कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै सो जब पांचहजार कुंभक कियों तब नागिनी जागी सो ऊपर को चढ़ी तब
चक्रको द्वार खुलिगयो तब आत्मातो दूलहहै सो चढ़िकै मौर जो नागिनीहै
ताके माथेपर गैब गुफ़ामें बैठयो जाइ । औ बरातनमें जो नहीं कहिबेलायक
झूठीबात सो गारीमें कहैहैं इहां शरीरमें ब्रह्म ह्वैजैबो अकथहै कहिबे लायक नहीं
है । सो कहै हैं कि, हम ब्रह्मह्वैगये । औ मड़ये के चारनको नेग समधी देइहै;
इहां मड़येके चारनके तेगनमें समधीही दीन्हेहै । मायाको पिता जो मनहै सो
एक समधीहै औ मनके समधी साहबहैं काहेते कि, यहजीव भगवद्वात्सल्यको
पात्रहै जबयह आत्मा विषयनमें रह्यो है तब बेजाने कबहूं कहतहू सुनतरह्यो
जबते ब्रह्मांड मड़वामें गयो तबते कबीरजी यहकूट करै हैं कि, मड़येके चारन में
समधीको दैराख्यो है कहे समधी जो साहब ताको कहिबो सुनिबो मिटिगयो ।
सो जानैतो यहहै कि, हम मायाते छूटिगये पै नागिनीको जै बुन्दसुधा देइहै तै
वर्ष वहां समाधि लागै है सो नागिनी ही वहां गोहरौख है सो पुत्र जो जीवहै
सो माता जो माया है ज्योतिरूप आदिशक्ति ताको बिवाहि लेयहै कहे वाहीके
संग ज्योतिमें लीनह्वै के वहां रहै है ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक बैठाये निर्भय पद परभाता ।
भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता॥३॥
चौक लीषिकै दुलिहिन को बैठावै हैं । यहां दुलहिन जो है माया जो जगत
रूप करिकै नानारूपहै ताको लीषिकै एक करिदार्यो कहे एक ब्रह्मही मान
भयो ताके ऊपर चौकबैठायो कहे चौक देत भयो । अर्थात् अन्तःकरणावच्छि
जो चैतन्य सो प्रमातृचैतन्य कहावै है । वृत्त्यवच्छिन्न जो चैतन्य सो
प्रमाणचैतन्य कहावै है । विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रमेय चैतन्य कहावै है।
स्फूर्त्यवच्छिन्नचैतन्य स्फूर्त चैतन्य कहावै है । सो ये चारों चैतन्यकें
चौकबैठायो कहे चौक पूरच्यो अर्थात् चारो चैतन्यको एक करिकै स्थितकियो।
बिवाह होत होत भिनसार होइ जायहै तब यह मन भयो कि, हम निर्भय
पदको पहुंचिगये प्रभात ह्वैगयो, मोहरात्री व्यतीत ह्वैगई । नागिनीको जो
अमृत सरोवर में अमृत पियावै है सोई भातहै सो नागिनी जब अमृतपियो तब
वहै भात बरात जो आगेवर्णनकरि आये पंचतत्त्व पचीसप्रकृति ताकोखाय