कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २६५ )
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियति है तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
हे भाई जीवो! एक वाणीरूप गैया तुम्हीं सबको विरंचि जे ब्रह्माहैं ते दियो
है । सो गैयाको जो तात्पर्य दूधहै ताको तुम न पायो गैयाको भारा अभर
ह्वैगयो तुम्हरो सँभारो न सँभारिगयो । अर्थात् जोनो वाणीमें विधि निषेध
लिखै हैं सो तुम्हारो कियो एकौ नहीं ह्वै सकैहै । सो ये मायिक विधि निषेध
तो तुम्हारे किये ह्वै नहींसकैहै । वाणी जो तात्पर्य वृत्तिते बतावैहै सो तो
अमायिकहै कैसे जानौगे? वह गैया कैसी है सो बतावैहैं नौ कहे नवो जे व्याक-
रण हैं तिनकी जो नारी कहे राहहै तिनकर जो शब्दरूपी जलहै ताको पियै है
अर्थात् वोहीके पेटते वेदशास्त्र सब निकसै हैं औ वहीके पेटमें हैं ते शास्त्र वेद
वोही नवो व्याकरणके शब्दरूपी जलते शोधे जायहैं । अर्थात् वही बाणीमें
जल समाईहै परन्तु तृषा तबहूं नहीं बुझाइहै कहे वोही नवो व्याकरण करिकै
शोधैहै शास्त्रार्थ करतही जायहै बोध नहीं होइहै किं, शुद्धह्वैगयो पुनि प्रणीतन
में आर्ष कहिदेयहै ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़ बांधो तेहिवो तोरि पराई ॥ २ ॥
पातंजल शास्त्रवाले वही गायत्री गैयाको बांधन चह्यो बहत्तरिउ कोठाते
लौलगाइकै कहे श्वास खैंचिकै खेचरी मुद्राकारि घेंटीके ऊपर बज्र कपाट जो
लग्यो है ताको जीभते टार्यो तब वहां अमृत श्रवो तब नागिनी उठी श्वासाके
साथ ऊपरको चढ़ी ताके साथ आत्मौ खूंटा जो ब्रह्मांडहै ब्रह्मज्योति तहां
पहुंच्योजाई सो ज्योतिरूप ब्रह्मखूंटाहै तामें प्रणागिनी जो गैयाहै ताको बांध्यो
तेहिवो तोरि पराई कहे जब समाधि उतरी तबफिरि जसकोतस संसारी ह्वै गयों
नागिनीशक्ति उतारिआइ पुनि जीवनको संसारमें डारिदियो ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गमकीन्हो गैया तउ न अघाई ॥ ३ ॥