कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २६३ )
मच्छ जो मत्स्योदरी सो शिकारी जो शांतनु ताकेसाथ भय ते रमन लगी ।
सिंहसमर्थ को कहै हैं सो समर्थ जे बड़े बड़े दानव थलके रहैया ते समुद्रमें
बसे जाय ॥ २ ॥
रेड़ा रूख भया मलयागिरि चहुं दिशि फूटी वासा ।
तीनि लोक ब्रह्मांड खंडमें देखै अंध तमासा ॥ ३ ॥
रेड़ा रूख जेहैं, सबरी, वानर, निषादादिक जिनको वेदकाअधिकार नहीं रह्यो,
तेऊ चंदनहैगये । उनकी बास चारिउदिशा फूटी कहै उनको यश सबकोई गावै
है । चंदन औरौ वृक्षनको चंदन करै है ऐसे औरहूको साधु बनावनवारे ये सब
भये तामें प्रमाण ॥ “नजन्म नूनं महतोनसौभगं नवाङ्नबुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । तैर्य-
द्विसृष्टानपिनोवनौकसश्चकारसख्येबतलक्ष्मणाग्रजः ” इतिभागवते ॥ औ आँध-
रेजे हैं धृतराष्ट्र तिनको कृष्णचन्द्र ब्रह्माण्ड भरेको तमाशा जिनकी सामर्थ्यते
शरीरहीमें देखायदियो । नारायण औ कृष्णचन्द्र साहबकी सामर्थ्यते करै हैं
तामेंप्रमाण ॥ “ यस्यप्रसादाद्देवेशमम सामर्थ्यमीदृशम् । संहरामिक्षणादेवत्रैलो-
क्यंसचराचरम् ॥ धातासृजतिभूतानि विष्णुर्द्धारयतेजगत् ” । इतिसारस्वततंत्रे ॥
कृष्णचंद्रको अवतार विष्णुहीते होइहै सो पुराणनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
पंगुल मेरु सुमेरु उलंधै त्रिभुवन मुक्ताडोलै ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशै अनहद वाणी बोलै ॥ ४ ॥
औ जिनके अघटित घटना सामर्थ्यते पंगु जे हैं अरुण ते पृथ्वीकी कीला
जे हैं सुमेरु तिसको रोज उलंधै हैं नांघै हैं । अथवा पंगुजो हैं राहु जाके शिरे
भरहै गोड़ हाथ नहीं है सोसुमेरु का नाघत रहे है औ मुक्ते जे हैं नारद
शुक कबीर आदिक जे संसार ते मुक्त हैकै मनादिकन को छोड़िकै साहब के
पास गये हैं औ यह शास्त्रमें लिखे है कि, उहांके गयेपुनि नहीं आवै है
परन्तु तेऊ साहबकी सामर्थ्यते त्रिभुवनमें डोलै हैं संसारबाधा नहीं करिसकै
है । आ जब शुकाचार्य निकसे हैं तब व्यास पछुआन जात रहे हैं तब गूंगे जे
बृक्ष हैं तेऊ व्यासको समुझायो है । औ मध्वाचार्य जब भिक्षाटन को निकसे