कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलियो अर्थात् कुछ सुधि न रहगई । सो कबीरजी कहै हैं कि भली कुशलात
बनीहै कि तब तो कुछसुधिहू रही अब कछू सुधिनहीं रहिगई ॥ ३ ॥
पाणि ग्रहण भये भव मंड्यो सुषुमनि सुरति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ ४ ॥
वहां मंडप परे पर पाणिग्रहणहोयहै यहां पाणिग्रहणभयेपर भव मंड्यो
अर्थात् जब पाणि ग्रहण मायाको ह्वै चुक्यौ कहैं नागिनी को जब सुधा पिआइ
चुक्यौ तब जै मुहुँ नागिनीको पानी दियो तैसेहि फल मिल्यो । एक मुंह
दियो तौ महीना भरेकी समाधि लगी औ दुइमुंहदियो तौ तीन महीनाकी
समाधिलगी औ चारि मुंहदियो तौ छः महीनाकी समाधि लगी. औ पांचमुंहदियों
तौ वर्षदिनकी, औछःमुंहदियो तौ तीन वर्षकी, औसातमुंहदियो तौ बारहवर्षकी,
समाधिलगी । और जो हजारनवर्ष समाधि लगावाचाहै तौ और मुंहदेय । सो
जब नागिनीको सुधा पिआयो तब जे मुँह दियो तेतनेनदिन भर सुषुमनि
सुरति समाता । अर्थात् सुषुम्णामें 'जीवकी सुरति समाईहै । पुनि जब समाधि
उतरी तब फिर भव मंड्यो कहे संसारी भयो अर्थात् पुनि ब्रह्मांड मंड्यो कि,
शरीरकी सुधि भई । सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! हे ज्ञाता पंडितौ !
तुम सुनौ तौ बूझौ तौ वे कहां मुक्तभये ? नहीं भये फेरि तौ संसारही में
उलटि आवै हैं ॥ ४ ॥
इति पचीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छब्बीसवां शब्द ॥ २६ ॥
कोई विरला दोस्त हमारा भाई रे बहुतका कहिये ।
गाठन भजन सवोरे सोइ ज्यों राम रखै त्यों रहिये ॥ १ ॥
आसन पवन योग श्रुति संयम ज्योतिष पढ़ि वैलाना ।
छौ दर्शन पाखंड छानबे येकल काहु न जाना ॥ २ ॥