कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २६७ )
अनन्त सिद्ध खोज मरे पै गैयो कोऊ न खोजे पायो कि, सत् है कि, असत् है
तात्पर्यऊ न जाने ॥ ५ ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पदको गाइ विचरि हे आगे ह्वै तरिजाइ ॥ ७ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! सुनौ जो यह पदको अर्थ है कहै अर्थ
विचारि है औ जौन पद हम वर्णन करिआये सब ब्रह्माण्ड सत्तावरण आदिदै कै
जे पद हैं कहै स्थान तिनको जोकोई गाइ कहै मायाको रूपही विचारैगो कि
यहां भरतो मायाही है सो मायाके आगे हैकै साहबको लोक विचारैगो सोई
तरैगो ॥ ७ ॥
इति अट्ठाईसवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्तीसवां शब्द ॥ २९ ॥
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेहु कै मन लागै ॥ १ ॥
अमलीलोग खुमारी तृष्णा कतहुं सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
ब्रह्म कलारचढ़ाइन भाठी लै इन्द्री रस चाखै ।
सँगहि पोच ह्वै ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै ॥ ३ ॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीरगंभीर अतिनिर्मल तहँउठि मिलहु कबीरा ॥४॥
यहां अब मायाकेपरे जे साहबहैं तिनको बतावैं हैं ।
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेकै मन लागै ॥ १ ॥