कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
है। ऐसे साहबके अनूप चरित हैं। अर्थात् जो रहस कहिआये सोऊ मन
बचनके परे है। सो कबीरजी कहैं हैं कि, जोचित्तमें अनुमानकरि देखौ तौ
यावत् उपासना औ ज्ञान तुम करौ हौ, जगत् मुक्तिरूप माणिक काहूते न
मिलैगी। ऐसी मुक्तिके लाभ को लोभत्यागिकै औ सब कुटुंब जे गुरुवालोग
तिनको त्यागिकै शारंगपानी कहे धनुषको ^न्हे साहब तिनको काहे नहीं
भजौहौ अर्थात् भजौ ॥ ३ ॥ ४ ॥
इति सत्ताईसवां शब्द समाप्त ।
अथ अठाईसवां शब्द ॥ २८ ॥
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियतिहै तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़बांधो तेहिबो तोरि पराई ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गम कीन्हो गैया अति हरहाई ॥ ३ ॥
ई सातौ अवरण हैं सातौ नौ औ चौदह भाई ।
एतिक गयै खाइ बढ़ायो गैया तौ न अघाई ॥ ४ ॥
खूंटामें राती है गैया श्वेत सींग हैं भाई ।
अवरण वरण कछू नहिं वाके भक्ष अभक्षै खाई ॥ ५ ॥
ब्रह्मा विष्णु खोज कै आये शिवसनकादिक भाई ।
सिद्ध अनंत वहि खोज परेहैं गैया किनहुं न पाई ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पद को गाइ विचारि है आगे है तरिजाई॥ ७॥