कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
शब्द । ( २२७ )
ह्वै मसकीन कुलीन कहावौ तुम योगी संन्यासी ।
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥२॥
रामराकहे रकार जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिन को अभावहै,
रामोपासक नहीं हैं, तिनकी संशयकी गांठिनहींछूटै है, तेहितेपकरिपकरिके यम
लूटिलेइहैं अर्थात् याकोमारिकै नरकमें डारिदेइँ हैं । फिरिफिरि शरीर पावै है
फिरिलुटि जायहै मारो जायहै ॥ १ ॥ मसकीन कहे गरीब फकीर ह्वैकै कुलीन
कहावै है कहे भये तौ फकीर परन्तु कुलाभिमान नहीं छूटै है कहै हैं कि, हम-
फलाने गद्दीके मुरीदहैं । सो तुम योगी हौ संन्यासी हौ ज्ञानी हौ गुणी हौ
शूर हौ कविहौ दाताहौ इत्यादिक जो भेदकी मति हैं सो कोई न नाशकीयो
काहेते कि, हे संतो ! ये परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो यह कोई नहीं
जान है औ यह जगत् चित् अचित् विग्रहकारिके साहबको रूपहै भेदकी बुद्धि
लगाइ राख्यो है ॥ २ ॥
स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब अनुभव भाव न दरशै ।
लोह हिरण्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परशै ॥ ३ ॥
स्मृति वेद पुराण सबै पढ़ै हैं परंतु परमपरपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं सबके तात्पर्य
तिनको अनुभव काहूको नहीं दरशै है । जो पारसको स्पर्श न होय तौ लोह
हिरण्य कहे सोन कैसेहोय न होय । तैसे स्मृति वेदपुराणनको तात्पर्य श्रीराम-
चन्द्रहैं तिनके चरणको जोलौं न परशै तौलौं मुक्ति नहीं होयहै पार्षद रूपत्व
वाको प्राप्ति नहीं होयहै ॥ ३ ॥
जियत न तरै मुयेका तरिहौ जियतै जो न तरै ।
गहि परतीति कीन जिनजासों सोई तहँ मरै ॥ ४ ॥
जो कछु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझि सयाना ।
कहै कबीर तासों का कहिये देखत दृष्टि भुलाना ॥ ५ ॥
सो जियतमें जो न तुम तरोगे तौ मुयेकैसे तरोगे । सो हे जीवो ! जियतै
काहेंनहीं तरिजाउहै । जासों कहे जौने साहबसों जाके स्पर्शकिये जीव शुद्ध
( २२८ ) बीजक कबीरदास ।
द्वै जायहैं तौने साहबसों जो कोई (जहैं साहबको मत गहिकै) परतीति कहैं
बिश्वासकीनहै सो जानतहै कहे संसारहीमें अमर है गयो है ॥ ४ ॥ सो कबी-
रजी कहैं हैं कि, ये जीव ज्ञान करैं हैं कि अज्ञान करैं हैं ताहीको सब कुछ
मानिकै अपने को सयान मानैहै तिनसों कहा कहिये जो अपनी दृष्टिते देखत
देखत भुलायदियो । स्मृतिवेद पुराण चक्रवर्ती परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीको कहैं
हैं, उन्हींके भक्त हनुमान् विभीषणादिक अमर भयेहैं, सो देखतेहैं औ यह नहीं
समुझैं हैं कि, सबके मालिक बादशाह श्रीरामचन्द्र हैं, इनहीके छोड़ाये छूटैंगे
औरके छोडाये न छूटैंगे ॥ ५ ॥
इति चौदहवां शब्द समाप्त ।
अथ पन्द्रहवां शब्द ॥ १५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ेजात जोलाहो॥१॥
गज नौ गज दश गज उनइसकी पुरिया एक तनाई ।
सात सूत नौ गाड़ बहत्तरि पाट लागु अधिकाई ॥ २ ॥
तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढ़ाई ।
तामें घटै बढ़ै रतिओ नहिं कर कच कर घरहाई ॥ ३ ॥
नित उठि बैठ खसम सों बरबस तापर लाग तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जिन्ह यह सृष्टि उपाई ।
छोड़ि पसार रामभजु बौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ जात जोलाहो॥१॥
रामरा कहै रा जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिनके अभावहै साह-
बको नहीं जानें । ऐसेजे समष्टिजीव तिनके इहां माहो है कारणरूपा माया
सोबिनावनको कहे बिनवावनको चली अर्थात् जगत् बनवाइबेको चली । इहां
शब्द । ( २२९ )
बिनवो न कह्यो बिनवाइबो कह्यो सोबिना चैतन्य ब्रह्म औजीवके लपेटे याको
बनायो नहीं बनै है काहेते कि, यह जड़है अर्थात् ब्रह्म जीवको संयोग करिकै
बनवानको चली । ब्रह्मजीवके पाससों जोलाहा जो यह जीवहै सो घरको छो-
ड़ेदेयहै अर्थात् यहशुद्ध जीवात्मा आपनो जो घरहै साहबके लोकको प्रकाश
जहांशुद्ध रहैहै तौनै घरको छांड़िकै, माया के लपेटमें परिके, आपने बंधनको
आपने मन करिके संसाररूपी पटको बनावैहै ॥ १ ॥
गज नौ गज दश गज उनइसकी पुरिया एक तनाई ।
सात सूत नौ गाड़ बहत्तर पाट लागु अधिकाई ॥ २ ॥
प्रथम एकगजकी कल्पनारूप पुरिया तनावत भई प्रथम जीव बाणी प्रणव-
रूप एक गजकी पुरिया अनुमान ब्रह्म बनायो अर्थात् मन भयो । पुनि नौ
गजकी पुरिया तनावत भई सो नवौ व्याकरण बनावत भई । अर्थात् नवौ
व्याकरणमें शब्द ब्रह्मको वर्णन ह सो शब्द बनावत भई । पुनि दश गज की
पुरिया तनावत भई, सो चारवेद औ छः शास्त्र ई दशगजकी पुरिया तनावत-
भंयी सो अठारहों पुराण उनीसों महाभारत ये उनइसगजकी पुरिया बनावत
भयो ॥ २ ॥ पुनि सात सूत कहे सप्तावरण १ पृथिवी २ अपु ३ तेज ४
वायु ५ आकाश ६ अहंकार ७ महत्तत्त्व अथवा सात सूत १ जाग्रत् २
महाजाग्रत् ३ बीजजाग्रत् ४ स्वप्नजाग्रत् ५ स्वप्न ५ सुषुप्ति ६ औ७ महासुषुप्ति
ये सात अज्ञान भूमिका बनावतभयो पुनि नवगाड़ कहे नवद्वार बनावत भयो
बहत्तर पाटकहे बहत्तर कोठा अथवा बहत्तर हजारनस बनावत भयो ॥ २ ॥
ता पट तूल न गजन अमाई पसन सर अढ़ाई ।
तामें घटै बढ़ै रतिवो नहिं कर कच कर घरहाई ॥ ३ ॥
तापट कहे तौन जो है शरीर संसाररूपी पट तामें जब अहंब्रह्म भ्रमरूप तूल-
रह्यो तबतो गजमें नहीं अमातरह्यो कहे अप्रमेय रह्यो है । औ सेरकहे सिंहरूप
रह्योहै संसारको नाशकै देनवारो रह्योहै । सो संसारी हैकै जैसे सूतपैसा को
अढ़ाईसेर बिकाय है तैसे यह जीवात्मा बिषयरूप पैसाको चाहिकै अढ़ाई
सेरद्वैगयो । एकै पृथ्बीको विषय सुख चाहैहैं एकै यज्ञादिक करिकेस्वर्ग-
( २३० ) बीजक कबीरदास ।
को विषय सुख चाहै हैं, आधेमुमुक्षू हैकै ईश्वरन के लोकको सुख चाहै हैं, औ
ब्रह्ममें लीनहैबो चाहै हैं, इनमें पूरीविषय भोगनहीं है, यातें आधाकह्यो अहंब्रह्म
तूलते नाना शरीर भ्रमरूप सूत निकस्यो एकते बहुत हैगयो । जोपट संसारमें
बिनिगयो सो पट जो है संसार सो रत्तीभर न घटैहै न बढ़ैहै घरहाई जोहैं
जीवैकौनारीमायासो यहीजीवको कच अपने करमें करिलियोहै अर्थात् यहजीवकी
चूँदीगहि लियोहै मायाको भोक्ताजीवहै यातेजीवहीकी स्त्री माया है ॥ ३ ॥
नित उठि बेठ खसमसों वरवस तापर लागु तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥४॥
खसम जो जीवहै तासो नित उठिउठिके वरवस कहै जबरदस्ती बेठ कहैं
बेगारि लेयहै सोएकतो संसारमें माया बेगारिलेयहै दूसरो जोभागतें यह
संसारउठो तो आत्मा को तिहाईलगो कहे त्रिकुटीमें धोखा ब्रह्मको ध्यान लगा-
यो । जोनमें विनिजायहै तौन पुरिया कहावैहै । सों जब भीजिजायहै तब नहीं
काम आवैहै । ऐसे यह संसार पुरिया है नाना पदार्थ ते जो है राग तेहिकरिकें
जब शरीर भीज्यो तब यह संसारको असार जानिके कहे संसार कुछ कामको
न जानिके जोलाहा जोहै जीव सो रिसाय चल्यो, धोखाब्रह्ममें लगतभयों;
सोऊ ब्रह्मतो तांहीको अनुभव है वहअनुभव ब्रह्ममें कछु न पावतभयो ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जिन यह सृष्टि उपाई ।
छाडि पसार राम भजु वौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, जामें तुम लग्यो है सोतो तिहारोई मन को अनु-
भवहै अरु यह संसारऊको तुम्हारो मनही रच्यो है. सो जिन सृष्टिवाली उपाय
कियोहै तेहि माया ब्रह्मते छोड़ि पसार परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र को भजन
करु, काहेते कि, यह भवसागर परमकठिनहै उनहींके भजन किये छूटैगों,
औरीभांति न छूटैगो, और तो सब याही में परैहैं अथवा यहकठिन भव-
सागरमें आयके श्रीरामचन्द्रही को भजन करि मनते छूटैगौ ॥ ५ ॥
इति पन्द्रहवां शब्द समाप्त ।
शब्द । (२३१)
अथ सोलहवां शब्द ॥ १६ ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
कर बिन बाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोता सोई ।
पाटन स्ववश सभाबिनु अवसर वूझौ मुनि जन लोई ॥ २ ॥
इन्द्रिय बिनु भोग स्वाद जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड विहूना ।
जागत चोर मंदिर तहँ मूसै खसम अछत घर मूना ॥ ३ ॥
बीज बिन अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिनु फूले फल फलिया ।
बांझ की कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागज बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहै कबीर जन सोई ॥ ५ ॥
पूर्व मायाको वर्णनकरिआये तौनी मायाते छूटिके जौने उपाय ते साहब को
पावै है सो उपाय कहैं ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
हे जीव! राम कहे रकार तोको मरौहै अर्थात् रकार बीज को तोको अभाव
है याहीते तैं अपने को ब्रह्म मानिके संसारी है गयोहै । झीझीकहावै झिंझिया
जो कुवार शुक्लचतुर्दशीको अनेक छिद्रकै जो मटुकी होयहै ताके मध्यमें दीप
वारिके धरैहै सो झिंझियानांव ढेढियाको कवि संप्रदायहूमेंहै ॥ ( रंध्र जाल मग
द्वै कदै तिय तन दीपति पुंज । झिंझियाके सो घट भयो दिनहूमें बनकुंज ) ॥
( सारीमूलामलसी फलकांति झरोखन की झझरी झिंझियासी ) सोझिंझिया रूप-
नव दुवारको । अथवा रोम रोम में छिद्र है जामें वोई छिद्रन द्वै पसीना निक-
सैहै यहिप्रकारको झींझी जौहै शरीर तौनेजन्तरबाजै है कहे ताहीको यह सोहं
शब्दहै काहेते कि, श्वासा कहैहैं सोवहीश्वासके कहेते करचरण बिहून जों
निराकार ब्रह्महै सो तेरे आगेराजै कहे शोभितं होन लग्यो । अथवा आंखिन के
आगे नाचन लग्यो, सर्वत्र ब्रह्मही देखि परनलग्यो । अथवा तैंहीं करचरण
( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
बिहून कहे निराकार ब्रह्म हैके नाचन लग्यो । अथवा राजै कहे शोभित भयो
सो तुम तो शरीरते भिन्नहो जैसे ढेढिया ते दीप भिन्न रहै है । वह सोहं शब्द
तो शरीरको है वाको कहे तुम काहे धोखा में परेहौ । तुम निर्गुण सगुणके
परे जो है साहब ताके हौ तिनमें लगौ । निर्गुण सगुणके परे कैसे साहबहैं
सो कहै हैं ॥ १ ॥
कर बिनु वाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोतासोइ ।
पाटन स्ववश सभा बिनु अवसर बूझौ मुनिजन लोइ ॥२॥
साहब के लोकके जेबाजाहैं ते बिन कर बाजैं हैं काहेते कि वहां के जे
बाजा हैं ते पांचभौतिक नहीं हैं, औ उहांके जे बासी हैं तिनके शरीर पांचभौ-
तिक नहींहैं अर्थात् मनवचन के परेहौ औ प्राकृतजे हैं प्रकृति संबंधी पदार्थ
साकार औ अप्राकृत जो हैं निराकार ब्रह्म लोक प्रकाश ताहूते विलक्षण है ।
कर बिना कह्यो याते साकारौ नहीं है औ सो बाजै है याते निराकारौ नहीं ह।
औ सोई श्रोता जे हैं लोकवासी ते श्रवणते सुनै हैं औ श्रवण नहीं हैं याते
साकारौ नहीं है औ श्रवणते सुनै है याते निराकारौ नहीं है । मायाब्रह्म जीव
को जो अरुझा लाग्योहै सो जीव साहबको स्मरण करै ताके पाटन कहे पटाइ-
लीवे को साहब स्ववशहैं अथवा नौकर जाको राखैहैं ताको पट्टा लिखि देइहैं
सो पाटा कहावै है सो इहां पाटन बहु बचन है सो जीव उनके शरण
जायहैं तिनको पाटन के लिखि दीबे में अपनायलीबे में स्ववश हैं तामें प्रमाण॥
( सकृदेवप्रपन्नायतवास्मीतिचयाचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतन्मम ) ॥
औ बिना अवसर कहे बिना काल उनकी सभा लागी रहैहै वहां कालकी
गति नहीं है औ बाजन सदाबाजैहैं अर्थात् सदा रास उहां होता रहैहै । सो हे
मनन शील मुनिलोगो! तुम उन्हीं को समझौ औ उन्हींको मनन करो वहधो-
खा ब्रह्म के मनन कीन्हेते तुम्हारो जनन मरण न छूटेगो ॥ २ ॥
इन्द्रि बिनु भोग स्वादु जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड बिहूना ।
जागत चोर मँदोर तहँ मूसे खसम अछत घरसूना ॥ ३ ॥
शब्द । ( २३३ )
तुम वह साहब को कैसे समुझौ इंद्रिय बिना ह्वैकै साहब के लोक को जौहै
भोग सुख है ताको लेऊ औ बिना जिह्वा ह्वैकै अनिर्वचनीय जो राम नामहै
ताको स्वादलेऊ । औ पिंड बिहूनाकहे पांचौ शरीरते बिहीन ह्वैकै कहे पांचौ
शरीरनको छोड़िकैहंसस्वरूपमें स्थित ह्वैकै अक्षय कहे अक्षय ह्वै जाऊ । तुम्हारे
अंतःकरण रूपीघरको चोरजोहै धोखा ब्रह्म सो मूसि लेय है अर्थात् साहब को
ज्ञान चोराय लेयहै तुमहीं अहं ब्रह्म बुद्धि कराये देयहै। काहे ते कि खसम जे
हैं साहब ते अछत बने हैं औ तुम अपनो हृदय घरसून करि राख्यो है साहब
को नहीं राख्यो अर्थात् साहब को नहीं जान्यो ॥ ३ ॥
बीज बिनु अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिन फूलै फल फलिया।
बांझकी कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया॥४॥
इहां याकु अर्थ है बीज बिना कहूं अंकुर होय हैं ? औ पेड़बिना कहे बिना
जड़ कहूं तरुवरहोय हैं ? औ बिना फूलकहूंफल होय हैं ? अरु बांझके कोखिमें
कहूंपुत्रहोइहै ? औबिनापगकोईतरुवरमें चढ़ैहै ? सो बीज तौ वह ब्रह्मको कहौ-
हौ सोतो शून्य है, कोईपदार्थनहीं है अंकुर कैसे भयो कहे कैसेमाया सबलित
ब्रह्म भयो । औ पेड़ जड़ मायाको कहौ सो तो मिथ्या है संसार तरुवर कैसे
भयो । औज्ञानरूप जो फूल है ताहूको तो मूलाज्ञान कहौ हौ, सोऊ मिथ्या
है, कहो तो मुक्तिरूपी फल कैसे फरयो । औ मनको तौ जड़ कहौ हौ, ताको
अनुभव प्रबोधरूपी पुत्र कैसे भयो । औ आत्मा को तौ अकर्त्ता कहौ हौ मन
बुद्धि चित्तते भिन्न है सो बिना पांव संसार वृक्षको चढ़िकै कैसे चैतन्याकाशको
पहुंच्यो ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागद बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहैं कबीर जन सोई॥५॥
बिना दुआइति मसि कैसे रहैगी अर्थात् मनको तो मिथ्या कहौ है। मनको
अनुभव कैसे रहैगो । वह मिथ्याई होयगो । औ बिना कागज कलम कहा करैगी
अर्थात् देहेन्द्रियादि अंतः करण तो मिथ्यै कहौ है ज्ञान केहिके आधारहोयगो
जहां बुद्धिरूपी कलमते लिखौगे निश्चय करौगै औ जो यहपाठ होय "बिनअ-
( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
क्षर सुधिहोय" तौ यह अर्थ है कि, जो एक आत्माही को सत्य मानोगे तों
साहब को बिना अक्षर कहे बिना अनादि माने सुधि कहे सुरति तुम को कैसे
होयगी । औ कौनसुरति देयगो । औ सुधिबिन कहे जो सुधि न भई तो सहज
कहे सो हंसो कैसे होयगो । तेहिते बिनाज्ञाता को ज्ञानकरु कहे अबैते अपने
को ज्ञाता मानि रहे हैं कि, मैं अपनो बिचारकरत करत औ सबको निषेध
करत करत जो पदार्थ रहि जाय है ताहीको मानिलेउंगो कि, यहीतत्व है सों
यह भ्रमछांड़ो, तेरेजानेते साहब न जानिपरेगे साहब मनबचन क परे हैं । सो
जौन बिना ज्ञाताको ज्ञान है जो साहब देय हैं काहेते कि, वह ज्ञान काहूकों
नहीं जाने है जब साहब आपनो रूपदेय हैं, तब वह रूपते जानि परै, साहब
हीके रूपको जानोपरै है । वाको ज्ञाता कोई नहीं है । सो ज्ञानकरु अर्थात्
रकार ध्वनि श्रवण रूप साधनकरु तब साहबई तोको हंसस्वरूपः दैके आपने
नामरूप लीलाधामको स्फुरित करायदैयेंगे । तौने हंसस्वरूप की आँखिते श्रवण
ते साहब को देखु औ साहबके गुणसुनु । सो कबीरजी कहै हैं कि, यहि तरह
ते जाके बिना ज्ञाताको ज्ञान है सोई मेरोज़न है । अर्थात् जौनलोक में
हमारी स्थिति है तौनही लोकको वहजन है बिनाज्ञाताकोज्ञान कौन कहावै है
जो साहब देय हैं तामेंप्रमाण ॥ "तेषांसततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येनमामुपयांतितें " ॥ इतिगीतायाम् ॥ ५ ॥
इति सोलहवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्रहवां शब्द ॥ १७ ॥
राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरै ॥ १॥
जा मुख वेद गायत्री उच्चरै ता सु वचन संसार तरै ।
जाक पाँव जगत उठि लागै सो ब्राह्मण जिउ वद्ध करै ॥ २॥
अपना ऊंच नीच घर भोजन ग्रीण कर्म करि उदर भरै ।
ग्रहण अमावस ढुकि ढुकि माँगै कर दीपकलिये कूपपरै॥३॥
शब्द । (२३५)
एकादशी व्रतौ नहिं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै ।
तजि कपूर गांठी विष बांधे ज्ञान गमाये मुगुध फिरै ४
छीजै शाहू चोर प्रतिपालै संत जननकी कूटकरै ।
कहै कबीर जिह्वाके लंपट यहि विधि प्राणी नरक परै ५
राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरै॥१॥
जा मुख वेद गायत्री उचरै तासु वचन संसार तरै ।
जाके पाँव जगत उठि लागै सो ब्राह्मण जिउ वद्ध करै॥२॥
श्रीरामचन्द्रको गावै हैं औ औरनको समुझावै हैं औ सबके क्लेश हरन-
वारे जे साहब हैं तिनको नहीं जानै कि, येई क्लेश हार हैं हरि येई हैं । सौं
या नाना देवता नाना उपासना खोजत विकल फिरैं हैं॥१॥अरु जाके मुखते वेद
गायत्री जों वचनहैं सो उचरै हैं वहीको तात्पर्यार्थ जे श्रीरामचन्द्रहैं तिन्हैं जानि-
संसार तरैहै ताको अर्थ न जानते कि वेदगायत्री तात्पर्यार्थ ते श्रीरामचन्द्र-
हीको कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “सर्वेवेदाः सघोषाश्च सर्वेवर्णाः स्वरा अपि ।
समात्रास्तुविसर्गाश्चसानुस्वाराः पदानिच । गुणसांद्रेमहाविष्णौ महातात्पर्य्य-
गौरवात्” ॥ इतिमहाभारते ॥ जेब्रह्मादिकनमें विष्णु हैं त विष्णुहैं औ महा
विष्णु श्रीरामचन्द्रही कहावै हैं तिनको तो नहीं जानै हैं । वेद गायत्री पढ़े हैं
औ वही मुखते हिंसा शिष्यनते प्रतिपादन करै हैं समुझावै हैं । औ आपहू
हिंसा करै हैं । तिन्हीं के पांव सब जगत् उठिलागै हैं अरु वाहीको कहा
सब सुनै हैं ॥ २ ॥
अपना ऊंचनीचघर भोजन घ्रीण कर्म करि उदर भरै ।
ग्रहण अमावस ढुकिढुकिमाँगे करदीपक लियेकूपपरै॥३॥
आपतौ जातिमें ऊंचे हैं परंतु नीचके घर भोजन करै है औ जौन कर्म
अपने को उचितनहीं है तौन घिनहा कम कैकै पेट भरै है । औ ग्रहणमें अमा-
वसमें ढुकिढुकिमाँगे है कि, यहकुदान आन न लैजाय, हमैं लेईं । औ राम-
नाममुंहते कहै हैं सो नाम रूपी दीपक लीन्हे भ्रम कूपमें परे हैं ॥ ३ ॥
( २३६ ) बीजक कबीरदास ।
एकादशीव्रतौ नहिं जान भूत प्रेत हठि हृदय धरै ।
तजि कपूर गाँठी विष बांधै ज्ञान गमाये मुग्ध फिरै ॥४॥
औ एकादशीव्रत उपलक्षणै है अर्थात् साढ़े अट्ठाईस जे व्रत हैं चौबीस
एकादशी औ रामनवमी, कृष्णाष्टमी, बामनद्वादशी, नरसिंहचतुर्दशी और
आधाअनन्त । येजे वैष्णवीब्रतहैं तिनको नहीं जानै हैं अर्थात् वैष्णवी
उपासना नहींकरैं औ मुंहते रामरामकहै हैं । औ भूत प्रेत यक्षिणी आदि जे
उपासनाहैं तिनको करै हैं तामें प्रमाण॥ “अंतः शैवाबहि शक्ताः सभामध्येच
वैष्णवाः । नानारूपधराः कौला विचरन्तिमहीतले” ॥ सो रामनाम जो कपूर
है ताको छोड़िकै नाना पाखंड मत जो विषयहैं ताको धारण कीन्हे ज्ञान गमा-
यके मूर्खचारों ओर फिरै हैं ॥ ४ ॥
छीजै शाहु चोर प्रतिपालै सन्त जननकी कूटकरै ।
कहे कबीर जिह्वाके लंपट यहि विधि प्राणी नरकपरै ॥५॥
तेहिते शाहु जो आत्मा परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रको अंश सदाको दास
या जीवको स्वरूपहैं सो जेहैं ते छीजैहैं । अर्थात् वह ज्ञान वाको भूलिजायहै ।
गुरुवनके बताये जेनाना पाखंडमत तेई चोरहैं तिनको प्रतिपाल कियो कहेसंग
कियो तेईज्ञानको चोरायलेयहैं । औ जे साहबके ज्ञानके बतैया जे संतहैं तिन-
हींकी कूट करै हैं कि, ये मुड़ियनको मत वेदशास्त्रके बहिरे हैं । सो कबीरजी
कहै हैं ऐसे जिह्वाके लंपट प्राणी हैं ते नरकहीमें परै हैं ॥ ५ ॥
इति सत्रहवां शब्द समाप्त ।
अथ अठारहवां शब्द ॥ १८ ॥
राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो ।
अबुझा लोग कहांलौं बूझ बूझनहार विचारो ॥ १ ॥
केते रामचन्द्र तपसीसों जिन यह जग विटमाया ।
केते कान्ह भये मुरलीधर तिनभी अंत न पाया ॥ २ ॥
शब्द । ( २३९ )
मत्स्य कच्छ वाराह स्वरूपी बामन नाम धराया ।
केते बौद्ध भये निकलंकी तिनभी अंत न पाया ॥ ३ ॥
केतक सिद्ध साधक संन्यासी जिन बनवास बसाया ।
केते मुनि जन गोरख कहिये तिनभी अंत न पाया ॥ ४ ॥
जाकी गति ब्रह्म नहिं पाई शिवसनकादिक हारे ।
ताके गुण नर कैसेपैहौ कहै कबीर पुकारे ॥ ५ ॥
राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो ।
अबुझा लोग कहांलौं बूझैं वूझनहार बिचारो ॥ १ ॥
परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनके गुण न्यारे न्यारे हैं । इहां तीन
बार जो कह्यो ताते या आयो कि साहबके गुण, मायाके गुणते जीवात्माके
गुणते ब्रह्मके गुण न्यारे हैं । कौनी रीतिसे न्यारे हैं कि, मायाके गुण नाशवान्
हैं बिचार किये मिथ्या हैं । औ साहबके गुण नित्यहैं साँचहैं, औ जीवात्माके
गुण अणु हैं । औ साहब क गुण विभुहैं औ ब्रह्मनिर्गुणत्वगुणब्रह्ममें है औ
साहब निर्गुण सगुणके परे है सो या प्रमाणपीछे लिखि आये हैं ॥ “ अपाणि-
पादोजवनो गृहीता” इत्यादि औ ब्रह्मसंबंधी अनुभवानंदजीवको होइ है औ साहब
अनुभवातीत है याते साहबक गुण सबते न्यारे हैं सो वा बात अबुझा लोग
कहांलौं बूझैं, कोई बूझनहार तो बिचारते जाउ ॥ १ ॥
केते रामचन्द्र तपसी सा जिन यह जग विटमाया ।
कत कान्ह भये मुरलीधर तिनभी अंत न पाया ॥ २ ॥
केतन्यो रामचन्द्र हैं कौन रामचन्द्र ज तपस्वी ब्रह्म हैं तिनसों जगत बिट-
माया कहे बनायोहै । अर्थात् जे नारायण रामावतार लेइहैं सो ब्रह्माते कैसे
जग बनवायो । सो कथा पुराणन में प्रसिद्धहै कि, कमलमें ब्रह्मा भये, तब
आकाशवाणी भई, “ तप तप ” तब तपस्या कियो, तब नारायण प्रकटभये,
( २३८ ) बीजक कबीरदास ।
ते ब्रह्माते कह्यो कि, जगत् बनावो, तब बनावत भयो। नारायण जे रामावतार लेइ हैं
तामें प्रमाण " यदास्वपार्षदौजातौराक्षणप्रवरौप्रिये । तदानारायणः साक्षाद्रा-
मरूपेणजायते ॥ प्रतापीराघवसखा भ्रात्रावै सहरावणः । राघवेनतदासाक्षात्साके-
तादवतीर्यते " ॥ नारायण अंत न पायो ते नारायण रामचन्द्र क्षीरशायी
श्वेत द्वीप निवासी बहुतहैं जिनकेगुण को अंतकोई नहीं पावैहैं। अरु जिनके
गुण सबके गुणते न्यारे हैं ते श्रीरामचन्द्र एकई हैं। औ केतेकान्ह मुरलीधर
भये तिन भी अंत नहीं पायो काहेते कि उनके अनंत गुणहैं ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ वाराह स्वरूपी वामन नाम धराया ।
केते बौद्ध भये निकलङ्की तिनभी अंत न पाया ॥ ३ ॥
केतिक सिद्ध साधक संन्यासी जिन वन वास वसाया ।
केते मुनिजन गोरख कहिये तिनभी अंत न पाया ॥ ४ ॥
औ केतन्यो मत्स्य कच्छ बाराह वामन बौद्ध कलकीरूप भये तिनभी
अंतनहीं पायो सोई अवतार जो कहिआये तिनमें वामन नरसिंह आदिक अव-
तार आइगये तेऊ अंतनहीं पायो है॥ ३॥ औ केतन्यो सिद्ध साधक संन्यासी भये
जे वनमें वासकरतभये औ केतन्यो मुनि गोरख इंद्रिन के रखवार भये तेऊ-
ताको अंत नहीं पायो ॥ ४ ॥
जाकीगति ब्रह्मै नहिं पाई शिव सनकादिक हारे ।
ताके गुण नरकैसे पैहौ कहै कबीर पुकारे ॥ ५ ॥
औ जाकी गति ब्रह्मा शिव सनकादिक नहीं पायो काहेते कि, तिनके अनंत
गुण हैं सो हे नर! तुमकैसे पावोगे? जे गुरुवनके कहे कहौहौ कि महीं राम हौं
सो मिथ्या है बे रामके गुण न तुम्हारे गुरुवा पायो है न तुम पावोगे । व्यंग
यहहै कि, ते वे पाखंडी गुरुवनको संगछाँड़िकै रामोपासकनको संगकरौ तब
जैसी भजन क्रिया वे करैहैं सो करिके निर्गुण सगुणकेपरे साहबके लोकजाउ,
तब तिहारो जनन मरण छूटैगौ । ये गुरुवालोग जौनेमें सिद्धांतकरि राखे हैं ते
सब याहीकैतोहै निर्गुण सगुणमें है औ परमपुरुष पर साहबको लोक सबके
परहै तामें प्रमाण कबीरजीको रेखता झूलनाछंद पिंगलमेंकहै हैं ॥ " चला
जबलोकको शोकस्रब त्यागिया हंसको रूपसतगुरु बनाई । भृंगज्यौंकीटको
पलटिभृङ्गैकिया आपसमरङ्गदै लैउड़ाई । छोड़ि नासूतमलकूतको पहुंचिया
विष्णुकी ठकुरीदीखजाई । इंद्रकुम्बेरजहँ रंभको नृत्यहै देवतेंतीस कोटिक र-
हाई॥ १॥ छोड़िवैकुंठको हंसआगे चला शून्यमें ज्योतिजगमग जगाई।ज्योति परका-
शमें निरखि निस्तत्त्वको आपनिर्भयहुआ भयमिटाई । अलखनिर्गुण जेहिवेद स्तुति
करै तीनहूं देवकोहै पिताई।भगवान तिनकेपरे श्वेत मूरतिधरे भागको आन
तिनकोरहाई ॥ २ ॥ चारमुकामपरखंडसोरहकहें अंडको छोर ह्यांतेरहाई।अंडके-
परे स्थान आचिंत को निरखिया हंसजब उहांजाई । सहस औद्वादशै रूहहैं सङ्गमें
करतकल्लोल अनहद बनाई । तासुके बदनकी कौनमहिमाकहौं भासती देह
अति नूरछाई ॥ ३ ॥ महल कंचनबने माणिकतार्मेजड़े बैठतहँ कलशअखंड
छाजै । आचिंतकेपरे स्थान सोहंगका हंस छत्तीसतहँवां बिराजै । नूरकामहल
औ नूरकाभुम्य है तहांआनंद सो द्वन्दभाजै । करतकल्लोल बहुभांतिसे संगयक
हंससोहंगके जो समाजै ॥ ४ ॥ हंसजब जात षट्चक्रकोबेधिकै सातमुका-
ममें नजरफेरा । सोहंगके परे सुरति इच्छाकही सहसबामन जहँहंसहेरा ।
रूपकी राशितेरूप उनको बना नहीं उपमा इन्दुजीनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै
शब्दको टेकिचढ़ि देखि मुकामअंकूरकेरा ॥ ५ ॥ शून्यकेबीचमें विमल बैठक
जहाँ सहज स्थान है गैब केरा । नवो मुकामयहहंसजब पहुंचिया पलकबिलंबह्वॉँ
कियोडेरा । तहाँसे डोरिमक्रतारज्यों लागिया ताहिचढ़िहंसगो दै दरेरा ॥ ६ ॥
भयेआनन्दसे फंदसब छोड़िया पहुंचिया जहाँ सतलोकमेरा । हंसिनीहंस सब-
गायबज्जायकै साजिकै कलश वहिलेन आये । युगनयुगबीछुरेमिलेतुम आइकै
प्रेमकरि अंगसों अंगलगाये । पुरुषनेदर्शनजबदीन्हियाहंसको तपनिवहु जन-
मकी तवनशाये । पलटिकैरूप जबएकसेकीन्हियामनहुं तवभानु षोडशउगाये
॥ ७ ॥ पुहुपकेदीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देहजबहंसपाई । पुहुपके से-
हरा हंसऔहंसिनीसच्चिदानन्द शिरछत्रछाई । दिपैंबहुदामिनी दमकबहुभांति
की जहाँ घनशब्दको घुमड़लाई । लेगेजहँवरषने गरजघनघेरकैकै उठततहँ शब्द
धुनिअति सोहाई ॥ ८ ॥ सुनैसोई हंसतहँ यूथकेयूथह्वै एकहीनूरयकरङ्गरागै ।
करतबीहार मनभामिनी मुक्तिमै कर्म औ भर्मसबदूरिभागै ॥ रङ्कऔभूप कोइपर-
खि आवैनहीं करत कल्लोलबहु भाँतिपागे । कामऔक्रोध मदलोभ अभिमान
सब छाँड़िपाखंड सतशब्दलागे ॥९॥ पुरुषके बदनकी कौनमहिमाकहौं जगत्में
उपमायकछुनाहिंपाई । चन्द्रऔरसूरगणज्योतिलागैनहीं एकहीनक्खयपरकाशभाई ।
पानपरवानजिनबंशका पाइया पहुंचियापुरुषकेलोकजाई । कहैंकबीर यहिभांति
सो पाइहैं सत्यकीराह सोप्रकट गई" ॥ १० ॥ औ वहलोकको बर्णन वेदसा-
रार्थ जो सदाशिवसंहिता है ताहूमें है । श्रीसौमित्रिरुवाच " महर्लोकः क्षितेरू-
र्ध्वमेककोटिप्रमाणतः । कोटिद्वयेनविख्यातो जनलोकोव्यवस्थितः ॥ १ ॥ चतु-
ष्कोटि प्रमाणंतु तपोलोकोविराजितः । उपरिष्टात्ततः सत्यमष्टकोटिप्रमाणतः ॥२॥
आयुःप्रमाणंकौमारंकोटिशोडशसंभवम् । तदूर्ध्वंपरिसंख्यातमुमालोकंसुनिष्ठतम्
॥ ३ ॥ शिवलोकतदूर्ध्वंतु प्रकृत्याच समागतम् । विश्वस्यपुरतोवृत्तिः शिव-
स्यपुरतोबहिः ॥ ४ ॥ एतस्माद्वहिरावृत्तिःसप्तावरणसंज्ञका । तदूर्ध्वंसर्वत-
त्वानांकार्यकारणमानिनाम् ॥ ५ ॥ निलयं परमंदिव्यंमहावैष्णवसंज्ञकम् । शुद्ध-
स्फटिकसंकाशनित्यस्वच्छमहोदयम् ॥ ६ ॥ निरामयंनिराधारंनिरंबुधिसमा-
कुलम् । भासमानंस्ववपुषावयस्यैश्चविजृंभितम् ॥ ७ ॥ मणिस्तंभसहस्रैस्तु
निर्मितंभवनोत्तमम् । वज्रवैदूर्यमाणिक्यग्रथितंरत्नदीपकम् ॥ ८ ॥ हेमप्रासादं
मावृत्यतरवःकामजातयः । रत्नकुंडैरसंख्यातर्नरैमर्लयवासिभिः ॥ स्त्रीरत्नैःपर-
माह्लादैःसंगीतध्वनिमोदितैः । स्तुतंचसेवितंरम्यरत्नतोरणमंडितम् ॥ १० ॥
कारुण्यरूपंतन्नी रंगगायस्माद्विनिःसृता । अनंतयोजनोच्छ्रायमनंतयोजनायतम्
॥ ११ ॥ यत्रशेतेमहाविष्णुर्भगवान्जगदीश्वरः । सहस्रमूर्द्धाविश्वात्मा सहस्राक्षः
सहस्रपात् ॥ १२ ॥ यन्निमेषाज्जगत्सर्वंलयीभूतंव्यवस्थितम् । इन्द्रकोटिसहस्राणां
ब्रह्मणांचसहस्रशः ॥ १३ ॥ उद्भवंतिविनश्यंति कालज्ञानविडंबनैः । यदंशेन-
समुद्भूता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ १४ ॥ कार्य्यकारणसंपन्ना गुणत्रयविभावकाः ।
यत्रावर्त्ततेविश्वं यत्रचैवप्रलीयते ॥ १५ ॥ तद्वेदपरमधाममदीयं पूर्वसूचितम् ।
एतद्गुह्यसमाख्यानं ददातु वांछितंहिनः ॥ १६॥ तदूर्ध्वंतु परंदिव्यं सत्यमन्यदू-
व्यवस्थितम् । न्यासिनांयोगिनांस्थानंभगवद्भावितात्मनाम्॥१७॥ महाशंभुर्मोदितेऽ
त्रसर्वशक्तिसमन्वितः । तदूर्ध्वंतुस्वयंभातं गोलोकंप्रकृतेः परम् ॥ १८ ॥"
अरुसहस्रशीर्षपुरुष जो लिख्या है तहँ शुद्धजीव समिटे रहे हैं। वे सम-
ष्टीहैं ताके रोमरोममें अनंतकोटि ब्रह्माण्ड हैं। तहँते अनेक ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति
होइ हैं औ तहँ महाप्रलयमें लीन होइ हैं औ दूसरे सत्यलोकमें जो महा-
शम्भुको वर्णनकियो सो परमगुरुको रूपहै। तामें प्रमाण ॥ “वंदेशंभुंजगद्गुरुं”
औ गुरुसों औ साहबसों अभेदतामें प्रमाणहै ॥ “ आचार्यंमाविजानीयान्नाव-
मन्येतकर्हिचित् इतिभागवते ” औ महाशंभुसों औ महाविष्णुसों अभेदहै तामें-
प्रमाण “ शिवस्यश्रीविष्णोर्यैह गुणनामादिसकलं धिया भिन्नंपश्येत् स ख-
ल्हरिनामाहितकरः ॥ इति स्कंदपुराणे ॥ ” औ नारायण जे वर्णन करिआयें
तेऊ श्रीरामचन्द्रईके रूपहैं तामे प्रमाण ॥ सदाशिवसंहितायाम् ॥ “ वासुदेवो
घनीभूतं तनुतेजो महाशिवः ॥ ” औ गोलोकमें श्रीकृष्णरूपते रघुनाथजी
विहारकरैं औ गोलोकके मध्यसाकेतमें रामरूपते रघुनाथजी विहारकरैं हैं
तामेंप्रमाण सदाशिवसंहिताके बिस्तारते वर्णन करिआये कि, पश्चिमद्वार वृन्दावन
है, उत्तरद्वार जनकपुर है, पूर्वद्वार आनंदबन है, दक्षिणद्वार चित्रकूट है ताके-
आगे यहलोक है तेहिते इहां प्रयोजनमात्र लिख्यो है ॥ “ तेषांमध्ये पुरंदिव्यं
साकेतमितिसंज्ञकम् इति ॥ ” औ साकेत ऊपर कछु नहीं है औ साकेत औ
अयोध्या सत्यासत्य लोक इत्यादिक नाम सब वही लोकके पर्यायहैं तामेंप्रमाण॥
“साकेतान्परंकिंचित्तेदवहिपरात्परम् ॥ ” औ गोलोकजे श्रीकृष्णचन्द्र हैं तेईश्री
रामचन्द्रईके महत॥“सीतारामात्मकं युग्मंमाविशन्प्रतिपूर्वकम् ॥ १॥” श्रीजानकीजी
श्रीरघुनाथजीसों कह्यो कि, वृन्दावनको बिहार करिये, तब रघुनाथजी कह्यो जब
तुम कह्यो तैं एक दूसरा बिहारस्थल बनाइये तब हम वृन्दावन बनायो, राधि-
का तुमभई कृष्णहमभये। सो बिहार करते भये सो हमारई, तुम्हाररूप राधाकृ-
ष्णहैं । या कहिकै आकर्षण करिकै वृन्दावन बोलाइलियो । राधाकृष्ण आइगये
तब राधिकाजी जानकीजीमें लीनभई श्रीकृष्णचंद्र रामचंद्रमें लीनभये । अरु
पुनि बिहारकियो जब बिहार करिचुके तब जानकी रघुनाथ ते निकसिकै बृन्दा
बन समेत राधाकृष्ण चलेगये गोलोकको । सो यह कथा शुकसंहितामें है ताको
एक इलोक लिख्यो है औ विस्तारसे देखिलीजयो । तेई श्रीकृष्णके नखके
प्रकाश ब्रह्म है वहीप्रकाशको मुसल्मान लामकान कहै हैं । औ जे दशमुकाम
रेखतामें कहिआये औ दश वोई मुकाम सदाशिवसंहितामें वर्णन करिआर्ये
१६
( २४२ ) बीजक कबीरदास ।
तिनमें पांच मुकाम मुसलमाननके कहै हैं औ पांचमुकाम छोड़िदेइहैं तिनकों
उनहींमें गतार्थ मानिलेइहैं । मुसलमाननमें वोई पांच मुकामके दुइनामहैं “ नासू-
तको आलम अजसामकहे शरीरधारी । ” याते यहलोकके सब आइगये औ
मलकूत को “ आलम मिसाल फिरिस्तनकै दुनियां देवलोक ” औ जबरूतको
आलम अर्थात् कहे पृथ्वी अप तेज बायु तत्त्वरूपहै “ औ लाहूतको आलम
कूर्ब कहे नूर अर्थात् श्रीकृष्णको मुख्यप्रकाशजोहै ब्रह्म वहीको कही लोकप्रकाश
लिख्योहै ” औ “ हाहूतको मुकाम महम्मदकैकहे जहांभर महम्मद पहुंचे है ”
श्रीकृष्णके लोक अब इनके मंत्रऊ लिखे हैं॥ जिकर नासूत “लाईला हइलाहू”
जिकिर मलकूत “इल्लिल्लाहू” जिकिरजबरूत “अल्ला: अल्ला:” जिकिरलाहूत
अल्लाह जिकिरहाहूत “हूंहूं” ॥ सोइनको रातिदिन पांचहज़ारबार जपकैरै ।
जब पांचहज़ारहोय तबध्यानकरै औध्यानमें गड़ै औ आपको भूलै फिरिजहानकों
भूलै पुनि जिकिरि कहे मंत्रको भूलै तब क्रमते मजकूरको पहुंचै अर्थात् अल्हा-
हीजे श्रीकृष्णचंद्र हंसस्वरूप देइँ तामें स्थित ह्वैकै जिनको प्रकाश निराकार जो हैं
ऐसेजे श्रीकृष्णहैं तिनकेपास होत उनके बताये मन बचनके परे जे खुद खाविंद
सबके बादशाह जे श्रीरामचंद्र है तिनके पास जाताहै । सो यह मत महम्म-
दजे साहबके बंदे हैं तिनको साहब भेजा । तब जे साहबके पास पहुंचनवारे रहे
तिनको महम्मद भेद बताइदियो । सो बिरले कोई कोई यह भेद जानै हैं जे जानै हैं
ते साहबके पासपहुंचै हैं । अब याको क्रम बतावैं हैं जौनी भांति साहबके पास
पहुंचै तामें प्रमाण॥पीरानपीरसाहबके पासपहुंचे ऐसेजेहैं सलोकके मालिक पनाह
अता तिनको कबित्त ॥ “देह नासूत सुरै मलकूत औ जीव जबरूतकी रूह
बखानै । अरबीमें निराकार कहै जेहि लाहुतै मानिकै मंजिल ठानै॥आगे हाहूत
लाहूत है जाहूत खुद खाविंद जाहूतमें जानै । सोई श्री रामपनाह सब जग-
नाह पनाह अता यह गानै ॥ १ ॥दोहा॥तजै कर्मनासूतलहि, निरखै तब मलकूत ।
पुनि जबरूतै छोड़िकै, दृष्टि परै लाहूत ॥ २ ॥ इन चारोंतजि आगेही, पना-
हअता हाहूत। तहां न मरै न बीछुरै, जात न तहँ यमदूत ॥३॥ औ “जुलजला-
लअव्वल” एकराम मुसलमानोंके कहै हैं किताबनमें प्रसिद्धहै साहब बुजुर्गीका
साहब बख्शीश का अर्थात् वह सबते बुजुर्गी कहे बड़ा है उससे बड़ा कोई नहीं
शब्द । (२४३)
है । औ वही गुनाहका बख्शनेवाला है औरे के छुड़ाये न छूटैगो । जब श्रीरा-
मचन्द्र जीवको छोड़ावेंगे तबहीं छूटैगो । औ खोदाके सौ नाम हैं निन्नानब
सगुणनाम हैं, औ मुक्तिको देनवारो निर्गुण अल्लाह नामही है वही खुद खाविं-
दका नाम है । तौने बात वेद शास्त्रनमें भी सिद्धान्त कियो है । कोई कोई जे
साहवके पहुंचे हैं ते बेग्रंथ जानै हैं सो लिख्यो है कि, और देवतनके नामतें
अधिक और सब नाम भगवान्के हैं औ भगवान्के सब नामते अधिक रामनाम
है । सो महादेवजी पार्वतीजी ते कह्यो है ॥ “सहस्रनामतत्तुल्यंरामनामं वरा-
नने । सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः । एकएव परोमंत्रोरामइत्यक्षरद्व-
यम् । विष्णोरेकैकनामापि सर्ववेदाधिकंमतम् । तादृङ्नामसहस्त्रेणरामनामसमंस्मृ-
तम्” ॥ इतिपाद्मे॥ औ गोसाईंजीहू लिख्यो है। “रामसकल नामनते अधिका”॥
सो यही रामनाम तै अल्लाहनाम निकस्यो । “राम नामके
मकारको रकार भये आगेका पीछे आया तब अरभया सो अर राके पीछे आया
तब “अर राम भयो रलके अभेदसे अल्लाभयो” व्याकरण वर्णविकार वर्णकार
वर्णविपर्यय पृषोदरादि पाठसे सिद्ध शब्दको साधनके वास्ते प्रसिद्धहै । औ
जो सदाशिव संहितामें दशमुकाम लिखि आये हैं औ पहिले रेखतामें लिखि-
आये हैं सो कबीरजी पुनि खुद खाविंदको दूसरे रेखतामें वहीबात लिख्यो है
“जुलमत नासूत मलकूतमें फिरिस्ते नूर जल्लाल जबरूतमें जी । लाहूतमें नूर
जम्माल पहिंचानिये हक मकान हाहूतमें जी ॥ बका बाहूत साहूत मुर्शिद
वारहै जोरब्ब राहूतमें जी । कहत कबीर अबिगति आहूतमें खुद खाविन्द
जाहूत में जी ॥ १ ॥” सो वे जे परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनके गुण
सबते न्यारे हैं औ उनको धाम सबते परेहै वाकोकोई अंतनहीं पायो सो तिनके
गुण हे जीवो ! तुम कैसे पावोगे ॥ ५ ॥
इति अठारहवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्नीसवां शब्द ॥ १९ ॥
एतत राम जपो हो प्राणी तुम बूझो अकथ कहानी ।
जाको भाव होत हरि ऊपर जागत रैनि विहानी ॥ १ ॥
( २४४ ) बीजक कबीरदास ।
डाइन डारे सोनहा डोरे सिंह रहे वन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय बन हाँकै पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल बन डाहै मक्ष अहेरा खेलै ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो यह पद निरधारै ।
जो यहि पदको गाय विचारै आप तरै अरुतारै ॥ ४ ॥
एतत राम जपोहो प्राणी तुम बूझौ अकथ कहानी ।
जाको भाव होत हरि ऊपर जागत रैनि बिहानी ॥ १ ॥
एतत कहे ई जे निर्गुण सगुणके परे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जपो।
कैसे जपो कि, अकथ कहानी कहे मनबचनके परे जाह रामनाम सो बूझ
अर्थात् रामनाममें साहबमुख अर्थ बूझिकै जपो । श्रीरघुनाथ जीके ऊपर जाकों
भाव होय है ताको यहसंसाररूपी जो है निशा बिहानई है जायहै; सोवंततें
जागिउठैहै । ताते यह ध्वनित होय है जाकौ रघुनाथजी के ऊपर भाव नहीं हैं
ताको यह संसार रूपी निशा बनी रहैहै बिहान नहीं होयहै; जागै नहीं है;
कहे ज्ञाननहीं होयहै; भ्रमरूपी निशामें सोवैते रहै है । यहीसंसारमें जीव कैसे
घेरे रहते हैं सो कहै हैं ॥ १ ॥
डाइन डोरे सोनहा डोरे सिंह रहे बन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥२॥
डाइनि जेहैं गुरुवालोग छालाके डारनेवाले ने वाके कानमें अपनी विद्या-
डारिदियो । इहां गुरुवालोग डाइनैं हैं ने सिंहको मंत्रते बाँधि देयहैं वा
बनत्यागि और बननहीं जायहैं । औ सोनहा जोहै सो हंसमंत्र तौनेमों
डौंरा बांध्यो अर्थात् यह कहो कि; तूहींब्रह्महै और कहां खोजहै, तैंवा है। यह-
मंत्रको अर्थबतायो सो सिंह जो है जीव या सामर्थ है सो उनही बाणीरूप बन-
में घेरि रह्यो कहे बँधिरह्यो तबपांचौ जे ज्ञानेन्द्रियहैं पांचौ जे कर्मेन्द्रियहैं अथवा
शब्द । ( २४५ )
पाचौ जे प्राणहैं प्राण अपान समान उदान व्यान तैई कुटुम्ब हैं तिनमें मिलिकै
जूझैलाग पांच कुटुम्ब सिंहके पंचआनन जब सिंहको मारन जाय है तब झुनका
बाजा बजावै है तैसे यहां गुरुवालोग अनहद सुननकी युक्ति बतावनलगे सों
दशौ अनहदकी धुनि सुननलग्यो तेई बाजा हैं ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय वन हांकै पारथ बाना मेलै ।
सायरजरै सकल वन डाहे मच्छ अहेराखेलै ॥ ३ ॥
रोह कौनकहावै कि, जो कमरीमें आगीबारत जायहै झुनका बजावत जायहै
तामें मृगा मोहि जायहैं सो वाहीकी छाया में पीछे धनुष बाणकी बांसकी बंदूकादि
आयुध लिये खड़े रहै है शिकारी सोई मारैहै यही रोहहै. सो मृगराज जोहै जीव
ताको गुरुवालोग जब योगाभ्यास कैकै धोखा ब्रह्मको मकाश बतायो तामें-
रहिगयो कहे मोहिगयो जो कहौ हाँकि कौन लायो? तौ संशय रूप हँकबैया है
जैसे आगी बरत देखिकै वा बाजा सुनिकै टेममें मोहिकै मृग मृगराज जायहै या
कैसो बाजा बाजै है या कैसी टेमहै या संशयजो है ज्ञानमिलनकी चाह सो याकों
हाँकिले आयों ऐसे गुरुवा लोगनकी जोबताई बाणीबनहै जौन अनहद सुनिबेकी युक्ति
बतायो तौन अनहदकी धुनिसुनिकै औ जौन ज्योति बतायो सोऊ योगाभ्यास
करिकै ज्योतिरूप ब्रह्म देखिकै जीव या संशय कैकै निकट जायहै औ याबिचा-
चारै है कि, याः ज्योतिरूप ब्रह्ममैंहीं हौं कि, मोते भिन्नहै तब शिकारी जैसे
ढुको रहैहै ऐसो मूलाज्ञान रूप शिकारी अहं ब्रह्मास्मि वृत्तिरूप बाण मारि वा
जीवको अनुभव कराय देयँ कि, महीं ब्रह्महौं वाके जीवत्वको नाश कै देयहै
यहीमारिबौहै ॥ औ जैसे बाण लागे मृग राजको अंतःकरण जर उठै है अधि-
क कोपै है बनमें जोई आगे वृक्ष परैहै तौने पर चोटँ करैहै, जो मारनवालेकों
देखै है तो वाहूको चीर खायहै ऐसे जब आपनेको ब्रह्ममान्यो तबसायर जो
संसारहै सो जरैहै अर्थात् संसार याको मिथ्या जानि परैहै औ वन डाहैहै कहे
वा दशामें बाणीरूप बन सोऊ भूलिजायहै । ऐसे बधिक मारयो बधिककों बाघ
मारयो वधिकको जबमारिकै दोऊ गलिकै नदी में मिल्यो तब मछरी खायो ।
अथवा मारिकै दोऊ बहैरहै कीड़ापरे जब बाढ़को जलआयो तबमछरी खायों
( २४६ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसें ब्रह्महु में लीनहै अठईं अवस्थाको प्राप्तभये तब न जीवत्वरह्यो न मूलाज्ञान
रह्यो ऐसैहूबये तथापि साहबको बिना जाने मच्छ जो काल है सो खायलेइहै,
फिरि संसारमें परै है तामें प्रमाण॥"येऽन्येऽरविंदाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावाद्वि-
शुद्धबुद्धयः। आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततःपतन्त्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः॥" इतिभा-
गवते ॥ कबीरजीकोप्रमाण ॥ "कोटि करम कटपलमें, जोराचै यक नाम । अने-
क जन्म जो पुन्य करै, नहीं नाम बिनु धाम ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो, जो यह पद निरधारै ॥
जो यह पदको गाइ बिचारै आपु तरै अरु तारै ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, हेसंतो ! जो यह पदको निराधारै कहे सारासार
बिचारकरै औ जौन ब्रह्मपद कहियाये तौनेको गाइ बिचारै कहे माया बिचारै
सों आपु तरै है और आनहूको तारै है अर्थात् साहबको बा जानै औ औरहूकौं
जनाइ देइ ॥ ४ ॥
इति उन्नीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बीसवां शब्द ॥ २० ॥
कोइ राम रसिक रस पियहुगे । पियहुगे सुख जिय हुगे ॥१॥
फल अमृतै बीज नहिं बोकला शुकपक्षी रस खाई ।
चुवै न बुन्द अंग नहिं भीजै दास भँवर सँगलाई ॥ २ ॥
निगमरसाल चारि फल लागे तामें तीनि समाई ।
एक है दूरि चहै सब कोई यतन यतन कोइ पाई ॥ ३ ॥
गयउ वसंत ग्रीष्म ऋतु आई बहुरि न तरुवर आवै ।
कहै कबीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ ४ ॥