोवैश्रीरामचन्द्रोभगवान्
द्वैतपरमानन्दात्मा यः परंब्रह्मेतिरामतापिन्याम्” ॥ जीवहूमें व्यापकहैं तामें
प्रमाण ॥ “यआत्मनितिष्ठन् यआत्मानं वेद्यस्यात्माशरीरमिति” ॥ मायादिक
सबमें व्यापक हैं तामेंप्रमाण ॥ “यस्यभासासर्वमिदंविभातीतिश्रुतिः” ॥ १ ॥
लछि बिनु सुख दरिद्र बिनु दुख है नींद विना सुख सोवै ।
जस बिनु ज्योति रूप बिन आशिक रतन विहूना रोवै॥२॥
कैसो साहब सर्वत्र पूर्णहै सो बतावैहैं । लछिबिनु सुखकहै जो पदार्थ
प्रत्यक्ष नहीं होइ है तामें सुखनहीं होइहै देखो तो नहीं परै है साहब पै जौं
कोई स्मरण करै है सर्वत्र ताको सुखहोयहै । साहबको कौनौ बातको दरिद्र
नहीं है जो चाहै सो करिदारै समर्थहै परन्तु नानाजीवनको अज्ञानमेंपरेदेखिकै
साहिबोको यही दुःख है कि, मेरे अंश जीव माया में परिकै नरक स्वर्ग
जाय हैं । काहेते यहदुःखहै कि, साहब अतिदयालुहैं तामेंप्रमाण ॥ “ताव-
त्तिष्ठतिदुःखीवयावद्दुःखं न नाशयेत् । सुखीकृत्यपरान्भक्तानस्वयम्पश्चात्सुखीभवेत्
इति” ॥ ध्वनि यह है कि,साहब दयालु हैं ते सर्वत्र पूर्णहैं यह बिचारिकै किं
जीव मोको जहँ स्मरणकरै मैं तहँ उबारिलेउँ । फिरिकैसो साहब है कि,
मोहनिद्रा नहीं है सदाजगै है अपने भक्तनकी रक्षाकरिबेको । ऐसेहू साहबके
सम्मुख जो जीव नहीं होइहैं तिनकी और सदा सुखमय साहब सोवै है अर्थात्
कबहूंनहीं देखैहै । फिरकैसो साहबहै जाकी ज्योति जो ब्रह्म है अर्थात् जाको
लोकमकाश जो है ब्रह्म सो बिना कौनौ कथै है वा कौनौ लीलैकियो अकथहैं
ऐसे साहबके बिना रूपमें आशिकभये साहबको ज्ञानरत्न विहीना जीवसंगर में
जनन मरण पाइपाइ रोवैहै ॥ २ ॥
भ्रम बिनु ज्ञान मनै बिनु निरखै रूप बिना बहुरूपा ।
थिति बिनु सुरति रहस बिनु आनँद ऐसो चरित अनूपा॥३॥
कहै कबीर जगत बिन माणिक देखौ चित अनुमानी ।
परि हरि लाभै लोभ कुटुंब सब भजहु न शारँग पानी॥४॥
फिर कैसोहै साहब भ्रमबिनाहै अर्थात् कबहूं मायासबलित ह्वैकै जगतमेंहीं
उत्पत्तिकियो । सदा ज्ञान गुण सदा ज्ञान स्वरूप है । तौने साहबको मानै बिना
निरखै कहे बिना ह्वैकै हंस स्वरूप पाइकै तैं देखै । कैसे हैं साहब कि, चिद्
अचित जेरूपहैं तेहि बिनाहैं अर्थात् ये स्पर्श नहीं करिसकै हैं औचित अचितके
शरीरी हैं बहुत रूपौ हैं सब उन्हींके रूपहैं । फिरि कैसेहैं जब साहब सुरति दीन
है तब जीवन की स्थिति भई है । औ सुरति नहीं है साहबकी स्थिति वालोक
में बनी है । औ आनंदजो मनबचनमें आवै है सो नहीं है वहां आनंद बनों
( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
है। ऐसे साहबके अनूप चरित हैं। अर्थात् जो रहस कहिआये सोऊ मन
बचनके परे है। सो कबीरजी कहैं हैं कि, जोचित्तमें अनुमानकरि देखौ तौ
यावत् उपासना औ ज्ञान तुम करौ हौ, जगत् मुक्तिरूप माणिक काहूते न
मिलैगी। ऐसी मुक्तिके लाभ को लोभत्यागिकै औ सब कुटुंब जे गुरुवालोग
तिनको त्यागिकै शारंगपानी कहे धनुषको ^न्हे साहब तिनको काहे नहीं
भजौहौ अर्थात् भजौ ॥ ३ ॥ ४ ॥
इति सत्ताईसवां शब्द समाप्त ।
अथ अठाईसवां शब्द ॥ २८ ॥
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियतिहै तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़बांधो तेहिबो तोरि पराई ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गम कीन्हो गैया अति हरहाई ॥ ३ ॥
ई सातौ अवरण हैं सातौ नौ औ चौदह भाई ।
एतिक गयै खाइ बढ़ायो गैया तौ न अघाई ॥ ४ ॥
खूंटामें राती है गैया श्वेत सींग हैं भाई ।
अवरण वरण कछू नहिं वाके भक्ष अभक्षै खाई ॥ ५ ॥
ब्रह्मा विष्णु खोज कै आये शिवसनकादिक भाई ।
सिद्ध अनंत वहि खोज परेहैं गैया किनहुं न पाई ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पद को गाइ विचारि है आगे है तरिजाई॥ ७॥
शब्द । ( २६५ )
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियति है तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
हे भाई जीवो! एक वाणीरूप गैया तुम्हीं सबको विरंचि जे ब्रह्माहैं ते दियो
है । सो गैयाको जो तात्पर्य दूधहै ताको तुम न पायो गैयाको भारा अभर
ह्वैगयो तुम्हरो सँभारो न सँभारिगयो । अर्थात् जोनो वाणीमें विधि निषेध
लिखै हैं सो तुम्हारो कियो एकौ नहीं ह्वै सकैहै । सो ये मायिक विधि निषेध
तो तुम्हारे किये ह्वै नहींसकैहै । वाणी जो तात्पर्य वृत्तिते बतावैहै सो तो
अमायिकहै कैसे जानौगे? वह गैया कैसी है सो बतावैहैं नौ कहे नवो जे व्याक-
रण हैं तिनकी जो नारी कहे राहहै तिनकर जो शब्दरूपी जलहै ताको पियै है
अर्थात् वोहीके पेटते वेदशास्त्र सब निकसै हैं औ वहीके पेटमें हैं ते शास्त्र वेद
वोही नवो व्याकरणके शब्दरूपी जलते शोधे जायहैं । अर्थात् वही बाणीमें
जल समाईहै परन्तु तृषा तबहूं नहीं बुझाइहै कहे वोही नवो व्याकरण करिकै
शोधैहै शास्त्रार्थ करतही जायहै बोध नहीं होइहै किं, शुद्धह्वैगयो पुनि प्रणीतन
में आर्ष कहिदेयहै ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़ बांधो तेहिवो तोरि पराई ॥ २ ॥
पातंजल शास्त्रवाले वही गायत्री गैयाको बांधन चह्यो बहत्तरिउ कोठाते
लौलगाइकै कहे श्वास खैंचिकै खेचरी मुद्राकारि घेंटीके ऊपर बज्र कपाट जो
लग्यो है ताको जीभते टार्यो तब वहां अमृत श्रवो तब नागिनी उठी श्वासाके
साथ ऊपरको चढ़ी ताके साथ आत्मौ खूंटा जो ब्रह्मांडहै ब्रह्मज्योति तहां
पहुंच्योजाई सो ज्योतिरूप ब्रह्मखूंटाहै तामें प्रणागिनी जो गैयाहै ताको बांध्यो
तेहिवो तोरि पराई कहे जब समाधि उतरी तबफिरि जसकोतस संसारी ह्वै गयों
नागिनीशक्ति उतारिआइ पुनि जीवनको संसारमें डारिदियो ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गमकीन्हो गैया तउ न अघाई ॥ ३ ॥
( २६६ ) बीजक कबीरदास ।
पातंजल शास्त्रमें योगक्रियाहै सो कायाते होयहै ताते अलग कह्यो अब सब
मेटिकै कहैहैं। चारि वेदजेहैं तेई वृक्षहैं औ छहउ शास्त्रजे हैं तेई शाखा हैं अठा-
रहौंपुराण पत्रहैं सो अकेलेकहै यहां लगे । गैयागमनकै जातभई कहे प्रवेश
कैजातभई सो गैया बड़ी हरहाई है अर्थात् जहां जहां आरोपकियो तौन तौन
वह खाय लियो अर्थात् जौन जौन आरोप कियौहै तौन वाके पेटते बाहर नहीं
है भीतरहीहै ॥ ३ ॥
ई सातौ अवरणहैं सातौ नौ औ चौदह भाई ।
एतिक गैया खाय बढ़ायो गैया तउ न अघाई ॥ ४ ॥
ई सातौ जे कहिआये छःचक्र औ सातौ सहस्रार जहां ब्रह्मज्योतिमें जीव-
को मिलावैहै अरु सातौ आवरणजेहैं पृथ्वी अप तेज वायु आकाश अहंकार
महत्तत्त्व अथवा सातौ बार काल अरु नौ खंड जे हैं अरु चौदहौ भुवन जे हैं
सोई सबनको गैया खाइकै बड़ाइ डारचो तऊ न अघातभई अर्थात् सब
वाणीमय ठहरे ॥ ४ ॥
खूंता में राती है गैया श्वेत सींग हैं भाई ।
अवरण वरण कछू नहिं वाके भक्ष अभक्षौ खाई ॥ ५ ॥
ब्रह्मा विष्णु खोजकै आये शिव सनकादिक भाई ।
सिद्ध अनंत वहिखोज परे हैं गैया किनहुं न पाई ॥ ६ ॥
सो वह गैया खूंता जो धोखाब्रह्महै तामें राती है अर्थात् ब्रह्म माया सबलि-
तैहै । अरु वहि गैयाके सींग श्वेत हैं कहे सतोगुणी हैं सोई ब्रह्ममें बांधिबो है
औ अवरण कहे असत् औ वरण कहे सत् ई वाके कोई नहीं है अर्थात्
सत् असत्ते विलक्षणहै अथवा अवरणकहे नहीं है वरण जाके निरक्षर ब्रह्म
नाम रूपादिक नहीं है जाके औ वरणकहे अक्षर ब्रह्म जीव ईदोनों नहीं है वाकें
अर्थात् ईदोनोंतें विलक्षणहै । औ भक्ष अभक्षौ खाइहै कहे कर्म करावन लाय-
कहै सो करावैहै औ जोकर्म करावन लायक नहीं है सोऊ करावैहै । अर्थात्
विद्यारूपते शुभकर्म करावैहै सो वाको शिव सनकादिक ब्रह्मा विष्णु महेश
शब्द । ( २६७ )
अनन्त सिद्ध खोज मरे पै गैयो कोऊ न खोजे पायो कि, सत् है कि, असत् है
तात्पर्यऊ न जाने ॥ ५ ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पदको गाइ विचरि हे आगे ह्वै तरिजाइ ॥ ७ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! सुनौ जो यह पदको अर्थ है कहै अर्थ
विचारि है औ जौन पद हम वर्णन करिआये सब ब्रह्माण्ड सत्तावरण आदिदै कै
जे पद हैं कहै स्थान तिनको जोकोई गाइ कहै मायाको रूपही विचारैगो कि
यहां भरतो मायाही है सो मायाके आगे हैकै साहबको लोक विचारैगो सोई
तरैगो ॥ ७ ॥
इति अट्ठाईसवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्तीसवां शब्द ॥ २९ ॥
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेहु कै मन लागै ॥ १ ॥
अमलीलोग खुमारी तृष्णा कतहुं सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
ब्रह्म कलारचढ़ाइन भाठी लै इन्द्री रस चाखै ।
सँगहि पोच ह्वै ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै ॥ ३ ॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीरगंभीर अतिनिर्मल तहँउठि मिलहु कबीरा ॥४॥
यहां अब मायाकेपरे जे साहबहैं तिनको बतावैं हैं ।
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेकै मन लागै ॥ १ ॥
( २६८ ) बीजक कबीरदास ।
हे भाइउ ! नयन रसिकजौहै संसारी चर्म चक्षुते भिन्नभिन्नदेखि विषयरस
लेनवारो सो जो जागै कहे मुमुक्षुहोइ तौ ब्रह्मके पार औ अबिगत कहे बिगत
नहीं सर्वत्र पूर्ण औ अबिनाशी कहे जाको नाश कबहूं नहीं होईहै ऐसे जे
परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनमें कैसेकै मन लागै जो कैसेहुके पाठहोय तौ
यह अर्थ है जो कैसेहुकै मन लगबो करै तौ बीचमें बहुत अवरोधहैं ॥ १ ॥
अमली लोग खुमारी तृष्णा कतहुँ सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
सबलोग अमली हैं विषय छांड़्यो पैतृष्णाकी खुमारी लगी है अरु कहूं
संतोषको नहीं पावै है । फिरि काम मत जो कोकशास्त्रादिक क्रोधमत जो
मुद्राराक्षसादि ग्रन्थनमें प्रतिपाद्य जे मतहै तेई प्यालाहैं तिनको काम क्रोध रूप
जो मद सो माया भरिभरि उन को पिआवै है ॥ २ ॥
ब्रह्मकलार चढ़ाइनि भाठी लैइन्द्री रसचाखै ।
सँगहि पोच होइ ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै॥३॥
प्रथम तों काम क्रोधादिकनते जागन नहीं पावैहै जो कदाचित् जाग्यो तों ब्रह्म
जो कलारहै जे अहंब्रह्म बुद्धि करै है गुरुवालोग जे भाटी चढ़ाइन ज्ञान सिखवै
लगे कि तुहीं ब्रह्महै ताहीं में इन्द्रिनको लैकरिकै अहंब्रह्मास्मिको रसचाखन
लग्यो अर्थात् ब्रह्मानंदको अनुभव करनलग्यो जो मदपियै है ताको ज्ञान भूलि
जायहै यहै कहैहै कि मैंहीं मालिकहौं सो जो गुरुवालोगन को संगकियो ब्रह्मानंद
पानकियो सो मैं साहबकोहौं यहअङ्ग भूलिगई वही गुरुवा लोगनको ज्ञानदियो
पुकारन लग्यो कि मैंहीं ब्रह्महौं।परं जो चतुराहाइ सो बिघननको नाकि जाइहै॥ ३॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीर गँभीर अति निर्मल तहँ उठि मिलहु कबीरा ॥४॥
पोचकहे अज्ञानी जे जीवहैं तिनको यहि कलिमें कहे माया ब्रह्मकें झग-
ड़ामें बहुतसंकट शोच औ व्याधिशरीर को है सोजहां अति धीर है कहे चला-
यमान नहीं है निश्चलपद है औ गंभीर कहे गहिरहै औ निर्मल कहे माया
शब्द । ( २६९ )
ब्रह्मको लेश नहीं है सो हे कबीर ! कायाके बीर जीवो ! मायाब्रह्मके तुम परे
हौ तहांते उठिकै कहै मायाब्रह्मके विघ्नन्ते निकसिकै साहबको मिलौ तबहीं
तिहारों जनन मरण छूटैगो ॥ ४ ॥
इतिउन्तसीवां शब्द समाप्त ।
अथ तीसवां शब्द ॥ ३० ॥
भाई रे!दुइ जगदीश कहांते आये कहु कौने भरमाया ।
अल्लाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया ॥ १ ॥
गहना एक कनक ते गहना तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइ करि थापे यक निमाज यक पूजा ॥२॥
वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिंदू कोइ तुरुक कहावै एक ज़िमीं पर रहिये ॥ ३ ॥
वद किताब पढ़ें वे खुतवा वे मोलना वे पांडे ।
विगत विगतकै नाम घरायो यक माटी के भांड़े ॥ ४ ॥
कह कबीर वे दूनौं भूले रामहिं किनहुं न पाया ।
वे खसिया वे गाय कटावैं वादै जन्म गँवाया ॥ ५ ॥
अब यहां यह वर्णन करै हैं कि दूसरो जगदीश नहीं है परमपरपुरुष जे
श्रीरामचन्द्रहैं तेई जगदीशहैं ॥
भाई रे ! दुइ जगदीश कहांते आये कहु कौने भरमाया ।
अल्लाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया ॥ १ ॥
गहना एक कनकते गहना तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइकरि थापे यकनेवाज यकपूजा ॥ २ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे भाइउ ! दुइजगदीश कहांते आये तोको कौनै
भरमायो है । अल्ला राम करीम केशव हरि हजरत ये तौ सब नामभेद हैं
( २७० ) बीजक कबीरदास ।
कहत तो एकही को हैं ॥१॥ जैसे एक गहना को सुवर्ण ते गहना कहे गहिलेई
कहे सुवर्ण बिचारिलेइ तामें भाव दूजा नहीं है वह सुवर्ण है जैसे कोई चूड़ा कोई
बिजायत इत्यादिक नाम कहै हैं परन्तु है सुवर्णही तैसे कहिबे सुनिबेको दुइ करि
थाप्यो ह यक निमाज़ यक पूजा परन्तु है सब साहबकी बंदगीही परम परपुरुष
श्रीरामचन्द्रही को सेवै हैं ॥ २ ॥
वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिंदू कोइ तुरुक कहावै एक जिमीं पर रहिये ॥ ३ ॥
वोही परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रको महादेव औ महम्मद औ ब्रह्मा औ
आदम सब कहिये कहे कहतभये कोई राम कहिकै कोई अल्लाह कहिकै
कुरानमें लिखै है कि सब नामनमें अल्लाहनाम ऊपर है औ यहां वेदपुराण में
लिखै है कि सबनामनमें रामनाम ऊपरहै तामें प्रमाण ॥ “ सर्वेषामपिमंत्राणांरा-
ममंत्रफलाधिकम् ” ॥ इति ॥ “ सहस्रनामतत्तुल्यंरामनमावरानने ” ॥ यातै
सबके मालिक परम पुरुष श्रीरामचन्द्रही जगदीशहैं दूसरो जगदीश नहीं है । उन
हींके अल्लाहनामको सब नामनते परे महम्मद कुरानमें लिख्योह औ उनहीं नाम
को महादेवने तंत्रमें लिख्योहं औ ब्रह्मा वेदमें कहतभये आदम किताबमें कहत-
भये अरु इहांतो एक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनहीं के जिमींमें कहे जगतमें
रहत भये । नामके भेदते कोई हिन्दू कोई मुसलमान कहावै है ॥ ३ ॥
वेद किताब पढ़ें वे खुतुबा वे मोलना वे पांड़े ।
विगत विगतके नाम धरायो यक माटी के भाँड़े ॥ ४ ॥
जिनके पोथी जमा होयहैं ते कहावैं खुतुबा वे वेदपुराण जमा कैकै पढैहैं वे
किताब जमाकैकै पढै हैं वे पंडितकहावै हैं वे मोलना कहावै हैं वेद पढ़िकै पंडित
किताब पढ़िकै मोलना कहावैं विगत विगत कहैं जुदा जुदा नाम धराय लेते
भये हैं एकई माटीकेभांड़े कहै हैं सब पांचभौतिकही हैं ॥ ४ ॥
कह कबीर वे दूनौं भूले रामहिं किनहुं न पाया ।
वे खसिया वे गाय कटावैं बादै जन्म गँवाया ॥ ५ ॥
शब्द । ( २७१ )
श्रीकबीरजी कहैहैं कि हिंदूतो बोकरा मारिके मुसल्मान गायमारिकें नानाप्र-
कारके वाद विवाद करिके अथवा बादिकहे वृथाही दोऊ भूलिके जन्म गँवाइ
दियो परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र तिनको न पावत भये हिन्दू तुरुककें खुद-
खाविंद एकई है कोई विरले जानैहैं ते वहां पहुंचे तामें प्रमाण झूलना ॥
“छोड़ि नासूतमलकूत जबरूत लाहूत हाहूत बाजी । और साहूतराहूत इहांडा-
रिदेकूद आहूत जाहूत जाजी ॥ जायजाहूतमें खुदखाविंद जहँ वही मक़ान-
साकेत साजी । कहै कबीरह्वां भिस्त दोजख थके वेदकीताबकाहूतकाजी”॥५॥
इति तीसवां शब्दसमाप्त ।
अथ इकतीसवां शब्द ॥३१॥
हंसा संशय छुरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया १
घरघर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई ।
पानी माहिं तलफिग भूभुरि धूरि हिलोरा देई ॥ २ ॥
धरती वरसै वादल भीगै भीटभया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
जौ लगि कर डोलै पगु चलई तौ लगि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासुवचन का लीजै॥४॥
हंसा संशय छुरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया १
घरघर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई ।
पानी माहिं तलफिंगै भूभुरि धूरि हिलोरा देई ॥ २ ॥
कबीरजी कहै हैं कि हे हंसा! संशयरूप छूरिते मारिगयो तोको उलटों ज्ञान
है गयो । बछरुवा जो है तेरोस्वरूप औरं ज्ञानरूप जो है दूध ताको गैया जो
माया सो दुहिकै पीलियो ॥ १ ॥ सावज जो या मनहै सो घरघरमें कहे शरीर
Here is the accurate transcription of the page into Devanagari text, with line-by-line markers preserved:
( २७२ ) बीजक कबीरदास ।
शरीरमें शिकारखेलैहै । पारथ कहे शिकारी जो तैं सो बोटालइहै अर्थात् नाना
उपासना नानाज्ञान करत फिरै है पै मन तोको नहीं छोड़ै है । साउज ते नहीं
बचैहै। वाणी रूप जो है पानी नानाशास्त्र तौनेमें( भूभुरि जोसूर्य्यनके तापते तपेत
भूमि होयहै सोभूभुरि कहावै है; ऐसे संसार तापते तपितजो)तेरा अंतःकरण सो
तलफिगयो अर्थात् अधिकअधिक शङ्का होतभई तिनते अधिकतप्त भयो शीतल न
भयो काहेते कि, धूरि जो सूखा ब्रह्मज्ञान सो हिलोरा देनलग्यो कहेशारूत्रनमें वही
धोखा ब्रह्मही देखपरन लग्यो । शास्त्रनको तात्पर्य्य साहब तिनको न जान्यो॥२॥
धरती बर्षै बादल भीजै भीट भया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
बुद्धिजोहै सो धरती है काहेते सब मतनको आधारयहीहै बाणीरूप पानी
बरसै है कहे नानामटनको निश्चय कैकै प्रकट करै है । अरु यह बाणी
जीवनही ते प्रथम निकसी है सो जीव बादल है सो भीजै कहे वोई मतनको
ग्रहणकियो । यह लोकोक्तिहै किं, फलाने फलानेमें भीजिरहे हैं कहे आसक्त
द्वैरहे हैं। भीट चारो वेदहैं मर्यादाते पैराउह्वैगये कहे उनकी थाह कोई न
पावतभयो अर्थात् तात्पर्य्य कारिकै जोपरमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णनकरेहै सोकोई
न पावतभयो । ताल सूखे हंस उड़ैहै यहां हंसउड़े तालसूखे हैं जब हंस उड़ो कहैं
यहजीव निकसिगयो तबताल जोशरीरहै सोसूखि गयो । तब बासना जेहैं तेई
चहला हैं तिनमें पाँउ बँधिरह्यो । जैसे तलाउ जबसूखेउ औ पुनिचौमासेमें
जब जल बरसयो तब जस को तस द्वैगयो, तैसे बासनामें पाँउफँसिरह्योहै दूसर
शरीर जब पायो तब फिर वही शरीरमें तलाउमें हंसजीव बूडन उतरान
लग्यो है । सो भाव यह कि, उड़नको तो करै है पर शरीर तालते अंतै नहीं
जाइ सकैहै कोई योनियैमें रहै है ॥ ३ ॥
जौलखि करडोलै पगचलई तौलखि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासु वचन का लीजै॥४॥
जबलग पाँउ चलैहै करडोलै है कहे शरीर बनोहै तबलगि गुरुवालोगनकी
आश न करिये जो आश करोगे तो याहीभांति बँधि रहैगो । सो कबीरजी कहैं