कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २५५ )
अथ चौबीसवां शब्द ॥ २४ ॥
अवधू सो योगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
पौ बिनु पत्र करह बिनु तुम्बा बिनु जिह्वा गुण गावै ।
गावनहारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ ३ ॥
पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ ४ ॥
अवधू सो योगी गुरुमेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढ़ो विन फूलै फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
वधू जाके न होइ सो अबधू कहावै सो हे अबधु जीवो! जो यह पदके अर्थको
निबेरा करिके जानै सो योगी गुरु कहे श्रेष्ठ है औमेरा है कहे मैं वाको आपनो
मानौहौं ॥ १ ॥ एकजो तरुवरहै सो बिन मूल ठाढ़ो है अरु वामें बिनाफूल
फल लागो हैं सो यहां तरुवर मनहै सो जड़है अरु आत्मा चैतन्य है शुद्ध है जो
कहिये आत्माते उत्पत्तिहै सो जो आत्माते उत्पन्नहोतो तौ आत्मा चतन्य है
याते यहू चैतन्य हो तो ताते आत्माते नहीं उत्पन्नभयी । यह आपई आत्माते
प्रकाशभयो जो बिचारैतौ वाकोमूल भगवत् अज्ञान सत नहीं है बिनामूल ठाढ़े
भयोहै अरु बिना फूलै फल लागोहै कहे जगत् उत्पादक क्रिया मननहीं कियो
मिथ्या संकल्पमात्रते जगद्रूप फललागवई भयो अरु वाके शाखापत्र कछू नहीं है
अर्थात् अंगनहीं है चित्त बुद्धि अहंकार येऊमिथ्याहैं निराकारहैं अरु यह मनैके
मुखते आठौ गगन जागतभये। सात सप्तावरणके आकाश अथवा चैतन्याकाश ॥ २ ॥