कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६८ ) बीजक कबीरदास ।
हे भाइउ ! नयन रसिकजौहै संसारी चर्म चक्षुते भिन्नभिन्नदेखि विषयरस
लेनवारो सो जो जागै कहे मुमुक्षुहोइ तौ ब्रह्मके पार औ अबिगत कहे बिगत
नहीं सर्वत्र पूर्ण औ अबिनाशी कहे जाको नाश कबहूं नहीं होईहै ऐसे जे
परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनमें कैसेकै मन लागै जो कैसेहुके पाठहोय तौ
यह अर्थ है जो कैसेहुकै मन लगबो करै तौ बीचमें बहुत अवरोधहैं ॥ १ ॥
अमली लोग खुमारी तृष्णा कतहुँ सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
सबलोग अमली हैं विषय छांड़्यो पैतृष्णाकी खुमारी लगी है अरु कहूं
संतोषको नहीं पावै है । फिरि काम मत जो कोकशास्त्रादिक क्रोधमत जो
मुद्राराक्षसादि ग्रन्थनमें प्रतिपाद्य जे मतहै तेई प्यालाहैं तिनको काम क्रोध रूप
जो मद सो माया भरिभरि उन को पिआवै है ॥ २ ॥
ब्रह्मकलार चढ़ाइनि भाठी लैइन्द्री रसचाखै ।
सँगहि पोच होइ ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै॥३॥
प्रथम तों काम क्रोधादिकनते जागन नहीं पावैहै जो कदाचित् जाग्यो तों ब्रह्म
जो कलारहै जे अहंब्रह्म बुद्धि करै है गुरुवालोग जे भाटी चढ़ाइन ज्ञान सिखवै
लगे कि तुहीं ब्रह्महै ताहीं में इन्द्रिनको लैकरिकै अहंब्रह्मास्मिको रसचाखन
लग्यो अर्थात् ब्रह्मानंदको अनुभव करनलग्यो जो मदपियै है ताको ज्ञान भूलि
जायहै यहै कहैहै कि मैंहीं मालिकहौं सो जो गुरुवालोगन को संगकियो ब्रह्मानंद
पानकियो सो मैं साहबकोहौं यहअङ्ग भूलिगई वही गुरुवा लोगनको ज्ञानदियो
पुकारन लग्यो कि मैंहीं ब्रह्महौं।परं जो चतुराहाइ सो बिघननको नाकि जाइहै॥ ३॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीर गँभीर अति निर्मल तहँ उठि मिलहु कबीरा ॥४॥
पोचकहे अज्ञानी जे जीवहैं तिनको यहि कलिमें कहे माया ब्रह्मकें झग-
ड़ामें बहुतसंकट शोच औ व्याधिशरीर को है सोजहां अति धीर है कहे चला-
यमान नहीं है निश्चलपद है औ गंभीर कहे गहिरहै औ निर्मल कहे माया