सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

कैसो साहब सर्वत्र पूर्णहै सो बतावैहैं । लछिबिनु सुखकहै जो पदार्थ
प्रत्यक्ष नहीं होइ है तामें सुखनहीं होइहै देखो तो नहीं परै है साहब पै जौं
कोई स्मरण करै है सर्वत्र ताको सुखहोयहै । साहबको कौनौ बातको दरिद्र
नहीं है जो चाहै सो करिदारै समर्थहै परन्तु नानाजीवनको अज्ञानमेंपरेदेखिकै
साहिबोको यही दुःख है कि, मेरे अंश जीव माया में परिकै नरक स्वर्ग
जाय हैं । काहेते यहदुःखहै कि, साहब अतिदयालुहैं तामेंप्रमाण ॥ “ताव-
त्तिष्ठतिदुःखीवयावद्दुःखं न नाशयेत् । सुखीकृत्यपरान्भक्तानस्वयम्पश्चात्सुखीभवेत्
इति” ॥ ध्वनि यह है कि,साहब दयालु हैं ते सर्वत्र पूर्णहैं यह बिचारिकै किं
जीव मोको जहँ स्मरणकरै मैं तहँ उबारिलेउँ । फिरिकैसो साहब है कि,
मोहनिद्रा नहीं है सदाजगै है अपने भक्तनकी रक्षाकरिबेको । ऐसेहू साहबके
सम्मुख जो जीव नहीं होइहैं तिनकी और सदा सुखमय साहब सोवै है अर्थात्
कबहूंनहीं देखैहै । फिरकैसो साहबहै जाकी ज्योति जो ब्रह्म है अर्थात् जाको
लोकमकाश जो है ब्रह्म सो बिना कौनौ कथै है वा कौनौ लीलैकियो अकथहैं
ऐसे साहबके बिना रूपमें आशिकभये साहबको ज्ञानरत्न विहीना जीवसंगर में
जनन मरण पाइपाइ रोवैहै ॥ २ ॥
भ्रम बिनु ज्ञान मनै बिनु निरखै रूप बिना बहुरूपा ।
थिति बिनु सुरति रहस बिनु आनँद ऐसो चरित अनूपा॥३॥
कहै कबीर जगत बिन माणिक देखौ चित अनुमानी ।
परि हरि लाभै लोभ कुटुंब सब भजहु न शारँग पानी॥४॥
फिर कैसोहै साहब भ्रमबिनाहै अर्थात् कबहूं मायासबलित ह्वैकै जगतमेंहीं
उत्पत्तिकियो । सदा ज्ञान गुण सदा ज्ञान स्वरूप है । तौने साहबको मानै बिना
निरखै कहे बिना ह्वैकै हंस स्वरूप पाइकै तैं देखै । कैसे हैं साहब कि, चिद्
अचित जेरूपहैं तेहि बिनाहैं अर्थात् ये स्पर्श नहीं करिसकै हैं औचित अचितके
शरीरी हैं बहुत रूपौ हैं सब उन्हींके रूपहैं । फिरि कैसेहैं जब साहब सुरति दीन
है तब जीवन की स्थिति भई है । औ सुरति नहीं है साहबकी स्थिति वालोक
में बनी है । औ आनंदजो मनबचनमें आवै है सो नहीं है वहां आनंद बनों