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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 311

शब्द । ( २६१ )
करिकै जगत्को उठावैहै कि, जगत् उठिजाय मरिहि जाइ । सो यह जगत्
तो मन रूपही है सो उनके मनमें मनरूप जगत् न समान्यो अर्थात् उनको
मिथ्या कियो न करि गयो । अथवा धोखाब्रह्म ताको मन कहे बिचार उनके
मनमें समाई रह्योहै ताही करिकै जगत को उठावै है कि, जगत् न रहिजाइ
सोऊ न उठ्यो ॥ ३ ॥
कहैकबीर योगी औ जङ्गम फीकी उनकी आसा ।
रामै नाम रटै ज्यों चातक निश्चय भक्ति निवासा ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि योगी जंगमन की सबकी आशा फीकी है काहेतें
धोखाब्रह्मके ज्ञानते संसार मिथ्यानहीं होइहै । जीवनके ब्रह्महोबेकी आशा
फीकी है सो जो रामनाम निशिवासर लेबहै औ जैसे चातक एक स्वातीही की
आशा करै है तैसे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रकी आशा करैहै ताहीके हृदयमें
उनकी भक्तिको निश्चय कै निवासहोइहै भक्तिरसरूपहै याते इनकी आशासरिसहै
अर्थात् सफलहै औ सोई संसार सागर ते उबरै है सो आगे रमैनीमें कहिआये
हैं ॥ “कहै कबीरते उबरे जोनिशिबासर नामहिलेव” ॥ ४ ॥
इति छब्बीसवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्ताईसवां शब्द ॥ २७ ॥
भाई अद्भुत रूप अनूप कथा है कहौं तो को पतिआई।
जहँजहँ देखों तहँतहँ सोई सब घट रह्यो समाई ॥ १ ॥
लछि बिनु सुख दरिद्र बिनु दुख है नींद बिना सुख सोवै।
जस बिनु ज्योति रूप बिनु आशिक रतन विहूना रोवै॥२॥
श्रम बिनु ज्ञान मनै बिनु निरखे रूप बिना बहु रूपा ।
थितिविनु सरति रहस बिनु आनंद ऐसो चरित अनूपा॥३॥
कहै कबीर जगत बिनु माणिक देखो चित अनुमानी ।
परिहरि लाभै लोभ कुटुंब सब भजहु न शारँगपानी॥४॥