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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

शब्द । ( २५७ )
अथ पचीसवां शब्द ॥ २५ ॥
अवधू वोत तुरावल राता । नाचै वाजन वाज बराता ॥१॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोरि कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक वैठाये निरभय पद परभाता ।
मातहि उलटि बरातहिं खायो भली वनी कुशलाता ॥३॥
पाणि ग्रहण भये भव मंडौ सुषुमानि सुराति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पण्डित ज्ञाता ॥ ४ ॥
अवधू वोत तुराबल राता । नाचै वाजन वाज वराता॥१॥
हे जीवौ ! आपतौ अबधू रहेहौ कहे आपके बधू जो है मायासो नहीं रही
है परंतु रौर अब वह तत्त्वमें राते हैं । अथवा हे अबधू ! यह शरीरको राजा
है जीव सो अब वह तत्त्वमें राता है । कौन तत्त्वमें राता है ? सोकहै हैं;
जहां बाजन नाचै है, बरातंबजै है । सो इहां शरीर बाजनहै सो नाचै है
कहे जाग्रत् अवस्थामें स्थूल, स्वप्नअवस्थामें सूक्ष्म, औ सुषुप्ति में कारण, तुरि-
यामें महाकारण, येई नाचै हैं । तिनको जब इकट्ठा कियो अर्थात् एकाग्र मन
कियो उन्मनी मुद्राआदिक साधन करिकै तब पचीसौ जे तत्त्व हैं तेई बरात हैं
तेई बाजै हैं कहे तिनको जो संघट्ट हैबो है इंद्रियनमें तिनते जो ध्वनि निकसै
है तेई दशौ अनहदकी ध्वनि सुनि परती हैं तामेंप्रमाण कबीरहीजीको ॥
“उठतशब्द घनघोर शंखध्वनि अतिघना । तत्त्वोंकी झनकार बजतझी-
नीझना” ॥ १ ॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोर कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता॥२॥
नाभीमें चक्र है तामें नागिनीको बास है सो चक्रके द्वारमें मुड़दिये परी
है । आत्मानीचे है सो वह आत्मा दूलह है ताहीकी नागिनी मौर ह्वै रही
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